गुरुवार, 7 मई 2026

योद्धा ( दायरे संग्रह)

योद्धा  (कहानी)


आज का दिन विजय के लिए सपनों के सच होने का दिन था। इस वर्दी के लिए उसने और उसकी माँ गीता ने जीवन भर मेहनत की थी। अपनी पहली पोस्टिंग के साथ उसे राज्य के उस जिले का कार्यभार संभालना था, जहाँ जाने से अनुभवी ऑफिसर भी कतराते थे। यूपीएससी की परीक्षाओं के बाद करीब दो साल की कड़ी ट्रेनिंग पूरी करके, आज उसे उसका लक्ष्य मिला था। 

आज शाम की विदाई पार्टी के बाद कल की ही ट्रेन टिकट उसने बुक करवा ली थी। माँ के पास जाकर सात दिन उनके साथ रहकर, उसे अपनी पोस्टिंग की जगह जाना था। सामान पैक करके उसने सामने रखी दो तस्वीरें जिसमें एक हनुमान जी की और एक अपने बचपन की, हाथों में उठा ली। अपने परिवार की उस  तस्वीर में डूबता चला गया। कुछ बातें उसे याद हैं और कुछ माँ से सुन-सुनकर बड़ा हुआ है।

इस तस्वीर में वह सात साल का है। उसके साथ उसके पापा, उसके हीरो, सीनियर सुपरीटेंडेंट ऑफ पुलिस अतुल वर्मा और माँ, जीप के पास खड़े हैं। अपने बचपन की यादों को वह फिर से सहेजने लगा था। पापा की पोस्टिंग हर तीन साल में अलग जगह हो जाती थी। फोटो वाली वह जगह उसके यादों में जीवित थी। यह पापा की सरकारी जीप थी। पापा की वर्दी, उनका रुतबा, उनके मान-सम्मान को वह अपना आदर्श मानने लगा था। जीप लेकर ड्राइवर अंकल आते तो वह पहले एक चक्कर घूम कर आता था। पापा की जीप को उस सड़क के अंतिम छोर तक जाते देखता रहता और सैल्यूट करता था। 

इस नक्सलवादी जगह में पोस्टिंग होने पर माँ ने बहुत विरोध किया था। 
"गीता, जिस दिन इस सेवा को ज्वाइन करते हैं उसी दिन अपना सर्वस्व देश के नाम कर देते हैं पुलिसवाले। वहां के लोग भी तो रहते होंगे तो एक पुलिस अधिकारी का परिवार क्यों नहीं रह सकता? वैसे तुम चाहो तो अपने माता-पिता के पास भी रह सकती हो। मैं छुट्टियों में आता जाता रहूंगा।" पापा के विचार बिल्कुल स्पष्ट थे।
 
आखिरकार, पापा के ड्यूटी ज्वाइन करने के करीब दो महीने बाद माँ कुछ सामान और मुझे लेकर उनके पास आ गई। समाचार पत्रों में लगातार इन आदिवासी क्षेत्र में बढ़ते नक्सलवाद और आतंक की खबरें, माँ को विचलित कर दिया करती थीं। यहाँ आने के बाद यहाँ की सुंदरता, शुद्ध वातावरण और स्वच्छंद हवाओं ने कुछ ही दिनों में माँ का मन मोह लिया था। बड़ा सा बंगला, चारों ओर हरियाली, दूर से दिखता तालाब और गाँव वालों का पूजा स्थल सब कुछ फिल्मी लगता था। 

"यहाँ की सब्जियां, दालें बहुत स्वादिष्ट हैं, कीमत भी कम है।" माँ अपने बजट से खुश थी। 
"भोले-भाले आदिवासी लोग हैं। अभी भी वस्तु विनिमय पर भरोसा करते हैं बेचारे। अपनी उपज की सही कीमत भी नहीं लगा पाते हैं, ऐसे में हमारे-तुम्हारे जैसे शहरी लोग इनको लूट लेते हैं।" हँसते हुए पापा ने कहा और माँ गुस्सा हो जाती थीं।

पापा को सब "बड़े साहब" कहा करते थे। लोग आम, तेंदू, कटहल, तालाब की मछलियाँ देने आते थे। पापा सभी को धन्यवाद सहित कुछ रुपए, बच्चों के लिए कपड़े, पुरुषों के लिए धोती दिया करते थे। हम जब भी शहर या किसी बड़े कस्बे में जाते तो वहां के हाट-बाजार से यह सब चीज खरीद लाया करते थे। 

मुझे दूर के एक ठीक-ठाक स्कूल में भर्ती किया गया था। सरकारी गाड़ी से स्कूल आना-जाना होता था। जब कभी कहीं नक्सली हमला होता तो डर से स्कूल बंद हो जाया करता था। आने वाले शिक्षकों को अपनी जान का डर था। वह भी तीस-चालीस किलोमीटर दूर से बसों में आया करते थे। मेरी पढ़ाई का हाल बेहाल देखकर माँ बड़ी चिंतित रहती थी।
"अरे! यह सब तुम घर में करवा सकती हो और यहाँ कोई जिंदगी भर थोड़े ही रहना है। दो-तीन सालों में दूसरी पोस्टिंग आ ही जाती है।" पापा ने मेरी पढ़ाई की समस्या भी हल कर दी।

अपने कड़े अनुशासन और नक्सली आतंकवाद को खत्म करने के हौंसले के कारण, पापा ने चप्पे-चप्पे पर पुलिस का जाल बिछा दिया। आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए वे खुद अपने क्षेत्र में आने वाले सभी पुलिस थानों का लगातार निरीक्षण करते रहते। वहां के सामान्य लोगों के दिलों में उनकी सच्चाई और ईमानदारी ने घर बना लिया था। शुरू में तो सब कुछ शांत था शायद दुश्मन इस पुलिस वाले की चाल समझने में लगे थे। चार महीने बाद उनकी सरगर्मियां बढ़ने लगीं।

एक दिन उन्होंने हाट में आकर लूटपाट किया और विरोध करने पर एक कांस्टेबल को मार डाला। उनका नेता बिसमा, जिस पर सरकार ने बीस हज़ार का इनाम रखा था, उसने लोगों को खुलेआम धमकाया और पुलिस वालों से दूर रहने की सलाह दी। उस रात पापा घर नहीं आए, माँ और मैं रात भर उनका रास्ता देखते रहे। पापा सुबह उस कांस्टेबल की पत्नी और दो बच्चों को अपने साथ, अपने बंगले में सुरक्षित रखने के लिए लेकर आए।

उस दिन के बाद उन नक्सलियों के पूरे गिरोह की गहरी पड़ताल एसएसपी अतुल वर्मा के नेतृत्व में होने लगी। कौन, कब, कहाँ आता-जाता है? कितनी मात्रा में हथियार, बम हैं और कहाँ-कहाँ तक उनकी पहुँच है। उनको सहयोग करने वालों, आश्रय देने वालों, जरूरत का सामान पहुंचाने वालों को ढूंढ कर निकाले जाने की खबर फैल गई। भनक मिलते ही पुलिस दस्ता ठिकानों पर हमला कर देता और इस तरह दो-दो, चार-चार नक्सली मारे जाने लगे। 

जंगलों में छुपकर नक्सलवाद फैलाने वालों के पैरों तले जमीन हिलने लगी। एक जांबाज पुलिस अधिकारी ने खलबली मचा दी थी। 
"अगले आदेश तक शाला, हाट, पशु मेला सब बंद रखे जाएंगे। झुंड में कोई नहीं घूमेगा, सब पर नियंत्रण रखा जाएगा।"  पुलिस महकमा खूंखार नक्सलियों से निपटने की हर संभव कोशिश कर रहा था। जब शिकंजा कसा तो कुछ गिरफ्तार हुए और कुछ का एनकाउंटर करना पड़ा और उनके ठिकानों से बड़े हथियारों का जमावड़ा सील किया गया। 

मेरा सातवां जन्मदिन था। माँ ने पापा को शाम पाँच बजे मंदिर में आने के लिए कहा था। मैं और माँ तालाब के पास वाले उस देवस्थान के दर्शन के लिए चले गए। थोड़ी ही देर बाद पापा भी अपनी जीप से वहाँ आए। ड्राइवर अंकल और दो कांस्टेबल उनके साथ थे। सड़क पर जीप खड़ी थी और ढलान से उतरते हुए पापा मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। तभी नक्सलियों के एक दल ने चारों तरफ से उनको घेर लिया। जीप के बाहर खड़े दोनों कांस्टेबलों को गोलियों से भून डाला। पापा को उन्होंने घुटने पर बैठ जाने के लिए कहा। गोलियों की आवाज़ से घबराकर माँ ने मंदिर के अंदर वाले झरोखे से इस भयानक दृश्य को देखा। 

माँ बाहर की ओर भागने लगी तो मंदिर के पुजारी ने उन्हें पकड़ लिया और कहने लगा,"मार डालही बहन जी। लैका ला बचा लैवो, बड़े साहब के निसानी हे।"  
मैंने भी उस झरोखे से अपने पापा को हाथ ऊपर किए, घुटनों के बल बेबस देखा। माँ शून्य खड़ी थी फिर उस पुजारी ने, मंदिर के गर्भगृह का एक पत्थर हटाकर सुरंग में हमें उतार दिया। संवेदनाशून्य सी माँ और रोता हुआ मैं, न जाने कितने देर चलते रहे। अंधेरे में टकराकर हाथ-पैर छिल गए, पैरों में नुकीले पत्थरों के चुभने से खून बहने लगा। थोड़ी सी रौशनी ने आगे का रास्ता साफ किया।

 धूल भरी पगडंडी सामने थी। उसपर पैरों को घसीटते चले जा रहे थे। पगडंडी सामने की पक्की सड़क से मिल गई। शाम गहरा गई थी, बिना बिजली की इस सड़क पर अंधकार का साया था। एक मोटरसाइकिल की आवाज़ आई और किनारे पर खड़े हमने देखा, पुलिस वर्दी में दो लोग थे। 

मैंने जोर से आवाज दी और वो रुक गए। मैंने अपना परिचय बताया और पापा के साथ हुआ इस भयानक हादसे की जानकारी उनको दी। वह दोनों भी सकते में आ गए। उन्होंने तुरंत हेड क्वार्टर से संपर्क किया और गश्त में लगे सभी दलों को सावधान कर दिया। पुलिस की गाड़ी आ गई और हम दोनों को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाया गया। 

माँ बिल्कुल चुप, शून्य रहीं। चाचा, नानाजी, मामा सब आ गए। पापा का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। जब मेरे हाथों से पापा को मुखाग्नि दिलवाई गई तब माँ फूट-फूटकर रो पड़ी। वहाँ से हम नानाजी के साथ चले आए थे। 

विजय ने हाथ में रखी तस्वीर को अपने सीने से लगाकर फिर उसे सूटकेस में रख लिया। दूसरे दिन वह अपनी माँ के पास पहुंच गया था। यह माँ की अभिलाषा और पापा के अधूरे कार्य, देश के प्रति उनके समर्पण की भावना का परिणाम था जो आज मैं वर्दी पहनकर माँ के सामने खड़ा था। नानाजी और नानी नहीं रहे थे। उन्होंने अपने घर का एक हिस्सा माँ के नाम कर दिया था। दूसरे बड़े हिस्से में मामाजी और उनका परिवार रहते थे। मामाजी ने हमेशा ही माँ की और मेरी सहायता की, हमें आधार दिया। यह कैसी नियति थी कि आज से उन्नीस-बीस साल पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए शहीद हुए सीनियर एसएसपी अतुल वर्मा ने जिस क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाया था, आज उनका बेटा एसपी विजय वर्मा भी इसी दिशा में अपने कदम बढ़ा रहा था।

माँ ने उसके साथ जाने की जिद की तो विजय ने उन्हें दो-तीन महीने के बाद ले जाने का वचन दिया। वहाँ  पहुंचने के बाद विजय का स्वागत हुआ क्योंकि आजकल सरकार का पूरा ध्यान, पूरी शक्ति नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ने में लगी हुई थी। लोगों में वस्तु विनिमय न के बराबर था। थोड़ी आधुनिकता आ गई थी और भाषा की समस्या भी कम हुई थी। कुछ कच्ची-कुछ पक्की सड़कें बन रही थीं सिर्फ एक ही चीज नहीं बदली थी वह डर, खौफ़ जिसमें आज भी लोग जीते थे।

सरकारी गेस्ट हाउस में रूक कर अगले दिन विजय ने अपना कार्यभार संभाल लिया। एक इंस्पेक्टर और एक कांस्टेबल को साथ लेकर पहले ही दिन उसने अपने क्षेत्र में आने वाले कुछ थानों का जायज़ा लिया। अभी सरकारी व्यवस्था मजबूत हुई थी और पुलिस महकमे को विश्वास, शक्ति और हौंसला मिला था। भरपूर मात्रा में हथियार, जैकेट्स सरकार मांग पर भेजती थी। 

अगले दिन विजय ने गूगल मैप पर अपना पुराना घर, स्कूल, तालाब और मंदिर सर्च किया। वहाँ जाकर देखा बंगले में साफ-सफाई, रंग-रोगन का काम चालू था शायद सभी क्वार्टर और बंगलो को अलॉटमेंट के लिए तैयार किया जा रहा था। तालाब के पास का मंदिर ठीक-ठाक बन गया था।
 अपने हेड क्वार्टर में वापस आकर विजय ने नक्सलियों की पूरी फाइल खोल दी।
 "सर आठ बज गए हैं आप गेस्ट हाउस नहीं जाएंगे?" ड्यूटी पर तैनात इंस्पेक्टर ने पूछा।
"कुछ खाने का मंगवा लेता हूँ यहीं, खाकर सोने चला जाऊंगा।" फाइलों पर आँखें गड़ाए विजय ने कहा।

 नक्सलवाद की शुरुआत से हर दो-चार सालों में बढ़ते सरगनाओं की फाइलें, तस्वीरों को देखते एक पन्ने पर उसकी दृष्टि अटक गई। वही साल, वही अपराध, वही पुराना चेहरा जो उसके ज़हन में रहता था। बीस साल पहले का ईनामी नक्सली 'बिसमा'। बाजू में उसकी हाल-फिलहाल की तस्वीर भी लगी थी जिसमें मूँछ  अधपकी, गाल थोड़े और लटके और आँखें बिल्कुल पहले की सी। ईनामी राशि दस लाख हो गई थी। 

सिर पर हथौड़े बरसने लगे विजय के। सरकारी तंत्रों, पुलिस, सेना सुरक्षा बलों को भी धोखा देकर आज हजारों की संख्या में फैले, समाज के इन नासूरों को जड़ से खत्म करने की सोच बलवती हो गई। उसे लग रहा था कि आज कहीं दिख जाए तो आज ही उसका काम तमाम कर दिया जाए। आजकल सरकार ने इन नक्सलियों को जीवन की मुख्य धारा में शामिल करने और आत्म समर्पण के लिए मजबूर करने का बीड़ा उठाया है। बहुत ही विषम परिस्थितियों में एनकाउंटर की छूट थी। 

 सैनिक बलों और पुलिस दस्तों, सीमा सुरक्षा बलों के बढ़ते वर्चस्व से घबराकर बहुत से नक्सलवादियों ने बंदूकें छोड़ भी दी थीं परंतु अभी भी इन जंगलों में उनकी बड़ी तादाद मौजूद थी। आसपास के प्रांतों की सीमाओं से, पुलिस की आँखों में धूल झोंककर वे सरलता से आवाजाही करते थे।

विजय रात दो बजे गेस्ट हाउस जाकर सो गया। अगले दिन से ही जंगलों की मैपिंग, नक्सलियों के संभावित ठौर-ठिकानों की रैकी का प्लान चालू हो गया। कुछ नए जवान, जो उत्साही और जोशिले थे तथा कुछ अनुभवी अधिकारी और कांस्टेबल। बाहरी दुनिया को खबर किए बिना खुफिया तौर पर काम होने लगा। सरेंडर करने वालों को सरकारी सुविधा और नौकरी का दाना, गांँव वालों के द्वारा फैलाया जाने लगा।

दो महीने बाद एक बड़ा मेला था। हर वर्ष ही गाँव वाले, तीन दिनों तक इस मेले का आयोजन करते थे। आसपास के सभी गाँवों, कस्बों , शहरों की चीजें इस मेले में बिकती थीं। लोकसंगीत, नृत्य और ग्रामीण वाद्यों की सुंदर प्रस्तुति की जाती थी। खबरियों से प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय था कि इन तीन दिनों में एक दिन नक्सलियों का दल, अपना हिस्सा वसूलने जरूर आएगा।

 पुरुष एवं महिला पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित किया जाने लगा। हर चार स्टॉल के बाद सरकारी प्रशिक्षित महिलाओं और पुरुषों की दुकान रखने की योजना थी।  केंद्र से भी कुछ नामी अधिकारियों और सुरक्षा बलों को धीरे-धीरे लाया जाने लगा। 
"तेरे क्वार्टर का तय नहीं हुआ क्या विजय? तू मुझे कब लेकर जाने वाला है?" माँ ने पूछा।
"अगले महीने पक्का आता हूँ माँ। तब तक क्वार्टर भी मिल जाएगा।" विजय अभी खुद ही घर लेना नहीं चाहता था। गेस्ट हाउस की जिंदगी, उसे अपने कॉलेज और ट्रेनिंग की याद दिलाती थी।

मेले के पहले दिन नेताओं ने, सरकारी कड़े बंदोबस्त में उद्घाटन और भाषण बाजी की। मेले में हर तरफ रंग-बिरंगा जीवन, अपनी वेशभूषा और संस्कृति से सराबोर होकर उमड़ रहा था। आज प्लानिंग के साथ पूरी टीम सतर्क रही। कुछ ही कांस्टेबल वर्दी में थी बाकी अधिकारी वर्ग महिला और पुरुष दल सभी यहाँ के आम लोगों में घुल मिल गए थे। पूरी सतर्कता के साथ पुलिस काम कर रही थी। 

पहला दिन सुगबुगाहट में बीत गया। दूसरे दिन मेला अपनी जवानी में था। झूले में बच्चों के झूलने की आवाजें , लोकगीतों की धुन लाउडस्पीकर में चलती घोषणाओं के बीच सादे कपड़ों में विजय, अपनी पिस्तौल संभालकर, सुरक्षा जैकेट पहने मेले से बाहर निकल गया। उसके थोड़ी-थोड़ी देर में दो महिलाएं सिर पर टोकरियां लिए और दो पुरुष रंग-बिरंगी लकड़ी लिए बाहर आ गए। इधर-उधर दृष्टि घुमाता हुआ विजय, देहाती अंदाज़ में मलंग चाल से गुनगुनाता हुआ मेले के मुख्य द्वार की विपरीत दिशा में करीब दो ढाई सौ मीटर दूर निकल गया। 
उसने अपने पीछे आने वाले अपने साथियों की उपस्थिति का अंदाजा लिया। पीपल के पेड़ के नीचे कुछ लोग दिख रहे थे। धीरे-धीरे चलता हुआ विजय उन बैठे लोगों के विपरीत दिशा में बैठ गया। उसने अपना गमछा निकला और मुँह पोंछने लगा। सिर पर टोकरी ली महिला पुलिसकर्मियों ने भी, पेड़ की छांव में, जमीन पर ही डेरा जमा लिया।
"मेला में सामान नहीं बिकिस का?" चौपाल पर बैठे एक ने उनसे पूछा।
"बिक गे, सुस्ता के जाबो संझा तक अऊ ले आबो।" क्षेत्र की बोली पर अधिकार था उन प्रशिक्षित महिलाओं को।

 उनमें से थोड़े मोटे और तेज दृष्टि वाले ने अपना मुँह पोंछा और जेब से तंबाकू लेकर हथेली पर मलने लगा। उसने कुछ इशारा किया और उनमें से दो उठकर मेले की ओर चलने लगे। उनके कुछ ही मिनट में एक और उस दिशा में बढ़ चला अब पीपल के नीचे सिर्फ दो रह गए थे। विजय उस तेज नज़र वाले, बड़ी आँखों वाले आदमी को, फाइल में छपी बिसमा के वर्तमान की फोटो से मिलाने लगा। जब पूरी तरह से मैच हो गया तब विजय ने टोकरी ली महिलाओं की ओर देखा और सामने से आते अपने दो इंस्पेक्टर्स को, जो रंग-बिरंगी लकड़ी लिए आ रहे थे। उन्हें अपनी ओर ताकता देखकर बिजली की गति से अपनी पिस्तौल संभाले झपटकर चौपाल की दूसरी ओर चढ़ गया।

टोकरी में से अपनी पिस्तौल निकालकर बिजली की तेजी से दोनों महिला पुलिसकर्मी सामने आ गईं। विजय ने बैठे  हुए उन दोनों नक्सलियों के पीछे से अपने दोनों हाथों से दोनों रिवाल्वर उनकी कनपटी पर सटा दिया। उनके पास रखी थैली छीनकर दोनों महिलाओं ने उन्हें नीचे उतार कर घुटने पर बैठने के लिए मजबूर कर दिया।
 
"जरा भी इधर-उधर हाथ सरकाए तो खोपड़ी खोल दूँगा।" गुर्राते हुए विजय ने दोनों को लात मार कर नीचे पटक दिया और पीठ पर चढ़ गया। इंस्पेक्टर और उसकी साथी ने सबको  कव्हर किया और महिलाओं ने सशक्त बलों को सूचित किया। मेले में गए नक्सलियों को उनके पहनावे के आधार पर तुरंत पहचान कर रोक दिया गया। दो को गिरफ्तार किया गया और एक ने भागने की कोशिश की तो पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर दिया।

"विजय, इसने बीस साल पहले तेरे पापा को मार डाला था। तेरे परिवार को बर्बाद कर दिया था। आज तेरे सामने तेरा अपराधी खड़ा है, चला दे गोली। वैसे भी सरकार ने कई सालों से इस पर ईनाम रखा है।"  विजय ठीक उनके सामने खड़ा था। उसकी आँखें अंगार बरसा रही थीं।
 तभी उन दोनों ने अपने हाथ ऊपर कर दिए। घुटनों के बल बैठकर आत्मसमर्पण की मांग करने लगे। 

 "यह सब नाटक है इनका, चला गोली उनकी बातों में मत आना विजय।" विजय का मन चीख रहा था।
 "नहीं सर नहीं, यह गलत है। सरकार ने उनको सरेंडर करवाने पर बल दिया है। उन्होंने आत्मसमर्पण कर लिया है इसलिए मारना ठीक नहीं है।"  सशस्त्र बल अधिकारी ने विजय को समझाया।
 "आपने अपनी योजना से इतने बड़े नक्सली, आतंकवादी को पकड़ा है सर। आगे इसका उपचार सरकार ही करे तो अच्छा होगा।"  सभी ने उसे समझाया।
"हम पुलिस वाले हमेशा कानून में कैद रहते हैं।" पापा की बातें, उनकी आवाज़ विजय के कानों में गूंजने लगी।

 पिछले पच्चीस सालों से इन जंगलों को आतंक का अड्डा बनाकर, लोगों से वसूली करने, पुलिस वालों को मारने, पुलिस चौकियों को नष्ट करने वाले बिसमा और उसके तीन साथियों के आत्म समर्पण और एक के एनकाउंटर को, अगले दिन देश के अखबारों ने मुख्य पृष्ठ पर जगह दी। नव नियुक्त जांबाज एसपी विजय वर्मा की बुद्धि और साहस का उल्लेख, देश के हर अखबार में किया गया।

दूसरे दिन अपना वही बंगला अपने नाम अलॉट करके, विजय ने दो दिनों बाद की ट्रेन टिकट बुक कर ली। आखिर माँ को वापस इस जगह लाना जो था।


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यह मेरी मौलिक, स्वरचित, अप्रकाशित एवं अप्रसारित रचना है।

शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)400610
मो.नं. 9967674585

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