सुरंग सुंदरी (कहानी)
पीठ पर बैग, हाथों में कैमरे का स्टैंड लिए नीरज पहाड़ियों में घूम रहा था। कंधे से कन्धा जोड़े, आकाश को छू लेने के लिए लालायित इन पहाड़ियों के आकर्षण से बंधा वह हर क्षेत्र के पर्वतीय इलाकों में घूमकर ब्लॉग बनाता है। अपनी ब्लॉगर के रूप में पहचान बनाने के लिए, उसने पिछले दो सालों में बहुत मेहनत की और अब उसके ब्लॉग सब्सक्राइबर्स की संख्या अच्छी होने लगी थी।
पहाड़ियों के ढलान वाली पगडंडी पर पैर जमाते हुए उतरने लगा था, बहुत नीचे कुछ ज्यादा ही हरियाली और समतल दिखाई दे रहा था।
स्वच्छ आकाश का रंग भूरियाने लगा। नीले-सफेद रंगों के ऊपर श्यामल भूरा लिहाफ हौले-हौले ओढ़ता सूरज, अपना तेवर समेटे, मेघों में दुबक गया।
"अरे यार! अभी आसमान साफ था और अब बादल आ गए, बस यही खराबी है पहाड़ियों की, मौसम बदलते देर नहीं लगती।" बारिश के आसार देखकर नीरज दुखी हो गया। वह जल्दी कदम बढ़ाते, ढलान से उतरने लगा।
मौसम के बदलते तेवर के साथ हवाओं ने भी अपना रूप बदल लिया। सनसनाती, कानों में सीटियां बजाती और शक्ति से ढकेलती वो भी अपनी तीव्रता दिखाने लगीं।
"ये वैभव भी बस्स! काम करने साथ आया पर खाने-पीने का जो शौक है ना, पेट ख़राब करके रिसोर्ट में सो रहा है आज। मैं भी आराम करता तो ठीक था, आज का दिन ही बुरा है।" नीचे समतल की हरियाली, घुमावदार पगडंडियों, हवा से झूमकर योग की मुद्राएं करते पेड़ों को इस बदलते मौसम में शूट न कर पाने की कसक नीरज को परेशान कर रही थी।
कम समय में ही बादलों के समूह ने नीले आसमान के नीचे अपनी पूरी दुनिया बसा ली। इंद्रदेव ने अपना इंद्रजाल चला दिया था। बादलों के ठहाकों से पहाड़ियांँ थरथराने लगीं, नीरज के पैर पत्थरों पर जम गए। उसने बैग से रेनकोट निकाला और तभी बादलों की गड़गड़ाहट के साथ बिजली की चमक से उसकी आँखें चौंधिया गईं। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता था। लकड़ियाँ बीनने, कंदमूल-फल लेने आने वाले पहाड़ी लोग, पहाड़ी मौसम के तेवर भांपकर समय से ही निकल जाते हैं।
गर्जना इतनी भयानक कि लगा मानो आसमान का टुकड़ा फटकर, पहाड़ियों पर बिखर जाना चाहता हो। पीठ पर लदी भारी बैग, हाथों में कैमरा स्टैंड और धुआं-धुआं होता मौसम, उसे कुछ ही दूरी पर दिख रही चट्टानी खोह में रूकना बेहतर लगा।
"क्या ही खूबसूरत जगह है यह!" चश्मा साफ़ करते हुए नीरज उस खोह को निहारने लगा। एक बड़े सीप के आकार की खोह, जो करीब दस-बारह फीट लंबी-चौड़ी थी, बहुत ही शांत जगह लगी।
"ऐसी ही जगहों में शायद ऋषि-मुनि ध्यान लगाते रहे होंगे।" उसने अपने रेनकोट की टोपी निकाली और वहीं बैठ गया। जेब से फोन निकालकर वैभव को कॉल करने लगा।
इस पर्वतीय प्रदेश में पावस का आनंद लेते नेटवर्क ने भी अपने हाथ उठा लिए थे।
"यहाँ तो वैसे भी नेटवर्क की समस्या है और इस गुफा-कंदरा में तो आने की उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। अच्छा किया वैभव ने जो आज आराम से रिसोर्ट में रह गया, मेरा ही दिन ख़राब था जो आया इस पहाड़ी मौसम का आनंद लेने।" ख़ुद से बातें करते हुए उसने आसपास नज़र दौड़ाई। खोह की अंदरूनी चट्टानों पर चमकीले बारीक पत्थर जगमगा रहे थे। उसने उन्हें स्पर्श किया तो उनमें एक ऊर्जा शरीर तक तरंगित होती जान पड़ रही थी।
उसने उसी क्षण बैग से कैमरा निकाला और लैंस ठीक करने लगा। पत्थरों का सौंदर्य जो नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता था उसे कैमरे की आँखें कैद करने लगीं। सीप के आकार के उस खोह के, सबसे अंतिम संकरे भाग में कोई आकृति सी दिखाई दे रही थी।
"कोई मनुष्य है या पशु, साधु या कोई शैतान?" मन ही मन विचार करते हुए उसने आवाज़ दी, "कौन है यहाँ?" नीरज ने दो कदम बढ़ा लिए थे।
"बोलो तो, कुछ उत्तर दो? बोल नहीं सकते क्या?" अब आवाज़ और तेज़ थी उसकी।
"यही तो खराबी है तुम शहरी लोगों में, शोर-शराबा खूब करते हो। शांति की तलाश में आकर इन पहाड़ियों को अशांत कर देते हो।" किसी स्त्री की मधुर परंतु तीखा स्वर खोह में गूंज गया।
"तुम, तुम तो लड़की हो? इस समय इस अंधेरी खोह में क्यों छिपी बैठी हो?" नीरज का प्रश्न था।
"मैं छिपी बैठी हूँ? नहीं तो, तुमने मुझे नहीं देखा मैं क्या करूँ?" वह उस संकरे भाग से उठकर खड़ी हो गई। उसकी पीठ नीरज की ओर थी। शरीर का इंच-इंच माप, किसी सौंदर्य प्रतियोगिता के तय पैमानों सा बना हुआ। उस पर काली लंबे बालों का कमर तक झूलना उसे प्रामाणिक सुंदरी करार कर रहे थे। वह हौले से पलटी और बिजली की चमक उसके ऊपर पड़ी। बला की खूबसूरत थी वह लड़की। दूधिया रंग, बड़ी आँखें, तीखी नाक और होंठों की उपमा सोचता वह मूर्तिवत खड़ा रह गया। उस खोह में दो प्रतिमाएं ध्यानमग्न, पत्थरों के साथ तादात्म्य स्थापित कर रहीं थीं।
बादलों की गड़गड़ाहट हुई और नीरज में जैसे चैतन्य का प्रवाह हुआ।
"तुम कौन हो?" पूछ्ते हुए नीरज की जुबां लड़खड़ा रही थी।
"पहाड़ियांँ मेरी, मैं पहाड़ों की लड़की, यह प्रश्न तो मुझे पूछना चाहिए।" उसके गुलाबी होठों के बीच शुभ्र दंत-पंक्तियाँ झिलमिला रही थीं। नीरज ने सोचा, "काश, वह कवि या शायर होता।"
"मैं ब्लॉगर हूँ, पहाड़ी गाँवों, वहाँ की परंपराओं, लोकगीतों, लोकगाथाओं को कैमरे में कैद करके लोगों तक पहुँचाता हूँ।" नीरज धाराप्रवाह बोल रहा था, "मेरा दोस्त भी साथ रहता है आज वो नहीं आया इसलिए मुझे अकेले तकलीफ़ हो रही है।" नीरज ने देखा वह लड़की लगातार मुस्कुरा रही थी।
"तुम क्या कर रही हो यहाँ?" नीरज ने हड़बड़ाते हुए पूछा।
"मैं तो रोज आती हूँ कंदमूल, जंगली फल लेने। इस खोह में बहुत शांति मिलती है इसलिए यहांँ कुछ देर आराम करती हूँ।" कहती हुई वह फिर संकरे भाग की ओर मुँह करके खड़ी हो गई।
"शांति है यहाँ? मुझे तो भयानक सन्नाटा लगता है।" नीरज बड़बड़ाने लगा।
"तुम तो ब्लॉगर हो, ऐसी जगह तो तुम्हारे कैमरे के लिए वरदान है फिर भी परेशान हो रहे हो!" वह कहती रही, "एक बात बताऊं जो बहुत कम लोग जानते है इस जगह के बारे में, शायद तुम्हारे काम की हो।" उसने पलटकर नीरज की आँखों में आँखें डालकर कहा।
गजब का आकर्षण था उसकी आंँखों में, नीरज को लगा कि जैसे उस झील में वह डूबने लगा है। उसने लड़की की ओर एक कदम और बढ़ा लिया।
"इस खोह में एक अंदरुनी रास्ता है जो बाहर के मौसम से प्रभावित हुए बिना सुरक्षित उस सुंदर झील तक ले जाता है।" कहती हुई वह उस संकरे भाग के सामने से हट गई। उसके किनारे होते ही संकरे भाग से एक सुरंगनुमा रास्ता दिखाई देने लगा।
"ओह.. वाह! अद्भुत , सचमुच! आजतक ऐसी जगह के बारे में न पढ़ा न देखा।" नीरज जोरों से चीख पड़ा।
"तुम शोर बहुत करते हो। ब्लॉग बनाना है तुम्हें इस गुप्त रास्ते का?" उस लड़की ने आँखों ही आँखों से नीरज को टटोला।
"बनाना तो है, काश वैभव साथ होता, अकेले सब हेंडल करने में बड़ी मुश्किल होती है।" नीरज ने सरलता से कहा।
"मैं हूँ ना, मुझे सिखा देना, मैं साथ दूंगी।" उसने अब नीरज की ओर कदम बढ़ाया।
बाहर गड़गड़ाहट हुई और बिजली की चमक के साथ नीरज को उसकी पास आती सांसें, शरीर से आने वाली पहाड़ी फूलों की खुशबू अपने में समाती मालूम हुई। उसने आगे बढ़कर नीरज का हाथ पकड़ लिया। उसके हाथों की नर्माहट और शरीर की गर्माहट से इस खोह में सुगबुगाहट हो गई।
नीरज उसके हाथ के स्पर्श को, आँखें मूँदकर आत्मसात करना चाहता था।
"चलो, उठाओ अपना सामान। आज तुम्हारे जीवन का सबसे अच्छा ब्लॉग बनेगा।" कहती हुई वो आगे चलने लगी।
संकरा, चट्टानी और कुछ अंधेरा सुरंगी रास्ता नीरज को धीरे चलने पर मजबूर कर रहा था। कैमरे का स्टैंड लेकर चलना कठिन था।
"इसको छोड़ दो, वापसी में ले लेना। अभी सिर्फ कैमरे से फोटो खींच लेना।" वह कहती हुई आगे चलने लगी और नीरज ने यंत्रवत हाथों के उस स्टैंड को वहीं छोड़ दिया।
दो-ढाई फुट चौड़ी, करीब सात-आठ फुट ऊंची यह लंबी सुरंग थी। वह सामने पायल छनकाती चली जा रही थी जैसे फूलों की चादर पर पैर रख रही हो।
"रूको भी, तुम पहाड़ी हो मैं नहीं। इतनी तेजी से मैं नहीं चल सकता।" कुछ हांफते हुए नीरज रुक गया।
वह पलटी और नीरज के पास आ गई।
"सचमुच तुम बहुत शोर मचाते हो। अब एक बार रास्ता देख लो, झील से वापसी के समय फोटो खींच लेना। और हाँ, अंधेरे से डर लगता हो तो फोन की लाइट जला लो।" वह मोहक अंदाज में मुस्कुरा रही थी।
"अरे हाँ, नेटवर्क नहीं है पर टार्च तो जला सकता हूँ।" खुद पर झुंझलाते हुए नीरज ने फोन निकालकर टार्च जला लिया। अब रास्ता कुछ साफ दिखाई देने लगा था।
वह सुंदरता की मूर्ति थी। सिर से पैर तक खूबसूरत। उसने फिर नीरज का हाथ पकड़ लिया और चलने लगी।
"तुम कौन सा परफ्यूम लगाती हो?" नीरज मंत्रमुग्ध सा पूछने लगा।
"परफ्यूम..!" वह रुक गई।
"ये तुम्हारे शरीर से जो ख़ुशबू आ रही है, वह कौन सी है?" नीरज के नथुनों से पहाड़ी फूलों की खुशबू, उस लड़की की देह गंध से मिलकर हृदय तक उतर रही थी।
"महक तो इस पहाड़ की है, इस मिट्टी की है। मुझमें वहीं तो घुला है।" कहती हुई वह चलने ही वाली थी कि नीरज का पैर पत्थर से टकराया और वह गिरने लगा। उस लड़की ने अपनी बाँहें बढ़ाकर उसे रोक लिया, वह उसके सीने से लिपटा था। उसकी सांसों के उतार-चढ़ाव को अपने सीने पर महसूस कर रहा था और आज इस समय से यहीं रुक जाने की प्रार्थना कर रहा था।
दुनिया का बेहतरीन परफ्यूम उसकी सांसों से दिलो-दिमाग में उतरता जा रहा था। नीरज का फोन फिसल कर गिर गया। उसकी आंखें बंद थीं और वह अपनी ज़िंदगी के इस खूबसूरत समय को हमेशा के लिए हृदय में उतार लेना चाहता था। यही वह खूबसूरत झील होगी जिसकी तलाश में वह पहाड़ियों में भटकता फिर रहा था। बाहरी मौसम का अब इस सुरंग में कोई प्रभाव नहीं था। दो सजीव मूर्तियांँ, एक-दूसरे से लिपटी हुई मानो पथरीली सुरंग में भित्तिचित्र बनकर चिपक गई हों।
"अबे नीरज, उठ ना! कितना सोएगा, हाथी घोड़े बेचकर सो रहा है तू तो। आज का समाचार पत्र तो पढ़ ले फिर बनाना ब्लॉग!" कमरे में आकर वैभव ने सोते हुए नीरज को झिंझोड़ कर उठाया।
"कैमरा ऑन कर वैभव, स्टैंड में फिट करता हूँ। बहुत सुंदर सुरंग है और यह लड़की दुनिया की सबसे सुंदर लड़की। उसका परफ्यूम, ओह मैंने नाम नहीं पूछा उसका..! क्या नाम होगा..?" नीरज बड़बड़ा रहा था।
"क्या बकवास कर रहा है तू? भांग खा लिया क्या? कल शाम से हम इस रिसोर्ट में बैठे हैं बारिश के कारण, तू कब सुरंग में गया, और हाँ लड़की भी मिली थी।" कहते हुए वैभव ने आज का समाचार पत्र नीरज के सामने फैला दिया।
"नाश्ते के बाद से खूब सो रहा है तू और मैं रिसेप्शन में बैठकर टेलीविजन, पुस्तकें और समाचार पढ़ता रहा। दो-तीन बार तो बिजली बंद हुई परंतु तेरी नींद नहीं खुली। अब जरा इस समाचार पर नज़र डाल और बता यहाँ रुकना है या बारिश बंद होने पर वापस चलें?" वैभव ने आज दिनभर का लेखा-जोखा दिया।
नीरज आँखें मलता हुआ समाचार पढ़ने लगा।
"पहाड़ियों की गुप्त सुरंग में ब्लॉग बनाने वाले ब्लॉगर को मानू झील के किनारे मृत पाया गया है। शरीर पर किसी भी चोट के निशान नहीं हैं। उसके कैमरे का स्टैंड पहाड़ी की एक गुफा में मिला। कैमरा और फोन अब तक प्राप्त नहीं हुआ है।" नीरज की आवाज़ घरघराने लगी।
"गाँववालों ने उस मृत देह की पुष्टि की क्योंकि पिछले एक सप्ताह से यह ब्लॉगर इस क्षेत्र में घूम घूमकर ब्लॉग बना रहा था।" अंतिम शब्द पढ़ते तक नीरज की आँखों के सामने अँधेरा छा गया। समाचार पत्र हाथों से सरक गया और अब एक बार फिर उसने अपनी सुध-बुध खो दिया था।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585