"स्त्री हूँ मैं"
ना अबला कहो, ना सबला कहो
ना श्रद्धा,ना देवी का दर्जा धरो ।
ना पूजनीय, ना वंदनीय हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, एक स्त्री हूँ मैं।।
चाहत नहीं कि लोगों बीच पूजी जाऊँ,
यह भी नहीं कि इश्तहारों में नज़र आऊँ।
इंसानियत की तलाश में सदियों से भटकती हूँ मैं
हाड़-मांस से बनी, एक स्त्री हूँ मैं ।।
भारत भूमि में वर्चस्व था कभी,
शिक्षा, अस्त्र-शस्त्र में पारंगत थीं सभी।
लुटेरों, आततायियों से मैं गोपनीय हो गई,
आज भी कहीं परदों में छुपी रहती हूँ मैं
हाड़-मांस की बनी, एक स्त्री हूँ मैं ।।
ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कृति हूँ,
रिश्तों-नातों से स्वयं बंधीं हूँ।
अधिकार नहीं, विश्वास चाहिए,
मात्र इंसान समझी जाने की प्रतीक्षा में हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, सिर्फ एक स्त्री हूँ मैं।।
गर संवेदनाओं को नकारा जाएगा,
क्षमताओं को जबरन दबाया जाएगा।
आँसूओं के सैलाब की परीक्षा ली जाएगी,
कोई भी स्त्री अब सहन नहीं कर पाएगी।
सदियों से बदलाव की राह तकती हूँ मैं,
हाड़-मांस से बनी, सिर्फ एक स्त्री हूँ मैं।।
स्त्री हूँ मैं।।
बरसों से खड़ी बाधाएँ हटने लगीं हैं
अदम्य हौसलों से राहें बनने लगीं हैं।
हौसलों के पंख से दुनिया हिली है,
आकाश की सौगात औरतों को मिली है।
उड़ान भरने को हीअब सुबह जागती हूँ मैं
हाड-मांस से बनी स्त्री हूँ मैं।।
शर्मिला चौहान
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