सोमवार, 27 दिसंबर 2021

12122 12122 12122 12122(सुनाई देती है जिसकी धड़कन हमारा दिल या तुम्हारा)

बहर १४ प्रथम प्रयास 🙏
१२१२२  १२१२२ १२१२२ १२१२२

सुबह सवेरे धरा महकती, कमल नया नित खिला हुआ है
नयन उठाकर निहार मानव, गगन में सूरज उगा हुआ है।।1।।

कहाँ से देखो हवा है आई, कि उनका आँचल लगा सरकने
समा गई जो बदन की खुशबू, ये दिल दिवाना बना हुआ है।।2।।

मिलन की बातें धरा गगन की, टपक रहा प्रेम ओस बनकर
सुबह लजाई धरा को देखा, सफेद आँचल भरा हुआ है।।3।।

निकल पड़ी नद पिया मिलन को, चली किनारों को साथ लेकर
मिठास भर दी हृदय की अपने, खुशी से सागर बढ़ा हुआ है।।4।।

उठीं जो लहरें मचल के भागीं, लिपट रहीं वो किनारों से अब
नहीं रहा दूर अब किनारा, समा लहर में छुपा हुआ है।।5।।

शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

11212 11212 11212 11212

इस बहर पर पहला प्रयास सादर है। 🙏(मार्गदर्शन के बाद संशोधित)

11212  11212 11212  11212

कहीं दूर से जो दिखी मुझे, वो करीब इतने यूँ आ गई
न नज़र मिली न पलक झुकी, मेरे मन में फिर भी समा गई।।1।।

जो लिपट रही हवा सर्द सी, लगी आग यूँ जला तन बदन
वो तपिश तेरी थी निगाहों की, मुझे इस कदर जो जला गई।।2।।

खुली लट किसी की जो दूर जब, मेरे दिल को अब तो भाने लगी
 चली फिर बयार जो झूमती, पता उनका मुझको बता गई।।3।।

न मलाल था न कोई खुशी, जो मिली न तू तो कटी यूं ही
मेरे हाथ में तेरा हाथ अब, यही जिंदगी मुझे भा गई।।4।।

सुने खूब किस्से कहानियांँ, पढ़े   नगमे गीत रुबाइयाँ
तेरे थरथराते लबों की धुन, मुझे प्रेम राग सिखा गई।।5।।


शर्मिला चौहान

बुधवार, 8 दिसंबर 2021

बहर_ 122 122 122 122

पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराती मेरी एक प्रस्तुति 🙏


122  122  122  122

विविध फूल सुंदर खिलें नित चमन में
धरा देख उनको रहे मन मगन में।।१।।

कली मुस्कुराती प्रणय राग सुनकर
गजब का है जादू भ्रमर की छुअन में।।२।।

शिखर गर्व करता दिखूँ सबसे सुंदर
दबी मौन है नींव नीचे भवन में।।३।।

लिए है परीक्षा चतुर्थी का चंदा
कमी ना दिखाती ये ललना लगन में।।४।।

दिखे चाँद दूधिया सराहे ये दुनिया
सितारों से रौनक बढ़ी है गगन में।।५।।


लगे दिल को अपना हमेशा से चंदा
करे शीत मन को विरह की तपन में।।६।।

हवा खाद पानी ज़रूरी तरू को
पनपते न पौधे कभी भी सघन में।।७।।

शर्मिला चौहान

सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

221 1222 221 1222


221 1222  221 1222


ओ मीत मेरे मन के, कैसा ये सताना है
हर रोज नया देखो, मिलने का बहाना है।।1।।

ये बात नहीं अच्छी, छुप छुप के मिला करते
सब ओर बिछीं आँखें, घूरे ये ज़माना है।।2।।

आते जो गली मेरी करते हो इशारे तुम
बेकार की रुसवाई, हर रोज उठाना है।।3।।

मैं जान गई मितवा, दिल प्यार भरा तेरा
ख़्वाबों को हक़ीक़त में, तब्दील कराना है।।4।।

बंधन जो लगाते हैं वो खूब करें पहरे
धर धीर हमें फिर भी मन दीप जलाना है।।5।।


जग देख रहा सारा है घोर परीक्षा  ये
जब सोच लिया हमने अब साथ निभाना है।।6।।

नित प्रेम की वो लहरें  उठतीं जो रहीं दिल में
लहरों को किनारों के अब साथ मिलाना है।।7।।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2021

221 2121 1221 212

221 2121 1221 212


जब प्यार से भरा ये ज़माना मिला हमें
तब जीने का हसीन बहाना मिला हमें।।1।‌

हम ढूंढते रहे कि कोई ठौर तो मिले
तब दिल में आपके ही ठिकाना मिला हमें।।2।।

लय ताल जानते नहीं कुछ बेसुरे थे हम
जब आप गुनगुनाए तराना मिला हमें।।3।।

माँगी थी मन्नतें कभी भगवान से बहुत
जो आप मिल गए तो खजाना मिला हमें।।4।।

मिलते नये नये से हमें लोग सब यहाँ
इक साथ आपका जो पुराना मिला हमें।।5।।


शर्मिला चौहान

शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

1212 1122 1212 22 पर गज़ल

प्रथम प्रयास समीक्षार्थ 🙏

रदीफ़_होती है
क़ाफ़िया_ आर

1212  1122  1212  22

धरा गगन के लिए बेकरार होती है
बरस पड़े जो गगन तो बहार होती है।।1।।

सभी को जीत मिले खेल में कहां मुमकिन
कई जीतों में छिपी मौन हार होती है।।2।।

निकल चला ये समय तेज़ रोक लो इसको
पलक झपकते उमर साठ पार होती है।।3।।

प्रवाह साथ तो आसान तैरकर जाना
कठिन मगर हो जो विपरीत धार होती है।।4।।

लबों की चुप्पी वो नज़रें झुकी हुई उनकी
यही अदा तो सनम दिल के पार होती है।।5।।

शर्मिला चौहान

बुधवार, 22 सितंबर 2021

1222 1222 1222 1222

एक प्रयास सादर

1222 1222 1222 1222

हृदय में साथ रहकर मुस्कुराती बात बचपन की
कभी जब याद आ जाती मुझे बरसात बचपन की।1।

चमकती दामिनी के संग बादल का गरज जाना
छिपे माँ की रजाई में निराली रात बचपन की।2।

बरसने से भरी गलियाँ भरे वो खेत चौबारे
चलाना नाव कागज की बड़ी सौगात बचपन की।3।

चने के चार दाने भी बखूबी बाँटकर खाना
नहीं था भेद आपस में न कोई जात बचपन की। 4।

लगाकर शर्त बारिश में गली तक दौड़कर जाना
अभी तक याद है मुझको मिली वो मात बचपन की।5।

शर्मिला चौहान

2122 1122 1122 22

गृहकार्य समीक्षार्थ 🙏 सुझाव के अनुसार संशोधन के बाद।

2122 1122 1122 22

स्वार्थ के बीज हमेशा जो बशर बोता है
देख औरों की खुशी खूब वही रोता है।।1।

हौसला सीख विहग से रे मनुज तू जग में
क्यों सुबह देर तलक ओढ़ के तू सोता है।।2।।

प्रेम की राह कठिन यह तो पता है सब को
जब मिलें हाथ तभी साथ सफल होता है।।3।।


चोट दुनिया ने बहुत बार दिए जो तुझको
घाव सीने पे लिए आज तलक ढोता है।।4।।

खूब खुशियों से भरा आज है दामन तेरा
चंद बातों में उलझ क्यों तू खुशी खोता है।।5।।

शर्मिला चौहान

221 2122 221 2122 की बहर

गृहकार्य प्रथम प्रयास 🙏

221  2122  221  2122

रदीफ़- ले
क़ाफ़िया- आ


सारे भरम हृदय के अपने ज़रा मिटा ले
जो राह सामने है  उस पर कदम बढ़ा ले।1।

नवपुष्प खिल उठें जब तब शाख मुस्कुराए
गम भूलकर जहाँ के जी भर के खिलखिला ले।।2।

तू छोड़ आ गया था वो गाँव याद करता
अब लौट चल वहीं फिर अपना उसे बना ले।।3।।

संसार रूप सागर जो दे रहा चुनौती
कश्ती चला के अपनी  हिम्मत को आज़मा ले।।4।।

वो नाच जो नचाता, सब नाचते उसी पर
तू ताल पे उसी की अपने कदम मिला ले।।5।।

शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 17 सितंबर 2021

2122. 1122. 1122 22

गृहकार्य समीक्षार्थ 🙏 सुझाव के अनुसार संशोधन के बाद।

2122   1122  1122  22

स्वार्थ के बीज हमेशा जो बशर बोता है
देख औरों की खुशी खूब वही रोता है।।1।

हौसला सीख विहग से रे मनुज तू जग में
क्यों सुबह देर तलक ओढ़ के तू सोता है।।2।।

प्रेम की राह कठिन यह तो पता है सब को
जब मिलें हाथ तभी साथ सफल होता है।।3।।


चोट दुनिया ने बहुत बार दिए जो तुझको
घाव सीने पे लिए आज तलक ढोता है।।4।।

खूब खुशियों से भरा आज है दामन तेरा
चंद बातों में उलझ क्यों तू खुशी खोता है।।5।।

शर्मिला चौहान

बुधवार, 8 सितंबर 2021

कहानी " नया नामकरण"

कहानी- "नया नामकरण"
(पलाश, उमाकांत भारती जी को भेजी, जुलाई दिसम्बर २०२३ अंक में प्रकाशित)

दस खरे सिक्कों के बीच एक खोटा तो चल जाता है, बस इसी बात को मानकर कुसुम, जी रही है। तीन बच्चियों की माँ है पर ताने उलहाने इतने झेलती कि दस बच्चे जनी हो। जिसके कारण गाँव भर से झगड़ा मोल लेना पड़ता है वो उसकी तीसरे नंबर की संतान, "कचरा"!

अब बताओ, कचरा भी कोई नाम हुआ ..पर क्या करे कुसुम दो बेटियों के बाद भी जब तीसरी बेटी पैदा हुई तो दाई ने फुसफुसा कर कहा, "मुई.. कित्ती छोरी पैदा करेगी। अरी! दूसरी छोरी के बखत कही थी मैंने, पर तू ना मानी। अब ले, पोस एक और बेटी।"  बच्ची के रोने की आवाज भी ना सुन सकी कुसुम ठीक से।
"क्या करूँ मौसी, मेरी किस्मत में बेटियाँ ही लिखीं हैं तो बेटा कैसे होगा?" नवप्रसूता की थकी, कमज़ोर आवाज थी।

"तुझे टोटका तो बताया था पर तूने सुनी ही नहीं। अब भी वक्त है, इस छोरी का नाम ऐसा रख दे कि कोई अपने बच्चे का ना रखे। जब जब इसको पुकारेगी तब तब तेरी किस्मत में फेर होगा।" दाई की बात कुसुम के दिमाग में घूमने लगी।

सवा महीने तक तो सभी उस बच्ची को गुड़िया, मुनिया कहकर पुकारते पर सवा महीने के बाद, जब आसपास के दो-चार लोगों के बीच पंडित जी के सामने, बच्ची का नाम रखवाया तो औरतें फुसफुसाने लगीं।

"ये क्या कोई नाम हुआ, "कचरा"!  कैसी माँ है ! अपनी सुंदर सी बेटी का नाम कचरा रख दी।" ढोलक पर दो-तीन सोहर गाकर, महिला मंडल नामकरण पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगा।
"क्या करे कुसुम भी, भगवान ने दो के बाद तीसरी भी छोरी भेज दी। अब कचरा ही तो बोलेंगे ना उसे ..हुँह.!" दो बेटों की माँ सगुना ने आँखें मटकाकर कहा।

खैर, कुछ महीनों के बाद सब कुछ सामान्य हो गया और कचरा अपनी बड़ी बहनों के साथ खूब मस्ती करते बढ़ने लगी। दो साल की होते कचरा, खूबसूरत, प्यारी बच्ची लगने लगी। गोल मटोल, गोरी चिट्टी, बड़ी आँखों वाली कचरा, दुकान में सजी गुड़िया लगती थी। सबसे बड़ी खासियत थी कचरा की जु़बान! सीधे, साफ शब्दों का उच्चारण, कहीं कोई तुतलाहट नहीं थी। पूरे वाक्य, कभी संयुक्त वाक्य भी, स्पष्ट तेज बोलती थी। समय के साथ बच्ची, स्वस्थ, तेज और मनमौजी हो गई।

"छोरी की ज़ुबान बड़ी तेज है, चार साल की है पर बोलने में तूफान।  कल मेरे को बोली की तेज ना चल, गिर जाएगी बुआ। बस.. आगे थोड़ी दूर जाकर सचमुच मैं गिर पड़ी। छोरी का नाम वैसी जुबान है।" कमला बुआ, जिसे सारा गाँव "बुआ" ही पुकारता था, ने अपनी दुखती कमर पर हाथ लगाकर कहा।

"बैठो बुआ, चाय पीकर जाना।" कुसुम ने उन्हें मनाने के लिए रोक लिया। बुआ तो फिर बुआ ठहरीं, चाय भी पी लीं और साथ पकौड़े भी बनवा लिए।

"इस लड़की ने खूब परेशानी में डाल रखा है। क्यों बोलती है ऊटपटांग बातें? लोगों ने तुझे 'काली जुबान वाली' का नाम दे रखा है। करम मेरे ही फूटे थे जो छाती पर मूंँग दलने ऐसी छोरी भेज दी भगवान ने।" कुसुम ने गुस्से से दो-चार हाथ जमा दिए कचरा पर।
"अरी.! ज्यादा गुस्सा मत किया कर, इससे पूछ जरा कि अबकी बार बेटा होगा या बेटी?" चौथी बार गर्भवती कुसुम से उसके पति मनोहर ने कहा‌
"क्या पूछूँ? कभी कोई जवाब अच्छा देती है‌। बित्ते भर की छोकरी गज भर ज़ुबान, वो भी काली।" गुस्सा कम ना हुआ था कुसुम का।

"अम्माँ, मेरे को भाई चाहिए, छोटा सा भाई।"  कचरा ने दोनों हथेलियों से छोटा आकार बना दिया‌
"आज तो तेरी ज़ुबान सच हो जाए, तो तेरे मुंँह में घी-शक्कर पड़े।" कहते हुए कुसुम कचरा को बेतहाशा चूमने लगी।

तीन-तीन बेटियों को जन्म देते-देते, बेटे की धूमिल होती आशा को जैसे नव रुप मिल गया। पति की इच्छा, समाज का दबाव झेलते हुए कुसुम का शरीर और मन, थक गए थे। छोटी बच्ची की बोली ने, उम्मीदों के दीपक में विश्वास का तेल भर दिया।

दिन, महीने जैसे-जैसे आगे बढ़ते, कुसुम का शरीर भारी होता जान पड़ता। अब आए दिन कचरा की बड़-बड़ उसको उतनी बुरी नहीं लगती। इस बार तो दाई ने भी चार-पांँच चक्कर लगा लिए‌ थे।

"कहती थी ना मैं कि छोरी का बेकार सा नाम रख दे। मेरा टोटका काम कर गया।" दाई जब जब आती, चाय नाश्ता करके ही जाती। 
"अभी बच्चा हुआ तो नहीं ना मौसी, लड़का ही होगा कैसे पक्का बोल सकते हैं?" दाई को कुसुम ने समझाया। 

तीन-तीन बेटियों को संभालना, घर का काम करना और शरीर की कमजोरी ने कुसुम को परेशान कर रखा था। अठारह में ब्याह कर आई थी कुसुम और अब अट्ठाइस में चौथी बार गर्भवती हुई थी।  खेती किसानी ठीक थी इसलिए खाने पीने की कमी तो नहीं थी परंतु बार बार मातृत्व का अनुभव करके, कुसुम का नाज़ुक शरीर इस बार बहुत कमजोर हो गया था।
"तू दूध घी खाया कर, छोरा अच्छा पैदा होगा। हमारे वंश को आगे बढ़ाने वाला वही तो है।" कुसुम को मनोहर समझाया करता।
कैसे कहती कुसुम कि तीन तीन बच्चियाँ हैं, उन्हें पहले खाने-पीने को देगी या खुद खा लेगी। पति की आशाओं से मानसिक दबाव महसूस करने लगी थी कुसुम।

"मेरी माँ को बुला लेती हूँ इस बार, रहेगी तो कम से कम चूल्हा-चौका संभाल‌ लेगी।" कुसुम ने धीमे स्वर में पति से पूछा।
"रहेगी तुम्हारी माँ हमारे घर? उनको तो बेटी का घर रास नहीं आता" मनोहर ने चोट की।
"मना लूँगी मैं, तुम हाँ कहो तो।" कुसुम ने थोड़ी ज़िद की और मनोहर मान गया।

मनोहर की माँ बचपन में ही गुजर गई थी और कुसुम ने ससुर को तो देखा परंतु सास का साथ नहीं मिला। कुसुम की शादी के बाद, ससुर भी धर्म स्थानों की यात्रा पर चले गए तो फिर कभी लौटकर नहीं आए। मनोहर और रिश्तेदारों ने बहुत पता लगाया पर निराशा ही हाथ लगी।

कुसुम की मांँ आ गई और कुसुम ने चैन की सांँस ली। माँ, बच्चियों का ख्याल भी रखती, रोटी पानी भी कर लेती थी। सचमुच, इस उम्र में भी माँ का उत्साह देखकर कुसुम को लगता कि भगवान "माँ" को गढ़ने में कौन सी माटी लगाता होगा जो हर पीढ़ी, हर उम्र की माँ में समान वात्सल्य मिलता है। नानी, कचरा को नहीं भाती थी क्योंकि वो दिन भर हिदायतें देती रहती। समय पर उठो, नहाओ खाओ.! कचरा ऐसे बंधन से ऊब रही थी।

"अम्माँ, नानी अपने घर क्यों नहीं जाती?" कचरा ने एक रात कुसुम से पूछा।
"हमारे घर ही रहेगी नानी, नानी खाना बनाती है बड़ी अच्छी है ना!" कुसुम ने बिटिया से पूछा।
"मुझे अच्छी नहीं लगती, ज्यादा दिन ना रहेगी नानी, देख लेना।" कहकर चार साल की बच्ची तो सो गई पर कुसुम की नींद उड़ गई।

अब होनी को कौन टाल सकता है, कुसुम का भाई छज्जे में खपरैल डलवा रहा था। पैर फिसलने से जो गिरा की पैरों में प्लास्टर चढ़ा कर पलंग पर आ गया।
कुसुम की माँ , बेटे का समाचार सुनकर व्याकुल हो गई और कुसुम से अपने वापसी का अनुरोध करने लगी। 
"पता नहीं, लल्लन को कितनी चोट लगी है। बहू भी अकेली, घर संभालेगी, बच्चे और अब लल्लन की देखभाल भी।" 

गाँव के एक आदमी के साथ, माँ को विदा करके अब कुसुम बहुत अकेलापन महसूस कर रही थी। माँ के साथ थोड़ा बहुत हाथ बँटाकर, अपने और भाई के बचपन के किस्से, आस-पड़ोस की बातें करते हुए समय बीत जाता था और आराम भी था।

वापस वही काम, बच्चों की चिक-चिक और चिड़चिड़ाहट का दौर शुरू हो गया। भाई को भी डाॅक्टर ने बेड रेस्ट और कुछ एक्सरसाइज बताई थी तो अब माँ के आने की कोई गुंजाइश बची नहीं थी।

सातवें महीने के आते-आते, कुसुम का शरीर पीला पड़ गया। कमजोरी से हाथ-पैरों की नसें दिखने लगीं। साँस फूल जाती थी तब मनोहर उसे डॉक्टर के पास ले गया। सरकारी अस्पताल की इकलौती महिला डॉक्टर ने जाँच करके बताया कि खून की कमी है। अच्छा पौष्टिक भोजन और साथ में कैल्शियम आयरन की गोलियां लिख दीं। इस बार प्रसव इसी अस्पताल में कराने का सोच रखी थी कुसुम ने।

शाम को दाई भी आ पहुँची  जो कुसुम के अस्पताल में जचकी कराने की बात से नाराज़ थी। कुसुम ने उसे बताया कि अस्पताल से घर आने पर जच्चा-बच्चा का नहलाना, मालिश और सिंकाई सब दाई को ही करना है। उसे नई साड़ी ‌देने का वादा किया कुसुम ने। 

अपने अंदाज में दाई ने कहना चालू किया, "क्या हालत बना ली तूने? भगवान ने सबकुछ दिया है तू तंदुरुस्त रहकर ही बेटा पैदा करेगी तो आगे सब ठीक रहेगा‌। ऐसा रहा तो तू मर ही जाएगी।" कुसुम तो सिर झुकाए सुन रही थी परंतु कचरा नहीं सुन पाई।

"क्यों, क्यों मरेगी मेरी अम्माँ? कभी नहीं मरेगी। तुम बहुत बुरी हो। जाओ..भाग जाओ। तुम ही मर जाओ! नहीं मरेगी मेरी अम्माँ, कभी नहीं मरेगी!" कचरा  जोर से चिल्ला रही थी, "तुमने ही मेरा नाम कचरा रखवाया था ना, बहुत गंदी हो तुम! भाग जाओ!"

दाई तो सिर पर पैर रखकर घर की ओर निकल गई। रास्ते भर रोते चिल्लाते जा रही थी कि," हे भगवान! 'काली जुबान वाली' छोरी ने मरने का श्राप दिया है। हे प्रभु! बचा ले!"

 इधर कुसुम से लिपटकर कचरा सुबकने लगी। दोनों बड़ी बेटियांँ भी आकर चिपक गईं।
कुसुम ने उनको सीने से लगा लिया.।अब वो इन बच्चियों के लिए और आने वाले नए शिशु के लिए जीवन जीना चाहती थी। 

सुबह उठकर देखा तो नौ साल की बड़ी बेटी, उसके लिए चाय और डबलरोटी लिए खड़ी थी। स्कूल से आकर दोनों बड़ी बहनों ने कचरा को नहलाया, खिलाया और खुद भी खाना खा लिए। मनोहर ने शाम को जल्दी आकर दूध दुहकर गरम किया। 

पूरे समय सब मिलकर काम करने की कोशिश करते और कचरा तो एक मिनट के लिए भी अपनी अम्माँ को छोड़ती नहीं थी। कभी कुसुम के बालों में तेल लगाकर अपने छोटे हाथों से मालिश करती तो कभी पैर दबाती। अब बोलती बहुत कम थी और जब बोलती सिर्फ अम्माँ के जल्दी अच्छी होने की बात करती।

दो-तीन दिनों तक सब ठीक चलने के बावजूद कुसुम परेशान थी कि सचमुच दाई को कुछ हो तो नहीं जाएगा। तीन दिन बाद, पास के घर से दाई की जोर से बोलने की चिर-परिचित आवाज सुनाई दी और कुसुम ने बाहर निकलकर देखा।
"कैसी हो मौसी?" डरते डरते कुसुम ने पूछा।
"अरी कुसुम बिटिया, बिल्कुल अच्छी हूँ। दो दिनों  से मैं बहुत डर रही थी परंतु कल मुझे रास्ते में दस हजार रुपए, पर्स में पड़े मिले। उसे पुलिस थाने में दे आई तो मुझे इनाम भी मिला और मेरी फोटू भी पेपर में छपी है, देख तू भी देख!" सचमुच दाई मौसी की फोटो छपी थी। 

"बच्ची के बोलने से क्या अच्छा और क्या बुरा हो सकता है। हमने क्यों ऐसा सोच लिया कि वह जो बुरा बोलती है वही होता है। उस दिन तो दाई ने मुझे मरने का श्राप दिया तो क्या उसकी जुबान काली नहीं हुई।" कुसुम ने बाजू में खड़ी कचरा को प्यार से चूम लिया।

"तू जब अस्पताल से आ जाएगी, तो जच्चा-बच्चा की देखभाल मैं ही करुँगी, तेरी मुँहबोली मौसी जो हूँ।" कहते हुए कुसुम को हाथ से टाटा करते दाई चली गई।

"तीसरी बेटी होने के कारण, कभी इसे प्यार-दुलार नहीं किया।  छोटी बच्ची मन में कितनी दुखी होती होगी तभी कुछ भी बोल‌ देती है।" अम्माँ के स्पर्श से बालमन की कली खिल गई। अम्माँ से लिपटकर बोली, "अम्माँ, मैं कचरा नहीं हूँ ना।"

कुसुम ने उसे छाती से चिपकाकर कहा, "नहीं बिटिया, तू तो खरा सोना है।  बिल्कुल खरा। मेरे घर तो तीन-तीन रत्न हैं , अब मैं जीवन में कभी हार नहीं मानूँगी।" कुसुम ने आगे बात पूरी की, "अब एक साथ दो बच्चों का नामकरण होगा, नए बच्चे का और  सोना का।"

बाहर खड़े मनोहर ने शांति की साँस ली, अब चौथा बच्चा जो भी हो इस परिवार का अंतिम सदस्य रहेगा। वंश बढ़ाने के लिए अब तक कुसुम ने अपने शरीर पर कितने ज्यादती सही है, उसका अंदाजा लगाते हुए मनोहर की आँखें नम हो गईं।

******************

स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।


शर्मिला चौहान
C-1401, निहारिका, कनकिया स्पेसेस
लोकपुरम मंदिर के सामने
ठाणे (पश्चिम)400610
महाराष्ट्र

मो.नं._9967674585
ई-मेल sharmilachouhan.27@gmail.com

शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

खूबसूरती ( कहानी- मे आइ कम इन)

"खूबसूरती"

मुंबई के सबसे शानदार, महंगे एरिया में, कंपनी के ऑफिस का होना गर्व के साथ थोड़ी कठिनाई की बात भी थी माला के लिए। पहले ही पढ़ाई करते समय, लोकल ट्रेनों के साथ जिंदगी की बड़ी दौड़ कर चुकी थी वो।
"एक-दो साल जाॅब कर लूँ, फिर बैंक से लोन लेकर कार खरीद ही लूँगी।" हमेशा से ही जल्दी आगे बढ़ने की उच्चाकांक्षा रखने वाली जवान लड़की को ठहराव पसंद ही नहीं था।
"अरे ..! बाप रे !! आज फिर लेट हो गई हूँ। लोकल ट्रेन, बस का चक्कर है ही बेकार। देखो किस्मत वाले लोग, शान से अपनी कार में आते हैं।" अपने बाजू से कार में जाती लड़की को देख, मन ही मन चिढ़कर माला ने बस स्टॉप से जल्दी कदम बढ़ा लिए।

परिवार की आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। पिताजी कपड़े की मिल में काम करते थे। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी माला, पढ़ने में बचपन से अच्छी थी। मिल के कामगारों के बच्चों के साथ खेलना, उनके साथ घुलना-मिलना पसंद नहीं था उसे।
चाॅल में रहने के कारण, सबके साथ गाना-नाचना, बातचीत करने और पूजा-पाठ का सबसे बड़ा उत्सव, गणेशोत्सव होता था। मिल में और चाॅल में गणपति उत्सव के समय दस दिन, अलग अलग कार्यक्रम होते थे। विसर्जन के दिन पूरा परिवार पंडाल में ही रहता। 
"माँ, मेरे लिए घर में खाना बना दे, मैं वहां नहीं जाऊंगी खाना खाने।" हर साल माला की एक ही जिद रहती।
"क्यों नहीं जाएगी तू? सब परिवार आते हैं दर्शन और खाने को, तू कोई स्पेशल है क्या? जरा जमीन पर पैर रखना सीख। अपने बाप की कमाई पर शर्म आती है ना तेरे को, जरा खुद कमाना तब दिखाना इतने नखरे।" माला की माँ, अपनी छोटी बेटी के व्यवहार, स्वभाव से परेशान हो जाती थी।

भगवान ने बुद्धि के साथ सुंदरता भी खूब दी थी माला को। रंग गेहुंआ, बढ़िया कद-काठी के साथ तीखे नैन-नक्श। बाल तो इतने लंबे, काले, मुलायम की किसी शैंपू का विज्ञापन हो। अब इससे ज्यादा क्या चाहिए किसी को, अपने आपको श्रेष्ठ समझने के लिए।

समय के साथ, माला की दीदी का विवाह हो गया, भाई भी काम करने लगा। माला ने अपनी पढ़ाई पूरी की, उस स्थिति में भी उसने मुंबई के कॉलेज से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

माला की ऊँची महात्वाकांक्षा का साथ किस्मत ने भी दिया। मुंबई के कॉलेज की ही एक रईस लड़की रुबी से, माला का दोस्ताना इतना बढ़ा कि रुबी के पापा की कंपनी में इंटरव्यू के लिए माला को बुलाया गया।

"पापा को बोल दिया है मैंने, तुम्हारी घर की स्थिति भी बता दी है। अच्छा इंटरव्यू देना, तुमको जाॅब मिल जाएगी।" रुबी ने समझा दिया।

माला को इस बात का बुरा लगा कि रुबी ने उस कंपनी में इंटरव्यू के पहले ही उसके घर की स्थिति बता दी। कहीं ना कहीं बात दिल में और चुभती परंतु दो दिन बाद ही नौकरी का आदेश मिल गया और अब माला सब कुछ भूलकर इस नई दुनिया में, अपनी जगह बनाने के लिए तैयार हो रही थी।
अपनी सुंदरता, काम सीखने की ललक और बड़े पदों के लोगों से जल्दी मधुर संबंध बनाने के स्वभाव ने, चार-छह महीनों में माला को कंपनी का जाना पहचाना चेहरा बना दिया।
"तुम कहां रहती हो माला?" लंच टाइम में कंपनी की एक सहकर्मी ने माला से पूछा।
"बस यहीं आसपास ही।" अपने चॉल का पता बताने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी माला की।
अब तो दिमाग में एक ही बात घूमती कि किस तरह एक सिंगल बेड रूम वाला फ्लैट किराए पर लिया जाय। अभी तो पैसे इतने नहीं मिलते थे कि इतना किराया दे सकती।
"बाबा, आपके पास कुछ पैसे हैं तो हम मुंबई में एक फ्लैट लेंगे ना।" एक रात खाना खाते समय माला ने अपने पिताजी से कहा।
"मेरे पास इतने पैसे कहां से आएंगे बेटा! तेरी दीदी की शादी, तेरी पढ़ाई कितनी मुश्किल से हुई है। भूल गई क्या तू, कितने बार हमने एक समय ही खाना खाया।" अपनी इस बेटी की अक्ल पर बाप हतप्रभ रह गया।
"तेरा भाई काम कर रहा है तो अब दो समय खाना मिल रहा है। यह घर, यह चॉल हमारी पहचान है, इसे ना हम छोड़ सकते हैं ना इससे ज्यादा हमारी औकात है।" इस बुढ़ापे में, बेटी की बेतुकी बातें, माँ को परेशान कर रहीं थीं।

"अब तेरी भी शादी कर देने का टाइम है। बिरादरी से अच्छे रिश्ते आ रहें हैं।" माँ की बात पर नाक मुंह सिकोड़ कर माला ने उत्तर दिया।

"नहीं, मैं अभी शादी नहीं करुंगी। अपना फ्लैट लूंगी, कार लूंगी और फिर सोचूंगी।" खाने की थाली सरका कर उठ गई थी माला।

पिछले कुछ दिनों से कंपनी का काम संभालने की जिम्मेदारी रुबी के भाई धवल ने संभाल ली थी। रुबी के पापा की तबियत ठीक नहीं थी और इतनी बड़ी कंपनी की जिम्मेदारी धवल ने संभाल ली।

ऑफिस के स्टाफ से धवल को परिचित कराने के लिए एक छोटी सी वेलकम पार्टी रखी गई थी। पहली बार माला ने धवल को देखा तो देखती रह गई। रुबी से विपरीत, गोरा चिट्टा, हैंडसम लड़का धवल। पार्टी के बाद उसी दिन से अपने केबिन को अपने अनुसार बनवाने का काम धवल ने आर्किटेक्ट को दे दिया।

दो पीढ़ियों के बीच काम करने का अंदाज अलग सा था। धवल एकदम आधुनिक ढंग से काम करना पसंद करता था। सभी कामवालों के मनोरंजन के लिए एक रिक्रिएशन रुम भी बनाने का काम दिया। उसे खुद के लिए "सर" का संबोधन बिल्कुल पसंद नहीं था वह खुद सभी सीनियर लोगों को नाम से बुलाता था।

माला ने उसे सिर्फ दो-तीन, बार देखा था। 
"माला, इस काम को और भी कम स्पेस में, कम खर्च में किया जा सकता है। मुंबई में जगह बेशकीमती है। थोड़ा समय लो, परंतु काम परफेक्ट करके लाना।" केबिन में चार लोगों के सामने कहा था धवल ने।
"सर, आपको मेरा नाम याद है।" आश्चर्य से पूछ लिया था माला ने।
"माला, पहले तो मेरा नाम सर नहीं धवल है। दूसरी बात, मुझे नाम कभी भूलते नहीं।" इस अंदाज से कहा धवल‌ ने की, माला सारी रात सो नहीं सकी।

"क्या लड़का है, अब तो कंपनी का मालिक भी है।" उसका मन ऊँचे ख्वाब देखने लगा। कमा कमाकर कितना भी कर लेगी वो परंतु इन अमीरों की बात निराली होती है। रुबी की तरह धवल की भी अलग अलग कारें, एक से एक ब्रांडेड कंपनी के कपड़े देखकर, माला को उनकी और उनके जैसे अमीरों की ज़िंदगी से ईर्ष्या होने लगी थी।
 
घर में माँ-बाबा और भाई से आने-जाने की तकलीफ़ो का बखान करके, आखिरकार माला ने ऐसे एरिया में वन रुम किचन किराए पर ले लिया जो उसके घर और आफिस के बीच था। किराया इतना था कि अपनी तनख्वाह में खींचतान कर दे सके। घर में पैसे देने का उसने सोचा ही नहीं, भाई है ना मांँ-बाबा का ध्यान रखेगा। कटी शाख की तरह उसने, अपने पेड़ से अलग होने में संकोच नहीं किया।

"आजकल तुम टिफिन नहीं लाती?" उसको आफिस में एक दोस्त ने पूछा।
"हाँ, आजकल मैंने दोपहर का खाना बंद किया है। मोटी होती जा रही हूँ और दिनभर बैठकर काम करना होता है।" कह तो दिया माला ने परंतु भूख तो लगती थी। खुद सुबह खाना बनाकर टिफिन लाने की फुर्ती नहीं थी। रोज बाहर से कुछ लेकर खाने की पर्स अनुमति नहीं देता था। अक्सर चाय-ब्रेड या चाय के साथ पराठा खा आती थी। रात को घर जाकर कुकर में दाल चावल बनाकर खाती। रोज खाते समय मांँ की याद बहुत आती थी परंतु अपने बड़े सुनहरे भविष्य की चाहत में, वह सब भूल जाती थी।

आफिस का रंग-रूप बदल गया था, धवल ने एकदम आधुनिक ढंग से बनवाया था। सभी की सुविधाओं का ध्यान रखा गया था। कई बार माला ने महसूस किया कि उसके लंबे बाल, उसकी आधुनिकता पर धब्बा थे। आफिस में आने जाने वाली, काम करने वाली सभी लड़कियों के बाल‌ एकदम खूबसूरत ढ़ंग से कटे रहते थे। 
"ये पैसा भी कमाल करता है, पैसे खर्च करके लोग अपने चेहरे को कितना बदल लेते हैं।" अक्सर कुछ लड़कियों को देखकर सोचती थी माला। उसका बड़ा मन होता था कि किसी अच्छे बड़े ब्यूटी पार्लर में जाकर, अपने शरीर के रखरखाव पर खर्च करे, परंतु जितना कमाती थी उतना तो घर किराया, आना-जाना और खाने में खत्म हो जाता था।

खैर, धवल के उन्मुक्त और सहयोगी स्वभाव का जादू माला पर इस कदर छा गया कि अब वो सिर्फ धवल की पसंद नापसंद के अनुसार कपड़े पहनती, तैयार होती। बालों की चोटी बनाना बंद करके, ऊपर कसकर बाँध आती।

आज तो माला बहुत खुश हो रही थी क्योंकि कल एक ऑफर कूपन में उसे एक बड़े ब्यूटी पार्लर में हेयर स्टाइलिस्ट से बाल कटवाने का मौका मिला। एक समय अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारे  लगने वाले बालों को, अपनी उन्नति के रास्ते में रोड़ा समझ कर  माला ने मोह त्याग दिया। आज उसे ऑफिस पहुँचने में थोड़ी देर भी हो गई। खूब सज-संवर कर वो आज धवल को एकदम आधुनिक ढंग की दिखना चाहती थी। पैंट और हलके रंग की शर्ट, खुले सुंदर, स्टाइल से कटे खुले बाल, हल्का सा मेकअप। अपनी खूबसूरती पर खुद रीझे जा रही थी माला।

ऑफिस के मेनगेट के अंदर कदम रखा तो आश्चर्यचकित रह गई। बहुत सुंदर सजावट, सारे खुले मैदान में शामियाना लगा हुआ था। 
"शनिवार रविवार की छुट्टी थी और इतनी सजावट हो गई!!ऐसा क्या हो गया?" मन ही मन सोचती ऑफिस के अंदर आ गई। 
आज रुबी को देखकर दूसरी बार आश्चर्य हुआ माला को। रुबी को पापा‌ और भाई की कंपनी, बिजनेस में बिल्कुल रुचि नहीं है।
"हैलो रुबी! आज तुम ऑफिस में कैसे?" माला ने रुबी को देखकर पूछ बैठी। पारंपरिक परिधान में रुबी बड़ी प्यारी लग रही थी।
"डियर माला, ऑफिस तो मेरा ही है इसलिए मेरा आना कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे तुमने कब इतने छोटे बाल कटवा लिए, मेरे लिए तो यही आश्चर्य की बात है!" रुबी ने अपनी पुरानी दोस्त को तल्ख़ स्वर में उत्तर दिया।
अब माला को अहसास हुआ कि सचमुच रुबी इस कंपनी के मालिक की बेटी है। नौकरी में लगने के दो माह बाद से ही माला ने उसे फोन करना बंद कर दिया था, शायद रुबी की नाराज़गी की यही वजह थी। माला अपने भविष्य को संवारने की प्लानिंग में इतनी डूब गई थी कि पढ़ाई के बाद तुरंत जॉब दिलाने वाली रुबी को भी याद करने का समय नहीं निकाला।

"अरे! तुम तो गुस्सा हो गई। मैंने तो यूँ ही पूछ लिया।" आदतन मीठी आवाज बनाकर माला बोली।
"मैं और नाराज़, कभी नहीं! वो भी आज के दिन.?" रुबी ने हँसकर कहा।
"आज क्या विशेष है? तेरा जन्मदिन भी नहीं.! आज क्या है बता तो सही।" माला ने मनुहार की।

"आज मेरे भाई धवल की सगाई हो रही है। मेरे लिए बहुत खुशी का दिन है। भाई ने ऐसी लड़की को पसंद किया जिसका कोई नहीं है, अनाथ आश्रम में पली बढ़ी परंतु स्वभाव, व्यवहार में बहुत प्यारी, दिल से प्रेम करने वाली।" आगे माला के कानों ने सुनने से इंकार कर दिया।

सामने से धवल और उसकी होने वाली जीवनसाथी आ रहे थे। दोनों हाथों में हाथ लिए, जीवन की नयी राह पर चलने के पूर्व सबसे आशीर्वाद ले रहे थे। उस लड़की के लंबे बालों की गूंथी चोटी, उसके कमर से नीचे लटक रही थी। माला के कदम थम गए, वह अनजाने में ही अपने कटे बालों को सहलाने लगी।

***************

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

कहानी_ नीलोफर

प्रकाशित गृहशोभा जनवरी प्रथम अंक २०२२ में

कहानी_"नीलोफर"

खिड़की के सामने अशोक की झाँकती टहनी पर, छोटा सा आशियाना बना रखा था उसने। जितनी छोटी वो खुद थी, उसके अनुपात से बित्ते भर का उसका घर। मालती जब जब शुद्ध हवा के लिए खिड़की पर आती, उसको देखे बिना वापस ना जाती। वो थी ही बला की खूबसूरत! चिकनी चमकती सुडौल काया, पीठ जहांँ खत्म होती वहीं से पूँछ शुरू हो जाती। भूरे छोटे परों पर दो चार नीले परों का आवरण चढ़ा था, यही नीला आवरण उसे दूसरी चिड़ियों से अलग करता था। उस छोटी सी मादा को भी, अपनी सबसे खूबसूरत चीज पर अभिमान तो जरूर ही था। 

 खाली समय में, चोंच से नीले परों को साफ करती, अपनी हलकी पीलापन लिए भूरी आँखों से चारों ओर का जायज़ा लेती कि उसके सुंदर रुप को कोई निहार भी रहा है या नहीं।

उस नन्हीं चिड़िया के खूबसूरत पँखों के कारण ही, मालती ने उसका नाम "नीलोफर" रख दिया था।

"मम्मी, नीलोफर ने शायद अंडे दिए हैं। वो उस घोंसले से हट ही नहीं रही।" मालती की चौबीस साल की बेटी नीलू ने उसी खिड़की के पास से मालती को आवाज दी।
"मुझे भी ऐसा ही लगता है, इसलिए इतनी मेहनत करके घर बनाया उसने।"  कहती हुई मालती भी खिड़की के बाहर झाँकने लगी।

नीलू को बाहर टकटकी बाँधें देखकर, मालती नीलू के बालों पर अंगुलियों से कंघी करने लगी।
"आपने इस चिड़िया का नाम नीलोफर क्यों रखा मम्मी?" नीलू अभी भी उस छोटी चिड़िया में गुम थी।
"उसके नीले पँख कितने प्यारे हैं, बस इसलिए वो नीलोफर हो गई।" मुस्कुराते हुए मालती ने कहा।
"मेरा नाम नीलू क्यों रखा?" अगला सवाल नीलू ने।
"इसलिए कि तुम्हारी नीली आँखें झील सी पारदर्शी हैं। तुम्हारे हृदय की बात, आंँखें कह देती हैं तो तुम नीलू हो।" मालती ने कहा और फिर नीलू की व्हील चेयर को धकेल कर बैठक की ओर ले गई।

नीलू ने रिमोट से टेलीविजन चालू किया और कुछ पंजाबी डांस वाले गानों का आनंद लेने लगी।  किसी त्यौहार का दृश्य था और रंग-बिरंगी पोशाकें पहने लड़कियाँ, ढ़ोल की थाप पर झूम-झूम के नाच रहीं थीं। मालती ने कनखियों से नीलू को देखा, वह तन्मय होकर गाना गा रही थी और कमर के ऊपर के शरीर को नाचने की मुद्रा में ढालने में लगी थी।

उसे गाने के बोल और नृत्य की मुद्राओं में तल्लीन देखकर, मालती उसके बचपन में खो गई।
"मम्मी, मुझे क्लासिकल डांस नहीं सीखना है, मुझे तो डांस वाले फिल्मी गाने पसंद हैं.  सात साल की नीलू ने जिद करके बालीवुड गानों पर नाचना शुरू किया था।
"क्या है मम्मी, ये दिन भर बंदरिया की तरह उछल-कूद मचाती रहती है। आइने के सामने मटकती रहती है और कोई काम नहीं है क्या इसको?" नीलू से चार साल बड़ा, शुभम झल्लाता रहता।
"आप भी नाचो ना, आपको तो आता ही नहीं।" कहती नीलू उसको और चिढ़ाती।

समय पंँख लगा कर उड़ता गया और नीलू नौ साल की हो गई। 
"कल सुबह बस से शुभम की स्कूल पिकनिक जा रही है। हम उसको स्कूल बस तक छोड़ आएंगे।" मालती ने अपने पति से कहा।
"मैं भी जाऊंगी भैया को छोड़ने।" नीलू ने रात को ही कह दिया था।
सुबह सब कार से शुभम को स्कूल बस तक छोड़ कर वापस आ रहे थे।
"पापा, रुको ना! हम वहां रुककर कुछ खाते हैं। मेरी फ्रेंड्स कहतीं हैं कि सुबह यहांँ वड़ा पाव, इडली डोसा और सैंडविच बहुत अच्छे मिलते हैं।" स्कूल के रास्ते पर, एक छोटे से  रेस्टोरेंट के आगे नीलू ने कहा।

सब उतर ही रहे थे और नीलू दौड़कर सड़क पार करने लगी।
"नीलू, बेटा रुको!" मालती की आवाज़ बाजू से गुजरती कार के ब्रेक मारने में दब गई।
मिनटों में पासा पलट गया था, लहुलुहान नीलू अस्पताल में बेहोश पड़ी थी। ‌तब से आज तक वह कभी खड़ी अपने पैरों नहीं हो पाई है। खेलता-कूदता, दौड़ता-नाचता बचपन कमर के नीचे से शांत हो गया। व्हील चेयर में उसकी दुनिया समा गई थी।

"मम्मी, भैया को आज वीडियो कॉल करेंगे तो मुझे उनसे एक बैग मंगवाना है।" नीलू की आवाज़ से चौंककर मालती वर्तमान में आ गई।
"हाँ, आज करते हैं शुभम को काॅल।"  अमेरिका में जाॅब कर रहे बेटे शुभम के बारे में बात हो रही थी।

दूसरे दिन सुबह-सुबह भाई से बात करके, अपने लिए एक मल्टीपर्पज बैग लाने को कहकर नीलू व्हील चेयर लेकर खिड़की पर आ गई।

पापा और भाई की सलाह से, नीलू ने अपनी पढ़ाई ‌ तो चालू रखी ही, साथ ही हस्तकला की सुंदर चीजें भी बनाती रही। ईश्वर ने उसके पैरों की सारी शक्ति मानो हाथों को दे दी। बारीक धागों, सीपियों, मोती, जूट से खूबसूरत बैग और वाॅल हैंगिंग बनाती थी। उसके काम में मदद करने के लिए मालती तो थी ही, साथ एक और लड़की को रखा था जो सामान उठाने, रखने में मदद करती थी। बड़ी बुटीक से आर्डर आते थे और सब मिलकर उसे समय पर पूरा करते। धीरे-धीरे जिंदगी अपनी गति फिर पकड़ने लगी थी।

"मम्मी, आपको मेरी बहुत चिंता होती रहती है ना?" एक चिर-परिचित से अंदाज में नीलू कहा करती थी।
"नहीं तो, मैं क्यों करुँ तेरी चिंता। तू तो खुद समझदार है, अपने काम कर लेती है। बुटीक के आर्डर भी संभालती है और पढ़ाई भी कर रही है।" मालती हमेशा उसे प्रोत्साहित करती।
"आपके चेहरे पर इतनी झुर्रियाँ आ गईं आँखों के नीचे काले निशान हो गए अब भी कहोगी कि कोई चिंता नहीं।" नीलू की गहरी नीली आँखें मालती को अंदर तक भेद जातीं।

नीलू की कमर से निचले अंगों की स्वच्छता, कपड़े पहनाने का काम मालती खुद करती थी, एक जवान लड़की को, किसी दूसरे के हाथों से ये सब काम करवाने की स्थिति का सामना रोज ही दोनों करते थे।

अचानक, चीं-चीं, चीं-चीं की आवाज के साथ, काँव काँव का शोर होने लगा।
"मम्मी, देखो! नीलोफर के घोंसले में एक साथ तीन चार कौए आ गए। उसको परेशान कर रहें हैं। बचाओ मम्मी, नीलोफर को उसके अंडों को।" नीलू की आवाज़ दर्दनाक थी जैसे कोई उसपर घात कर रहा हो।
एक बेबस, व्हील चेयर पर जीवन बिताने वाली लड़की ने, पेड़ पर रहने वाली अकेली चिड़िया के साथ अपने को शायद दिल की गहराइयों से जोड़ लिया था।

 मालती रसोई से भागकर कमरे की खिड़की पर आ गई। नीलू की ओर देखा, वो पसीने से तर-बतर हो रही थी।
"मम्मी, प्लीज नीलोफर को बचा लो। ये कौए उसे मार डालेंगे। आपने जैसे मुझे बचा लिया, इसको भी बचा लो मम्मा..!" नीलू की आवाज़ कुएं से बाहर आने का प्रयास कर रही थी। एक अंधकार जिसमें वो खुद जी रही थी, एक सन्नाटा जिसको वो झेल रही थी जहाँ मीलों उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था। मुट्ठी में आशाओं का क्षितिज था, जो हमेशा मुट्ठी से फिसलने को लालायित रहता।

"बेटा, हर एक को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। कोई दूसरा कुछ मदद तो कर सकता है पर जीवन भर साथ नहीं दे सकता।" मालती ने नीलू का हाथ थाम लिया, "नीलोफर की लड़ाई, उसकी अपनी है। हम सिर्फ ईश्वर से प्रार्थना कर सकतें हैं कि उसको शक्ति दे।" 
"आप तो उन कौओं को भगा सकती हो ना, मैं तो उठकर उन्हें नहीं मार सकती।" नीलू की आवाज कंपकंपा रही थी।
"अपने अंडों की चिंता हमसे ज्यादा नीलोफर को खुद है। तुम देखो, वो कैसे अपनी लड़ाई लड़ेगी।" मालती ने बेटी को दिलासा तो दे दिया परंतु एक नन्ही सी चिड़िया की शक्ति पर उसको विश्वास नहीं था अतः अंदर से एक बड़ी लकड़ी ले आई।

सामने देखकर हतप्रभ रह गई कि चार कौओं से अकेली नीलोफर पूरे विश्वास से जूझ रही थी। अपनी छोटी परंतु नुकीली चोंच से, कौए की आँखों पर वार कर करके, दो कौओं को भगा दिया उसने। एक नज़र अपने अंडों पर डाली, पंख फड़फड़ा कर शक्ति का संचार किया, परंतु यह क्या..? उसके नीले चमकीले पंखों में से दो गिर गए थे। एक भरपूर निगाह गिरे पंखों पर डालकर वो तेजी से चीं-चीं, चीं-चीं करती हुई, बचे दोनों कौओं पर वार करने लगी।

साँस थामकर खिड़की से मालती और नीलू, उस नन्हीं सी चिड़िया का हौसला बढ़ा रहे थे। पक्षी हृदय की बात बहुत जल्दी समझ लेते हैं जो ज़ुबान के रहते मनुष्य नहीं समझ पाता।
 संबल देती चार आँखों ने नीलोफर को बिजली सी गति दे दी। उड़-उड़कर वह अपनी चोंच से लगातार वार करती रही। कौओं की बड़ी, मोटी चोंच से खुद को बचाना छोड़ दिया उसने और आक्रामक हो गई।

आखिर एक माँ के आगे वो दोनों हार गए और भाग खड़े हुए। लंबी श्वास भरकर नीलोफर ने अपने घोंसले में सुरक्षित अंडों को प्रेम से जी भर देखा। उसकी नज़र खिड़की पर रुक गई, जहाँ दो मादाएं ताली बजाकर उसका अभिनंदन कर रहीं थीं।

नीलोफर, अपने क्षतिग्रस्त शरीर का मुआयना करने लगी। जगह जगह, कौओं की चोंच से घाव हो गए थे। उसके चमकीले, नीले पंँख अब शरीर छोड़कर नीचे गिर गए थे। उसकी आँखों में एक बूँद सी चमकने लगी। 

"नीलोफर, तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत चिड़िया हो, तुम्हें नीले पंखों की जरूरत ही नहीं है। आज तुम्हारी खूबसूरती को मैंने महसूस किया है।" नीलू की बात, उस छोटे से पंछी को कितनी समझ आई पता नहीं परंतु  वह खुशी से चिचियाने लगी।

नीलू ने घूमकर मालती की ओर देखा, मम्मी के दमकते चेहरे में आज कोई झुर्रियाँ, आँखों के नीचे कोई कालापन नहीं दिखाई दिया।

****************

यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।
लिखने की तिथि- 26/8/2021


नाम- शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

Add-
Sharmila chouhan
 C-1401, Niharika kankia Spaces
Opposite Lokpuram Temple
Thane (west) 400610
Maharashtra
M.no.9967674585
email- sharmilachouhan.27@gmail.com

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

212 212 212 212 पर गजल2/9/21

मुसलसल गज़ल

212  212  212  212

रदीफ़- लगे
क़ाफ़िया- आने

हौसलों से भरे गीत गाने लगे
शूर अपनी कहानी सुनाने लगे।1।

शाम  चौपाल पर बैठ कर गांँव की
जिंदगी के तजुर्बे बताने लगे। 2।

याद करके पुरानी सभी जंग को
मूँछ पर हाथ अपने फिराने लगे। 3।

टाँग टूटी रही पर थमे वो नहीं
ले सहारा उठे मुस्कुराने लगे। 4।

जन्म लेकर सदा प्राण अर्पित करें
भारती से यही वो मनाने लगे। 5।

शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 13 अगस्त 2021

लघुकथा- रेस्क्यू

"रेस्क्यू"

"छोटी बहू, अब रसोई में क्या कर रही है? खाना नहीं खा रहे तुम लोग?" सास लीला देवी की आवाज से, बड़ी और मंझली बहू घबरा गए।
"अम्माँ, सब्जी थोड़ी ही बची है तो हम तीनों के लिए फिर से बना रही हूँ।" छोटी बहू ने उत्तर दिया।
"आदमियों का खाना तो हो गया था तो तुम लोग दाल, अचार से खा लेते। हमारे जमाने में मजाल नहीं थी कि हम औरतों के लिए दुबारा सब्जी बनाएँ। अब तो जमाना ही बदल गया है।" अम्माँ को गुस्सा आ रहा था।

 कई बार बहूओं ने अम्माँ की ज़ुबानी उनके ज़माने के किस्से सुने थे कि आदमियों को ही मेवा, दूध दिया जाता था। औरतों और आदमियों के खान-पान में बहुत फ़र्क होता था। आदमियों को घर से बाहर जाकर काम करना होता था इसलिए उनके भोजन में घी-दूध की अच्छी मात्रा देने का नियम था। इस भेदभाव की कसक, छोटी बहू ने अम्माँ की आवाज में महसूस किया था।

"जा मंझली, बाहर बैठक में बैठे सभी को दूध का गिलास दे आ।" आदमियों को रोज दूध पीने को दिया जाता था।

"अम्माँ, गर्मी बहुत थी तो मैंने दूध  की आइसक्रीम जमा दी थी।" कहती हुई छोटी बहू ने आइसक्रीम फ्रिज से निकाल कर, मंझली बहू को दे दिया।

"जीजी, हम सब ग्यारह लोग हैं तो आप ग्यारह कटोरियों में आइसक्रीम निकाल दीजिए।" अम्माँ के हाथों आइसक्रीम की कटोरी पकड़ाती छोटी बहू ने अम्माँ के चेहरे की ओर देखा। एक अलग सी संतुष्टि अम्माँ की आँखों से झलक रही थी।

शर्मिला चौहान

सोमवार, 2 अगस्त 2021

अप्रकाशित लघुकथाएं

        "परदे के पीछे"


सुरेखा जल्दी जल्दी हाथ चला रही है, काम खत्म होने के बाद वह अपनी सहेलियों के साथ पिक्चर देखने जाने वाली है। उसका पति बिरजू घर पर है, बच्चों की भी पंद्रह अगस्त की छुट्टी है तो आज उसने सहेलियों के साथ पिक्चर देखने का कार्यक्रम बना लिया।
उसकी मालकिन मंजूषा दीदी, किसी बड़ी जगह में स्वतंत्रता दिवस पर भाषण देने जाने वाली हैं। लाल किनारी की सफेद साड़ी में, पुराने जमाने की हिरोइन लग रही हैं दीदी।

"ये क्या पुरानी सूती की साड़ी पहन रखी है तुमने! जहाँ जा रही हो मुझे सब पहचानते हैं। कोई ढंग की साड़ी पहनो!" साहब की आवाज़ को अनसुना करते हुए सुरेखा बर्तनों पर हाथ चलाने लगी।
"बालों की बाँध तो लो, अब क्या तुम सोलह साल की हो जो खुले बाल रखोगी।" सुरेखा के कानों ने सुनी और दिल कह उठा, "बेचारी दीदी! ना मन का पहन सकती ना कुछ कर सकती। इतनी पढ़ी लिखी, होशियार है तभी तो सब अखबारों में, पत्रिकाओं में दीदी का लिखा छपता है‌। साहब बहुत रोक-टोक करते रहतें हैं।"

साफ धुली थाली में अपना चेहरा देखने लगी, गीले हाथों से बालों को संवारा और अपने बिरजू की सोच में खो गई।

"फोन ले लेते हैं तेरे लिए, बड़े काम की चीज है।" बिरजू ने चार महीने पहले पाँच हजार का फोन खरीदा था उसके लिए। रंग भी सुरेखा की पसंद का, चटक लाल। अब सुरेखा अपने फोन को निहार रही थी।

"ड्राइवर को लेकर जाना, तुम्हारी  ड्राइविंग की कोई गारंटी नहीं है।" साहब की आवाज़ से सुरेखा की भौं तन गई।
"दीदी, बहुत बढ़िया कार चलातीं हैं, साहब क्यों हर बात पर रोक टोक करते हैं क्या मालूम।" चार घरों का काम खत्म करके सुरेखा  को पिक्चर देखने जाने की जल्दी थी।
दीदी की हल्की आवाज आ रही थी शायद स्वतंत्रता दिवस के भाषण को एक बार पढ़ रहीं थीं।
"स्वतंत्रता की अलग अलग परिभाषाएँ हो सकतीं हैं.....।"


 थोड़ी देर बाद गेट खुलने की आवाज आई और एक बार फिर वही लाल किनारी की सफेद साड़ी पहने, बालों को खुला छोड़े, उसकी सुंदर मंजूषा दीदी ने कार की ड्राइविंग सीट संभाल‌ ली थी। सुरेखा का पिक्चर देखने का उत्साह दुगुना हो गया।

शर्मिला चौहान
२/८/२०२१
**************



       "बेड़ियाँ"


नया लहंगा, चूनर और पायल पहनी मुन्नो आँगन भर घूम रही थी।
"ऐ मुन्नो, क्या तेरा ब्याह तय हो गया है?" मुन्नो के साथ शाला जाने वाली, कक्षा आठ की संजो ने पूछा।
"हाँ हाँ! कल ही हुआ, देख ना ये नयी चूनर और पायल।" पायलों को छमकाती मुन्नो ने कहा।
"तू अब पढ़ाई ना करेगी, कक्षा सात ही पढ़ेगी।" संजो, जो मुन्नो से एक कक्षा आगे थी, ने थोड़ी चिढ़कर पूछा।
"अरी, मेरा होने वाला दूल्हा आठवीं पास है। मुझे तो उससे कम ही पढ़ना चाहिए ना।" अपने होने वाले रिश्ते का सार समझा दिया मुन्नो ने।
"तूने सुना नहीं, मास्टरनी जी कितनी बार समझातीं हैं कि,"छोरियों को खूब मन लगाकर पढ़ना चाहिए, नौकरी करना चाहिए।" संजो एक मित्र, बहन की भूमिका निभा रही थी।
"संजो,मेरी ससुराल वालों की बहुत खेती है। पैसेवाले हैं,अम्माँ कह रही थी कि ब्याह में वो मेरे लिए सोने के कंगन, हार और बिंदिया लाएंगे।" मुन्नो की मासूम आंखों में गहनों, कपड़ों की चमक तैर रही थी।
"तो तू गहनों के लिए ब्याह कर रही है?" संजो की आवाज थोड़ी धीमी हो गई।
"और क्या! अम्माँ से कितनी बार कहा कि पायल ले दो, मुझे पहननी है, हर बार कहती बापू से पूछकर बनवा दूँगी।" गरीबी की स्पष्ट छाप पड़ चुकी थी मन पर।
"अपनी सब मास्टरनी खुद कमातीं हैं, अपने पैसों से अपने बच्चों के लिए चीजें खरीद कर ले जातीं हैं। हमें भी पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहिए, तब हम भी अपने बच्चों के लिए सब खरीद सकेंगे।" अपने भविष्य को दूर तक सोचने लगा किशोर मस्तिष्क।
दोनों के बीच कुछ देर बात होती रही और फिर मुन्नो ने अपनी पायल उतारकर अम्माँ की हथेली पर रख दिया।
"अम्माँ, मुझे ब्याह नहीं करना, खूब पढ़ना है। ऐसी पायल, चूनर मैं अपने लिए भी और तेरे लिए भी खरीद सकूँगी अम्माँ।" कहती हुई बस्ता उठाकर संजो के साथ चली गई।
मुन्नो की अम्माँ कभी हथेली पर रखी पायल को देखती तो कभी खुद के पैरों की काली पड़ी पायल को।

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
१/८/२०२१

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

ग़ज़ल 1222 1222 122

1222  1222  122

बुजुर्गों की जुबानी सब सुना है
गुलामी में वतन ने जो सहा है।1।
 
दुखों की रात इक लंबी बिता कर
सुबह की आस में भारत जगा है।2।

विदेशी ताकतों से लुट के देखो 
वतन अपनों से ही अब लुट रहा है।3।

जिसे सोने की सब कहते थे चिड़िया 
पसारे हाथ अब वो मांगता है।4।

जिन्होंने जान दे दी इसकी खातिर 
शहीदों को वतन भूला पड़ा है।5।

शर्मिला चौहान

शनिवार, 26 जून 2021

साहित्य संवेद हेतु

"डिटाक्सिन"


कठोर लाॅकडाउन के बाद अभी कुछ दिनों से थोड़ी छूट मिली। पिंजरे में बंद पंछी की तरह महसूस कर रहे थे मोहन बाबू। अपने आठ साल के पोते को साथ लिए सोसायटी के बाग में बैठे थे। पोता जय, झूलों पर झूल रहा था और थोड़ी देर घूमने के बाद मोहन बाबू बैंच पर बैठ गए। जून की उमस भरी शाम में पेड़ों से छनकर बहती हवा, एयरकंडीशनर की थकी हवा से ज्यादा आनंद दायक लग रही थी।
साथ में लाया समाचार पत्र खोल कर फिर से पढ़ने लगे। पिछले दिनों हथिनी की हत्या के समाचार से व्यथित थे मोहन बाबू क्योंकि प्राणियों से विशेष लगाव था उन्हेें। जब शहर के चिड़ियाघर में पेंगुइन लाए गए थे तो सपरिवार उसे देखने गए थे। चिड़ियाघर के उस भाग को उत्तरी ध्रुव की तरह बनाने का प्रयास किया गया था। बर्फीली पहाड़ियों और ठंडे पानी के कृत्रिम ताल बने थे। 
"कैसे रहेंगे ये पेंगुइन? प्राकृतिक ठंडे, बर्फीले जगह के निवासी हैं।" मोहनबाबू की चिंता जायज थी क्योंकि उनमें से एक पेंगुइन, संक्रमण से मर गया था।
"दादाजी, ये पींगु तो चुपचाप एक कोने में बैठे हैं।" पोते के प्रश्न पर उसकी उम्र के अनुसार समझाया था दादा ने। 
पेंगुइन के आने से चिड़ियाघर की आमदनी बढ़ गई थी।
मोहन बाबू उठ खड़े हुए, शाम के साथ ही बाग से निकलने का समय है गया।
"जय, चलो बेटा। क्या कर रहे हो?" बाग के एक कोने में बैठे जय को देखने दादाजी गए।
"दादू, इसे भूख लगी थी। मुझे देखकर कूँ कूँ करने लगा।" जय के हाथों में कुत्ते का छोटा सा पिल्ला था।
अपनी जेब से बिस्कुट निकाल कर, छोटे टुकड़े करके जय उसके मुँह में डाल रहा था। कुत्ते का पिल्ला, प्यार से उसकी गोद में बैठा था।
मोहन बाबू को, शाम के सूरज की लालिमा में प्रेम की चमक दिखाई दे रही थी। न जाने क्यों, वे अपने को डिटाॅक्सिक महसूस कर रहे थे।

शर्मिला चौहान

गुरुवार, 10 जून 2021

हिंदी विश्व कोश edit हेतु

हिंदी विश्व कोश में  edit करने हेतु

लघुकथा-2020 blog
संपादक- बीजेंन्द्र जैमिनी
लघुकथा- पेट भर

************

महाराष्ट्र के प्रमुख हिंदी लघुकथाकार (ई-संकलन)मई 2021
संपादक-  बीजेन्द्र जैमिनी

१)  तलाश
२) विनिमय
३) उजियारा
४) नसीहत
५) अपना आसमान
६) मीठे आँसू
७) छत्रछाया
८) कथनी-करनी
९) ओरिजनल
१०) यात्रा
११) भूख

************

लघुकथा शोध केंद्र भोपाल "लघुकथा वृत्त" ( अनियतकालीन पत्रिका)
प्रधान संपादक- कान्ता राॅय
लघुकथा- मुक्ति

********

लघुकथा संकलन आयोजन 2020 एक समग्र प्रयास
वनिका प्रकाशन
संपादक- डॉ. नीरज सुधांशु
लघुकथा- सोंधी महक

बीजेंद्र जैमिनी के blog 2020 लघुकथा

पेट भर                                 


                                                 - शर्मिला चौहान

                                                    ठाणे - महाराष्ट्र


          आज खुशी से फूली ना समा रही थी नीमा। मैडम जी ने खाने -पीने का ढे़र सारा सामान दिया है।
कल पार्टी हुई थी बंगले पर और खाना बच गया था। रात तक तो नीमा थी सरजू और गीता की मदद करने। वो दोनों खाना बनाते और नीमा साफ -सफाई करती। 
आज तो बच्चों को और पति को स्वादिष्ट खाना पेटभर मिलेगा। एक सप्ताह से, संतोष घर पर ही है , सर्दी - ताप से कमजोर हो गया है। काम करने की कौन कहे, बिस्तर से उठने पर भी सिर चकराने लगता है उसका।
सरकारी अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टर ने गोली - दवाई थमाते हुए कहा , "शरीर को ताकत की जरूरत है, अच्छा खाना, फल- फूल, सब्जियांँ खिलाना।" 
उसी समय से नीमा सोच में पड़ गई कि पेट भर रोटी-भात तो जुट नहीं रहा, काम बंद और ऊपर से तीन जवान होते बच्चे।
कल का बचा खाना जब बांधकर रख रही थी तभी सरजू और गीता ने खुद को मिले सेब और केक भी उसे ही पकड़ा दिया ,"घर ले जा बच्चे खाएंगे, हम दोनों को तो दो जून खाना यहां मिलता ही है।" कृतज्ञता से नीमा ने उनको देखा और बड़ी सी पोटली बांध लहकती चली।
छोटू तो केक देखकर पगला ही जाएगा,  सेब छुपाकर रखेगी बच्चों से, सिर्फ संतोष को देगी, हिस्से-बाटे का ताना-बाना बुनते चल ही रही थी कि पीछे से जोर-जोर की आवाजों से पलटी।

मोटरसाइकिल पर सवार कई लोगों का हुजूम चला आ रहा था। वो रास्ते पर आने वाली सभी चीजों को तोड़ते- फोड़ते, चिल्लाते तेजी से आगे बढ़ रहे थे।
अगले कुछ पलों में जमीन पर गिरी नीमा ने, दबी कुचली पोटली को समेटते हुए, आँखें मूंद लीं।

================================

सोमवार, 3 मई 2021

घनाक्षरी छंद_ मनहरण, कृपाण एवं रुप

घनाक्षरी छंद

भवन रास्ते बनाता, रेल जाल हूँ बिछाता।
कंँगूरों को भी सजाता, एक मजदूर मैं।

तेज धूप हो या पानी, मन में लगन ठानी।
मौसमों को देता मात, जीवन से चूर मैं।

मिल हो या कारखाने, मेरे काम के दीवाने।
स्वेद से मशीनें चलें, सुखों से हूँ दूर मैं।।

रोटी भात सब्जी खाता, घी दूध कभी ना पाता।
मेवा मिठाई ना सोचूँ, ऐसा मजबूर मैं।।

*****************

देख श्रमिक का हाल, दया नहीं आए काल?
काल की कठोर चाल, बीते दिन माह साल।।

धूप में तपाता खाल,थक कर है निढ़ाल।
हाथों में पड़े हैं छाल, धरती का सच्चा लाल।।

अस्त्र फावड़ा कुदाल, नित रोटी का सवाल।
काम से रहे निहाल, स्वेद कण जड़े भाल।।

बने मजदूर बाल, फंसा मजबूरी जाल।
किस्मत की ये कुचाल, मेहनत बनी ढा़ल।।

************

चंद रुपए कमाने, छोड़ चला घर द्वार।
पराए नगर रहे, ढोता परिवार भार।‌।

यान कार वो बनाता, गढ़ता साज सामान।
उसके घर है नहीं, दीवाली के दीए चार।।

करे मेहनत सदा, शक्ति का है अवतार।
धैर्य धरे झेल जाता, जिंदगी के सारे वार।।

मान का है अधिकारी, दुनिया चलाता सारी।
करके दिखाता सदा, कभी नहीं माने हार।।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

ग़ज़लें १२२२ १२२२ १२२ एवं 122 122 122 122

आर... तुकांत, क़ाफ़िया
होगा...पदान्त, रदीफ़

1222  1222  122

१)  हृदय में भाव का आगार  होगा
   तभी भावुक सकल संसार होगा।

२) सनेही रूठ कर कोई विलग हो
गले लग नेह से मनुहार होगा।

३) कली घूंँघट उठाती जब लजाकर
करे भंवरा निवेदन प्यार होगा।

४) क्षितिज पर हाथ थामें व्योम भू जब
बरसता प्रेम जल भंडार होगा।

५) जलद आया नगाड़े ढ़ोल ले कर
धरा पर पौध नव तैयार होगा।

५) मिले अब पेट भर रोटी सभी को
क्षुधित कोई नहीं लाचार होगा।

६) बढ़े जंगल यहां सीमेंट के अब
तरू कटने कहीं लाचार होगा।

७) तिरोहित हो चला सूरज यहां से
प्रखर होगा जहां साकार होगा।


*****************


122 122 122 122

जगत जीव माया बड़ी ही गहन है
भला कौन इसमें नहीं जो मगन है। 1।

तिमिर घोर छाए भटकता मनुज जब
तभी हौसलों की चमकती किरन है। 2।


बुराई भरी सोच आती हृदय में
सरल भाव धरकर करें फिर दहन है। 3।

बुरे वक्त में साथ देने खड़े जो
वही रूप भगवान, उनको नमन है। 4।

उजाला करे दीप छोटा जले जब
हटाता तमस ठान मन में लगन है। 5।

मिला श्रेष्ठ जीवन सभी से मनुज को
करें काज अच्छे यही तो भजन है । 6।

मधुर बोल बन कर दिखावा रिझाता
वचन सत्य की ही परख का चलन है। 7।

भरी जेब रिश्ते निभाना सरल सब
गरीबी पड़े तब न भाई बहन है।8।

सिपाही वतन के लिए जान देता
शहीदी मिले बस यही इक लगन है। 9 ।

शर्मिला चौहान



मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

राम कथा घनाक्षरी

मनहरण घनाक्षरी

बड़ा शुभ चैत मास, नवमी  तिथि है खास।
सबके हृदय आस, राम जन्म आज है।

सांवली सूरत प्यारी, मारे हंँस किलकारी।
मोहनी मूरत देखो, सुंदर रूप साज है।

अवध में छाई धूम, बधाई दें घूम घूम।
घर घर लड्डू बंटें, शगुन का काज है।

चंदन का पलना है, राम प्यारा ललना है।
कौशल्या झुलाए डोर,ममता का राज है।

🌺🌸🌼🌸🌺🌼🌸🌺🌼

मनहरण घनाक्षरी

 ब्याह की हुई तैयारी, मिथिला सजी निराली।
शिव धनु तोड़ें हम, सबने ये ठान ली।

मुनि संग आए राम, तोड़ा चाप बढ़ा मान।
जानकी के हृदय की,रामजी ने जान ली।

जनक की प्यारी लली, सीता सुकुमारी चली।
सारी सीख जननी की, बिटिया ने मान ली।

परछन थाल सजी, ढ़ोल शहनाई बजी।
अवध की बहू सीता, सासूओं से ज्ञान ली।

🌺🌸🌼🌸🌺🌼🌸🌺🌼

मनहरण घनाक्षरी

कैकयी ने मांगा वर, रामजी ने छोड़ा घर।
लखन सिया के संग, चले वन राह हैं।

धरे वेष मुनियों का, करें काम क्षत्रियों का।
रहूँ मिल सब संग, करें यही चाह हैं।

पंचवटी आए राम, राक्षसों को भेजा धाम।
ऋषियों की रक्षा करें, बोलें सब वाह हैं।

 केवट गले लगाए, शबरी के बेर खाए।
सुग्रीव से की मिताई, धर लिए बांह हैं।

🌼🌺🌸🌼🌺🌸🌼🌺🌸

कृपाण घनाक्षरी

आई सेना सेतु पार, वानर दल अपार।
दानवों पे किए वार, लंका में मची है रार।

बड़े बड़े हथियार, तीर भाला तलवार।
पत्थर फेंके हजार, दुष्टों का हुआ संहार।

रावण का अहंकार, हर लाया सीता नार।
रामजी ने दिया मार, बताया जीवन सार।

लंका का शासन भार, विभीषण है तैयार।
दशहरे का त्यौहार, रामजी की जयकार।

🌼🌺🌸🌼🌺🌸🌼🌺🌸
रुप घनाक्षरी

 पुष्पक विमान चढ़, पहुँचे अयोध्या गढ़
नगर में दीप जलें, गली गली बाजे ढो़ल।

आकुल हैं जन जन, राम की लगी लगन
राह निहारे सब, नैनों के किवाड़ खोल। 

खुश हुईं महतारी, तिलक की है तैयारी
नैनन से आँसू गिरें, बिके सब बिना मोल।

राम दरबार  साजे, ढ़ोल ताशे खूब बाजे
राम के चरण दाबे, जय हनुमान बोल।

🌸🌺🌼🌸🌺🌼🌸🌺🌼

गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

फाग गीत २७/३/२०२१

"कान्हा संग होरी"

खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।

प्रेमरंग की भर पिचकारी, तोसे खेलन आई।
इत-उत ढुँढू तोहे कन्हाई, ढूँढ नहीं मैं पाई।।

कैसै जाऊंगी लौट कर आज, कोरी की कोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

अबीर गुलाल से भरी हथेली, भाव नेह भर लाई।
मनमंदिर में बसने वारे, ढूंढे मिला ना कन्हाई।

रंगभरी मेरी सुन ले पुकार, नाजुक मैं गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

श्यामवर्ण पीतांबर सोहे, गले बैजयंती माला।
मुरली मधुर बजावर वारे, रूप तेरा निराला।

धुन ऐसी बजाना आज, मन कर ले चोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।


खोजत खोजत थक गई मोहन, मिला ना तू हरजाई।
नैन बंद कर नाम पुकारुँ, हृदय में मूरत पाई।।

खुल गए अब बंद कपाट, श्यामा भई गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

आँखें खोलूं अब मैं माधव, तू ही तू मुस्काए।
जमुना किनारे, गली चौबारे, ठौर ठौर दिख जाए।।

अँसुवन की बहती धार, अद्भुत ये होरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।‌।

अपने रंग रंगाना कान्हा, बहुत दूर से आई।
जन्मों की प्यासी, तेरी दासी, आस तुम्हीं ने जगाई।

मेरी नैया लगाना पार, अस्तुति कर जोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी‌।।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

फागुन गीत २७/३/२०२१

"द्वार फागुन आ गया"

है बिदाई अब बसंत की, कलियों का मन मुरझा गया।
खोल पलकें देखतीं वो, द्वार फागुन आ गया।।

बन संवर के मौज में, अपनी चला आता है वो,
गीत बन भ्रमरों के मुख, गुंजार भर लाता है जो।
कलियों की अठखेलियों पर, चुपके से मुस्काने लगा,
फिर फागुनी बयार बन, हौले से सहलाने लगा।

अधखिले फूलों को जब, भ्रमरों का गुंजन भा गया।
खोल पलकें देखते वो, द्वार फागुन आ गया।।


आगमन से उसके हर्षित, झूमती गाती धरा,
खिलते टेसूओं ने उसका, अंक रंगों से भरा।
त्याग काया जीर्ण-शीर्ण, नव किसलय से दमकते,
बूढ़े बरगद और पीपल,बन युवान हैं चमकते।

रुप यौवन से भरा, मदमस्त मौसम छा गया।
खोल पलकें देखते वो, द्वार फागुन आ गया।।


ना कंपकंपी है शीत की, ना आग सा मौसम अभी,
कोयलों की कूक पर, मनमुग्ध हो जाते सभी।
बौरों का सेहरा बाँध, आमकुंज अब लजाने लगे,
ढ़ोल थाप, नगाड़ों की धुन पर, पाँव थिरकाने लगे।


स्वर्ण बालियों का चमकना, सूरज को भरमा गया।
खोल पलकें देखता वो, द्वार फागुन आ गया।।

हृदय को आसक्त करती, झांकती चलती बयार
मत्त महुआ और तेंदु, हो गई उन पर सवार।
हैं हुलसते, सरसराते, चटक दिखते अब पलाश
फागुन की अगवाई में, साथी की करते हैं तलाश।

मस्त पवन का एक झोंका, सांसों को महका गया।
खोल पलकें देखता वो, द्वार फागुन आ गया।।


बाट जोहती साल भर मैं, ओ मेरे प्यारे सजन
हूँ कली मैं आज जो, छू लो तो खिल जाए चमन।
बांकी चितवन से निरखती, हुई कुसुमित सलज्ज धरा
कूचिका से प्रेम रंग फिर, सजन स्वागत में भरा।

मनमौजी सजन सखी, चूनर उसकी सरका गया।
खोल पलकें देखती वो, द्वार फागुन आ गया।।

होली की दहकी अगन, बसंत का ठिठक कर देखना
विरहिन कोयल का नित उठ, आकुल होकर कूकना।
यत्र तत्र सर्वत्र, हृदय बरबस मुस्काने लगे
प्रकृति का प्रेमल फाग गीत, कण कण गुनगुनाने लगे।

घुलती भांग का नशा, जनमानस पर छा गया।
खोल पलकें देखते वो, द्वार फागुन आ गया।।
द्वार फागुन आ गया।।


शर्मिला चौहान

फाग गीत २७/३/२०२१

"कान्हा संग होरी"

खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।

प्रेमरंग की भर पिचकारी, तोसे खेलन आई।
इत-उत ढुँढू तोहे कन्हाई, ढूँढ नहीं मैं पाई।।

कैसै जाऊंगी लौट कर आज, कोरी की कोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

अबीर गुलाल से भरी हथेली, भाव नेह भर लाई।
मनमंदिर में बसने वारे, ढूंढे मिला ना कन्हाई।

रंगभरी मेरी सुन ले पुकार, नाजुक मैं गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

श्यामवर्ण पीतांबर सोहे, गले बैजयंती माला।
मुरली मधुर बजावर वारे, रूप तेरा निराला।

धुन ऐसी बजाना आज, मन कर ले चोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।


खोजत खोजत थक गई मोहन, मिला ना तू हरजाई।
नैन बंद कर नाम पुकारुँ, हृदय में मूरत पाई।।

खुल गए अब बंद कपाट, श्यामा भई गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।

आँखें खोलूं अब मैं माधव, तू ही तू मुस्काए।
जमुना किनारे, गली चौबारे, ठौर ठौर दिख जाए।।

अँसुवन की बहती धार, अद्भुत ये होरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।‌।

अपने रंग रंगाना कान्हा, बहुत दूर से आई।
जन्मों की प्यासी, तेरी दासी, आस तुम्हीं ने जगाई।

मेरी नैया लगाना पार, अस्तुति कर जोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी‌।।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

नई गज़लें 1222 1222

 १२२२  १२२२
रदीफ़....है
क़ाफ़िया...आना


१) अँधेरों को हराना है
   बुझे दीपक जलाना है।

२) चमन उजड़ा हुआ दिखता
    गुलों से फिर सजाना है।

३) कठिन है राह जीवन की
    सरल इसको बनाना है।

४) निराशा से भरी दुनिया
     नई आशा जगाना है।

५) कहर है रोग कोरोना
    सभी जीवन बचाना है।

६) हवाएं तेज चलती अब
    कदम जमकर बढ़ाना है।

७) दिवाना मन हुआ मेरा
   इसे रस्ता दिखाना है।

८) मधुर लय ताल छेड़े जो
      तराने वो सुनाना है।

९) बहुत से हैं विषय ऐसे
    कलम जिनपर चलाना है।

************************

 1222  1222

रदीफ़.... पढ़ लेना
क़ाफ़िया...आर

१)  मेरे अशआर पढ़ लेना
     गज़ल दो चार पढ़ लेना।
      

२) चमकती प्रेम से आंखें
     सजन मनुहार पढ़ लेना।

३) किताबें हैं सवालों की
     अजी सरकार पढ़ लेना।

४) धड़कता दिल मेरा नाज़ुक
     उसे दिलदार पढ़ लेना।

५) लिखे जो ख़त तेरी खातिर
    सनम हर बार पढ़ लेना।
     
 ६) बदलते रंग दुनिया के
    हजारों बार पढ़ लेना।

७) शिकायत पर जमाने की
     पड़ी फटकार पढ़ लेना।

****************
 १२२२  १२२२
रदीफ़....है
क़ाफ़िया...आना


१) अँधेरों को हराना है
   बुझे दीपक जलाना है।

२) चमन उजड़ा हुआ दिखता
    गुलों से फिर सजाना है।

३) कठिन है राह जीवन की
    सरल इसको बनाना है।

४) निराशा से भरी दुनिया
     नई आशा जगाना है।

५) कहर है रोग कोरोना
    सभी जीवन बचाना है।

६) हवाएं तेज चलती अब
    कदम जमकर बढ़ाना है।

७) दिवाना मन हुआ मेरा
   इसे रस्ता दिखाना है।

८) मधुर लय ताल छेड़े जो
      तराने वो सुनाना है।

९) बहुत से हैं विषय ऐसे
    कलम जिनपर चलाना है।

**********************

 1222  1222

रदीफ़.... पढ़ लेना
क़ाफ़िया...आर

१)  मेरे अशआर पढ़ लेना
     गज़ल दो चार पढ़ लेना।
      

२) चमकती प्रेम से आंखें
      सनम इक़रार पढ़ लेना।

३) किताबें हैं सवालों की
     अजी सरकार पढ़ लेना।

४) धड़कता दिल मेरा नाज़ुक
     उसे दिलदार पढ़ लेना।

५) लिखे जो ख़त तेरी खातिर
     सजन हर बार पढ़ लेना।
     
 ६) बदलते रंग दुनिया के
     अरे फनकार पढ़ लेना।

७) शिकायत पर जमाने की
     पड़ी फटकार पढ़ लेना।

**************

1222  1222
रदीफ़.….है
क़ाफ़िया...आया


१) सिपाही लौट आया है
     तिरंगे से सजाया है।

२) हमेशा काम हो सच्चा 
    बुज़ुर्गों ने सिखाया है।

३) महक फैली हवाओं में
      गुलाबों से नहाया है।

४) मुसाफ़िर छाँव को तरसे
    तरू किसने हटाया है।

५) नज़र लग जाएगी उनको
     डिठौना भी लगाया है।

६) बहुत बेचैन रहता दिल
    मुहब्बत का सताया है।

७) बहर छोटी लगे प्यारी
     कलम इस पर चलाया है।

मंगलवार, 16 मार्च 2021

अप्रकाशित लघुकथा "संरक्षक"

"संरक्षक"

आज मंडल बाबू के घर के सामने, पंडाल तना था, कुर्सियां बिछी थीं। मंडल बाबू का बेटा रंजन, अमेरिका से आया है। 
"सुना है कोई बड़ा काम किया रंजन ने।" मंडल बाबू के मित्र सुदेश जी ने पूछा।
" हाँ हाँ, पक्षियों की विलुप्त होती प्रजातियों पर शोध कर रहा था।" उसके शोध पर प्रकाशित पुस्तक हाथ में पकड़े मंडल बाबू बोले।
"ये भी कोई काम है।" चेहरे पर बुरे से भाव थे।
"नहीं यार! उसके शोध को बहुत सराहा गया, पुस्तक का रूप दिया गया है। उसके शोध से पक्षी प्रेमियों को बहुत सहायता मिलेगी।" अपने बेटे की मेहनत का, इतना उदासीन स्वागत मंडल बाबू को पसंद नहीं आया।
"किसी को सुनने, जानने की इच्छा ही नहीं है, सिर्फ बधाई दी और जलपान करके गए।" अपनी पुस्तकों की ओर देखकर रंजन दुखी हो गया।
मंडल बाबू ने, रंजन को साथ चलने कहा।
बाजार में रद्दी वाले की दुकान के बाजू में चादर बिछाए, कुर्ता पायजामा पहने, पुस्तक पढ़ने में तल्लीन, अधेड़ उम्र के व्यक्ति को पहचानने में रंजन को अधिक समय नहीं लगा।
"अरे! लेखक काका आप, यहां! " आश्चर्य से रंजन ने पूछा।
"अरे! रंजन बेटा! बधाई हो, बहुत बढ़िया काम किया तूने। तेरे शोध की पुस्तक मुझे भी देना पढ़ने।" खुशी से रंजन को गले लगा लिया।
"आप तो लिखते थे काका। कोई पुस्तक आई आपकी?" रंजन ने बचपन से समाचार पत्रों में प्रकाशित उनकी कविताएं, कहानियां पढ़ीं थीं।
"नहीं रे! अब मैंने लिखना बंद कर दिया है।" लंबी सांस भरकर उन्होंने कहा, "पढ़ने वालों की विलुप्त होती प्रजाति को बचाने के लिए, मैं विशुद्ध पाठक बन गया।" मुस्कुराते हुए बोले, "नहीं तो आगे दस बीस साल बाद, तेरे को पाठकों की विलुप्त प्रजातियों पर शोध करके पुस्तक लिखना पड़ता।" कहकर रंजन के 'लेखक काका' वेदना भरी हँसी, हंसने लगे।
रंजन ने अपनी पुस्तक, एक प्रबुद्ध पाठक के हाथों सौंप दी।

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान

अप्रकाशित लघुकथा

"संरक्षक"

आज मंडल बाबू के घर के सामने, पंडाल तना, कुर्सियां बिछी थीं। मंडल बाबू का बेटा रंजन, अमेरिका से आया है। 
"सुना है कोई बड़ा काम किया रंजन ने।" मंडल बाबू के मित्र सुदेश जी ने पूछा।
" हाँ हाँ, पक्षियों की विलुप्त होती प्रजातियों पर शोध कर रहा था।" उसके शोध पर आधारित पुस्तक हाथ में पकड़े मंडल बाबू बोले।
"ये भी कोई काम है।" चेहरे पर बुरे से भाव थे।
"नहीं यार! उसके शोध को बहुत सराहा गया, पुस्तक का रूप दिया गया है।" अपने बेटे की मेहनत का, इतना उदासीन स्वागत मंडल बाबू को पसंद नहीं आया।
"किसी को सुनने, जानने की इच्छा ही नहीं है, सिर्फ मिलकर जलपान करके गए।" अपनी हिंदी में अनूदित पुस्तकों की ओर देखकर रंजन दुखी हो गया।
मंडल बाबू ने, रंजन को साथ चलने कहा।
बाजार में रद्दी वाले की दुकान के बाजू में चादर बिछाए, कुर्ता पायजामा पहने, पुस्तक पढ़ने में तल्लीन, अधेड़ व्यक्ति को पहचानने में रंजन को अधिक समय नहीं लगा।
"अरे! लेखक काका आप, यहां! " आश्चर्य से रंजन ने पूछा।
"अरे! रंजन बेटा! बधाई हो, बहुत बढ़िया काम किया तूने। तेरे शोध की पुस्तक मुझे भी देना पढ़ने।" खुशी से रंजन को गले लगा लिया।
"आप तो लिखते थे काका। कोई  पुस्तक आई आपकी?" रंजन ने बचपन से समाचार पत्रों में प्रकाशित उनकी कविताएं, कहानियां पढ़ीं थीं।
"नहीं रे! अब मैंने लिखना बंद कर दिया है।" लंबी सांस भरकर उन्होंने कहा, "पढ़ने वालों की विलुप्त होती प्रजाति को बचाने के लिए, मैं पाठक बन गया हूँ।" मुस्कुराते हुए बोले, "नहीं तो आगे दस बीस साल बाद, तेरे को पाठकों की खोज पर पुस्तक लिखना पड़ेगा।" 
रंजन ने अपनी पुस्तक, एक प्रबुद्ध पाठक के हाथों सौंप दी।

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान

शर्मिला चौहान ठाणे (महाराष्ट्र)१) संज्ञान वार्षिक पत्रिका-२०१९संपादक- के.पी.सक्सेनालघुकथा- उम्र का ढ़लता पड़ाव२) चिकीर्षा ई-पत्रिकासंपादक- दुर्गेश साध२०२०- गर्म कोट२०२१- पोटलीसाझा संकलन१) जिंदगी जिंदाबाद-२०२१संपादिका- रीमा दीवान चड्ढालघुकथा- जीवन सुर२) समसामयिक लघुकथाओं का साझा संकलन-२०२१संपादिका- शगुफ्ता यास्मीन क़ाज़ीलघुकथा- अपना आसमान३) महिला दिवस, एक अभिव्यक्ति-२०२१संपादिका- खुदेजा खानलघुकथा- चिंगारीवर्ष २०१९-२०२० में विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित लघुकथाएंनवभारत साहित्यनामा- माँ यहीं है, गरीब का दुख, रिश्ते।दैनिक भास्कर मधुरिमा- बिदाई, सेल्फी, मिजा़ज, जवाब, आनलाइन।इंदौर समाचार- अपना अपना हिस्सा, आकाशदीप, हस्ताक्षर।निकट भविष्य में प्रकाशित होने वाले साझा संकलन (२०२१)१) विभाजन त्रासदी की लघुकथाएंसंपादक- डाॅ. रामकुमार घोटड़ लघुकथा- अपना अपना सच२) क्षितिज - संवादात्मक लघुकथाएँ३) भूख पर आधारित लघुकथाओं का साझा संकलनलघुकथा- बोध, गिरगिट।४) पड़ाव और पड़ताल खण्ड 32संपादक- मधुदीप गुप्ता जीलघुकथा- मन की बात५) लघुकथा आयोजन २०२० में प्रथम आई लघुकथा "सौंधी महक" भी संकलन में आने वाली है। वनिका प्रकाशन( जानकारी के अनुसार)६) समकालीन लघुकथा कारों का दस्तावेज (साझा संकलन)लघुकथा- सारथी, गर्म रजाई।अभी तक की जानकारी अनुसार आपको बताया है सर।🙏

अखिल भारतीय हिंदी लघुकथा प्रतियोगिता १३ सामयिक परिवेश हेतु ३ लघुकथाएं

[14/03, 16:50] Sharmila Chouhan: "मरहम"

सुबह से ना जाने कितनी बार उन्हीं पंक्तियों को दोहराते हुए मोहिनी का मन मस्तिष्क थक गया था। मेकअप की परत के नीचे से, मुक्ति की आकांक्षा लिए, त्वचा की आत्मा चीख रही थी। 

एक बार फिर सैट तैयार हो गया, पूरी शक्ति से बड़े बड़े बल्ब, ढलती शाम को टक्कर देने के इरादे से चमकने लगे। मोहिनी के चेहरे पर फिर से साज सज्जा पोती गई और काम चालू हुआ।

किसी कंपनी के सौंदर्य प्रसाधनों की स्तुति करती मोहिनी, अपने ही अंदाज में मन मोह रही थी। अपनी खूबसूरती का राज, वह सभी को बताने पर आमादा थी।
विज्ञापन बनाने वाले, उसकी एक एक अदा को कैमरे में बखूबी कैद कर रहे थे। आने वाले दिनों में, उसकी अदाएं हर जवान लड़की में नजर आने वाली थी।‌ 
रात को घर वापस आने तक, मोहिनी चूर हो गई थी। हाथ मुंह धोते हुए,अपने चेहरे को गौर से देखने लगी।
"चीजें नहीं, सपने और कुछ उम्मीद बेचता है यह चेहरा।" अपने द्वारा बोली पंक्तियों को याद करके, उसका चेहरा मलीन पड़ गया।

अपने मुर्झाए चेहरे को प्यार से सहलाते हुए, अंदर कमरे में झाँकी। माँ और छोटी बहन, उसका इंतजार करते हुए, सो गए थे। उनके ऊपर चादर डालकर, खाना खाने के लिए रसोई की ओर जाने लगी।

वाश-बेसिन के ऊपर लगे दर्पण ने उसके पैर बाँध लिए। उम्र का असर आँखों के नीचे झलकने लगा है। चेहरे पर हाथ फेरते हुए मोहिनी को अपनेपन का अहसास हुआ।
"यही उसका असली रूप है।" कुछ वर्षों के बाद, यह चेहरा किसी विज्ञापन के लिए नहीं लिया जाएगा, भविष्य की वेदना से आँखें छलक गईं।

मोहिनी ने कुछ महंगे, सौंदर्य प्रसाधनों का मरहम चेहरे पर लगा लिया। अब भूख भी मिट गई थी।

यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com
[14/03, 17:30] Sharmila Chouhan: "स्वाद"

सूरज अपने दीदे फाड़े, सबको डरा रहा था। दल-बदलने में माहिर हवा, आज सूरज से दोस्ती गांठे, गर्म हो रही थी। एक दुकान के सामने वातानुकूलित कार रूकी और मालिक उतर कर सामान लेने गए।

चिलचिलाती धूप में, ठंडे वातावरण में बैठा गोल्डी, अपनी किस्मत पर इतरा रहा था। भूरे-सुनहरे बालों वाला, मध्यम कद काठी का, प्यारा-सा कुत्ता गोल्डी। न..न..न! कुत्ता नहीं, बेटा गोल्डी।

"भौं! भौं! भौं!भौं!" गोल्डी ने कार से बाहर जाने की इच्छा जताई।
"नहीं गोल्डी बेटा, बाहर तेज धूप है। पापा आइसक्रीम ला रहें हैं।" मालकिन ने प्यार से गोल्डी के बालों को सहलाया।
कुछ मिनटों में, अपने पसंद के वनीला आइसक्रीम का स्वाद लेता गोल्डी, खुले शीशे से बाहर झांकने लगा। अचानक, तीन-चार सड़क छाप कुत्ते कार के पास खड़े होकर भौंकने लगे। अपनी जाति-बिरादरी के प्राणी को, आदमी के साथ कार में बैठे देखना उन्हें नागवार गुजरा।
अपने जैसे दिखने वाले, अपनी बोली बोलने वालों को देखकर, गोल्डी खुशी से पूँछ हिलाने लगा।
"अंदर सिर करो गोल्डी, ये आवारा कुत्ते हैं।" कहते हुए मालिक ने कार के शीशे चढ़ा दिए।
सड़क पार, उन कुत्तों को डबलरोटी का खुला पड़ा पैकेट दिख गया। उछलते कूदते हुए ‌वे मुँह में पैकेट दबाए, पेड़ के नीचे की मिट्टी में लोट पोटकर टुकड़े खाने लगे।

कार के अंदर बैठे गोल्डी को, ना जाने क्यों वनीला आइसक्रीम बेस्वाद लगने लगी।


यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com
[16/03, 13:09] Sharmila Chouhan: "बैल"

गर्मियों की उमसभरी शाम, दिन ढल गया परंतु अभी भी कुछ रोशनी रास्ते पर पड़ रही है। लंबे लंबे डग भरता, गोविंद अपनी झोपड़ी के सामने पहुँचा। दिनभर के पसीने से, कुर्ता और गमछा दोनों ही निचोड़ने लायक हो गए थे।
"कुएं का ठंडा पानी भर रखा है नहा धो लो।" कहते हुए पत्नी झुनिया धोती लाने गई।
सिर से ठंडे पानी की धार छोड़ते गोविंद ने, लंबी सांस ली। दिनभर की जी-तोड़ मेहनत, आग बरसाने वाली गर्मी से मन और शरीर, दोनों त्रस्त हो जाते हैं।
"मालिक से एक दो दिन की छुट्टी क्यों नहीं मांगते? मोगी बुआ कह रही थी कि घर परिवार अच्छा है। लड़का भी सरकारी स्कूल में चपरासी है।" अपनी अठारह साल की बेटी के विवाह की चिंता, झुनिया के शब्दों से झलक रही थी।
"अब गर्मी में कहां छुट्टी देंगे मालिक! पूरे बगीचे को दो-दो बार पानी देना, गैया- बैलों को पानी पिलाना। मुझे तो छुट्टी मांगने में डर लगता है झुनिया‌।" अपनी दोनों लड़कियों को चूल्हे के पास देखकर, गोविंद ने हौले से कहा।
"कैसा काम है, भिनसारे के गए तो संझा भी घर नहीं पहुंचते। दो रोटी बांध देती हूँ तो दोपहरी खाते हो, नहीं तो भूखे ही काम करते रहो।" पूरी जिंदगी मेहनत करके, मुश्किल से दो जून खाना जुटाने वाले की पत्नी का संयम टूट गया था।
"बरसात के समय बुवाई, फिर निराई -गुडाई, कटाई! अरे..! खेत का काम कभी बंद होता है। जो अभी छुट्टी ना मिली तो आषाढ़ में मिलेगी क्या?"
पानी का गिलास थमाकर, झुनिया अंदर खाना लाने चली गई। 
"आज गुड़ भी खत्म हो गया, इसलिए बिना गुड़ के पानी पकड़ा गई।" पानी गटकते हुए गोविंद ने मन ही मन सोचा।
झोपड़ी में लगे इकलौते बल्ब की पीली रोशनी, सब ओर प्रकाश देने की पुरजोर कोशिश कर रही थी।
गोविंद उस रोशनी में, अपने पूरे परिवार को देखने की कोशिश कर रहा था।
"मालिक, कर्जा तो चुकता करना ही है आपका! आप तो माई-बाप हैं। मैं मर गया तो ये गोविंद, मेरा बेटा आपके खेतों में काम करेगा।" कहते हुए गोविंद के बाबू ने आठ साल के गोविंद को आगे कर दिया था।
आज इसी इकलौते बल्ब की धीमी रोशनी में, उसका दस साल का बेटा माधव पढ़ रहा है।
"बैल बहुत उपयोगी पशु है। वह मेहनती और ईमानदार होता है। दिन रात काम करता है, अपने मालिक का वफादार...।"आगे के शब्द गोविंद को सुनाई ही नहीं पड़े।
"बंद कर ये पाठ! नहीं बनना तुझे बैल।" अचानक तेजी से उठकर गोविंद ने बेटे की पुस्तक बंद कर दी।
चारपाई पर बैठे, हांफते गोविंद के सामने थाली में भात सब्जी रखी थी।

यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

बुधवार, 10 मार्च 2021

शिव वंदना ( महाशिवरात्रि)१०/३/२०२१

"शिव वंदना"

हे नीलकंठ, हे शिव शंकर, मम हृदय करो बसेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।

मन कर्म वचन का बिल्वपत्र, नित्य करूँ शिव अर्पण,
नंदी जैसा मौन साथ, रहे मन में पूर्ण समर्पण।
जटाजूट का वेश धराए, तप करते महायोगी,
तामस छोड़ सत्व को पाऊँ, जनम जनम की भोगी।

हे शिव शंभू, हे मृत्युंजय, दूर करो तम मेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।

☘️☘️🌼🌼☘️☘️🌼🌼

घट घट वासी, शिव अविनाशी, भूत भविष्य के ज्ञाता,
ज्ञान चक्षु खुल जाएं भोले, हूँ मूढ़ मति अज्ञाता।
सत रज तम से ऊपर हैं, निर्गुण त्रिशूल धारी,
भूत भविष्य के ज्ञाता हैं शिव, रूप छबि निराली।

हे त्रिलोकी, हे गंगाधर, अज्ञान हरो प्रभु मेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।

☘️☘️🌼🌼☘️☘️🌼🌼

नाग ततैया बिच्छू विषधर, सबको गले लगाए,
हलाहल धारे सृष्टि हित, नीलकंठ कहलाए।
बाघंबर मृगछाला पहनें, करते नंदी सवारी,
पशुपति हो नाथ सदा ही, अद्भुत लीला तिहारी।

हे शंकर, हे भूतपति, करुँ सदा जप तेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।

☘️☘️🌼🌼☘️☘️🌼

हे सोमनाथ, हे महाकाल, कल्याण कारी विश्वेश्वर,
हे शिव शंकर, हे मृत्युंजय, केदारनाथ  रामेश्वर।
हे वामदेव, अंबिकानाथ, हे त्रिलोकेश जटाधर,
हे त्र्यंबकं, हे बैद्यनाथ, कैलाशपति परमेश्वर।
त्रिदल त्रिशूल त्रिपुंड धारी, हो त्रिलोक के स्वामी,
भक्ति शक्ति मुक्ति के दाता, भोले अंतर्यामी।

हे आदिदेव, हे शिव शंभू, रक्षण करना मेरा।
हे उमापति, हे महादेव, कैलाश बने मन मेरा।।
☘️☘️🌼🌼🌼☘️☘️

  🙏ऊँ नमः शिवाय 🙏

शर्मिला चौहान

मंगलवार, 9 मार्च 2021

लघुकथा-चिंगारी( महिला दिवस,एक अभिव्यक्ति पुस्तक) प्रकाशित, लघुकथा- स्वयंसिद्धा अप्रकाशित(कथादेश में भेजी)





-"चिंगारी"


दुलारी ने आँगन में बीड़ी फूंँकते लखना को देखा तो बस बिगड़ गई।
"अरे! भिनसारे कोई बीड़ी फूँकता है क्या? निकल पड़ो तो कोई काम भी मिले।" एक सप्ताह से बिना काम के, घर में बैठे पति से त्रस्त हो गई थी दुलारी। 
"काम मिलता ही नहीं तो क्या चोरी करूँ?"तल्ख स्वर में लखना ने जवाब दिया।
"उमर हो रही है तुम्हारे साथ, सब जानती हूँ। एक-दो घर पूछा और फिर चार दोस्तों में दिन बिता के खाने के टैम हाजिर।" आज दुलारी के तेवर भी तेज थे।
"चार घर पोंछा बर्तन क्या कर लेती है, अपने आप को मालकिन समझ रही है।" गुर्राते हुए लखना ने अधजली बीड़ी को पैर से मसल दिया।
लखना के पैरों तले रौंदी बीड़ी ने दुलारी को अपने पुराने दिनों की याद दिला दी। 
गाँव की सबसे सुंदर लड़की थी दुलारी। पाँच कक्षा पढ़ी भी थी। सोलह में ब्याह दी गई लखना से और बीस तक तो दो बच्चों की माँ बन गई थी। 
लखना, लकड़ी का काम करता था। फर्नीचर, दरवाजे सब बनाता था परंतु स्वभाव का तेज और शरीर से आलसी। किसी ठेकेदार के नीचे टिककर काम ना करता। घर की जरुरतों को पूरा करने के लिए दुलारी आसपास की बिल्डींग में काम करने लगी।
लखना के खाँसने से दुलारी की तंद्रा टूटी। हाथ में पानी का गिलास भरकर लखना के पास गई।
"कहती हूँ बीड़ी मत फूँको। फेफड़ा खराब हो रहा है। सब जगह लिखा रहता है कि बीड़ी पीना बुरी बात है।" कहते हुए पानी का गिलास उसके हाथ में पकड़ा दिया।
बेकार बैठकर, दोनों जून  खाना खाने का आनंद लेने वाला मर्द जाग गया। 
गिलास की झनझनाहट हुई और दुलारी का माथा छिल गया। माथे से छलकती रक्त बूँदों ने दुलारी को, उसका अस्तित्व बता दिया। उसने ऐसी मर्दानगी अपने बापू और अपने ससुर में भी देखी थी।  किसी भी कीमत पर वह इस परंपरा को आगे  बढ़ने नहीं  देना चाहती थी।
कुछ सड़ी-गली परंपराओं को तोड़ना ही भला होगा, इसी सोच के साथ दुलारी ने कमर कस लिया।
अगले कुछ क्षणों में, अपनी मर्दानगी भूलकर, हाथ पैर बचाता लखना सचमुच काम की खोज में निकल गया था। कुचली बीड़ी में से एक चिंगारी चमक रही थी।

स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com



"स्वयंसिद्धा"

शादी की गहमा-गहमी खत्म हुई तो आज पूरा परिवार घर के बगीचे में आराम कर रहा है। वैसे व्यवसाय करने वाले परिवारों में ऐसा दृश्य कम ही होता है कि सब एक साथ घर पर बैठें। कुछ एक्का - दुक्का करीबी रिश्तेदार ही घर पर हैं।

"नितिन की शादी बड़ी यादगार रहेगी, कम मेहमान और जो थे वो सब भी मास्क में।" हँसते हुए नितिन के बड़े भाई राजीव ने कहा।
"सही बात कही भैया ने, फोटोग्राफर के सामने ही सब चेहरा दिखा रहे थे।" नितिन से छोटे पुनीत ने कहा।
इन सबकी बातों को सुनते हुए, नई बहू दिव्या और कहीं खो रही थी।
इस घर में सब कुछ अच्छा है, पर उसको ना जाने क्यों कुछ अजीब सा लगता है। अपने कमरे में भी लगता है कि कोई और भी है। कल बाथरूम से बाहर‌ निकली तो लगा कोई दरवाजे से तुरंत हट गया।
"क्यों, तुम मेरे नहाने के समय बाथरूम के बाहर पहरा दे रहे थे!" दिव्या ने नितिन से मुस्कुरा कर पूछा था।
"मैं तो बाहर समाचार पत्र पढ़ रहा था, तुम भी ना! क्यों करुँगा पहरेदारी?" नितिन ने बताया।
कल से दिव्या और परेशान हो गई। 
शाम को सास और जिज्जी ने चाय बनाकर कमरे में लाने को कहा। जिज्जी ने रसोई का सारा समझा दिया था कि चीजें कहाँ कहाँ हैं।
चाय उबल रही थी और गुनगुनाते हुए दिव्या दूध का पतीला लेने पलटी, अनायास ही डर गई। उसने रसोई के दरवाजे से किसी को तेजी से हटते देखा।
"कौन है ये? कोई क्यों छिपकर देखता है?" एक मर्दाने परफ्यूम की खुशबू ने उसका दिमाग खराब कर दिया।
सास- जेठानी के साथ चाय पीने में बिल्कुल मन नहीं लगा उसका।
"हमारी नई बहू आती जाती है तो पता चलता है। बहू की पायल बजती है।" बाबूजी ने कुर्सी पर बैठी दिव्या को देखकर कहा।
बाजू में बैठे, जिज्जी के भाई की परफ्यूम की महक से विचलित दिव्या ने, सबकी ओर एक दृष्टि डाली और अपने पैर से पायल निकाल लिया।
"मुझसे ज्यादा जरुरत इस पायल की इनको है।" जिज्जी के भाई के हाथों, अपनी पायल पकड़ाते हुए दिव्या के दिल का बोझ हल्का हो गया।

स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
सी-१४०१, निहारिका कनकिया स्पेसेस
ठाणे (पश्चिम) ४००६१०
महाराष्ट्र
फो.नं._ 9967674585
ई-मेल- sharmilachouhan.27@gmail.com


महिला दिवस, खुदेजा खान जी को नागपुर।

लघुकथा-यात्रा, खुशी

[18/02, 15:31] Sharmila Chouhan: 

"यात्रा"

चौक पर खड़ा, सीमेंट का पुराना खंभा परसों रात गिर गया। अस्सी वर्षीय गोविंद सिंह जी, आज सुबह उस क्षत विक्षत, धराशाही खंभे के पास चुपचाप खड़े थे।
एक समय था जब गोविंद सिंह जी की सभाएँ, समारोह इसी खंभे के नीचे हुआ करते थे। वक्त बदला, पार्टियाँ बदली, लोग और हालात भी। अब तो चौक के चाय की टपरी वाला, अस्सी साल के बूढ़े नेता को टोहता है कि एक कप चाय पीने के बाद कब जाएँगे।

 कितनी ही सभाओं, समारोहों का साक्षी था खंभा। नेताओं की तस्वीर, बड़े बड़े बैनर, चुनाव के पोस्टर थामकर, खंभे की कमर दुख गई थी और परसों तो टूट ही गई।
आज अचानक जिले के पालक मंत्री के आगमन की सूचना मिली और पार्टी के कार्यकर्ताओं में हलचल होने लगी।
"शाम को मंत्री जी यहाँ संबोधित करेंगे और इस खंभे को अभी गिरना था‌।" नए खंभे के लिए गड्ढा खुदवाते हुए एक कार्यकर्ता झल्लाया।
"हाँ यार, अब जल्दबाजी में नया खंभा लगाना ही पड़ेगा। चौक का मजा खराब हो गया।" दूसरे कार्यकर्ता ने गिरे खंभे को घूरते हुए कहा।

खंभे की आत्मा तिलमिला गई।
 दोपहर को बड़े से ट्रक में, मान सम्मान के साथ नए खंभे को लाया गया। लंबी आयु की कामना करते हुए, कुछ लोगों के करकमलों से उसे खड़ा किया। खुदे गड्ढे में पैर जमाए, खंभा आसमान को झाँकने लगा। पालक मंत्री की तस्वीर उसके शरीर पर चिपका दी गई।

जमीन पर पड़ा, पुराना खंभा दो दिनों से लोगों की ठोकरें और कुत्तों की जगविदित प्रिय क्रिया को झेलता कराह रहा था।
"ट्रक में इस सीमेंट के टूटे खंभे को भरकर शहर के बाहर डाल दो। कचरा साफ करो।" एक नवजवान कार्यकर्ता चिल्लाया।

टुकडों में बंटे, उस बूढ़े पुराने खंभे को ट्रक में ठूँसा जा रहा था। खंभे का एक छोटा टुकड़ा, अपने हाथों से उठाकर, गोविंद सिंह जी ने ट्रक पर रख दिया।

आगे बढ़ते ट्रक की दिशा में, थके बूढ़े कदम, कुछ दूर साथ चलने लगे।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
१८/०२/२०२१
[19/02, 17:31] Sharmila Chouhan: 

*******************


"खुशी"

सुबह से काम की तलाश में भटकते गनपत को, भूख लग गई थी। बड़ी इमारत के सामने एक बार कोशिश करना चाहा।
"क्या है, कौन हो? गेट के अंदर कैसे आ गए?" चौकीदार ने घुड़की दी।
"काम चाहिए साहब। बाग की साफ-सफाई, छोटी-मोटी मरम्मत का काम, कोई भी काम दिलवा दो।" चौकीदार को 'साहब' संबोधित करते, गनपत बिल्कुल नहीं हिचकिचाया।
"अभी बाहर के लोगों को कोई काम नहीं देता, कोरोना का डर है ना। जा भाई।" स्वयं के लिए 'साहब'का संबोधन चौकीदार को तृप्त कर गया था और आवाज में नरमी आ गई।
सड़क के किनारे ही बड़े पेड़ के नीचे गनपत डिब्बा खोलकर खाना खाने लगा। 
खाते हुए उसकी आंखें नम हो रहीं थीं। पाँच साल की बेटी मनु का अगले सप्ताह जन्मदिन आ रहा है और उसने कहा है कि," बाबा, मुझे लंबे बालों वाली, सुंदर गुड़िया देना ना। मुझे खेलना है उससे।" 
आधा खाना खाकर गनपत ने डिब्बा बंद कर दिया, "काम ही नहीं मिल रहा तो कहाँ से गुड़िया लूँगा ?" सामने की बड़ी इमारतों को देखकर ना जाने क्यों उसे चिड़ हो रही थी। आँखों के सामने बेटी का प्यारा सा चेहरा घूम रहा था।
सामने की एक इमारत का बड़ा गेट खुला और कामवाली बाहर आई। उसने बड़ी भरी थैली को कचरे के डिब्बे में डाल दिया और निकल गई।
उत्सुकता से गनपत उस कचरे के डिब्बे को झाँकनें लगा। रंग-बिरंगे कागजों की कतरनें, पुरानी टूटी चीजों के बीच, नीली आँखों वाली, पलक बंद करने वाली और लंबे बालों वाली सुंदर सी गुड़िया पड़ी थी।
गनपत की तो जैसे लाॅटरी निकल पड़ी। कचरे में से गुड़िया निकाल कर, उसे अपने पास के पानी से पोंछने लगा।
"ऐ..! क्या कर रहा है? बता ?" चौकीदार भागकर आया।
"अबे! बोलना, गूँगा तो है नहीं। क्या लिया है?" चौकीदार ने अपने पद की गरिमा निभाई।
"साहब, कचरे से बेटी की खुशी लिया है।" गनपत के हाथों में, नीली आँखों वाली, लंबे बालों वाली गुड़िया मुस्कुरा रही थी।

शर्मिला चौहान

रविवार, 7 मार्च 2021

स्त्री हूँ मैं

"स्त्री हूँ मैं"

ना अबला कहो, ना सबला कहो
ना श्रद्धा,ना देवी का दर्जा धरो  ।
ना पूजनीय, ना वंदनीय हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, एक स्त्री हूँ मैं।।

चाहत नहीं कि लोगों बीच पूजी जाऊँ,
यह भी नहीं कि इश्तहारों में नज़र आऊँ।
इंसानियत की तलाश में सदियों से भटकती हूँ‌‌ मैं
हाड़-मांस से बनी, एक स्त्री हूँ मैं ।।

भारत भूमि में वर्चस्व था कभी,
शिक्षा, अस्त्र-शस्त्र में पारंगत थीं सभी।
लुटेरों, आततायियों से मैं गोपनीय हो गई,
आज भी कहीं परदों में छुपी रहती हूँ मैं
हाड़-मांस की बनी,  एक स्त्री हूँ मैं ।।

ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति हूँ,
रिश्तों-नातों से स्वयं बंधीं हूँ।
अधिकार नहीं, विश्वास चाहिए,
 मात्र इंसान समझी जाने की प्रतीक्षा में हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, सिर्फ एक स्त्री हूँ मैं।।

गर संवेदनाओं को नकारा जाएगा,
क्षमताओं को जबरन दबाया जाएगा।
आँसूओं के सैलाब की परीक्षा ली जाएगी,
कोई भी स्त्री अब सहन नहीं कर पाएगी।
 सदियों से बदलाव की राह तकती हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, सिर्फ एक स्त्री हूँ मैं।।
स्त्री हूँ मैं।।

बरसों से खड़ी बाधाएँ हटने लगीं हैं
अदम्य हौसलों से राहें बनने लगीं हैं।
हौसलों के पंख से दुनिया हिली है,
आकाश की सौगात औरतों को मिली है।
उड़ान भरने को हीअब सुबह जागती हूँ मैं
हाड-मांस से बनी स्त्री हूँ मैं।।

शर्मिला चौहान 

बुधवार, 3 मार्च 2021

मेरी गज़लें..

तेरी याद भी अब सताती नहीं है
तेरी बात भी अब रुलाती नहीं है।

न चाहत न कोई शिकायत है तुझसे
तेरी सादगी अब जलाती नहीं है।

तेरी बेबसी का पता है मुझे भी
नई  राह दुनिया बनाती नहीं है।

सुनेगा न कोई भी दुनिया में मेरी
यही बात जीना सिखाती नहीं है।

दबे पाँव आकर चले भी गए जो
मेरी आह तुमको बुलाती नहीं हैं।

इसी चाह में हूँ कभी तो मिलोगे
मेरी चाह आँखें छुपाती नहीं हैं।

कहूँगा मैं तेरी ही महफ़िल में सबसे
कि तू राज़ अपने बताती नहीं है।

बहर-१२२
काफिया-आती
रदीफ़- नहीं है

शर्मिला चौहान
३/३/२०२१

***********

१२/३/२०२१
बहर १२२
काफिया- आ, छा, भा
रदीफ- रही है


न जाने कहाँ से हवा आ रही है।
उड़ा कर घरौंदा चली जा रही है।

बड़ी तेज़ बहती हवा है यहाँ पर।
कि चूनर सरकती मेरी जा रही है।

न किस्मत मेरी में लिखी थी मुहब्बत।
तेरी चाहतें किस कदर छा रही है।

न शिकवा ना कोई शिकायत करुँगी।
कि दिल से मेरे यह सदा आ रही है।

रखूंगी छिपाकर मैं दिल में हमेशा।
तेरी आशिकी अब मुझे भा रही है।

खुलें हैं कहीं चंद झिलमिल झरोखे
लिये साथ खुश्बू हवा आ रही है।

मेरा नाम आया तुम्हारी जबां पर।
खुली चोट पर अब दवा भा रही है।


शर्मिला चौहान
 ठाणे

मंगलवार, 2 मार्च 2021

गंगा दर्शन


" गंगा दर्शन "

तेजस्विता भाव, शुचिता परिपूर्ण , भव निर्मल करती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे,अंतर मम  बसती हो ।।
भगीरथ अथक प्रयास सफल ,
हुआ धरा पर अवतरण ।
शिव जटा बीच सिमटी ,
था प्रबल वेग मात्र कारण ।
शुभ्र उफनती गौमुख उद्गम,
चपला सी वेग गति ।
संतृप्त हृदय, आत्म अनहद ,
स्थिर करती चंचल मति ।

आवेग, उत्साह , हर्ष , परिपूर्णता , जन-जन में भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।।

वेद, पुराण , इतिहास , वंदित ,
जप-तप ध्यान योग स्थान ।
निर्मल नीर प्रवाह निरंतर ,
आदिकाल से धरा की शान ।
हरिद्वार की पुण्य भूमि को ,
करती जब स्पर्श ।
तपोभूमि ऋषियों-मुनियों की ,
रम्य मनोहर तीर्थ ।

श्रृद्धा भाव , मन शुचिता , आस्था विश्वास भरती हो ।
माँ गंगे , कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।।

सुरसरि , देवनदी, माँ गंगा ,
जाह्नवी, अलकनंदा , मंदाकिनी ।
पुण्यदायिनी ,मोक्षप्रदायिनी,
पापनाशिनी , कर्म प्रकाशिनी ।
सिंचन करती निज नीर से , 
समस्त धरा का पोषण करे ।
आलिंगन कर वसुधा का फिर,
जन -जन का कल्याण करे ।

बूंद बूंद निर्मल गंगाजल ,
आध्यात्म भाव भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे, अंतर मम बहती हो ।

घंटा, ढोल, नगाड़े बाजें, 
शंखनाद की गूंज रहें ।
बहते दीपक जलधारा में
जीवन सातत्य की सीख धरें ।
आकाश दीप सा जीवन हो
ध्येय उच्चतम सदा रहे ।
आत्मज्ञान की ज्योति से 
हृदय आलोकित रहे ।

जीवन दर्शन की सुंदरता , लहर लहर भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे, अंतर मम बहती हो ।।

राम, कृष्ण ने वंदन किया,
तुलसीदास गुणगान करे ।
तट पर स्थित पवित्र भूमि पर ,
शिव साक्षात निवास करे ।
आदि शंकराचार्य , विवेकानंद के
दर्शन का आधार हो तुम ।
सनातन वैदिक संस्कृति का 
एक प्रबल विश्वास हो तुम ।

आदिकाल से अनंत तक , जनमानस में भाव भरती हो  ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।
अंतर मम बहती हो ।।

रविवार, 28 फ़रवरी 2021

फाग गीत (कन्हाई)

"होरी खेलत हैं कन्हाई"



कैसे जाऊँ मैं सखी री,
होरी खेलत हैं कन्हाई।
होरी खेलत हैं कन्हाई,
होरी खेलत हैं कन्हाई,
कैसे जाऊँ मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई ।।
गुँज की माला, मोरपंखा सिर ,
कटि करधनी सजायो।
पीताम्बर, पग पैंजन नीकी,
रुप मेरो मन भायो।
बरसाने की छोड़ के होरी...होऽऽ
बरसाने की छोड़ के होरी,
मैं ब्रज खेलन आई।

कैसे जाऊँ मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई।।
ललिता, विशाखा संग सहेली,
राधे ढूंढे कन्हाई।
जमुना जल को निरखत राधे,
मन ही मन सकुचाई।
श्यामल जमुना केसर भई री ..होऽऽ
श्यामल जमुना केसर भई री,
राधे लाज लजाई ।

कैसे जाऊँ मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई।।
अबीर-गुलाल उड़े ब्रज में,
मन मुक्तक फाग सुनाये।
पूर्ण पुरूषोत्तम मोहन प्यारा,
होरी रास रचावे।
रूप बना गोपी का सुंदर ..होऽऽ 
रूप बना गोपी का सुंदर, गौरा भी ब्रज आई।

कैसे जाऊँ मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई ।।
कठिन डगर है जोग-ज्ञान की,
राधा चल ना पाए।
प्रेम रंग है सबसे चोखा,
माधव के मन भाए।
राधेश्याम की सुंदर जोड़ी...होऽऽ 
राधेश्याम की सुंदर जोड़ी, लोगन के मन भाई।

कैसे जाऊं मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई।।
कैसे जाऊं मैं सखी री,  होरी खेलत हैं कन्हाई।।

 यह मेरी मौलिक एवं स्वरचित रचना है।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)४००६१०

       

शनिवार, 27 फ़रवरी 2021

पुरस्कार समारोह मुट्ठी भर क्षितिज के लिए

मुट्ठी भर क्षितिज को अखिल भारतीय हिंदी लेखिका संघ मध्यप्रदेश द्वारा गिरजावती देवी स्मृति पुरस्कार प्रदान किया गयाा।
17 march2021 को भोपाल में आयोजित किया गया है।



"मुट्ठी भर क्षितिज" को अखिल भारतीय हिंदी लेखिका संघ मध्यप्रदेश द्वारा गिरजावती देवी स्मृति पुरस्कार प्रदान किया गया है।

हिंदी लेखिका संघ के 26 वें वार्षिक सम्मान समारोह में पुरस्कृत होगीं देश की जानी-मानी लेखिकाएँ  
2021-21 के लेखिका संघ के प्रतिष्ठित सम्मान
    1.श्रीमती कुसुम कुमारी जैन वरिष्ठता सम्मान - श्रीमती खालिदा सुल्तान, भोपाल
2. डॉ. फीरोज़ा  मुज़फ्फर सेवा सम्मान- श्रीमती  कल्पना विजयवर्गीय,भोपाल
3. डॉ. सुशीला कपूर हिंदी सेवी सम्मान- श्रीमती कुलतार कौर कक्कड़, भोपाल
कृति पुरस्कार
1. सुश्री प्रभा बरतरिया समग्र साहित्य सारस्वत पुरस्कार - डॉ. लता अग्रवाल (62 प्रकाशित पुस्तकें)
2. श्री श्यामलाल सोनी स्मृति पुरस्कार, विधा उपन्यास, निधि जैन, (रेवा में बहते मयूरपंख)
3. श्रीमती उमादेवी पटेरिया स्मृति पुरस्कार  कविता विधा, डॉ. क्षमा पाण्डेय, (मर्यादा कानूनों की)
4. श्रीमती अंजना मगरे स्मृति पुरस्कार  कविता विधा, रीमा दीवान चड्ढा, (ढाई आखर)
5. श्री प्रेमनारायण विजयवर्गीय स्मृति पुरस्कार कविता विधा, आरती सिंह एकता, (बारिश में भीगती नदी)
6. सुश्री चन्द्रावती राघव स्मृति पुरस्कार, आध्यात्म, डॉ. नीलिमा रंजन, (युगे-युगे शिशुपाल,)
7. श्री ब्रह्मदत्त तिवारी स्मृति पुरस्कार, विधा कहानी, डॉ. गरिमा संजय दुबे, (दो ध्रुवों के बीच की आस)
8. श्रीमती गिरजावती देवी स्मृति पुरस्कार विधा कहानी, शर्मिला  चौहान , (मुट्ठी भर क्षितिज)
9. श्रीमती सकरी बा एवं सूरज बा स्मृति पुरस्कार – लोकसाहित्य, लक्ष्मी शर्मा, (हिया हिलौरे रे)
10. साहित्यश्री पुरस्कार  सुधा राठौर (छंद हुए साकार)
11. श्रीमती सुशीला जिनेश स्मृति विधा लघुकथा पुरस्कार - ज्योत्स्ना कपिल , (लिखी हुई इबारत)
12. सुश्री सुषमा तिवारी स्मृति पुरस्कार, बाल साहित्य कहानी, उदिता मिश्रा, (भोला भालू एवं अन्य कहानियाँ)
13. श्री घनश्यामदास सक्सेना स्मृति पुरस्कार बाल साहित्य कविता आशा सतीश शर्मा, (आसमान का चंदा गोल)
14. श्री अरुण भार्गव स्मृति पुरस्कार डॉ. सुधा गुप्ता अमृता, यात्रा वृत्तांत, (चलें भ्रमण की ओर)
15. श्री द्वारका प्रसाद सक्सेना स्मृति पुरस्कार, समीक्षा विधा,  डॉ. मालती बसंत, (हिंदी बाल उपन्यास)
16. श्री वासुदेव प्रसाद खरे स्मृति पुरस्कार कविता विधा, डॉ. अन्नपूर्णा सिसौदिया , (औरत बुद्ध नहीं होती)
17. श्री राधारमण स्मृति अनुदित साहित्य पुरस्कार द्वारा श्रीमती मधु सक्सेना, देवयानी बैनर्जी, गीतांजलि
18. श्रीमती मनोरमा द्विवेदी स्मृति पुरस्कार  कविता विधा, शील कौशिक , (मासूम गंगा के सवाल)
19. नवलेखन प्रोत्साहन पुरस्कार सुनीता मिश्रा (दोराहा) विधा लघुकथा
20. श्रीमती कस्तूरी बाई स्वयंसिद्धा सम्मान  नीता दीप बाजपेयी
21. श्रीमती कमला सक्सेना युवा लेखिका पुरस्कार कृति गुप्ता माथुर
22. श्रीमती रामवती खरे हिंदी प्रतिभा पुरस्कार कु. संध्या मौर्य
23. हिंदी लेखिका संघ द्वारा विशेष पुरस्कार उपन्यास विधा डॉ. चंद्रा चतुर्वेदी (युग परिधि)



शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

होरी खेलें रघुराई(फाग गीत)

होरी की धूम मची है, अवध में होरी खेलें रघुराई।।

श्याम वर्ण रघुबीर सुहाए, गौरवर्ण सब भाई।
रंग-रंगीली भई रे अयोध्या, कौतुक करें सब माई।
सरयू में केसर घुल गई ऐसे, ह्रदय में साँसें समाई।
कंगन-नग से निरखे जानकी,नवधा भक्ति जग पाई ।
अवध में होरी खेलें रघुराई।।

पिचकारी बड़ी कारीगरी की,पंचधातु से बनाई।
हीरा, पन्ना, मोती माणिक, नवरत्नों से सजाई।
काया जो रघुबीर ने गढ़ दई, पाँच तत्व है समाई।
लोभ,मोह,सत,रज गुण डाला, प्रेम-सुधा बरसाई।
अवध में होरी खेलें रघुराई ।।

जिसके रंग सारा जग रंगता, रंग खेलें हैं रघुराई।
मुक्ति, ज्ञान,भक्ति के सागर, कर रहे ठकुरसुहाई।
खेल रे मनवा जी भर होरी, ऐसी होरी ना आई।
राम साथ जो खेलें होरी, धन्य वो लोग-लुगाई।
अवध में होरी खेलें रघुराई।।

होरी की धूम मची है, अवध में होरी खेलें रघुराई।
राम-सिया के फाग गा रहे, चरण कमल चित लाई।।

अवध में होरी खेलें रघुराई।।


मौलिक एवं स्वरचित रचना।

शर्मिला चौहान
सी-१४०१, निहारिका कनकिया स्पेसेस।
लोकपुरम मंदिर के सामने
ठाणे (पश्चिम)४००६१०
महाराष्ट्र

मो.नं.- 9967674585
ई-मेल- sharmilachouhan.27@gmail.com

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

गज़ल के वज़्न की गिनती

 (९) संयुक्ताक्षर का मात्राभार १ (लघु) होता है , जैसे - स्वर=११ , प्रभा=१२
 .... श्रम=११ , च्यवन=१११
 (१०) संयुक्ताक्षर में ह्रस्व मात्रा लगने से उसका मात्राभार १ (लघु) ही रहता है , ..... जैसे - प्रिया=१२ , क्रिया=१२ , द्रुम=११ ,च्युत=११, श्रुति=११
 (११) संयुक्ताक्षर में दीर्घ मात्रा लगने से उसका मात्राभार २ (गुरु) हो जाता है ,
 ..... जैसे - भ्राता=२२ , श्याम=२१ , स्नेह=२१ ,स्त्री=२ , स्थान=२१ ,
 (१२) संयुक्ताक्षर से पहले वाले लघु वर्ण का मात्राभार २ (गुरु) हो जाता है ,
 ..... जैसे - नम्र=२१ , सत्य=२१ , विख्यात=२२१
 (१३) संयुक्ताक्षर के पहले वाले गुरु वर्ण के मात्राभार में कोई अन्तर नहीं पडता है, ..... जैसे - हास्य=२१ , आत्मा=२२ , सौम्या=२२ , शाश्वत=२११ , भास्कर=२११.  
 (१४) संयुक्ताक्षर सम्बन्धी नियम (१२) के कुछ अपवाद उपरोक्त नियम के शब्द भार के अनुसार हैं, भी हैं , जिसका आधार  
 ..... पारंपरिक उच्चारण है, अशुद्ध उच्चारण नहीं।  मुख्यतः ल्ह, न्ह, म्ह के पहले अगर लघु है एवं ये भी लघु है तो पहले वाला दीर्घ हो जायगा, अगर ये दीर्घ हैं एवं पहले वाला लघु है तो भी यह लघु ही रहेगा दीर्घ नहीं बनेगा उदहारण :
तुम्हें=१२ , तुम्हारा/तुम्हारी/तुम्हारे=१२२, जिन्हें=१२, जिन्होंने=१२२, कुम्हार =१२१, कन्हैया=१२२ , मल्हार=१२१  यहाँ संयुक्त अक्षर के पहले का अक्षर लघु है फिर भी दीर्घ नहीं बना क्योंकि यहाँ ह दीर्घ है , यहाँ ह लघु है अतः संयुक्ताक्षर के पहले वाला अक्षर दीर्घ बन गया जैसे कुल्हड़=211 अल्हड 211.

+91 98602 11911: नमस्कार मैं नीरज गोस्वामी, मैंने अभी भट्ट साहब का भेजा हुआ ग़ज़ल पर लेख पढ़ा। भट्ट साहब ने अपने लेख में बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां दी लेकिन मेरी दृष्टि में नवांकुरों के लिए यह लेख थोड़ा मुश्किल है। मैंने गजल लेखन 56 वर्ष की अवस्था में शुरू किया, इससे पूर्व यकीन मानो मुझे ग़ज़ल का कोई ज्ञान नहीं था ।आदरणीय पंकज सुबीर जी के ब्लॉक से गजल क्या है यह जानना सीखा। बाद में जब मुझे थोड़ी बहुत समझ आई तो मैंने ग़ज़ल कहना शुरू किया ।मैं आपको ग़ज़ल के बारे में बहुत साधारण जबान में समझाने का प्रयास करता हूं, ताकि वो लोग जिन्होंने ग़ज़ल के बारे में कोई जानकारी अभी तक नहीं ली है वो इससे लाभान्वित हो सकें ।

गजल में तीन बातें विशेष रुप से ध्यान रखने योग्य हैं ,पहली काफिया बंदी ,दूसरी रदीफ़ को निभाना और तीसरी बहर ।काफिया याने तुकांत शब्द। गजल के शेर में काफिये का बहुत बड़ा स्थान है आपको काफिये मिलाने पड़ते हैं, तुकबंदी करती पड़ती है जैसे कल, पल, हल, चल...जैसे दवा, हवा, घटा...आप पूछेंगे कि दवा और घटा की तुक एक कैसे हई...सही पूछा है...इसमें आ की मात्रा की तुक मिलाई गई है...इसी तरह गली ,मरी, कही भी तुकांत शब्द हैं जिनमें ई की तुक मिलाई है।

एक मशहूर शेर देखें : "दिल में इक लहर सी उठी है अभी 
कोई ताजा हवा चली है अभी" इसमें उठी और चली दोनों काफिये हैं ।इसी तरह गालिब का शेर है "दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है ,आखिर इस दर्द की दवा क्या है "इसमें हुआ और दवा की दोनों काफिये हैं ।'क्या है' हर शेर में आता है जिसे हम रदीफ कहते हैं । रदीफ हर शेर की दूसरी पंक्ति में काफिये के बाद आना जरूरी होता है।
अब बात करें 'बहर' की, वो दरअसल मीटर है याने शब्दों का का समूह एक विशेष गणितीय क्रम में रखा जाता है ।ये थोड़ा कॉम्प्लिकेट सब्जेक्ट है इसलिए अभी इस पर चर्चा ना करके हमें शब्दों का वज़्न यानी कि भार जानना जरूरी होगा ।अब आप पूछेंगे किस शब्द का भार क्या? तो कोई भी शब्द जिसमें मात्रा लगती है उसका भार हम मानते हैं 2 इसे हम गुरु कहते हैं, बिना मात्रा का अक्षर लघु कहलाता है।जैसे 'क' का भार 1 और 'का' भार 2 ,'कि 'का भार 1,की भार 2 छोटी मात्रा का भार 1 और बड़ी का 2 होता है । इसी तरह कोई और शब्द में जैसे कौन इसमें 'कौ' का भार 2 और न का भार 1 याने कौन का भार 21, इसका भार होगा 21.जब आप वज़्न को समझ लेंगे तो ग़ज़ल कहने में बहुत आसानी होगी अभी इतना ही।
हम शुरू में वज़्न समझने का प्रयास करेंगे।
[16/02, 09:57] +91 98602 11911: अब हम वज़्न पता लगाने का प्रयास करते हैं। ग़ज़ल का संबंध श्रवण से है इसलिए इसमें शब्द का भार जैसे हम बोलते हैं वैसे लिया जाता है। याद रखें ग़ज़ल कभी लिखी नहीं जाती कही जाती है।
मैं कुछ शब्द और उनका वज़्न लिख रहा हूँ... आप इसे गौर से पढ़ें और समझें
आम- आ+म- 2 1
रात - रा +त - 2 1
गीत - गी+त - 2 1
कील - की+ल -2 1
भूल - भू +ल - 2 1
कमी - क + मी- 1 2
गीली - गी + ली - 2 2
मिली - मि + ली - 1 2
सीखा - सी + खा - 2 2
गिरा - गि + रा - 1 2
[16/02, 10:10] +91 98602 11911: अब हम ऐसे शब्द लेंगे जिसमें तीन अक्षर आते हैं

कमाल - क+मा+ल : 1 2 1
रहीम - र + ही + म : 1 2 1
कामना - का + म + ना : 2 1 2
कीमती - की+ म + ती : 2 1 2
बारीक - बा + री + क : 2 2 1
करीबी - क+ री + बी : 1 2 2

यदि दो लघु एक साथ आएं तो वो मिलकर गुरु हो जाते हैं जैसे
हल - ह ल :11 या 2
सर - स र : 11 या 2
मिल - मि ल :11 या 2
कुछ - कु छ : 1 1 या 2



मात्रा गिनने के नियम को अब यूँ समझें

1 - सभी व्यंजन (बिना स्वर के) एक मात्रिक होते हैं
जैसे – क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट ... आदि 1 मात्रिक हैं

2 - अ, इ, उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं
जैसे = अ, इ, उ, कि, सि, पु, सु हँ आदि एक मात्रिक हैं 

3 - आ, ई, ऊ ए ऐ ओ औ अं स्वर तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन दो मात्रिक होते हैं
जैसे = आ, सो, पा, जू, सी, ने, पै, सौ, सं आदि 2 मात्रिक हैं।

4. - यदि किसी शब्द में दो 'एक मात्रिक' व्यंजन हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक अर्थात दीर्घ बन जाते हैं जैसे ह1+म2 = हम = 2 ऐसे दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ होते हैं ।जिनको जरूरत के अनुसार 11 अथवा 1 नहीं किया जा सकता है
जैसे – सम, दम, चल, घर, पल, कल आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं

5. -परन्तु जिस शब्द के उच्चारण में दोनो अक्षर अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ दोनों लघु हमेशा अलग अलग अर्थात 11 गिना जायेगा
जैसे – असमय = अ/स/मय = अ1 स1 मय 2 = 112    
असमय का उच्चारण करते समय 'अ' उच्चारण के बाद रुकते हैं और 'स' अलग अलग बोलते हैं और 'मय' का उच्चारण एक साथ करते हैं इसलिए 'अ' और 'स' को दीर्घ नहीं किया जा सकता है और मय मिल कर दीर्घ हो जा रहे हैं इसलिए असमय का वज्न अ1 स1 मय2 = 112 होगा इसे 22 नहीं किया जा सकता है क्योकि यदि इसे 22 किया गया तो उच्चारण अस्मय हो जायेगा और शब्द उच्चारण दोषपूर्ण हो जायेगा|   

6. – किसी लघु मात्रिक के पहले या बाद में कोई शुद्ध व्यंजन(1 मात्रिक क्रमांक 1 के अनुसार) हो तो उच्चारण अनुसार दोनों लघु मिल कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है

उदाहरण – “तुम” शब्द में “'त'” '“उ'” के साथ जुड कर '“तु'” होता है(क्रमांक २ अनुसार), “तु” एक मात्रिक है और “तुम” शब्द में “म” भी एक मात्रिक है (क्रमांक १ के अनुसार) और बोलते समय “तु+म” को एक साथ बोलते हैं तो ये दोनों जुड कर शाश्वत दीर्घ बन जाते हैं इसे 11 नहीं गिना जा सकता
इसके और उदाहरण देखें = यदि, कपि, कुछ, रुक आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं

7.-परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दोनो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही अर्थात 11 गिना जायेगा
जैसे – सुमधुर = सु/ म /धुर = स+उ1 म1 धुर2 = 112

8- यदि किसी शब्द में अगल बगल के दोनो व्यंजन किन्हीं स्वर के साथ जुड कर लघु ही रहते हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक हो जाता है इसे 11 नहीं गिना जा सकता
जैसे = पुरु = प+उ / र+उ = पुरु = 2,   
इसके और उदाहरण देखें = गिरि

9-परन्तु जहाँ किसी शब्द के उच्चारण में दो हर्फ़ अलग अलग उच्चरित होंगे वहाँ ऐसा मात्रा योग नहीं बनेगा और वहाँ अलग अलग ही गिना जायेगा
जैसे – सुविचार = सु/ वि / चा / र = स+उ1 व+इ2 चा2 र1 = 1121

10-- ग़ज़ल के मात्रा गणना में अर्ध व्यंजन को 1 मात्रा माना गया है तथा यदि शब्द में उच्चारण अनुसार पहले अथवा बाद के व्यंजन के साथ जुड जाता है और जिससे जुड़ता है वो व्यंजन यदि 1 मात्रिक है तो वह 2 मात्रिक हो जाता है और यदि दो मात्रिक है तो जुडने के बाद भी 2 मात्रिक ही रहता है ऐसे 2 मात्रिक को 11 नहीं गिना जा सकता है
उदाहरण -
सच्चा = स1+च्1 / च1+आ1 = सच् 2 चा 2 = 22
(अतः सच्चा को 112 नहीं गिना जा सकता है)

आनन्द = आ / न+न् / द = आ2 नन् 2द1= 221 
कार्य = का+र् / य = कार् 2 य 1 = 21 (कार्य में का पहले से दो मात्रिक है तथा आधा र के जुडने पर भी दो मात्रिक ही रहता है)
तुम्हारा = तु/ म्हा/ रा = तु1 म्हा2 रा2 = 122
तुम्हें = तु / म्हें = तु1 म्हें2 = 12 
उन्हें = उ / न्हें = उ1 न्हें2 = 12

11-अपवाद स्वरूप अर्ध व्यंजन के इस नियम में अर्ध स व्यंजन के साथ एक अपवाद यह है कि यदि अर्ध स के पहले या बाद में कोई एक मात्रिक अक्षर होता है तब तो यह उच्चारण के अनुसार बगल के शब्द के साथ जुड जाता है परन्तु यदि अर्ध स के दोनों ओर पहले से दीर्घ मात्रिक अक्षर होते हैं तो कुछ शब्दों में अर्ध स को स्वतंत्र एक मात्रिक भी माना लिया जाता है
जैसे = रस्ता = 1+स् 1/ ता2= 22 होता है मगर रास्ता = रा/स्/ता = 212 होता है
दोस्त = दो+स् /त= 21 होता है मगर दोस्ती = दो/स्/ती = 212 होता है
इस प्रकार और शब्द देखें 
बस्ती, सस्ती, मस्ती, बस्ता, सस्ता = 22
दोस्तों = 212
मस्ताना = 222
मुस्कान = 221       
संस्कार= 2121

12 - संयुक्ताक्षर जैसे = क्ष, त्र, ज्ञ द्ध द्व आदि दो व्यंजन के योग से बने होने के कारण दीर्घ मात्रिक हैं परन्तु मात्र गणना में खुद लघु हो कर अपने पहले के लघु व्यंजन को दीर्घ कर देते है अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी स्वयं लघु हो जाते हैं   
उदाहरण = पत्र= 21, वक्र = 21, यक्ष = 21, कक्ष - 21, यज्ञ = 21, शुद्ध =21 क्रुद्ध =21
गोत्र = 21, सूत्र = 21,

13-यदि संयुक्ताक्षर से शब्द प्रारंभ हो तो संयुक्ताक्षर लघु हो जाते हैं
उदाहरण = त्रिशूल = 121, क्रमांक = 121, क्षितिज = 12

14- संयुक्ताक्षर जब दीर्घ स्वर युक्त होते हैं तो अपने पहले के व्यंजन को दीर्घ करते हुए स्वयं भी दीर्घ रहते हैं अथवा पहले का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी दीर्घ स्वर युक्त संयुक्ताक्षर दीर्घ मात्रिक गिने जाते हैं 
उदाहरण =
प्रज्ञा = 22 राजाज्ञा =222, पत्रों = 22  

15- उच्चारण अनुसार मात्रा गणना के कारण कुछ शब्द इस नियम के अपवाद भी है -
उदाहरण = अनुक्रमांक = अनु/क्र/मां/क = 2121('नु' अक्षर लघु होते हुए भी 'क्र' के योग से दीर्घ नहीं हुआ और उच्चारण अनुसार अ के साथ जुड कर दीर्घ हो गया और क्र लघु हो गया।




[20/02, 11:20] कविता की पाठशाला नीरज सर: आपको पता है कि:
1 - सभी व्यंजन (बिना स्वर के) एक मात्रिक होते हैं।
जैसे – क, ख, ग, घ, च, छ, ज, झ, ट ... आदि 1 मात्रिक हैं

2 - अ, इ, उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं
जैसे = अ, इ, उ, कि, सि, पु, सु हँ  आदि एक मात्रिक हैं 

3 - आ, ई, ऊ ए ऐ ओ औ अं स्वर तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन दो मात्रिक होते हैं
जैसे = आ, सो, पा, जू, सी, ने, पै, सौ, सं आदि 2 मात्रिक हैं
इनमें से केवल आ ई ऊ ए ओ स्वर को गिरा कर 1 मात्रिक कर सकते है तथा 
:: ऐसे दीर्घ मात्रिक अक्षर को गिरा कर 1 मात्रिक कर सकते हैं जो "आ, ई, ऊ, ए, ओ" स्वर के योग से दीर्घ हुआ हो 
:: अन्य स्वर को लघु नहीं गिन सकते न ही ऐसे अक्षर को लघु गिन सकते हैं जो ऐ, औ, अं के योग से दीर्घ हुए हों

उदाहरण =
मुझको :22 को मुझकु 2 1 कर सकते हैं 
आ, ई, ऊ, ए, ओ, सा, की, हू, पे, दो आदि को दीर्घ से गिरा कर लघु कर सकते हैं परन्तु ऐ, औ, अं, पै, कौ, रं आदि को दीर्घ से लघु नहीं कर सकते हैं

स्पष्ट है कि आ, ई, ऊ, ए, ओ स्वर तथा आ, ई, ऊ, ए, ओ तथा व्यंजन के योग से बने दीर्घ अक्षर को गिरा कर लघु कर सकते हैं

5 - यदि किसी शब्द में दो 'एक मात्रिक' व्यंजन हैं तो उच्चारण अनुसार दोनों जुड कर शाश्वत दो मात्रिक अर्थात दीर्घ बन जाते हैं जैसे ह1+म1 = हम = 2  ऐसे दो मात्रिक शाश्वत दीर्घ होते हैं जिनको जरूरत के अनुसार 11 अथवा 1 नहीं किया जा सकता है
जैसे – सम, दम, चल, घर, पल, कल आदि शाश्वत दो मात्रिक हैं,
ऐसे किसी दीर्घ को लघु नहीं कर सकते हैं|  
दो व्यंजन मिल कर दीर्घ मात्रिक होते हैं तो ऐसे दो मात्रिक को गिरा कर लघु नहीं कर सकते हैं ।

उदहारण = कमल की मात्रा 12 है इसे क1 + मल2 = 12 गिनेंगे तथा इसमें हम मल को गिरा कर 1 नहीं कर सकते अर्थात कमाल को 11 अथवा 111 कदापि नहीं गिन सकते।
[20/02, 11:20] कविता की पाठशाला नीरज सर: ग़ज़ल सीखने की और चलिए अब अगला कदम बढ़ाते हैं। आज हम बात करते हैं मात्रा गिराने की। अब आप कहेंगे कि, अभी तक आप मात्र भार सिखा रहे थे अब गिराने की बात कर रहे हैं । ग़ज़ल लेखन की तकनीक ये सुविधा या छूट आपको देती है कि आप कुछ अक्षरों की जो की दीर्घ हैं मात्रा गिरा कर उन्हें लघु कर सकते हैं ।याने जिनका मात्रा भार 2 है उस को 1 माना जा सकता है ।अब सवाल यह उठता है कि वो दीर्घ कौन से हैं जिन्हें हम गिराकर एक कर सकते हैं ।
इस बात को एक आप कहीं नोट करलें ताकि ग़ज़ल कहते वक्त जरूरत पड़ने पर चाहें तो इस छूट का लाभ ले सकें...
[20/02, 11:40] कविता की पाठशाला नीरज सर: जैसा कि मैंने बताया:

आ, ई, ऊ, ए, ओ के संयोग से बनी दीर्घ मात्रा को गिरा कर लघु किया जा सकता है किन्तु ऐ, औ, अं को किसी भी स्थिति में गिराया नहीं जा सकता हालाँकि अपवाद स्वरूप कुछ को इससे छूट भी प्राप्त है। इन अपवाद में - है, हैं, मैं, और शामिल हैं। 
सबसे अधिक जो गिराए जाते हैं वे हैं - तो, को, जो, ये, में आदि। 

साथ ही यह ध्यान रखना भी आवश्यक है कि किसी भी शब्द के अंत का ही दीर्घ गिरता है आरंभ का नहीं। 
किन्तु कुछ अपवाद वाले शब्द यहाँ भी हैं जिनमें सुविधानुसार आदि या अंत किसी की भी मात्रा गिराई जा सकती है जैसे - कोई, मेरी, तेरी। आपने शायद देखा होगा कि शायर इन के लिए कुई, मिरी या तिरी का प्रयोग करते हैं जबकि ऐसा करने की जरूरत नहीं होती। खैर।
सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात यह कि किसी भी संज्ञावाचक शब्द और हिंदी के तत्सम शब्दों की मात्रा नहीं गिराई जा सकती। हालाँकि अब कई लोग तत्सम शब्दों की मात्रा भी गिराने लगे हैं और इसे स्वीकार भी किया जाने लगा है।

जिसकी लाठी उसकी भैंस का चलन हर क्षेत्र में है...बड़े शायर अक्सर नियमों की धज्जियाँ उड़ाते देखे गये हैं ...हम लोग क्योंकि कि अभी नौसीखिए हैं इसलिए नियमों का यथासंभव पालन करेंगे।😊


याद है हमने ग़ज़ल की कक्षा की शुरुआत शब्दों का मात्रा भार जानने से की थी। तब का सीखा अब यहाँ काम में लेते हैं और इस पूरे मिसरे याने पंक्ति का मात्रा भार निकालते हैं।
बहारों: 122
फूल: 21
बर सा ओ: 222
मिरा(मेरा): 12
महबूब: 221
आया: 22
है:2
पूरी पंक्ति का मात्रा भार हुआ
122 21 222 12 221 222
ठीक है न?
इसमें गौर से देखें तो पाएंगे कि इस पंक्ति या मिसरे में लघु और दीर्घ अक्षर एक विशेष क्रम में रखें गये हैं जिसे यूँ लिखने से बात स्पष्ट हो जाएगी
1222 1222 1222 1222
कोइ शक ?😁
लघु दीर्घ का ये क्रम एक अत्यधिक प्रचलित बहर है ।बस इस क्रम को याद रखें और चाहें तो कोई भी नाम दें।क्रम याद रखना जरूरी है नाम कुछ भी हो।
अब इस गीत का दूसरा मिसरा लें
*हवाओं रागिनी गाओ मिरा(मेरा) महबूब आया है*
इसका मात्रा भार निकालें
हवाओं: 122
रागिनी : 212
गाओ: 22
मिरा(मेरा): 12
महबूब: 221
आया: 22
है:2
पूरी पंक्ति का मात्रा भार हुआ
1222 1222 1222 1222

बहारों फूल बरसाओ मेरी महबूब आया है
1222 1222 1222 1222
हवाओं रागिनी गाओ मेरा महबूब आया है
1222 1222 1222 1222

ये हुआ ग़ज़ल का मतला जिसके काफिये की ध्वनि है आओ( बरस+आओ और ग+आओ) रदीफ है मेरा महबूब आया है और बहर है 1222 1222 1222 1222