बंगला नंबर ३०४
बीजू तेजी से कदम बढ़ाता हुआ ३०४ बंगले के पास पहुंच जाना चाहता था। मई के महीने में सूरज सात बजे तक थकता ही नहीं, पता नहीं बारह-तेरह घंटे की ड्यूटी करने में उसे कितना आनंद आता है। अपने एक हाथ में थैली पकड़े और दूसरे से आँखों पर अर्ध पारदर्शक छज्जा बनाता, वह चार बजे की उतरती धूप से कदम मिला रहा था। बीजू सोचने लगा, उतरती उम्र, उतरता सूरज और मद्धम पड़ता दीया पूरी शक्ति से दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करने में लगे रहते हैं। हल्की सी मुस्कान उसके होठों पर फैल रही थी परंतु सूखी पपड़ियों से होठों के मोड़ों में कहीं गुम हो गई।
वह भी उतरती उम्र में आ गया है। साठ साल के ऊपर तो ढलान आने लगती है और वह तो उससे भी चार पार कर गया है। बंगले का बड़ा गेट दिखने लगा था। सबसे सुंदर, सबसे हरा-भरा और रंगीन फूलों से खुशनुमा है बंगला नंबर ३०४। गेट पर लोहे की गोलाई वाली कमान पर एक ओर से लाल-गुलाबी गुच्छे वाले फूलों की बेल, तो दूसरी ओर से घंटी के आकार के बैंगनी फूलों की बेलें बढ़ रही थीं। गेट के बीच में दोनों बेलें आपस में एक-दूसरे को स्पर्श करके विपरीत दिशा में बढ़ती चली गई और एक दूसरे के संपूरक होती गईं।
गेट के सीखचों से हाथ डालकर बीजू ने कुंडी खोलने का प्रयास किया और सफल हुआ। इस बंगले ने सूरज को ठेंगा दिखाते हुए अपनी ठंडक का वर्चस्व बनाए रखा है। आम का पेड़ जहां फलों के बोझ से झुका जा रहा है, वहीं रातरानी, जूही की बेलों ने बंगले की ऊंचाई से होड़ लगा रखी है।
वह आम के तने से टिककर बैठ गया। आठ-दस साल पुराना होगा यह पेड़। उसके छालों की दरारों में चीटियों ने अपनी आवाजाही बना रखी थी। आज ही इनका इंतजाम करना होगा वरना यह चीटियां जड़ों को खोखला कर देंगी।
सामने डालियों पर झूलती-लटकती कैरियां जैसे किसी पूजा के मंडप में घंटियां लगी हैं।
दीवार से सटी, एक डेढ़-फीट चौड़ी गेंदे की क्यारियां बीजू के हृदय की धड़कन थीं। इन बंगलों में कहीं भी गेंदे के फूलों को लोग जगह ही नहीं देते हैं। बंगला नंबर ३०४ गेंदे की क्यारी रखने वाला एकलौता बंगला है। बस बीजू को लगता गेंदे उन्हीं घरों में पनपते हैं जहां जमीन से जुड़ी संवेदनाएं पनपती हैं। जब मैडम जी ने उससे बाग की देखभाल करने की बात पूछी थी तो इन्हीं विविध रंगों में खिले, छोटे-बड़े गेंदों के फूलों को देखकर उसने सहर्ष काम स्वीकार कर लिया था।
थैली में से पानी की बोतल निकाल कर गट-गट पीने लगा तभी बरामदे में से कठोर आवाज आई।
"कौन है, क्या चाहिए? अंदर कैसे आ गए?" आवाज से बीजू पहचान गया कि आज साहब घर पर हैं।
साहब बारह-पंद्रह दिनों में रविवार को ही आते हैं, आज तो बुधवार है और ऐसे अचानक..खैर!
"माली हूँ साहब। मैडम जी ने आठ महीने पहले काम पर लगाया है। अभी शाम को पानी डालना है इसीलिए आया हूँ।" यह साहब से पहली मुलाकात थी तो अपनी जगह पर खड़े होकर बीजू ने कहा।
"शाम को काम है और चार बजे आ गए! यह मेरा बंगला है कोई रेस्ट हाउस नहीं जहाँ आराम करो। जाओ छह बजे आना।" कहते हुए उन्होंने बरामदे की खिड़की का पर्दा खींच लिया।
"हे भगवान! इतनी धूप में सोचा था कि थोड़ा आराम करूँ फिर लॉन की घास काट कर, पौधों में पानी डाल दूँ। कितना कसैला आदमी है।" मन ही मन सोचता हुआ थैली उठाकर बीजू थके कदमों से वापस गेट की ओर बढ़ गया। कुछ ही दूरी पर नगरनिगम का बगीचा था, वहीं कोने की बेंच में बैठ गया। पानी के फव्वारे में जमा पानी पंछियों के लिए तालाब बन पड़ा था। अपनी छोटी चोंच में बूंद भरते और गटक लेते फिर किनारे में थोड़े से भरे पानी को पंखों से अपने ऊपर फेंक लेते।
"थोड़े में खुश रहने वाले यह पंछी और वह देखो इतने बड़े बंगले का मालिक।" बीजू बड़बड़ाया।
छह बजने वाले थे। धीरे-धीरे चलता बीजू वापस बंगला ३०४ की ओर बढ़ने लगा। सूरज के उतार ने हवाओं को स्वच्छंदता सौंप दी थी। अब वह लपट की तरह नहीं, थोड़ी ठंडक लिए हुए शरीर को स्पर्श कर रही थी। बीजू ने लॉन में पहुँचकर अपनी कैंची निकाली और लॉन में लगी घास को सलीके से संवारने लगा। उसकी तन्मयता और घास काटने की सुघड़ता से कुछ ही देर में, लॉन ने नया रूप का लिया। सूखी पत्तियों को झाड़ कर, किनारे रखी टोकरी में भर दिया फिर पानी का पाइप सीधा किया और नल से जोड़ने लगा। सबसे पहले उसने गेंदों के पौधों को जी भर नहलाया, हाथों से सहलाने लगा जैसे बेमौसम कलियाँ लिए खड़े, इन पौधों की हौंसला-आफज़ाई कर रहा हो।
सहसा, उसकी निगाह सड़क के दूसरी ओर वाले बंगले के ऊपरी कमरे में रहने वाले नए लड़के-लड़की पर पड़ी। कभी-कभी दोनों को ऑफिस से साथ आते देखा था। कभी शायद घर से काम करते थे दोनों। मन ही मन हँस पड़ा वह। देखते-देखते जमाना कितना बदल गया। अब ऑफिस घर में आ जाता है और लड़का-लड़की बिना शादी ब्याह किए एक ही घर में रहते हैं। वह दोनों बालकनी में खड़े सूरज की मद्धम पड़ती रोशनी को देख रहे थे। हाथ में शायद चाय-कॉफी का मग रखा था। उस लड़की ने बालकनी में स्टैंड रख कर, दो गमलों में गेंदे के पौधे रखें थे। शाम को पानी डालती बीजू को दिखती थी। बड़े प्यार से छोटे पौधे को बड़ा होते देखा करती थी। उसके उस फूल विशेष के प्रेम ने बीजू के मन में उसके प्रति अपनापन जगाया था।
माली को बंगले के बगीचे में पानी डालते देख उसे लड़की ने उंगलियों से "सुंदर" बगीचे का इशारा किया। एक क्षण के लिए बीजू को लगा किसी ने उसे चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया हो। किसी को इस तरह देखना कोई अच्छी बात तो नहीं। सोचते हुए बीजू ने उस लड़की की ओर एक मुस्कुराहट उछाल दी। करीब सात बजे वह गेट बंद करके, अपने घर की ओर निकल गया।
आज मैडम जी दिखाई ही नहीं दीं वरना वह गर्मियों में नींबू-पानी, छांछ, पना कुछ ना कुछ जरूर देती थीं। वह जितने देर काम करता मैडम जी भी पूरे उत्साह से हर पौधे की जतन करतीं।
"मैडम जी, मैं कई घरों में बगीचे की देखभाल करता हूँ पर आप सिर्फ साथ में बगीचे का काम करती हैं। बाकी घरों में मैं खुद काम करके निकल जाता हूँ।" एक शाम मैडम जी को खुद के साथ गुलाबों की कटिंग करता देख बीजू ने पूछा था।
"पेड़-पौधे तो बच्चों की तरह होते हैं इन्हें किसी दूसरे के हाथों पूरा कैसे सौंप दिया जाए? अच्छा लगता है उनकी देखभाल, साज-संभाल करना मुझे।" मैडम जी ने उसे 'दूसरे' से संबोधित किया परंतु बीजू को उनका पौधों के प्रति यह अपनापन अच्छा लगा।
अपनी खोली से आई उमस भरी हवा बीजू को बहुत बुरी लगी। उसने हाथ पांव धोकर, लोटा भर पानी दरवाजे के दोनों ओर रखें गमलों में डाला। दिनभर की तपन झेलते गेंदे के पौधों को सहलाकर मानो उनका दुःख कम कर देना चाहता हो। उसकी बेटी तारा का पसंदीदा फूल गेंदा। तारा का अधूरा बचपन और उसके स्वयं की जवानी का जो समय मजदूरों की बस्ती में बीता, उस खोली के बाहर भी छोटा आंगन था।
"बाबूजी, मैं एक पौधा चुरा कर लाई हूँ। बहुत सुन्दर फूल होते हैं पीले, नारंगी।" एक शाम जब वह काम से लौटा तो तारा ने उससे कहा।
"चोरी किया, क्यों बेटी?" बीजू ने आश्चर्य से पूछा।
"क्योंकि चुराने से पौधे जल्दी फूल देते हैं, मेरी सहेली ने बताया है।" कहती हुई उसने बीजू से गड्ढा खुदवाकर पौधा लगा दिया।
अपनी जान की तरह जतन करती, जानवरों से बचाने के लिए चारों तरफ़ छोटी लकड़ियों की बाड़ बनवाई थी। जब खुद पानी पीती उसे भी सींच आती।
जिस दिन पहला फूल खिला, उस पीले जंगली फूल से खोली में बसंत आ गया और तारा के जीवन में भी। एक फूल ने उस बच्ची के ममत्व को जगा दिया था। अपनी बेटी की इस खुशी ने धीरे-धीरे, ईंट गारे में डूबे मजदूर बीजू को उस फूल विशेष का प्रेमी बना दिया। अब तो सात-आठ पौधे आंगन में लहलहाने लगे थे।
"लोग तो रंग-बिरंगे गुलाब पसंद करते हैं, तुम्हें गेंदा क्यों पसंद है?" बीजू ने तारा से पूछा।
"क्योंकि ये सुंदर भी हैं और इनमें कांटे नहीं हैं इसलिए।" बेटी की प्यारी बातों को याद करके, आँखें भर आईं बीजू की।
गैस पर चाय चढ़ाया और कल की ब्रेड ढूंढने लगा। रात का खाना यही खाता है सालों से वह। सुबह भात-साग बनाकर दिनभर के लिए ठूंस जाता है। वैसे कुछ घर हैं जहां काम करते समय शरबत, चाय और कभी-कभी नाश्ता मिल जाता है।
बाहर खाट पर गुदड़ी डालकर बीजू लेट गया। आज आकाश साफ था फिर भी दो-चार तारे दिखाई दे रहे थे। इन्हीं के जैसे चमकती थी उसकी बेटी तारा जो अब शायद इन्हीं में से कोई एक होगी। नज़रें बेटी को तलाशने लगीं। रोज ही याद करता था वह अपनी बच्ची को। कुछ लोग इतने अच्छे, इतने सच्चे और प्यारे होते हैं कि भगवान के घर जल्दी चले जाते हैं।
अचानक मैडम जी का चेहरा उसकी आंखों के सामने घूमने लगा।
"नहीं-नहीं, मैडम जी क्यों जाएंगी भगवान के घर!" उसने अपना सिर झटक दिया मानो उसे ख्याल को मीलों दूर तक फेंक देना चाहता है।
करवट बदलता रहा बहुत देर, नींद ही नहीं आई उसको। जाने अनजाने ३०४ बंगले वाली मैडम की सूरत घूम जाती और साथ ही उनके पति यानी साहब जी की आवाज भी।
"मेरे पति काम के सिलसिले में ज्यादातर बाहर रहते हैं। किसी शनिवार-रविवार आते हैं।" बताया था मैडम जी ने। आसपास से पता चलने पर उसने कभी मैडम जी से उनके बाल बच्चों के बारे में नहीं पूछा बच्चों के नहीं होने का दुख यदि वह भोग रही थी तो बच्चे के न रहने को का दुख वह स्वयं भोग रहा था।
एक दुख ही तो है जो धर्म-जाति, रूपए-पैसे, ऊँच-नीच, लिंग किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करता। वह अपने-आप को ऊंचा उठाकर झेल जाने की प्रवृत्ति तलाश करता है या उस प्रवृत्ति का निर्माण कर देता है। दो दुखी एक-दूसरे से मिलकर राहत की सांस लेते हैं। यही बंधन मैडम जी और बीजू के बीच बनता जा रहा था।
पर बातें तो बतंगड़ बनकर सारी दुनिया में फैल जाती हैं। शादी के बीस-बाइस वर्षों तक बाल बच्चों की कमी रही इसीलिए मैडम जी फूल पौधों पर अपना वात्सल्य उड़ेल देती थीं। एक-एक नई कली, नई पत्तियों के निकलने का हिसाब रहता था उनके पास।
पिछले महीने की बात है, देसी गुलाब की टहनी लचक गई। नयी टहनी थी पता नहीं कैसे टूट गई। इतने गुलाबों के बीच, मैडम जी ने उसकी देखभाल में घंटों बिता दिए। बड़े बांस की छोटी कमची से बांधकर उसे आधार दिया। उस टहनी को चिपकाने वाले टेप से कुछ देर लपेटा और फिर धागे से बांध कर रखा। जड़ के पास नयी मिट्टी और खाद डाल दिया। उनकी सेवा देखकर बीजू को लगता कि इस बगीचे की असली माली तो मैडम जी ही हैं।
मैडम जी के बारे में सोचते-सोचते बीजू की आँख लग गई और जब खुली तो सूरज चढ़ आया था। बिस्तर-खाट समेट कर, नहा-धोकर बीजू ने चाय चढ़ाई। खौलती चाय ने नथुनों में घुसकर दिमाग में नशा बढ़ा दिया। चाय बनते तक भात का बर्तन तैयार कर दिया। आज भात, अचार के साथ खा लेगा अब साग बनाने का समय तो नहीं था।
अभी चाय पीकर कप धो ही रहा था कि बाहर जोरों की आवाज सुनाई दी। गाली-गलौज, हो-हल्ला की जानकारी लेने के लिए कमीज पहनकर वह बाहर निकल गया। एक आदमी को सब बुरी तरह पीट रहे थे। एक औरत उसे चप्पलों से, डंडे से मार-मार कर गालियाँ दे रही थी।
"क्या हुआ भाई! क्या किया इसने?" बीजू ने एक पड़ोसी से पूछा।
"बीजू भाई यह राक्षस है राक्षस। अपने गज्जू का दोस्त है, रोज आता-जाता था उसके घर। आज घर पर कोई नहीं था तो आकर गज्जू की दस साल की बच्ची को खोली में बंद करके जबरदस्ती..।" उसका वाक्य अधूरा छूट गया और बीजू अपना सिर थाम कर, पास की एक दीवार से टिक गया।
वक्त बदलता है पर लोग नहीं। कैसी विडंबना है कि बेटी के माँ-बाप के लिए दुनिया हमेशा दानव ही रहती है। अपने को बटोरता, समेटता भारी कदमों से अपनी खोली की ओर आ गया बीजू।
तारा, उसकी अपनी बेटी तारा, उसकी आँखों का तारा थी। बीवी ने तो उसको पैदा कर दिया और दो महीने का छोड़कर अपनी जीवनयात्रा पूरी कर ली थी। उसने तारा को सीने से लगाकर एक-एक पल सहेजा था। बच्ची को दूध पिलाने से लेकर उसकी टट्टी-पेशाब, उसको नहलाना-धुलाना और जब थोड़ी सी बड़ी हुई तो उसे पास की एक पड़ोसन के पालनाघर में छोड़कर, वह काम पर जाता था। यह बरसों की नित्य की दैनंदिनी बन गई थी।
तारा का बबलाना, उसको बाबा कहना, पहला कदम बढ़ाना सब कुछ चलचित्र की भांति कौंध गया। चोटी गूंथने में तारा उसकी मरम्मत कर दिया करती थी।
"बाबा, एक चोटी ऊंची एक नीचे है। अच्छे से तो बनाओ।" वह कई बार रिबन खोल देती। उसका ठुनकना, लड़ियाना जैसे बीजू के जीवन का केंद्र था। सात-आठ बरस की हो गई तब तो बड़ी समझदार हो गई थी। कभी-कभी उसकी नानी आ जाता करती थी, साथ में कुछ दिन रहकर उसे दुनियादारी समझाती थी। चाय बनाना भी सिखा दिया था उन्होंने।
"बाबा, आज मैं चाय बनाऊंगी तुम बैठो।" दिनभर ईंट गारे में लगे पिता को जैसे दुनिया का सुकून मिल गया। उसकी प्यारी बातों से जीवन में रस घुल जाता था। मजदूरों की बस्ती में सभी एक-दूसरे के साथी बन जाते हैं। कोई सब्जी-तरकारी दे जाता तो कोई त्यौहार का पकवान। कुछ दोस्तों से बीजू का अच्छा नाता था तो तारा उनके बच्चों के साथ खेलती, उनके घर जाती थी।
"बाबा, आज भुवन काका ने जलेबी दी थी।" एक शाम तारा ने बताया।
"अच्छा! भुवन की तो तबीयत खराब है, वह तो काम पर भी नहीं आ रहा है। कल उसका हाल पूछकर आऊंगा।" बीजू ने तारा से कहा और शाम की रोटी पानी का इंतजाम करने लगा।
दूसरे दिन भी ठीहे पर भुवन नहीं दिखा।
"क्यों बे गणपत, भुवन को क्या हुआ काम पर नहीं आता।" बीजू ने एक साथी से पूछा।
"कुछ दमा का अटैक आया है कहता था। कहता था दो-चार दिन आराम करके काम पर आएगा। उसके बीवी-लड़का भी गांव गए हैं जब आ जाएं तब उसकी देखभाल होगी।" गणपत कहता रहा और बीजू सोच में पड़ गया, "बीवी बच्चा नहीं है तो बीमार भुवन जलेबी क्यों लाया? तारा को देने घर क्यों आया?" बीजू जितना सोचता उतने ही संदेह की खाई गहराती जाती।
"घर में मेरे ना रहने पर क्यों आया होगा भुवन?" बीजू की घड़ी की सुई अटक गई थी।
उसका मन बिल्कुल नहीं लग रहा था। उसने आधे दिन की छुट्टी ठेकेदार से मांगी और बस्ती की ओर आ गया। पहले भुवन के घर गया ताला देख कर तुरंत अपनी खोली की ओर निकल गया। खोली के आंगन में सन्नाटा था
"पता नहीं, आज तारा अंदर सो गई क्या वरना तो आँगन में ही खेलती है।" सोचता हुआ बीजू सब तरफ नजर दौड़ाने लगा। खोली के अंदर से दबी-घुटी सी सांस की घरघराहट कानों तक पहुंची।
"तारा, खोल बेटा दरवाजा खोल। क्या हुआ तेरी तबीयत तो ठीक है ना?" दरवाजा पीटते हुए बीजू चिल्लाया। पागल-बौखलाए पिता ने चीखना शुरू कर दिया। दरवाजे को दो-चार लातें मारकर तोड़ दिया और अंदर चला गया। एक आदमी उसे धक्का देकर बाहर की ओर भागा। बीजू गिर पड़ा परंतु भागते आदमी को पहचान गया।
"कमीना, नमकहराम, गद्दार राक्षस!" गालियां देता बीजू चारपाई की ओर दौड़ा।
तारा, उसकी फूल सी बच्ची, बिखरे बाल, मुँह-नाक से खून बह रहा था। अपनी बच्ची को छाती से लगाकर बाहों में उठाए चूमने लगा बीजू।
हल्की सांस का आभास हुआ तो वैसे ही बच्ची को उठाए बाहर की ओर भागा। आसपड़ोस के लोग जमा होने लगे थे। बीजू, बेटी को दोनों हाथों में उठाएं दौड़ता-भागता गाँव के चिकित्सा केंद्र में पहुंचा। पड़ोसी पीछे-पीछे भागते आ रहे थे। वहां जो डॉक्टर था उसने बच्ची को मृत घोषित कर दिया। अपनी तारा को अपने सीने से लगाए बीजू पागलों की तरह गाँव में घूम रहा था। लोगों ने समझा बूझकर बच्ची का अंतिम संस्कार किया। उसी जगह पर बैठा रहता था बीजू। जब तेरह दिन हो गए तब वह अपनी खोली में गया। कुछ सामान एक थैली में भरकर, बेटी की तस्वीर लेकर निकल गया। खोली खाली थी, बीजू के दिल की तरह वीरान और सुनसान। आंगन में लगाए गेंदे के पौधे सूख गए थे। उनकी ओर देखकर बीजू का कलेजा मुँह को आ गया।
महीने भर के अंदर उसने भुवन को ढूंढकर को मार डाला। लोगों के सामने तब तक उसका गला दबाता रहा जब तक सांसों की घरघराहट बंद नहीं हो गई। खुद ही पुलिस थाने में जाकर अपना अपराध कबूल कर लिया था। उसकी स्वीकारोक्ति, हत्या का मकसद, गाँव वालों की गवाही से उसे हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
शहर के बड़े जेल में बीजू अपने जीवन के दिन निकाल रहा था। ना कोई इच्छा ना कोई उद्देश्य। तारा की फोटो उसने विशेष अनुरोध करके अपने पास रख लिया था। जेलर साहब दुनियादारी के रंग और इंसान को समझते थे। उन्होंने उसे बाग का काम सौंप दिया। फूलों-पौधों में अपना सुख तलाशना सिखाया। धीरे-धीरे बीजू का मन इन क्यारियों को हरा-भरा बनाने में रमने लगा था।
रविवार, जेलर साहब के क्वार्टर के बगीचे में भी निराई-गुड़ाई कर आता था। जेलर साहब की दस-बारह साल की बेटी उसे माली चाचा कहती थी। बीजू हमेशा उसे फूलों का गुलदस्ता दिया करता था।
"आप मेरीगोल्ड के फूल क्यों नहीं लगाते?" एक दिन बच्ची ने पूछा।
मेरीगोल्ड का अर्थ जानने के बाद बीजू ने खुशी से उस अहाते में गेंदे के कई पौधे लगा दिए और उसके फूलों को देखकर खुश होती बच्ची के चेहरे में डूबकर तारा को ढूंढने लगता था।
अपने शांत स्वभाव, काम में मन लगाने की आदत, नियमित दिनचर्या और जेलर साहब के प्रमाण पत्र ने उसकी आजीवन सजा को बीस साल की कैद में बदल दिया। जेलर साहब तो दूसरी जेल में चले गए परंतु बीजू उनको आज तक नहीं भूला है।
पड़ोस के उस हो-हल्ले और उस आदमी के कुकर्म ने जैसे बीजू को तीस साल पीछे धकेल दिया था। सिर, हाथ-पैर सब दुख रहा था। मन व्याकुल था तो खाट पर पसर गया। उस मासूम बच्ची और उसके मां-बाप के हृदय की वेदना को, उनकी छटपटाहट जैसे बाँट लेना चाहता था। करीब चार बजे घर से निकला। सब सुनसान था मानो कुछ घटा ही नहीं। सब अपने कामों में लगे थे। वह भी धीरे-धीरे अपना काम करने बंगलों की ओर चल पड़ा। सबने पूछा कि, "आज देर क्यों किया?" अंत में ३०४ बंगले की ओर गया। गेट पर ताला लगा था। मन में सोच-विचार करता वापस आ रहा था कि देखा सामने बंगले के वह दोनों लड़का-लड़की खूब जोर-जोर से लड़ रहे थे। तभी काँच का कुछ टूटने की आवाज भी आई।
आज के दिन इतना देख चुका था कि बिना रुके अपने रास्ते निकल गया। भूख-प्यास से नींद नहीं आ रही थी तो रात को दस बजे चौक की दुकान से समोसा लाकर खाया फिर पानी पीकर सोने की कोशिश करने लगा। आज आकाश में तारे नहीं दिख रहे थे शायद आज उन्हें भी जमीन की ओर देखने में शर्म आ रही थी। इंसानी कृत्यों से सारी सृष्टि दुखी हो जाती है।
"मैडम जी कहां गई? वह लड़का-लड़की इतना झगड़ा क्यों कर रहे थे?" उसने याद किया कि अपने जीवन की कहानी, अपने जेल की जिंदगी के बारे में उसने मैडम जी को बताया था। सुनकर उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। इन्हीं विचारों में डूबकर अंततः उसे नींद आ गई।
अगले दिन चाय पीकर काम पर जल्दी चला गया। बहुत धूप होती है तो बगीचों में आजकल पानी भी ज्यादा लगता है और सूखे पत्तों का कचरा भी अधिक रहता है। नगरनिगम के बगीचे के माली से थोड़ी बातचीत हुई और फिर वह कॉलोनी के बंगलो की ओर चला गया। ३०४ बंगले के सामने वाले उस लड़की-लड़का के जोड़े में से लड़की सामान एक गाड़ी में डाल रही थी। वह चुपचाप खड़ा देखता रहा समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है।
गाड़ी में सामान भरकर उसने बीजू की ओर देखा। अपनी बालकनी के दोनों गमलों को बीजू के हवाले करते हुए बोली, "इनका ध्यान रखना आप! उसको छोड़ कर जा रही हूँ। मेरी कमाई से किराया, मेरी कमाई से घर का मेंटेनेंस, अपना पैसा अलग रखेगा और दूसरी लड़कियों के साथ मौज-मस्ती करेगा.. मेरी ही क़िस्मत खराब थी।" गुस्से से भरी हुई वह कार में बैठी और चली गई।
उसकी कार निकली और लड़का अपना सामान लेकर फोन से टैक्सी बुला रहा था। बीजू को देखा तो एक क्षण के लिए ठिठक गया फिर वह भी टैक्सी में बैठकर निकल गया।
"हे भगवान! यह साथ रहते थे अब अलग हो गए। क्या अब किसी और से शादी-ब्याह करके फिर से घर बसाएंगे।" आश्चर्य और दुःख से भरा वह बंगला ३०४ की और चला गया।
आज गेट खुला था। कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। गेट पर और बंगले के द्वार पर बड़ा नेम प्लेट था जिस पर मैडम जी का नाम लिखा था। पहले तो आदमी यानी साहब का नाम था। उसने हाथ में पकड़े दोनों गमले जमीन पर रख दिए। सोच-विचार में पड़ा वह पानी का पाइप ढूंढने लगा। तभी द्वार खुला और मैडम जी आईं।
उन्होंने पूछा, "नेम प्लेट देख रहे हो बीजू? अब मैं इस घर की मालकिन हूँ। मैंने यह घर अपने नाम कर लिया और उनको हमेशा के लिए उनकी पत्नी और बच्चों के लिए मुक्त कर दिया।"
बीजू टकटकी बांधे देख रहा था। एक औरत की सालों दबी कुंठाएं, इच्छाओं को सीने में दबाने के बाद कैसा लावा फूट जाता है?
"मैं अपने माता-पिता से छिपकर, उस व्यक्ति के साथ अपना घर छोड़कर आ गई थी जो पहले ही विवाहित था। मुझे पहले धोखे में रखा बाद में मेरी स्थिति मुझे बता दी।" मैडम जी में गहरी सांस भरी।
"आज उसको भी मुक्त कर दिया और मैं भी मुक्त हो गई। इन दोहरे संबंधों का अंधकार मुझे ही लील गया। मेरे एक ग़लत निर्णय ने, मुझे सारे जीवन का दर्द दे दिया। मेरा कोई अपना नहीं रहा।" कहते हुए उनकी आँखें गीली हो गईं।
"देखो! वह टूटी टहनी वाला पौधा देखो। उस टूटी टहनी ने अपने आपको संभाल लिया है और अब उसमें नये फूल आएंगे।" मैडम जी ने बात को अलग दिशा दी।
"हाँ, समय सब घाव भर देता है मैडम जी। देखिए, बेमौसम आज गेंदे का फूल भी तो खिला है। कितनी दिलेरी और हिम्मत से इसने अपने लिए इस समय का चुनाव किया है।" मौसमी फूलों के बीच इठलाते गेंदे ने इस मौसम को बसंत में बदल दिया था।
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