गर्मियों में धरा का उच्छवास है।
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।
ताप से सृष्टि में अकुलाहट सी है,
सनसनाती लू की ही आहट सी है।
ऐसे में मन में जगाता आस है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।1।।
पीत रंग परचम फहराता जो है,
गुलमोहर के संग मुस्काता वो है ।
लाल पीले का रचा ये रास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।2।।
सूर्य तेजस्वी ठठाकर हँस पड़ा,
दग्ध दाह बिखेरता था वो खड़ा।
सहने की क्षमता धरा की ख़ास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।3।।
अस्त्र चटकीले भूमि को हैं मिले,
टेसू गुलमोहर दमकते जो खिले।
गर्मियों में लगे ज्यों मधुमास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।4।।
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शर्मिला चौहान
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