सोमवार, 13 अप्रैल 2026

युद्ध नहीं आसान.. कविता

युद्ध नहीं आसान 

देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।
भूख मृत्यु और आँसू, हर तरफ श्मशान है।।

चल दिए घर से निकल कर, लौट न पाए कभी।
बच्चे बूढ़े औरतें, भुक्तभोगी हैं सभी।

ज़िंदगी फिर से बसाना, इतना क्या आसान है?
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।1।।

द्रोन, बम, मिसाइलें, हैं धधकती हर घड़ी।
ढ़ेर मलबों का बढ़ा, छोटी मानवता पड़ी।

युद्ध लड़ते देश पर, मरता तो बस नादान है,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।2।।

वीरता का खून करती, भस्म क्षण में सब करे।
एक दो नहीं सैकड़ों, एक क्षण में हैं मरे।

जीव जंतु प्राणियों का, हो रहा अवसान है,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।3।।

गिद्ध, चील, कौओं का, चल रहा महाभोज है।
सत्ता शक्तिशालियों की, और कुछ की होड़ है।

लोभ, पद की लालसा ने, छीनी कई संतान हैं,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।4।।

श्रेष्ठ खुद को है समझता,  शक्ति का भंडार जो।
दूसरों को है मिटाता, रचता खुद संसार वो।

सृष्टि और मानव के मध्य, मचा यह घमासान है,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।5।।

लुटती इज्जत औरतों की, बच्चे मरते रात दिन।
बूढ़ों ने रोकी हैं सांसें, लोग हैं परिवार बिन।

सबने झेला युद्ध को, जापान और ईरान है,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।6।।

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रविवार, 12 अप्रैल 2026

अमलतास गीत

गर्मियों में धरा का उच्छवास है।
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।

ताप से सृष्टि में अकुलाहट सी है,
सनसनाती लू की ही आहट सी है।

ऐसे में मन में जगाता आस है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।1।।

पीत रंग परचम फहराता जो है,
गुलमोहर के संग मुस्काता वो है ।

लाल पीले का रचा ये रास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।2।।

सूर्य तेजस्वी ठठाकर हँस पड़ा,
दग्ध दाह बिखेरता था वो खड़ा।

सहने की क्षमता धरा की ख़ास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।3।।

अस्त्र चटकीले भूमि को हैं मिले,
टेसू गुलमोहर दमकते जो खिले।

गर्मियों में लगे ज्यों मधुमास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।4।।

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शर्मिला चौहान

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

221 2121 1221 212 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी साथियों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 आप सबकी ग़ज़लों से पटल खूबसूरत लग रहा है।


फ़िलबदीह-63 
दूसरा चरण 

221 2121 1221 212


रखती सभी का हर घड़ी सच्चा हिसाब है
कहते हैं ज़िंदगी जिसे ये वो किताब है।।1।।

हर कामयाब आदमी बूझे सवाल खुद 
जिसने सबक नहीं लिया वो ही ख़राब है।।2।।

कांटों के बीच राह बनाते चले चलो
जो अंत तक निभा सको जीवन गुलाब है।।3।।

कोई कहे नशा इसे कोई सज़ा कहे
ये है दवा किसी के लिए ये शराब है।।4।।

बाहर जो ढूंढते रहे अपने में ही मिली
ढूंढे जो खुद में ही खुशी वो कामयाब है।।5।।

गंगा सी तेज़ हो कभी सरयू सी मंद हो 
ये ही तो ज़िंदगी का लुब्बे-लुबाब है।।6।।

औरों की भेड़चाल से बचकर चलें यहाँ
अपने ही दम पे जो जिया वो ही जनाब है।।7।।

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शर्मिला चौहान