शनिवार, 9 मई 2026

1222 1222 1222 122पर ग़ज़ल

1222 1222 1222 122

बुरी नज़रों से मैं तुझको बचाना चाहती हूँ
इसी छोटे से आँचल में छुपाना चाहती हूँ।।1।।

बड़े होने का तेरा सपना ही जीवन है मेरा
उसे ही मैं हकीकत अब बनाना चाहती हूँ।।2।।


बहुत मुश्किल से पहुँचाया तुझे ऊंचाइयों पर
हँसी इक पर तेरी सब कुछ भुलाना चाहती हूँ।।3।।

तेरी राहों के सारे कण्टकों को बीनकर मैं
उन्हीं राहों को फूलों से सजाना चाहती हूँ।।4।।

कमाने में लगा तू भूल घर की दाल रोटी 
पका कर अपने हाथों से खिलाना चाहती हूँ।।5।।

अकेले रात में आए नहीं जब नींद तुझको
तेरे कानों में लोरी गुनगुनाना चाहती हूँ।।6।।

मुझे भगवान बस सेहत व लंबी उम्र दे दे
तेरे बच्चों को बाँहों में झुलाना चाहती हूँ।।7।।


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शर्मिला चौहान

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