कुटुंबपाल
कुटुंब, जहाँ बीस-पच्चीस लोगों का साथ खाना बने, सब साथ रहें और साथ ही लड़ाई-झगड़ा भी ज़ोरदार होता रहे। ऐसे बड़े कुटुंब का एक छोटा सा हिस्सा थी वह। 'पूनो' कुटुंब का दिया नाम जिसने पूर्णिमा को स्नेह से समेट कर पूनो कर दिया था। मकान का कुछ हिस्सा पक्का, कुछ कच्चा परंतु दिल तो सबका बच्चा ही था। दरवाजे पर लकड़ी की तख्ती से दादाजी ने 'सिंह कुटुंब' लिखवाया था। पूनो की स्मृतियों में दादाजी की झलक साफ थी क्योंकि हमेशा बच्चों में बच्चों की तरह गाते-खेलते, लतीफे सुनाते, छुप्पन-छुपाई का हिस्सा भी बन जाते थे। दादी, उतनी ही अक्खड़, उनके पीछे छिपे बच्चों को दो थप्पड़ पड़ती और पकड़ा जाता वो अलग।
दादा जी के चार बेटे और दो बेटियाँ। बड़े उदय ताऊ जी और सुधा ताई। दूसरे नंबर पर किशोर ताऊजी और मीना ताई। तीसरे नंबर पर पूनो के पिताजी कमल और माँ गौरी। चौथे सबसे छोटे चाचा दीपक और चाची शीला। दो बुआ कमला और मंगला। अब बच्चों की गिनती ना भी करो तो दर्जन भर यह बड़े ही हो गए। दीपक चाचा और मंगला बुआ तो दूध-भात थे, कभी बड़ों में रहते ही नहीं थे दोनों। बड़े ताऊ जी के बच्चों के उम्र के आसपास रहने के कारण बस बच्चों में ही शामिल रहते थे। इस कुटुंब में आगे एक दर्जन बच्चों की भी एंट्री है।
अपने बंगले के सामने लॉन में कुर्सी पर बैठी सर्दियों की नरम मुलायम धूप का आनंद लेती पूनो नहीं.. अब तो पूर्णिमा, ने स्वेटर की डिजाइन को बड़ी कुशलता से पूरा किया। फंदों को गिराने-उठाने, घटाने-बढ़ाने और फिर एक निश्चित आकार दे देने में स्त्रियाँ तो माहिर होती हैं। अपनी जरूरतों, अपने सपनों, अपनी इच्छाओं के फंदों को कब घटा देती हैं और परिवार की जरूरतों, आशाओं को बुनकर तैयार करती हैं घर। यह स्वेटर वह अपनी नातिन ध्रुवी के लिए बना रही है। दो साल की प्यारी, गोल-मटोल ध्रुवी कितनी सुंदर लगेगी गुलाबी रंग के इस स्वेटर में, इस कल्पना से ही पूर्णिमा को खुशी होती है। आजकल तो बड़े कोई हाथ के बुने स्वेटर नहीं पहनते।
बुनाई का एक ज़माना देखा था पूर्णिमा ने अपने कुटुंब में। यह कला अपनी दादी, ताइयों, माँ और बुआ से बहती हुई उसमें भी आ गई थी। सर्दियों की दोपहरी में, उन की रंग-बिरंगे लच्छियों को सुलझाकर गोले बनाना, नये नमूनों की तलाश में पत्रिकाओं का आदान-प्रदान करती ये स्त्रियाँ, गृहस्थी की बड़ी उलझनें भी साथ-साथ सुलझा लेती थीं।
"मैं सब्जियाँ लेने जा रहा हूंँ। तुम्हें चलना हो तो चलो वरना यह सब्जी अच्छी नहीं, वह ठीक नहीं कहती रहती हो।" हाथ में थैली लिए पूर्णिमा के पति अशोक खड़े थे।
"अब अगले सप्ताह तक मुझे यह स्वेटर पूरा करना है तुम ही ले आओ सब्जियाँ, देखकर लाना तो अच्छी ही आएगी ना।" उसकी बात सुनकर सिर हिलाते हुए सब्जी मंडी के लिए अशोक प्रस्थान कर गए। उनको जाता देख, एक बार चारों तरफ नज़रें घूमाकर पूर्णिमा फिर से उस स्वेटर के फंदों और अपने कुटुंब की सुखद स्मृतियों में लीन हो गई।
ऐसी सर्दियों में तो 'सिंह कुटुंब' का सौंदर्य द्विगुणित हो जाता था। सब्जियों का बाहुल्य उनकी कीमतों को घटा देता था और तब प्रति समय दो सब्जियों का आनंद लेने वाला परिवार अपने आप को राज परिवार से कम नहीं समझता था।
दादाजी और दादी ने अपने बच्चों के काम बाँट रखे थे। अपनी दोनों बेटियों को भी उन्होंने बराबरी का काम दिया था। दोनों बुआ, सबके कपड़े तह करतीं, उनके कमरों में रख देतीं, परदे बदलना, नाश्ता परोसना और बैठक की साज-सज्जा बड़ी खुशी से किया करती थीं। दोनों बुआ के साथ बड़े ताऊ जी की दोनों बेटियाँ भी गुपचुप काम किया करतीं। शाला से आने के बाद यूनिफॉर्म धोना और विशेष समय पर लोहा करना, सब बच्चे कर लेते थे।
कितना सुंदर, कितना प्यारा समय था। एक-दूसरे के कपड़ों को धोकर उनके कमरे तक पहुंचाना, कोई मनमुटाव नहीं। आँगन के चूल्हे पर चादरों को उबलते पानी में खौलाकर, फिर ताई जी और मांँ उन्हें कुटेले से कूट-कूट कर साफ करते थे। मजाल है कि सूखती चादरों और तकिया के गिलाफ़ो को कोई हाथ भी लगा दे। दो-तीन बच्चों का काम छोटी बाल्टी से पानी लाकर टंकियों में भरना था, वो भी चड्डी-बनियान पहने दौड़कर अपना काम पूरा कर लेते।
भोजन का आनंद तो इतना कि अंत में खाने वालों की थालियों में साग, अचार-चटनी जैसी और अचार, चटनी-साग जैसे परसे जाते थे। हमेशा ही दोनों ताईजी, माँ और चाची सबके खाने के बाद, सिलबट्टे पर टमाटर-धनिया की चटनी पीसकर खाते थे। कुटुंबपाल सब्जियांँ भी कभी-कभी उनकी दादी तक नहीं पहुँच पाती थी।
दादा जी के साथ दोनों ताऊजी खाने बैठते। बाबूजी कभी-कभी उनके साथ बैठते वरना तो बाबूजी और चाचा बाद में ही खाना पसंद करते थे। खाते समय दादाजी पूरे दिन के काम का हिसाब-किताब पूछा करते तो नौकरी करने वाले बाबूजी और पढ़ाई करने वाले चाचा, कन्नी काट लेते थे।
खेती का काम तो अंत तक दादाजी ही देखते थे। पूरे परिवार की दाल-रोटी यानी गेहूँ और अरहर की फसल भरपूर हो जाती थी खेतों में। दोनों ताऊ जी ने कपड़ों की दुकान डाली थी, दोनों मिलकर आधा-आधा समय बैठते और दुकान चलाते थे। बाबूजी प्राथमिक शाला की शिक्षक थे। बड़ी बुआ के रिश्ता भी उन्होंने दूसरे गाँव में एक शिक्षक से ही तय करवाया था।
दादाजी ने सबके काम, सबकी जिम्मेदारियांँ बाँट रखी थीं। दाल-रोटी खेती से और फल-सब्जियों की पूर्ति बड़े ताऊजी पर थी। त्योहारों पर सबके कपड़े बनवाने का जिम्मा छोटे ताऊजी पर था। बाबूजी, चावल, तेल और रसोई के अलावा लगने वाले धुलाई का पावडर, साबुन का इंतजाम करते थे।
नए कपड़े बनवाने का जैसे मुहूर्त देखा जाता था। शादी-ब्याह, दीपावली या कभी किसी के जन्मदिन पर उसको नए कपड़े मिलते थे। आँगन में गाँव का दर्जी अपनी मशीन लिए आठ-पंद्रह दिनों का डेरा लगा लेता था। छोटे ताऊजी दुकान से कपड़ों की थान ले आते, इन्हीं थानों में से पूरे कुटुंब के कपड़े सिलवाए जाते थे। नमूनेदार बेल-फूल वाले थान लड़कियों के लिए आते थे और फैशन तो बढ़-चढ़कर था उस ज़माने का।
किसी बच्ची को छोटी चुन्नट वाला घेर तो किसी को चौड़ी प्लेट्स की स्कर्ट चाहिए, किसी को चूड़ीदार तो किसी को घेरदार सलवार चाहिए होती थी। गाँव का वह दर्जी हर प्रकार की फरमाइश सधे हाथों से पूरी करता। दादी फलालेन के ब्लाउज पहनती थी तो बड़ी ताई जी पूरी आस्तीन के। छोटी ताई जी को जरी और कांच लगे आस्तीन बड़े पसंद आते थे और मां को रुबिया और सूती कपड़ों के ब्लाउज। चाची के ब्लाउजों की डिजाइन ढूंढते-ढूंढते दर्जी चाचा भी माथे पर हाथ लगा लेते थे।
किसी रिश्तेदार के यहां शादी पड़े या घर में कोई बड़ा कामकाज हो तो दर्जी चाचा की बहुत डिमांड बढ़ जाती। बार-बार बच्चों को उनके घर का फेरा लगाना पड़ता तब कहीं जाकर वो दर्शन देते। इन कपड़ों की थानों में से वह अपने परिवार के कपड़े भी सिल लिया करते। परिवार के साथ ही उसका खाना-पीना, चाय-नाश्ता उन पूरे दिनों दिन बंधा रहता था। पुरुषों के कपड़ों के लिए हल्के रंग के प्लेन गट्ठे आते।
ताऊजी और दादाजी, दोनों ही धोती के साथ कुर्ता पहना करते थे। छोटे ताऊजी, बाबूजी और चाचा पैंट -कमीज पहनते थे। चाचा उस वक्त कॉलेज में पढ़ा करते थे और वे छोटे ताऊ जी के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते कि, "भैया मेरे लिए यह सादे कपड़े मत लाना कुछ लाइन वाले चमकीले रंग के लाना जैसे फलाने पिक्चर में राजेश खन्ना ने पहना था। उनके लिए दर्जी चाचा अलग-अलग कॉलर वाली अलग प्रकार के फिटिंग वाली कमीज़ें से बनाया करते थे। उस समय के बड़े फैशन डिजाइनर दर्जी चाचा और शो स्टॉपर दीपक चाचा थे।
यह तो हुई कपड़ों की बातें, अब जरा सब्जियों की दुनिया में भी कदम रखते हैं। कुटुंब के लिए सब्जियों का ठेका बड़े ताऊजी के कंधों पर था। मुझे लगता है सबसे बड़ा यही काम था जो ताऊजी ने सालों-साल संभाला। पाँच बजे कपड़ों की अपनी दुकान से निकल कर वह पैदल ही सब्जी मंडी जाते। छह-सात बजे जब सब्जी वाले अपना सामान कम कीमत में बेचकर निकलने की फिराक में रहते तो ताऊ जी बड़ी तादाद में सभी बची सब्जियाँ खरीद लाते। अब वह भी क्या करें बीस-बाइस लोगों के इस कुटुंब में भोजन का मुख्य आकर्षण तो सब्जियां ही थीं। कोई किलो दो किलो तो नहीं पूरे चार किलो सब्जी एक समय में लग जाया करती थी।
भूरा कुम्हड़ा, लौकी, बैगन, पत्ता गोभी और आलू की तो पूरी बोरी ले आते थे ताऊजी। शायद कुटुंब ने ट्रकों आलू खाए होंगे जीवन में। सब्जियों की कमी के समय आलू मुख्य केंद्र होता था। फूलगोभी, बरबटी, पनीर, शिमला मिर्च यह सब सब्जियां विशेष दिन त्योहार पर ही बनती थीं। अरहर की दाल जब बनाई जाती थी तब बीस-पच्चीस किलो साबुत अरहर घर पर रख दिया करते थे जो कभी-कभी उबाल कर नाश्ते के काम आती थी।
सिलबट्टे पर पिसा हुआ मसाला, चूल्हे पर पकी सब्जियां जिनकी महक घर आंगन में फैला करती। सूखी मसालेदार सब्जियां कभी-कभार ही बनती थीं । हमेशा खूब रसदार, बड़ी कढ़ाही के कानों तक मसालेदार पानी में तैरती 'कुटुंबपाल' सब्जी ही परोसी जाती।
"चाची, इतना रस क्यों रहता है सब्जी में? सूखे परवल, कटहल क्यों नहीं बनाते?" रसोई इंचार्ज माँ थी तो ताऊ जी के बच्चे माँ से पूछा करते।
"तुम्हारे ताऊजी से कहना तीन-चार की जगह पाँच-छह किलो सब्जियाँ लाया करें। यहाँ हर आदमी चार-पांँच रोटी के साथ दो कटोरी दाल और उतनी ही सब्जी खा लेता है। सूखी सब्जी बनाते रहे तो चल गया यह कुटुंब ।" माँ की जगह दोनों ताईजी कूद जातीं बच्चों के सामने।
इस पूरे कुटुंब के लिए सब्जियों की व्यवस्था करने वाले बड़े ताऊजी को दादाजी ने ही पहली बार "कुटुंबपाल" का उपनाम दिया था। सबके मन को बनाए रखना, गर्मियों में तरबूज, खरबूज और सर्दियों में गाजर लाकर "आज बच्चों के लिए गाजर का हलुआ बनाना छोटी" कहकर, अपने उपनाम को सार्थक करने वाले बड़े ताऊजी, आज भी पूर्णिमा की स्मृतियों में मुस्कुरा रहे थे।
सब्जी रामायण का समापन टमाटर की किसी चटनी से करने में कोई संकोच नहीं है। चाहे सब्जी स्वादिष्ट हो न हो, रसदार हो सूखी भुनी हो, कुम्हड़े की हो भिंडी की हो, रसोई संभालने वालियों की थालियों के लिए बस अचार की तरह बचती थी और फिर सिलबट्टे पर पिसी जाती थी इन स्त्रियों के नित्य की साथी 'चटनी'। जिसे बड़े प्रेम से, दुनिया जहान के व्यंजनों की विधियां एक-दूसरे से साझा करते हुए, पहले तीनों फिर चौथी आई चाची भी चटकारे लेकर खाया करतीं।
"अपने लिए पहले ही थोड़ी सब्जी अलग रख लिया करो दुल्हन। रोज-रोज इस तरह चटनी के साथ खाना क्या अच्छा लगता है रसोई में जितनी बनेगी सारे पूरी खा जाएंगे तो तुम क्या रोज ही ऐसी रहोगी?" दादी अक्सर अपनी चारों बहुओं को रसोई में आकर कहा करती थीं।
सोने के पहले बच्चों को और दादाजी को दूध दिया जाता था। घर में ही एक भैंस और दो गायें थी। चाय, दही-छाछ, घर के ही दूध से बनता था। शाम को ताजा दुहा दूध उपले जला कर मिट्टी की हांडी में पकने रख दिया जाता था। पीला होता दूध अपनी खुशबू से सबका ध्यान खींच लेता। कुछ दूध रोटी खाना पसंद करते थे जिसमें दादाजी अपने फूलकांस के कटोरे में दूध-रोटी खाया करते थे। ऊपर से शक्कर डालने का बिल्कुल रिवाज नहीं था इस कुटुंब में।
ठेलों पर बिकने वाले बर्फ के गोले, कुल्फी, गुपचुप खरीदने के लिए बड़ी सिफारिश करनी पड़ती थी। पूर्णिमा ने याद किया एक बार बर्फ के गोले वाले की आवाज़ से लाचार बच्चों की गैंग ने एक दुपहरी छोटे ताऊ जी के कमरे से दस रूपए का नोट चुरा लिया। इस नोट में जी भर गोला खाए और कुल्ला करके मुंँह को साफ करने का असफल प्रयास करने वाले इन बच्चों की चोरी छुपी नहीं रही। छह बच्चों की इस गैंग का एक छोटा सदस्य ही मुखबिर बन गया। वह था पूर्णिमा का अपना छोटा भाई प्रमोद।
जब ताई जी अपनी अलमारी, अपने बटुए, अपने कपड़ों और हर जगह उस दस के नोट को ढूंढ रही थीं तब इसी मुखबिर ने उस नोट की चोरी यात्रा का नमक-मिर्च लगाकर वर्णन कर दिया। उसे तो मुखबिरी का पुरस्कार मिला "ईमानदार बच्चा" और बाकी पाँचो की शाम को पेशी लग गई। कितने उठक-बैठक, कितनी डाँट, कितनी विभूतियों से उनको नवाजा गया था, आज भी पूर्णिमा को हँसी आ गई।
"अकेली बैठी-बैठी कब तक हंँसती रहोगी? अब तो धूप भी बढ़ गई है।" गेट खोलकर अशोक सब्जियों का थैला लिए पूर्णिमा के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गए।
"सुबह तो इतनी ताजी सब्जियाँ मिलती हैं कि मजा आ जाता है।" उन्होंने उत्साह में भरकर एक-दो सब्जियांँ बानगी के रूप में दिखाईं।
"यह परवल लाया हूंँ, मौसम के पहले परवल, पचास रूपए पाव हैं। इन्हें एकदम सूखा बनाना। वाह! सूखे परवल का स्वाद ही निराला होता है।" सब्जियों के शौकीन अशोक ने पूर्णिमा की ओर देखकर कहा, "सूखे ही बनाना कुटुंबपाल नहीं जो तुम्हें पसंद है। कढ़ाई भर रस में तैरते चंद परवल के टुकड़ों को गोता लगाकर निकालना पड़ता है।" अशोक जी ने हंँसना शुरू किया तो पूर्णिमा भी हंँस पड़ी।
"अब न कुटुंब रहते न कुटुंबपाल! अब तो बड़ी चारदीवारियों से घिरे मकानों में सिर्फ दो-तीन प्राणी बसते हैं। जो चाहे तो रोज मनमोहन भोग भी खा सकते हैं।" अपने उस कुटुंब से आज दो प्राणियों तक के इस सफर को पूर्णिमा ने, पिछले कुछ घंटे में एक बार फिर जी लिया था।
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शर्मिला चौहान