शनिवार, 9 मई 2026

1222 1222 1222 122पर ग़ज़ल

1222 1222 1222 122

बुरी नज़रों से मैं तुझको बचाना चाहती हूँ
इसी छोटे से आँचल में छुपाना चाहती हूँ।।1।।

बड़े होने का तेरा सपना ही जीवन है मेरा
उसे ही मैं हकीकत अब बनाना चाहती हूँ।।2।।


बहुत मुश्किल से पहुँचाया तुझे ऊंचाइयों पर
हँसी इक पर तेरी सब कुछ भुलाना चाहती हूँ।।3।।

तेरी राहों के सारे कण्टकों को बीनकर मैं
उन्हीं राहों को फूलों से सजाना चाहती हूँ।।4।।

कमाने में लगा तू भूल घर की दाल रोटी 
पका कर अपने हाथों से खिलाना चाहती हूँ।।5।।

अकेले रात में आए नहीं जब नींद तुझको
तेरे कानों में लोरी गुनगुनाना चाहती हूँ।।6।।

मुझे भगवान बस सेहत व लंबी उम्र दे दे
तेरे बच्चों को बाँहों में झुलाना चाहती हूँ।।7।।


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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 7 मई 2026

योद्धा ( दायरे संग्रह)

योद्धा  (कहानी)


आज का दिन विजय के लिए सपनों के सच होने का दिन था। इस वर्दी के लिए उसने और उसकी माँ गीता ने जीवन भर मेहनत की थी। अपनी पहली पोस्टिंग के साथ उसे राज्य के उस जिले का कार्यभार संभालना था, जहाँ जाने से अनुभवी ऑफिसर भी कतराते थे। यूपीएससी की परीक्षाओं के बाद करीब दो साल की कड़ी ट्रेनिंग पूरी करके, आज उसे उसका लक्ष्य मिला था। 

आज शाम की विदाई पार्टी के बाद कल की ही ट्रेन टिकट उसने बुक करवा ली थी। माँ के पास जाकर सात दिन उनके साथ रहकर, उसे अपनी पोस्टिंग की जगह जाना था। सामान पैक करके उसने सामने रखी दो तस्वीरें जिसमें एक हनुमान जी की और एक अपने बचपन की, हाथों में उठा ली। अपने परिवार की उस  तस्वीर में डूबता चला गया। कुछ बातें उसे याद हैं और कुछ माँ से सुन-सुनकर बड़ा हुआ है।

इस तस्वीर में वह सात साल का है। उसके साथ उसके पापा, उसके हीरो, सीनियर सुपरीटेंडेंट ऑफ पुलिस अतुल वर्मा और माँ, जीप के पास खड़े हैं। अपने बचपन की यादों को वह फिर से सहेजने लगा था। पापा की पोस्टिंग हर तीन साल में अलग जगह हो जाती थी। फोटो वाली वह जगह उसके यादों में जीवित थी। यह पापा की सरकारी जीप थी। पापा की वर्दी, उनका रुतबा, उनके मान-सम्मान को वह अपना आदर्श मानने लगा था। जीप लेकर ड्राइवर अंकल आते तो वह पहले एक चक्कर घूम कर आता था। पापा की जीप को उस सड़क के अंतिम छोर तक जाते देखता रहता और सैल्यूट करता था। 

इस नक्सलवादी जगह में पोस्टिंग होने पर माँ ने बहुत विरोध किया था। 
"गीता, जिस दिन इस सेवा को ज्वाइन करते हैं उसी दिन अपना सर्वस्व देश के नाम कर देते हैं पुलिसवाले। वहां के लोग भी तो रहते होंगे तो एक पुलिस अधिकारी का परिवार क्यों नहीं रह सकता? वैसे तुम चाहो तो अपने माता-पिता के पास भी रह सकती हो। मैं छुट्टियों में आता जाता रहूंगा।" पापा के विचार बिल्कुल स्पष्ट थे।
 
आखिरकार, पापा के ड्यूटी ज्वाइन करने के करीब दो महीने बाद माँ कुछ सामान और मुझे लेकर उनके पास आ गई। समाचार पत्रों में लगातार इन आदिवासी क्षेत्र में बढ़ते नक्सलवाद और आतंक की खबरें, माँ को विचलित कर दिया करती थीं। यहाँ आने के बाद यहाँ की सुंदरता, शुद्ध वातावरण और स्वच्छंद हवाओं ने कुछ ही दिनों में माँ का मन मोह लिया था। बड़ा सा बंगला, चारों ओर हरियाली, दूर से दिखता तालाब और गाँव वालों का पूजा स्थल सब कुछ फिल्मी लगता था। 

"यहाँ की सब्जियां, दालें बहुत स्वादिष्ट हैं, कीमत भी कम है।" माँ अपने बजट से खुश थी। 
"भोले-भाले आदिवासी लोग हैं। अभी भी वस्तु विनिमय पर भरोसा करते हैं बेचारे। अपनी उपज की सही कीमत भी नहीं लगा पाते हैं, ऐसे में हमारे-तुम्हारे जैसे शहरी लोग इनको लूट लेते हैं।" हँसते हुए पापा ने कहा और माँ गुस्सा हो जाती थीं।

पापा को सब "बड़े साहब" कहा करते थे। लोग आम, तेंदू, कटहल, तालाब की मछलियाँ देने आते थे। पापा सभी को धन्यवाद सहित कुछ रुपए, बच्चों के लिए कपड़े, पुरुषों के लिए धोती दिया करते थे। हम जब भी शहर या किसी बड़े कस्बे में जाते तो वहां के हाट-बाजार से यह सब चीज खरीद लाया करते थे। 

मुझे दूर के एक ठीक-ठाक स्कूल में भर्ती किया गया था। सरकारी गाड़ी से स्कूल आना-जाना होता था। जब कभी कहीं नक्सली हमला होता तो डर से स्कूल बंद हो जाया करता था। आने वाले शिक्षकों को अपनी जान का डर था। वह भी तीस-चालीस किलोमीटर दूर से बसों में आया करते थे। मेरी पढ़ाई का हाल बेहाल देखकर माँ बड़ी चिंतित रहती थी।
"अरे! यह सब तुम घर में करवा सकती हो और यहाँ कोई जिंदगी भर थोड़े ही रहना है। दो-तीन सालों में दूसरी पोस्टिंग आ ही जाती है।" पापा ने मेरी पढ़ाई की समस्या भी हल कर दी।

अपने कड़े अनुशासन और नक्सली आतंकवाद को खत्म करने के हौंसले के कारण, पापा ने चप्पे-चप्पे पर पुलिस का जाल बिछा दिया। आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए वे खुद अपने क्षेत्र में आने वाले सभी पुलिस थानों का लगातार निरीक्षण करते रहते। वहां के सामान्य लोगों के दिलों में उनकी सच्चाई और ईमानदारी ने घर बना लिया था। शुरू में तो सब कुछ शांत था शायद दुश्मन इस पुलिस वाले की चाल समझने में लगे थे। चार महीने बाद उनकी सरगर्मियां बढ़ने लगीं।

एक दिन उन्होंने हाट में आकर लूटपाट किया और विरोध करने पर एक कांस्टेबल को मार डाला। उनका नेता बिसमा, जिस पर सरकार ने बीस हज़ार का इनाम रखा था, उसने लोगों को खुलेआम धमकाया और पुलिस वालों से दूर रहने की सलाह दी। उस रात पापा घर नहीं आए, माँ और मैं रात भर उनका रास्ता देखते रहे। पापा सुबह उस कांस्टेबल की पत्नी और दो बच्चों को अपने साथ, अपने बंगले में सुरक्षित रखने के लिए लेकर आए।

उस दिन के बाद उन नक्सलियों के पूरे गिरोह की गहरी पड़ताल एसएसपी अतुल वर्मा के नेतृत्व में होने लगी। कौन, कब, कहाँ आता-जाता है? कितनी मात्रा में हथियार, बम हैं और कहाँ-कहाँ तक उनकी पहुँच है। उनको सहयोग करने वालों, आश्रय देने वालों, जरूरत का सामान पहुंचाने वालों को ढूंढ कर निकाले जाने की खबर फैल गई। भनक मिलते ही पुलिस दस्ता ठिकानों पर हमला कर देता और इस तरह दो-दो, चार-चार नक्सली मारे जाने लगे। 

जंगलों में छुपकर नक्सलवाद फैलाने वालों के पैरों तले जमीन हिलने लगी। एक जांबाज पुलिस अधिकारी ने खलबली मचा दी थी। 
"अगले आदेश तक शाला, हाट, पशु मेला सब बंद रखे जाएंगे। झुंड में कोई नहीं घूमेगा, सब पर नियंत्रण रखा जाएगा।"  पुलिस महकमा खूंखार नक्सलियों से निपटने की हर संभव कोशिश कर रहा था। जब शिकंजा कसा तो कुछ गिरफ्तार हुए और कुछ का एनकाउंटर करना पड़ा और उनके ठिकानों से बड़े हथियारों का जमावड़ा सील किया गया। 

मेरा सातवां जन्मदिन था। माँ ने पापा को शाम पाँच बजे मंदिर में आने के लिए कहा था। मैं और माँ तालाब के पास वाले उस देवस्थान के दर्शन के लिए चले गए। थोड़ी ही देर बाद पापा भी अपनी जीप से वहाँ आए। ड्राइवर अंकल और दो कांस्टेबल उनके साथ थे। सड़क पर जीप खड़ी थी और ढलान से उतरते हुए पापा मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। तभी नक्सलियों के एक दल ने चारों तरफ से उनको घेर लिया। जीप के बाहर खड़े दोनों कांस्टेबलों को गोलियों से भून डाला। पापा को उन्होंने घुटने पर बैठ जाने के लिए कहा। गोलियों की आवाज़ से घबराकर माँ ने मंदिर के अंदर वाले झरोखे से इस भयानक दृश्य को देखा। 

माँ बाहर की ओर भागने लगी तो मंदिर के पुजारी ने उन्हें पकड़ लिया और कहने लगा,"मार डालही बहन जी। लैका ला बचा लैवो, बड़े साहब के निसानी हे।"  
मैंने भी उस झरोखे से अपने पापा को हाथ ऊपर किए, घुटनों के बल बेबस देखा। माँ शून्य खड़ी थी फिर उस पुजारी ने, मंदिर के गर्भगृह का एक पत्थर हटाकर सुरंग में हमें उतार दिया। संवेदनाशून्य सी माँ और रोता हुआ मैं, न जाने कितने देर चलते रहे। अंधेरे में टकराकर हाथ-पैर छिल गए, पैरों में नुकीले पत्थरों के चुभने से खून बहने लगा। थोड़ी सी रौशनी ने आगे का रास्ता साफ किया।

 धूल भरी पगडंडी सामने थी। उसपर पैरों को घसीटते चले जा रहे थे। पगडंडी सामने की पक्की सड़क से मिल गई। शाम गहरा गई थी, बिना बिजली की इस सड़क पर अंधकार का साया था। एक मोटरसाइकिल की आवाज़ आई और किनारे पर खड़े हमने देखा, पुलिस वर्दी में दो लोग थे। 

मैंने जोर से आवाज दी और वो रुक गए। मैंने अपना परिचय बताया और पापा के साथ हुआ इस भयानक हादसे की जानकारी उनको दी। वह दोनों भी सकते में आ गए। उन्होंने तुरंत हेड क्वार्टर से संपर्क किया और गश्त में लगे सभी दलों को सावधान कर दिया। पुलिस की गाड़ी आ गई और हम दोनों को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाया गया। 

माँ बिल्कुल चुप, शून्य रहीं। चाचा, नानाजी, मामा सब आ गए। पापा का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। जब मेरे हाथों से पापा को मुखाग्नि दिलवाई गई तब माँ फूट-फूटकर रो पड़ी। वहाँ से हम नानाजी के साथ चले आए थे। 

विजय ने हाथ में रखी तस्वीर को अपने सीने से लगाकर फिर उसे सूटकेस में रख लिया। दूसरे दिन वह अपनी माँ के पास पहुंच गया था। यह माँ की अभिलाषा और पापा के अधूरे कार्य, देश के प्रति उनके समर्पण की भावना का परिणाम था जो आज मैं वर्दी पहनकर माँ के सामने खड़ा था। नानाजी और नानी नहीं रहे थे। उन्होंने अपने घर का एक हिस्सा माँ के नाम कर दिया था। दूसरे बड़े हिस्से में मामाजी और उनका परिवार रहते थे। मामाजी ने हमेशा ही माँ की और मेरी सहायता की, हमें आधार दिया। यह कैसी नियति थी कि आज से उन्नीस-बीस साल पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए शहीद हुए सीनियर एसएसपी अतुल वर्मा ने जिस क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाया था, आज उनका बेटा एसपी विजय वर्मा भी इसी दिशा में अपने कदम बढ़ा रहा था।

माँ ने उसके साथ जाने की जिद की तो विजय ने उन्हें दो-तीन महीने के बाद ले जाने का वचन दिया। वहाँ  पहुंचने के बाद विजय का स्वागत हुआ क्योंकि आजकल सरकार का पूरा ध्यान, पूरी शक्ति नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ने में लगी हुई थी। लोगों में वस्तु विनिमय न के बराबर था। थोड़ी आधुनिकता आ गई थी और भाषा की समस्या भी कम हुई थी। कुछ कच्ची-कुछ पक्की सड़कें बन रही थीं सिर्फ एक ही चीज नहीं बदली थी वह डर, खौफ़ जिसमें आज भी लोग जीते थे।

सरकारी गेस्ट हाउस में रूक कर अगले दिन विजय ने अपना कार्यभार संभाल लिया। एक इंस्पेक्टर और एक कांस्टेबल को साथ लेकर पहले ही दिन उसने अपने क्षेत्र में आने वाले कुछ थानों का जायज़ा लिया। अभी सरकारी व्यवस्था मजबूत हुई थी और पुलिस महकमे को विश्वास, शक्ति और हौंसला मिला था। भरपूर मात्रा में हथियार, जैकेट्स सरकार मांग पर भेजती थी। 

अगले दिन विजय ने गूगल मैप पर अपना पुराना घर, स्कूल, तालाब और मंदिर सर्च किया। वहाँ जाकर देखा बंगले में साफ-सफाई, रंग-रोगन का काम चालू था शायद सभी क्वार्टर और बंगलो को अलॉटमेंट के लिए तैयार किया जा रहा था। तालाब के पास का मंदिर ठीक-ठाक बन गया था।
 अपने हेड क्वार्टर में वापस आकर विजय ने नक्सलियों की पूरी फाइल खोल दी।
 "सर आठ बज गए हैं आप गेस्ट हाउस नहीं जाएंगे?" ड्यूटी पर तैनात इंस्पेक्टर ने पूछा।
"कुछ खाने का मंगवा लेता हूँ यहीं, खाकर सोने चला जाऊंगा।" फाइलों पर आँखें गड़ाए विजय ने कहा।

 नक्सलवाद की शुरुआत से हर दो-चार सालों में बढ़ते सरगनाओं की फाइलें, तस्वीरों को देखते एक पन्ने पर उसकी दृष्टि अटक गई। वही साल, वही अपराध, वही पुराना चेहरा जो उसके ज़हन में रहता था। बीस साल पहले का ईनामी नक्सली 'बिसमा'। बाजू में उसकी हाल-फिलहाल की तस्वीर भी लगी थी जिसमें मूँछ  अधपकी, गाल थोड़े और लटके और आँखें बिल्कुल पहले की सी। ईनामी राशि दस लाख हो गई थी। 

सिर पर हथौड़े बरसने लगे विजय के। सरकारी तंत्रों, पुलिस, सेना सुरक्षा बलों को भी धोखा देकर आज हजारों की संख्या में फैले, समाज के इन नासूरों को जड़ से खत्म करने की सोच बलवती हो गई। उसे लग रहा था कि आज कहीं दिख जाए तो आज ही उसका काम तमाम कर दिया जाए। आजकल सरकार ने इन नक्सलियों को जीवन की मुख्य धारा में शामिल करने और आत्म समर्पण के लिए मजबूर करने का बीड़ा उठाया है। बहुत ही विषम परिस्थितियों में एनकाउंटर की छूट थी। 

 सैनिक बलों और पुलिस दस्तों, सीमा सुरक्षा बलों के बढ़ते वर्चस्व से घबराकर बहुत से नक्सलवादियों ने बंदूकें छोड़ भी दी थीं परंतु अभी भी इन जंगलों में उनकी बड़ी तादाद मौजूद थी। आसपास के प्रांतों की सीमाओं से, पुलिस की आँखों में धूल झोंककर वे सरलता से आवाजाही करते थे।

विजय रात दो बजे गेस्ट हाउस जाकर सो गया। अगले दिन से ही जंगलों की मैपिंग, नक्सलियों के संभावित ठौर-ठिकानों की रैकी का प्लान चालू हो गया। कुछ नए जवान, जो उत्साही और जोशिले थे तथा कुछ अनुभवी अधिकारी और कांस्टेबल। बाहरी दुनिया को खबर किए बिना खुफिया तौर पर काम होने लगा। सरेंडर करने वालों को सरकारी सुविधा और नौकरी का दाना, गांँव वालों के द्वारा फैलाया जाने लगा।

दो महीने बाद एक बड़ा मेला था। हर वर्ष ही गाँव वाले, तीन दिनों तक इस मेले का आयोजन करते थे। आसपास के सभी गाँवों, कस्बों , शहरों की चीजें इस मेले में बिकती थीं। लोकसंगीत, नृत्य और ग्रामीण वाद्यों की सुंदर प्रस्तुति की जाती थी। खबरियों से प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय था कि इन तीन दिनों में एक दिन नक्सलियों का दल, अपना हिस्सा वसूलने जरूर आएगा।

 पुरुष एवं महिला पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित किया जाने लगा। हर चार स्टॉल के बाद सरकारी प्रशिक्षित महिलाओं और पुरुषों की दुकान रखने की योजना थी।  केंद्र से भी कुछ नामी अधिकारियों और सुरक्षा बलों को धीरे-धीरे लाया जाने लगा। 
"तेरे क्वार्टर का तय नहीं हुआ क्या विजय? तू मुझे कब लेकर जाने वाला है?" माँ ने पूछा।
"अगले महीने पक्का आता हूँ माँ। तब तक क्वार्टर भी मिल जाएगा।" विजय अभी खुद ही घर लेना नहीं चाहता था। गेस्ट हाउस की जिंदगी, उसे अपने कॉलेज और ट्रेनिंग की याद दिलाती थी।

मेले के पहले दिन नेताओं ने, सरकारी कड़े बंदोबस्त में उद्घाटन और भाषण बाजी की। मेले में हर तरफ रंग-बिरंगा जीवन, अपनी वेशभूषा और संस्कृति से सराबोर होकर उमड़ रहा था। आज प्लानिंग के साथ पूरी टीम सतर्क रही। कुछ ही कांस्टेबल वर्दी में थी बाकी अधिकारी वर्ग महिला और पुरुष दल सभी यहाँ के आम लोगों में घुल मिल गए थे। पूरी सतर्कता के साथ पुलिस काम कर रही थी। 

पहला दिन सुगबुगाहट में बीत गया। दूसरे दिन मेला अपनी जवानी में था। झूले में बच्चों के झूलने की आवाजें , लोकगीतों की धुन लाउडस्पीकर में चलती घोषणाओं के बीच सादे कपड़ों में विजय, अपनी पिस्तौल संभालकर, सुरक्षा जैकेट पहने मेले से बाहर निकल गया। उसके थोड़ी-थोड़ी देर में दो महिलाएं सिर पर टोकरियां लिए और दो पुरुष रंग-बिरंगी लकड़ी लिए बाहर आ गए। इधर-उधर दृष्टि घुमाता हुआ विजय, देहाती अंदाज़ में मलंग चाल से गुनगुनाता हुआ मेले के मुख्य द्वार की विपरीत दिशा में करीब दो ढाई सौ मीटर दूर निकल गया। 
उसने अपने पीछे आने वाले अपने साथियों की उपस्थिति का अंदाजा लिया। पीपल के पेड़ के नीचे कुछ लोग दिख रहे थे। धीरे-धीरे चलता हुआ विजय उन बैठे लोगों के विपरीत दिशा में बैठ गया। उसने अपना गमछा निकला और मुँह पोंछने लगा। सिर पर टोकरी ली महिला पुलिसकर्मियों ने भी, पेड़ की छांव में, जमीन पर ही डेरा जमा लिया।
"मेला में सामान नहीं बिकिस का?" चौपाल पर बैठे एक ने उनसे पूछा।
"बिक गे, सुस्ता के जाबो संझा तक अऊ ले आबो।" क्षेत्र की बोली पर अधिकार था उन प्रशिक्षित महिलाओं को।

 उनमें से थोड़े मोटे और तेज दृष्टि वाले ने अपना मुँह पोंछा और जेब से तंबाकू लेकर हथेली पर मलने लगा। उसने कुछ इशारा किया और उनमें से दो उठकर मेले की ओर चलने लगे। उनके कुछ ही मिनट में एक और उस दिशा में बढ़ चला अब पीपल के नीचे सिर्फ दो रह गए थे। विजय उस तेज नज़र वाले, बड़ी आँखों वाले आदमी को, फाइल में छपी बिसमा के वर्तमान की फोटो से मिलाने लगा। जब पूरी तरह से मैच हो गया तब विजय ने टोकरी ली महिलाओं की ओर देखा और सामने से आते अपने दो इंस्पेक्टर्स को, जो रंग-बिरंगी लकड़ी लिए आ रहे थे। उन्हें अपनी ओर ताकता देखकर बिजली की गति से अपनी पिस्तौल संभाले झपटकर चौपाल की दूसरी ओर चढ़ गया।

टोकरी में से अपनी पिस्तौल निकालकर बिजली की तेजी से दोनों महिला पुलिसकर्मी सामने आ गईं। विजय ने बैठे  हुए उन दोनों नक्सलियों के पीछे से अपने दोनों हाथों से दोनों रिवाल्वर उनकी कनपटी पर सटा दिया। उनके पास रखी थैली छीनकर दोनों महिलाओं ने उन्हें नीचे उतार कर घुटने पर बैठने के लिए मजबूर कर दिया।
 
"जरा भी इधर-उधर हाथ सरकाए तो खोपड़ी खोल दूँगा।" गुर्राते हुए विजय ने दोनों को लात मार कर नीचे पटक दिया और पीठ पर चढ़ गया। इंस्पेक्टर और उसकी साथी ने सबको  कव्हर किया और महिलाओं ने सशक्त बलों को सूचित किया। मेले में गए नक्सलियों को उनके पहनावे के आधार पर तुरंत पहचान कर रोक दिया गया। दो को गिरफ्तार किया गया और एक ने भागने की कोशिश की तो पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर दिया।

"विजय, इसने बीस साल पहले तेरे पापा को मार डाला था। तेरे परिवार को बर्बाद कर दिया था। आज तेरे सामने तेरा अपराधी खड़ा है, चला दे गोली। वैसे भी सरकार ने कई सालों से इस पर ईनाम रखा है।"  विजय ठीक उनके सामने खड़ा था। उसकी आँखें अंगार बरसा रही थीं।
 तभी उन दोनों ने अपने हाथ ऊपर कर दिए। घुटनों के बल बैठकर आत्मसमर्पण की मांग करने लगे। 

 "यह सब नाटक है इनका, चला गोली उनकी बातों में मत आना विजय।" विजय का मन चीख रहा था।
 "नहीं सर नहीं, यह गलत है। सरकार ने उनको सरेंडर करवाने पर बल दिया है। उन्होंने आत्मसमर्पण कर लिया है इसलिए मारना ठीक नहीं है।"  सशस्त्र बल अधिकारी ने विजय को समझाया।
 "आपने अपनी योजना से इतने बड़े नक्सली, आतंकवादी को पकड़ा है सर। आगे इसका उपचार सरकार ही करे तो अच्छा होगा।"  सभी ने उसे समझाया।
"हम पुलिस वाले हमेशा कानून में कैद रहते हैं।" पापा की बातें, उनकी आवाज़ विजय के कानों में गूंजने लगी।

 पिछले पच्चीस सालों से इन जंगलों को आतंक का अड्डा बनाकर, लोगों से वसूली करने, पुलिस वालों को मारने, पुलिस चौकियों को नष्ट करने वाले बिसमा और उसके तीन साथियों के आत्म समर्पण और एक के एनकाउंटर को, अगले दिन देश के अखबारों ने मुख्य पृष्ठ पर जगह दी। नव नियुक्त जांबाज एसपी विजय वर्मा की बुद्धि और साहस का उल्लेख, देश के हर अखबार में किया गया।

दूसरे दिन अपना वही बंगला अपने नाम अलॉट करके, विजय ने दो दिनों बाद की ट्रेन टिकट बुक कर ली। आखिर माँ को वापस इस जगह लाना जो था।


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यह मेरी मौलिक, स्वरचित, अप्रकाशित एवं अप्रसारित रचना है।

शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)400610
मो.नं. 9967674585

रविवार, 3 मई 2026

2122 1122 1122 22

2122 1122 1122  22

युद्ध दुनिया में छिड़ा गुम हुई ख़ुशहाली है 
सारी दुनिया की फ़िज़ा इसने बदल डाली है।। 1।।

बम धमाकों से सुरक्षित न रहे बच्चे भी 
सूनी हैं शाला सभी ज़िंदगी अब काली है।।2।।

मुट्ठी भर अन्न बचा कैसे चले यह जीवन 
पेट में दाना नहीं आई ये कंगाली है।।3।।

देखते देखते हो जाते शहर पूरे तबाह
जिस शहर में गिरे बम होता शहर ख़ाली है।।4।।

बम धमाकों से डरी दुनिया को बेबस देखा
रुकवा दे युद्ध को जो सच्चा वो बलशाली है।।5।।


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शर्मिला चौहान

शनिवार, 2 मई 2026

बंगला नंबर ३०४

बंगला नंबर ३०४


बीजू तेजी से कदम बढ़ाता हुआ ३०४ बंगले के पास पहुंच जाना चाहता था। मई के महीने में सूरज सात बजे तक थकता ही नहीं, पता नहीं बारह-तेरह घंटे की ड्यूटी करने में उसे कितना आनंद आता है। अपने एक हाथ में थैली पकड़े और दूसरे से आँखों पर अर्ध पारदर्शक छज्जा बनाता, वह चार बजे की उतरती धूप से कदम मिला रहा था। बीजू सोचने लगा, उतरती उम्र, उतरता सूरज और मद्धम पड़ता दीया पूरी शक्ति से दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करने में लगे रहते हैं। हल्की सी मुस्कान उसके होठों पर फैल रही थी परंतु सूखी पपड़ियों से होठों के मोड़ों में कहीं गुम हो गई। 

वह भी उतरती उम्र में आ गया है। साठ साल के ऊपर तो ढलान आने लगती है और वह तो उससे भी चार पार कर गया है। बंगले का बड़ा गेट दिखने लगा था। सबसे सुंदर, सबसे हरा-भरा और रंगीन फूलों से खुशनुमा है बंगला नंबर ३०४। गेट पर लोहे की गोलाई वाली कमान पर एक ओर से लाल-गुलाबी गुच्छे वाले फूलों की बेल, तो दूसरी ओर से घंटी के आकार के बैंगनी फूलों की बेलें बढ़ रही थीं। गेट के बीच में दोनों बेलें आपस में एक-दूसरे को स्पर्श करके विपरीत दिशा में बढ़ती चली गई और एक दूसरे के संपूरक होती गईं।
गेट के सीखचों से हाथ डालकर बीजू ने कुंडी खोलने का प्रयास किया और सफल हुआ। इस बंगले ने सूरज को ठेंगा दिखाते हुए अपनी ठंडक का वर्चस्व बनाए रखा है। आम का पेड़ जहां फलों के बोझ से झुका जा रहा है, वहीं रातरानी, जूही की बेलों ने बंगले की ऊंचाई से होड़ लगा रखी है। 

वह आम के तने से टिककर बैठ गया। आठ-दस साल पुराना होगा यह पेड़। उसके छालों की दरारों में चीटियों ने अपनी आवाजाही बना रखी थी। आज ही इनका इंतजाम करना होगा वरना यह चीटियां जड़ों को खोखला कर देंगी।
 सामने डालियों पर झूलती-लटकती कैरियां जैसे किसी पूजा के मंडप में घंटियां लगी हैं। 
दीवार से सटी, एक डेढ़-फीट चौड़ी गेंदे की क्यारियां बीजू के हृदय की धड़कन थीं। इन बंगलों में कहीं भी गेंदे के फूलों को लोग जगह ही नहीं देते हैं। बंगला नंबर ३०४ गेंदे की क्यारी रखने वाला एकलौता बंगला है। बस बीजू को लगता गेंदे उन्हीं घरों में पनपते हैं जहां जमीन से जुड़ी संवेदनाएं पनपती हैं। जब मैडम जी ने उससे बाग की देखभाल करने की बात पूछी थी तो इन्हीं विविध रंगों में खिले, छोटे-बड़े गेंदों के फूलों को देखकर उसने सहर्ष काम स्वीकार कर लिया था।

 थैली में से पानी की बोतल निकाल कर गट-गट पीने लगा तभी बरामदे में से कठोर आवाज आई। 
"कौन है, क्या चाहिए? अंदर कैसे आ गए?" आवाज से बीजू पहचान गया कि आज साहब घर पर हैं।
साहब बारह-पंद्रह दिनों में रविवार को ही आते हैं, आज तो बुधवार है और ऐसे अचानक..खैर!
"माली हूँ साहब। मैडम जी ने आठ महीने पहले काम पर लगाया है। अभी शाम को पानी डालना है इसीलिए आया हूँ।" यह साहब से  पहली मुलाकात थी तो अपनी जगह पर खड़े होकर बीजू ने कहा। 
"शाम को काम है और चार बजे आ गए! यह मेरा बंगला है कोई रेस्ट हाउस नहीं जहाँ आराम करो। जाओ छह बजे आना।" कहते हुए उन्होंने बरामदे की खिड़की का पर्दा खींच लिया।

"हे भगवान! इतनी धूप में सोचा था कि थोड़ा आराम करूँ फिर लॉन की घास काट कर, पौधों में पानी डाल दूँ। कितना कसैला आदमी है।" मन ही मन सोचता हुआ थैली उठाकर बीजू थके कदमों से वापस गेट की ओर बढ़ गया। कुछ ही दूरी पर नगरनिगम का बगीचा था, वहीं कोने की बेंच में बैठ गया। पानी के फव्वारे में जमा पानी पंछियों के लिए तालाब बन पड़ा था। अपनी छोटी चोंच में बूंद भरते और गटक लेते फिर किनारे में थोड़े से भरे पानी को पंखों से अपने ऊपर फेंक लेते।  
"थोड़े में खुश रहने वाले यह पंछी और वह देखो इतने बड़े बंगले का मालिक।" बीजू बड़बड़ाया।

छह बजने वाले थे। धीरे-धीरे चलता बीजू वापस बंगला ३०४ की ओर बढ़ने लगा। सूरज के उतार ने हवाओं को स्वच्छंदता सौंप दी थी। अब वह लपट की तरह नहीं, थोड़ी ठंडक लिए हुए शरीर को स्पर्श कर रही थी। बीजू ने लॉन में पहुँचकर अपनी कैंची निकाली और लॉन में लगी घास को सलीके से संवारने लगा। उसकी तन्मयता और घास काटने की सुघड़ता से कुछ ही देर में, लॉन ने नया रूप का लिया। सूखी पत्तियों को झाड़ कर, किनारे रखी टोकरी में भर दिया फिर पानी का पाइप सीधा किया और नल से जोड़ने लगा। सबसे पहले उसने गेंदों के पौधों को जी भर नहलाया, हाथों से सहलाने लगा जैसे बेमौसम कलियाँ लिए खड़े, इन पौधों की हौंसला-आफज़ाई कर रहा हो। 

सहसा, उसकी निगाह सड़क के दूसरी ओर वाले बंगले के ऊपरी कमरे में रहने वाले नए लड़के-लड़की पर पड़ी। कभी-कभी दोनों को ऑफिस से साथ आते देखा था। कभी शायद घर से काम करते थे दोनों। मन ही मन हँस पड़ा वह। देखते-देखते जमाना कितना बदल गया। अब ऑफिस घर में आ जाता है और लड़का-लड़की बिना शादी ब्याह किए एक ही घर में रहते हैं। वह दोनों बालकनी में खड़े सूरज की मद्धम पड़ती रोशनी को देख रहे थे। हाथ में शायद चाय-कॉफी का मग रखा था। उस लड़की ने बालकनी में स्टैंड रख कर, दो गमलों में गेंदे के पौधे रखें थे। शाम को पानी डालती बीजू को दिखती थी। बड़े प्यार से छोटे पौधे को बड़ा होते देखा करती थी। उसके उस फूल विशेष के प्रेम ने बीजू के मन में उसके प्रति अपनापन जगाया था। 

 माली को बंगले के बगीचे में पानी डालते देख उसे लड़की ने उंगलियों से "सुंदर" बगीचे का इशारा किया। एक क्षण के लिए बीजू को लगा किसी ने उसे चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया हो। किसी को इस तरह देखना कोई अच्छी बात तो नहीं। सोचते हुए बीजू ने उस लड़की की ओर एक मुस्कुराहट उछाल दी। करीब सात बजे वह गेट बंद करके, अपने घर की ओर निकल गया।

 आज मैडम जी दिखाई ही नहीं दीं वरना वह गर्मियों में नींबू-पानी, छांछ, पना कुछ ना कुछ जरूर देती थीं। वह जितने देर काम करता मैडम जी भी पूरे उत्साह से हर पौधे की जतन करतीं।
"मैडम जी, मैं कई घरों में बगीचे की देखभाल करता हूँ पर आप सिर्फ साथ में बगीचे का काम करती हैं। बाकी घरों में मैं खुद काम करके निकल जाता हूँ।" एक शाम मैडम जी को खुद के साथ गुलाबों की कटिंग करता देख बीजू ने पूछा था। 
"पेड़-पौधे तो बच्चों की तरह होते हैं इन्हें किसी दूसरे के हाथों पूरा कैसे सौंप दिया जाए? अच्छा लगता है उनकी देखभाल, साज-संभाल करना मुझे।" मैडम जी ने उसे 'दूसरे' से संबोधित किया परंतु बीजू को उनका पौधों के प्रति यह अपनापन अच्छा लगा।


अपनी खोली से आई उमस भरी हवा बीजू को बहुत बुरी लगी। उसने हाथ पांव धोकर, लोटा भर पानी दरवाजे के दोनों ओर रखें गमलों में डाला। दिनभर की तपन झेलते गेंदे के पौधों को सहलाकर मानो उनका दुःख कम कर देना चाहता हो। उसकी बेटी तारा का पसंदीदा फूल गेंदा। तारा का अधूरा बचपन और उसके स्वयं की जवानी का जो समय मजदूरों की बस्ती में बीता, उस खोली के बाहर भी छोटा आंगन था।  
"बाबूजी, मैं एक पौधा चुरा कर लाई हूँ। बहुत सुन्दर फूल होते हैं पीले, नारंगी।" एक शाम जब वह काम से लौटा तो तारा ने उससे कहा।
"चोरी किया, क्यों बेटी?" बीजू ने आश्चर्य से पूछा।
"क्योंकि चुराने से पौधे जल्दी फूल देते हैं, मेरी सहेली ने बताया है।" कहती हुई उसने बीजू से गड्ढा खुदवाकर पौधा लगा दिया। 
अपनी जान की तरह जतन करती, जानवरों से बचाने के लिए चारों तरफ़ छोटी लकड़ियों की बाड़ बनवाई थी। जब खुद पानी पीती उसे भी सींच आती।

जिस दिन पहला फूल खिला, उस पीले जंगली फूल से खोली में बसंत आ गया और तारा के जीवन में भी। एक फूल ने उस बच्ची के ममत्व को जगा दिया था। अपनी बेटी की इस खुशी ने धीरे-धीरे, ईंट गारे में डूबे मजदूर बीजू को उस फूल विशेष का प्रेमी बना दिया। अब तो सात-आठ पौधे आंगन में लहलहाने लगे थे।
"लोग तो रंग-बिरंगे गुलाब पसंद करते हैं, तुम्हें गेंदा क्यों पसंद है?" बीजू ने तारा से पूछा।
"क्योंकि ये सुंदर भी हैं और इनमें कांटे नहीं हैं इसलिए।" बेटी की प्यारी बातों को याद करके, आँखें भर आईं बीजू की।
गैस पर चाय चढ़ाया और कल की ब्रेड ढूंढने लगा। रात का खाना यही खाता है सालों से वह। सुबह भात-साग बनाकर दिनभर के लिए ठूंस जाता है। वैसे कुछ घर हैं जहां काम करते समय शरबत, चाय और कभी-कभी नाश्ता मिल जाता है।

बाहर खाट पर गुदड़ी डालकर बीजू लेट गया। आज आकाश साफ था फिर भी दो-चार तारे दिखाई दे रहे थे। इन्हीं के जैसे चमकती थी उसकी बेटी तारा जो अब शायद इन्हीं में से कोई एक होगी। नज़रें  बेटी को तलाशने लगीं। रोज ही याद करता था वह अपनी बच्ची को। कुछ लोग इतने अच्छे, इतने सच्चे और प्यारे होते हैं कि भगवान के घर जल्दी चले जाते हैं।

 अचानक मैडम जी का चेहरा उसकी आंखों के सामने घूमने लगा। 
"नहीं-नहीं, मैडम जी क्यों जाएंगी भगवान के घर!" उसने अपना सिर झटक दिया मानो उसे ख्याल को मीलों दूर तक फेंक देना चाहता है। 
करवट बदलता रहा बहुत देर, नींद ही नहीं आई उसको। जाने अनजाने ३०४ बंगले वाली मैडम की सूरत घूम जाती और साथ ही उनके पति यानी साहब जी की आवाज भी। 
"मेरे पति काम के सिलसिले में ज्यादातर बाहर रहते हैं। किसी शनिवार-रविवार आते हैं।" बताया था मैडम जी ने। आसपास से पता चलने पर उसने कभी मैडम जी से उनके बाल बच्चों के बारे में नहीं पूछा बच्चों के नहीं होने का दुख यदि वह भोग रही थी तो बच्चे के न रहने को का दुख वह स्वयं भोग रहा था।

एक दुख ही तो है जो धर्म-जाति, रूपए-पैसे, ऊँच-नीच, लिंग किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करता। वह अपने-आप को ऊंचा उठाकर झेल जाने की प्रवृत्ति तलाश करता है या उस प्रवृत्ति का निर्माण कर देता है। दो दुखी एक-दूसरे से मिलकर राहत की सांस लेते हैं। यही बंधन मैडम जी और बीजू के बीच बनता जा रहा था। 
पर बातें तो बतंगड़ बनकर सारी दुनिया में फैल जाती हैं। शादी के बीस-बाइस वर्षों तक बाल बच्चों की कमी रही इसीलिए मैडम जी फूल पौधों पर अपना वात्सल्य उड़ेल देती थीं। एक-एक नई कली, नई पत्तियों के निकलने का हिसाब रहता था उनके पास। 

 पिछले महीने की बात है, देसी गुलाब की टहनी लचक गई। नयी टहनी थी पता नहीं कैसे टूट गई। इतने गुलाबों के बीच, मैडम जी ने उसकी देखभाल में घंटों बिता दिए। बड़े बांस की छोटी कमची से  बांधकर उसे आधार दिया। उस टहनी को चिपकाने वाले टेप से कुछ देर लपेटा और फिर धागे से बांध कर रखा। जड़ के पास नयी मिट्टी और खाद डाल दिया। उनकी सेवा देखकर बीजू को लगता कि इस बगीचे की असली माली तो मैडम जी ही हैं। 
मैडम जी के बारे में सोचते-सोचते बीजू की आँख लग गई और जब खुली तो सूरज चढ़ आया था। बिस्तर-खाट समेट कर, नहा-धोकर बीजू ने चाय चढ़ाई। खौलती चाय ने नथुनों में घुसकर दिमाग में नशा बढ़ा दिया। चाय बनते तक भात का बर्तन तैयार कर दिया। आज भात, अचार के साथ खा लेगा अब साग बनाने का समय तो नहीं था।

अभी चाय पीकर कप धो ही रहा था कि बाहर जोरों की आवाज सुनाई दी। गाली-गलौज, हो-हल्ला की जानकारी लेने के लिए कमीज पहनकर वह बाहर निकल गया। एक आदमी को सब बुरी तरह पीट रहे थे। एक औरत उसे चप्पलों से, डंडे से मार-मार कर गालियाँ दे रही थी। 
"क्या हुआ भाई!  क्या किया इसने?" बीजू ने एक पड़ोसी से पूछा। 
"बीजू भाई यह राक्षस है राक्षस। अपने गज्जू का दोस्त है, रोज आता-जाता था उसके घर। आज घर पर कोई नहीं था तो आकर गज्जू की दस साल की बच्ची को खोली में बंद करके जबरदस्ती..।"  उसका वाक्य अधूरा छूट गया और बीजू अपना सिर थाम कर, पास की एक दीवार से टिक गया। 
वक्त बदलता है पर लोग नहीं। कैसी विडंबना है कि बेटी के माँ-बाप के लिए दुनिया हमेशा दानव ही रहती है। अपने को बटोरता, समेटता भारी कदमों से अपनी खोली की ओर आ गया बीजू।

तारा, उसकी अपनी बेटी तारा, उसकी आँखों का तारा थी। बीवी ने तो उसको पैदा कर दिया और दो महीने का छोड़कर अपनी जीवनयात्रा पूरी कर ली थी। उसने तारा को सीने से लगाकर एक-एक पल सहेजा था। बच्ची को दूध पिलाने से लेकर उसकी टट्टी-पेशाब, उसको नहलाना-धुलाना और जब थोड़ी सी बड़ी हुई तो उसे पास की एक पड़ोसन के पालनाघर में छोड़कर, वह काम पर जाता था। यह बरसों की नित्य की दैनंदिनी बन गई थी। 

तारा का बबलाना, उसको बाबा कहना, पहला कदम बढ़ाना सब कुछ चलचित्र की भांति कौंध गया। चोटी गूंथने में तारा उसकी मरम्मत कर दिया करती थी।
"बाबा, एक चोटी ऊंची एक नीचे है। अच्छे से तो बनाओ।" वह कई बार रिबन खोल देती। उसका ठुनकना, लड़ियाना जैसे बीजू के जीवन का केंद्र था। सात-आठ बरस की हो गई तब तो बड़ी समझदार हो गई थी। कभी-कभी उसकी नानी आ जाता करती थी, साथ में कुछ दिन रहकर उसे दुनियादारी समझाती थी। चाय बनाना भी सिखा दिया था उन्होंने। 
 "बाबा, आज मैं चाय बनाऊंगी तुम बैठो।"  दिनभर ईंट गारे में लगे पिता को जैसे दुनिया का सुकून मिल गया। उसकी प्यारी बातों से जीवन में रस घुल जाता था। मजदूरों की बस्ती में सभी एक-दूसरे के साथी बन जाते हैं। कोई सब्जी-तरकारी दे जाता तो कोई त्यौहार का पकवान। कुछ दोस्तों से बीजू का अच्छा नाता था तो तारा उनके बच्चों के साथ खेलती, उनके घर जाती थी।
"बाबा, आज भुवन काका ने जलेबी दी थी।"  एक शाम तारा ने बताया।
"अच्छा! भुवन की तो तबीयत खराब है, वह तो काम पर भी नहीं आ रहा है। कल उसका हाल पूछकर आऊंगा।" बीजू ने तारा से कहा और शाम की रोटी पानी का इंतजाम करने लगा।

दूसरे दिन भी ठीहे पर भुवन नहीं दिखा।
"क्यों बे गणपत, भुवन को क्या हुआ काम पर नहीं आता।" बीजू ने एक साथी से पूछा।
 "कुछ दमा का अटैक आया है कहता था। कहता था दो-चार दिन आराम करके काम पर आएगा। उसके बीवी-लड़का भी गांव गए हैं जब आ जाएं तब उसकी देखभाल होगी।" गणपत कहता रहा और बीजू सोच में पड़ गया, "बीवी बच्चा नहीं है तो बीमार भुवन जलेबी क्यों लाया? तारा को देने घर क्यों आया?" बीजू जितना सोचता उतने ही संदेह की खाई गहराती जाती। 
"घर में मेरे ना रहने पर क्यों आया होगा भुवन?" बीजू की घड़ी की सुई अटक गई थी।

 उसका मन बिल्कुल नहीं लग रहा था। उसने आधे दिन की छुट्टी ठेकेदार से मांगी और बस्ती की ओर आ गया। पहले भुवन के घर गया ताला देख कर तुरंत अपनी खोली की ओर निकल गया। खोली के आंगन में सन्नाटा था 
"पता नहीं, आज तारा अंदर सो गई क्या वरना तो आँगन में ही खेलती है।"  सोचता हुआ बीजू सब तरफ नजर दौड़ाने लगा। खोली के अंदर से दबी-घुटी सी सांस की घरघराहट कानों तक पहुंची।
"तारा, खोल बेटा दरवाजा खोल। क्या हुआ तेरी तबीयत तो ठीक है ना?" दरवाजा पीटते हुए बीजू चिल्लाया। पागल-बौखलाए पिता ने चीखना शुरू कर दिया। दरवाजे को दो-चार लातें मारकर तोड़ दिया और अंदर चला गया। एक आदमी उसे धक्का देकर बाहर की ओर भागा। बीजू गिर पड़ा परंतु भागते आदमी को पहचान गया। 
 "कमीना, नमकहराम, गद्दार राक्षस!"  गालियां देता बीजू चारपाई की ओर दौड़ा।
 तारा, उसकी फूल सी बच्ची, बिखरे बाल, मुँह-नाक से खून बह रहा था। अपनी बच्ची को छाती से लगाकर बाहों में उठाए चूमने लगा बीजू।

हल्की सांस का आभास हुआ तो वैसे ही बच्ची को उठाए बाहर की ओर भागा। आसपड़ोस के लोग जमा होने लगे थे। बीजू, बेटी को दोनों हाथों में उठाएं दौड़ता-भागता गाँव के चिकित्सा केंद्र में पहुंचा। पड़ोसी पीछे-पीछे भागते आ रहे थे। वहां जो डॉक्टर था उसने बच्ची को मृत घोषित कर दिया। अपनी तारा को अपने सीने से लगाए बीजू पागलों की तरह गाँव में घूम रहा था। लोगों ने समझा बूझकर बच्ची का अंतिम संस्कार किया। उसी जगह पर बैठा रहता था बीजू। जब तेरह दिन हो गए तब वह अपनी खोली में गया। कुछ सामान एक थैली में भरकर, बेटी की तस्वीर लेकर निकल गया। खोली खाली थी, बीजू के दिल की तरह वीरान और सुनसान। आंगन में लगाए गेंदे के पौधे सूख गए थे। उनकी ओर देखकर बीजू का कलेजा मुँह को आ गया।
महीने भर के अंदर उसने भुवन को ढूंढकर को मार डाला। लोगों के सामने तब तक उसका गला दबाता रहा जब तक सांसों की घरघराहट बंद नहीं हो गई। खुद ही पुलिस थाने में जाकर अपना अपराध कबूल कर लिया था। उसकी स्वीकारोक्ति, हत्या का मकसद, गाँव वालों की गवाही से उसे हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

शहर के बड़े जेल में बीजू अपने जीवन के दिन निकाल रहा था। ना कोई इच्छा ना कोई उद्देश्य। तारा की फोटो उसने विशेष अनुरोध करके अपने पास रख लिया था। जेलर साहब दुनियादारी के रंग और इंसान को समझते थे। उन्होंने उसे बाग का काम सौंप दिया। फूलों-पौधों में अपना सुख तलाशना सिखाया। धीरे-धीरे बीजू का मन इन क्यारियों को हरा-भरा बनाने में रमने लगा था। 

रविवार, जेलर साहब के क्वार्टर के बगीचे में भी निराई-गुड़ाई कर आता था। जेलर साहब की दस-बारह साल की बेटी उसे माली चाचा कहती थी।  बीजू हमेशा उसे फूलों का गुलदस्ता दिया करता था।
"आप मेरीगोल्ड के फूल क्यों नहीं लगाते?" एक दिन बच्ची ने पूछा।
मेरीगोल्ड का अर्थ जानने के बाद बीजू ने खुशी से उस अहाते में गेंदे के कई पौधे लगा दिए और उसके फूलों को देखकर खुश होती बच्ची के चेहरे में डूबकर तारा को ढूंढने लगता था। 
अपने शांत स्वभाव, काम में मन लगाने की आदत, नियमित दिनचर्या और जेलर साहब के प्रमाण पत्र ने उसकी आजीवन सजा को बीस साल की कैद में बदल दिया। जेलर साहब तो दूसरी जेल में चले गए परंतु बीजू उनको आज तक नहीं भूला है। 

पड़ोस के उस हो-हल्ले और उस आदमी के कुकर्म ने जैसे बीजू को तीस साल पीछे धकेल दिया था। सिर, हाथ-पैर सब दुख रहा था। मन व्याकुल था तो खाट पर पसर गया। उस मासूम बच्ची और उसके मां-बाप के हृदय की वेदना को, उनकी छटपटाहट जैसे बाँट लेना चाहता था। करीब चार बजे घर से निकला। सब सुनसान था मानो कुछ घटा ही नहीं। सब अपने कामों में लगे थे। वह भी धीरे-धीरे अपना काम करने बंगलों की ओर चल पड़ा। सबने पूछा कि, "आज देर क्यों किया?" अंत में ३०४ बंगले की ओर गया। गेट पर ताला लगा था। मन में सोच-विचार करता वापस आ रहा था कि देखा सामने बंगले के वह दोनों लड़का-लड़की खूब जोर-जोर से लड़ रहे थे। तभी काँच का कुछ टूटने की आवाज भी आई।
आज के दिन इतना देख चुका था कि बिना रुके अपने रास्ते निकल गया। भूख-प्यास से नींद नहीं आ रही थी तो रात को दस बजे चौक की दुकान से समोसा लाकर खाया फिर पानी पीकर सोने की कोशिश करने लगा। आज आकाश में तारे नहीं दिख रहे थे शायद आज उन्हें भी जमीन की ओर देखने में शर्म आ रही थी। इंसानी कृत्यों से सारी सृष्टि दुखी हो जाती है। 
"मैडम जी कहां गई? वह लड़का-लड़की इतना झगड़ा क्यों कर रहे थे?" उसने याद किया कि अपने जीवन की कहानी, अपने जेल की जिंदगी के बारे में उसने मैडम जी को बताया था। सुनकर उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। इन्हीं विचारों में डूबकर अंततः उसे नींद आ गई।

अगले दिन चाय पीकर काम पर जल्दी चला गया। बहुत धूप होती है तो बगीचों में आजकल पानी भी ज्यादा लगता है और सूखे पत्तों का कचरा भी अधिक रहता है। नगरनिगम के बगीचे के माली से थोड़ी बातचीत हुई और फिर वह कॉलोनी के बंगलो की ओर चला गया। ३०४ बंगले के सामने वाले उस लड़की-लड़का के जोड़े में से लड़की सामान एक गाड़ी में डाल रही थी। वह चुपचाप खड़ा देखता रहा समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है।
गाड़ी में सामान भरकर उसने बीजू की ओर देखा। अपनी बालकनी के दोनों गमलों को बीजू के हवाले करते हुए बोली, "इनका ध्यान रखना आप! उसको छोड़ कर जा रही हूँ। मेरी कमाई से किराया, मेरी कमाई से घर का मेंटेनेंस, अपना पैसा अलग रखेगा और दूसरी लड़कियों के साथ मौज-मस्ती करेगा.. मेरी ही क़िस्मत खराब थी।"  गुस्से से भरी हुई वह कार में बैठी और चली गई।
उसकी कार निकली और लड़का अपना सामान लेकर फोन से टैक्सी बुला रहा था। बीजू को देखा तो एक क्षण के लिए ठिठक गया फिर वह भी टैक्सी में बैठकर निकल गया।
"हे भगवान! यह साथ रहते थे अब अलग हो गए। क्या अब किसी और से शादी-ब्याह करके फिर से घर बसाएंगे।" आश्चर्य और दुःख से भरा वह बंगला ३०४ की और चला गया। 

आज गेट खुला था। कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। गेट पर और बंगले के द्वार पर बड़ा नेम प्लेट था जिस पर मैडम जी का नाम लिखा था। पहले तो आदमी यानी साहब का नाम था। उसने हाथ में पकड़े दोनों गमले जमीन पर रख दिए। सोच-विचार में पड़ा वह पानी का पाइप ढूंढने लगा। तभी द्वार खुला और मैडम जी आईं।
 उन्होंने पूछा, "नेम प्लेट देख रहे हो बीजू? अब मैं इस घर की मालकिन हूँ। मैंने यह घर अपने नाम कर लिया और उनको हमेशा के लिए उनकी पत्नी और बच्चों के लिए मुक्त कर दिया।" 
 बीजू टकटकी बांधे देख रहा था। एक औरत की सालों दबी कुंठाएं, इच्छाओं को सीने में दबाने के बाद कैसा लावा फूट जाता है?
"मैं अपने माता-पिता से छिपकर, उस व्यक्ति के साथ अपना घर छोड़कर आ गई थी जो पहले ही विवाहित था। मुझे पहले धोखे में रखा बाद में मेरी स्थिति मुझे बता दी।" मैडम जी में गहरी सांस भरी।
"आज उसको भी मुक्त कर दिया और मैं भी मुक्त हो गई। इन दोहरे संबंधों का अंधकार मुझे ही लील गया। मेरे एक ग़लत निर्णय ने, मुझे सारे जीवन का दर्द दे दिया। मेरा कोई अपना नहीं रहा।" कहते हुए उनकी आँखें गीली हो गईं। 
"देखो! वह टूटी टहनी वाला पौधा देखो। उस टूटी टहनी ने अपने आपको संभाल लिया है और अब उसमें नये फूल आएंगे।" मैडम जी ने बात को अलग दिशा दी।
"हाँ, समय सब घाव भर देता है मैडम जी। देखिए, बेमौसम आज गेंदे का फूल भी तो खिला है। कितनी दिलेरी और हिम्मत से इसने अपने लिए इस समय का चुनाव किया है।" मौसमी फूलों के बीच इठलाते गेंदे ने इस मौसम को बसंत में बदल दिया था।


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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

युद्ध नहीं आसान.. कविता

युद्ध नहीं आसान 

देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।
भूख मृत्यु और आँसू, हर तरफ श्मशान है।।

चल दिए घर से निकल कर, लौट न पाए कभी।
बच्चे बूढ़े औरतें, भुक्तभोगी हैं सभी।

ज़िंदगी फिर से बसाना, इतना क्या आसान है?
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।1।।

द्रोन, बम, मिसाइलें, हैं धधकती हर घड़ी।
ढ़ेर मलबों का बढ़ा, छोटी मानवता पड़ी।

युद्ध लड़ते देश पर, मरता तो बस नादान है,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।2।।

वीरता का खून करती, भस्म क्षण में सब करे।
एक दो नहीं सैकड़ों, एक क्षण में हैं मरे।

जीव जंतु प्राणियों का, हो रहा अवसान है,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।3।।

गिद्ध, चील, कौओं का, चल रहा महाभोज है।
सत्ता शक्तिशालियों की, और कुछ की होड़ है।

लोभ, पद की लालसा ने, छीनी कई संतान हैं,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।4।।

श्रेष्ठ खुद को है समझता,  शक्ति का भंडार जो।
दूसरों को है मिटाता, रचता खुद संसार वो।

सृष्टि और मानव के मध्य, मचा यह घमासान है,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।5।।

लुटती इज्जत औरतों की, बच्चे मरते रात दिन।
बूढ़ों ने रोकी हैं सांसें, लोग हैं परिवार बिन।

सबने झेला युद्ध को, जापान और ईरान है,
देख लो पन्ने पलट कर, युद्ध बस नुकसान है।।6।।

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रविवार, 12 अप्रैल 2026

अमलतास गीत

गर्मियों में धरा का उच्छवास है।
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।

ताप से सृष्टि में अकुलाहट सी है,
सनसनाती लू की ही आहट सी है।

ऐसे में मन में जगाता आस है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।1।।

पीत रंग परचम फहराता जो है,
गुलमोहर के संग मुस्काता वो है ।

लाल पीले का रचा ये रास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।2।।

सूर्य तेजस्वी ठठाकर हँस पड़ा,
दग्ध दाह बिखेरता था वो खड़ा।

सहने की क्षमता धरा की ख़ास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।3।।

अस्त्र चटकीले भूमि को हैं मिले,
टेसू गुलमोहर दमकते जो खिले।

गर्मियों में लगे ज्यों मधुमास है,
सिर उठाकर वो खड़ा अमलतास है।।4।।

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शर्मिला चौहान

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

221 2121 1221 212 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी साथियों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 आप सबकी ग़ज़लों से पटल खूबसूरत लग रहा है।


फ़िलबदीह-63 
दूसरा चरण 

221 2121 1221 212


रखती सभी का हर घड़ी सच्चा हिसाब है
कहते हैं ज़िंदगी जिसे ये वो किताब है।।1।।

हर कामयाब आदमी बूझे सवाल खुद 
जिसने सबक नहीं लिया वो ही ख़राब है।।2।।

कांटों के बीच राह बनाते चले चलो
जो अंत तक निभा सको जीवन गुलाब है।।3।।

कोई कहे नशा इसे कोई सज़ा कहे
ये है दवा किसी के लिए ये शराब है।।4।।

बाहर जो ढूंढते रहे अपने में ही मिली
ढूंढे जो खुद में ही खुशी वो कामयाब है।।5।।

गंगा सी तेज़ हो कभी सरयू सी मंद हो 
ये ही तो ज़िंदगी का लुब्बे-लुबाब है।।6।।

औरों की भेड़चाल से बचकर चलें यहाँ
अपने ही दम पे जो जिया वो ही जनाब है।।7।।

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 10 मार्च 2026

1222 1222 1222 1222


1222 1222 1222 1222

जिगर में जब तलक थोड़ा सा भी ईमान ज़िंदा है 
तभी तक आदमी के जिस्म में इंसान ज़िंदा है।।1।।

बड़े मजबूर हो रहते हैं दो कमरों के घर में अब
अभी भी दिल में बचपन का बड़ा दालान ज़िंदा है।।2।।


नमी दिखती नहीं है अब लबों की मुस्कराहट में
दिलों में आज बस रिश्तों का रेगिस्तान ज़िंदा है।।

भुलाया ही नहीं जा सकता मीरा सूर राधा को
हैं जब तक कृष्ण यादों में तो फिर रसखान ज़िंदा है।।4।।

सनातन सत्य है धरती की खातिर जान दे देना 
अभी भी है जहाँ गोरी वहाँ चौहान ज़िंदा है।।5।।

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 3 मार्च 2026

1222v1222 1222 1222 होली विशेष हज़ल (गज़ल)

1222 1222 1222 1222

कभी साली कभी सरहज, ये रिश्ता ही लुभाता है 
रहे भाभी जो होली में, मज़ा दुगुना हो जाता है।।1।।


नगाड़े ढोल बाजे ले, है टोली फाग की आई
दुपट्टा ओढ़ कर बांके, कमर मोटी हिलाता हैं।।2।।

करे चालू वो गाड़ी को, जो रूठी प्रेमिका सी थी
बिना चाबी लगाए ही, वो  अब गाड़ी चलाता है।।3।।

बनी गुझिया बने पूरन, धरी प्लेटों में सब सज के
हुए मधुमेह रोगी सब, करेला रास आता है।।4।।

चढ़ा है रंग फगुआ का, उमर की बात मत छेड़ो 
चचा सत्तर का नाचे तो, जवां छोरा लजाता है।।5।।

तरही मिसरा:

कभी बचपन कभी यौवन, बुढ़ापा तो लगा हरदम
मगर जो है जवां दिल वो, सदा होली मनाता है।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

सोमवार, 2 मार्च 2026

कहानी - ज़िंदगी धुआँ सी

कहानी - ज़िंदगी धुआँ सी 


मैंने अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ समाप्त करके, सेवानिवृत्ति के बाद इस छोटे शहर में बस जाने का फैसला किया। एक तो छोटे शहर के बड़े होने की उम्मीद हर समय रहती है और दूसरे जीवन उपयोगी वस्तुओं का उचित मूल्य या कभी-कभी सस्ते में मिल जाना सेवानिवृत्त व्यक्ति के लिए फायदे का सौदा होता है। तीसरी बात इस शहर में कोई ऐसी प्रसिद्ध इमारत, स्थल नहीं है जिसके दर्शनार्थ आकर मेहमान घर को लॉज बनाकर रहने लगें। इसका ऐसा अर्थ नहीं कि मैं अतिथि-सत्कार नहीं जानता परंतु बड़े शहर में रहकर, वक्त-बेवक्त बिना पूर्व सूचना के आकर कई दिनों रूकने वालों से अब इस उम्र में परहेज करने को मजबूत था।
मैं, संजीव दयाल और मेरी पत्नी सुलभा हम दोनों ने कई मुद्दों पर एकमत रखते हुए इस स्थान को चुना था। मेरे चुनावी मुद्दे तो मैंने कह दिए, सुलभा ने यहां की शांति और कामकाजी सहायिकाओं की उपलब्धि को पसंद किया। पास ही बाजार दुकान, सर्राफा, मेडिकल स्टोर्स और जनरल फिजिशियन के क्लीनिक इस उम्र में उसे आकर्षित कर रहे थे। खैर, मुद्दे जो भी थे उसमें हमारी इकलौती बेटी उत्तरा और दामाद जी की भी सहमति थी। उनके महानगर से सीधी ट्रेन और बढ़िया सड़क ने इस स्थान के लिए थी, जो उनका और हमारा सम्मिलित मुद्दा था। अपने इस नए घर को अपनी जरूरत और सुविधा के अनुसार सजाने में हम दोनों पति-पत्नी फिर एक बार फिर मशगूल हो गए थे। इस बीच उत्तरा और दामाद जी, दोनों नातियों को लेकर एक बार ही आ पाए थे।
टन-टन, टन-टन, टन-टन मंदिर की घंटियों का स्वर इस गोधूलि बेला में सबके कानों में रस बरसाने लगा। अभी कुछ ही क्षणों पहले सूर्यास्त हुआ है और सूरज ने अपने पीछे कुछ लाल मोती अंबर में बिखेर दिए हैं। बस, अब वही लाल मोती, नीले रंग के साथ मिलकर कुछ श्यामल हुए जा रहे हैं। मैंने अपने के भगवान घर  की ओर कदम बढ़ाए। सुलभा प्रतिदिन दीपक में बाती-तेल डालकर तैयार कर जाती है।
"जब मंदिर से आरती की आवाज आए तो दीपक जला देना। मैं आकर तुलसी में दीपक रख दूंगी।" यह उसके रोज का काम था। मेरी सेवानिवृत्ति के बाद, थोड़ी निवृत्त वह भी हुई थी। घर के पास मंदिर होना, उसकी आकांक्षाओं को साकार कर रहा था।
माचिस की तीली जलाकर, तेल में डूबी बाती के दूसरे सिरे को स्पर्श कराया। शनै-शनै मध्यम पीत प्रकाश फैलने लगा। उसके आलोक में सर्वशक्तिमान ईश्वर की मूर्ति का मुख मंडल दैदीप्यमान हो गया। एक आनंद, एक आकर्षण उनके चेहरे में कि दृष्टि हटती नहीं थी। जगत बनाने वाले इस अप्रतिम कलाकार को मूर्त रूप देने वाले कलाकार की प्रतिभा मानने में मुझे कोई संकोच नहीं था। एक लय, एक समर्पण से जलती बाती अपने जीवन को सार्थक होते देख, बीच-बीच में मुस्कुराती भी थी।
डिंग-डोंग, डिंग-डोंग, डिंग-डोंग, डिंग-डोंग दरवाजे की घंटी बजी। 
 "अरे आज आरती चल ही रही है और सुलभा आ गई।" मन ही मन सोचते हुए मैं दरवाजा खोलने गया। दरवाजा खुला तो सामने करीब ग्यारह-बारह साल का एक लड़का खड़ा था। उसके हाथ में एक थैली थी और उसने तुरंत झुककर थैली से सामान बाहर निकालना शुरू किया। कुछ चार-पांच पैकेट थे जो उसने देहरी पर रख दिए। खड़ा होकर मुझे एकटक देखने लगा जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो कि सामान सही घर, सही आदमी को दिया है या नहीं। 
 मैंने ध्यान से उसकी ओर देखा गेहुँआं रंग, रुखे-उलझे बाल, टी-शर्ट जिसमें कोई कार्टून बना था, घुटने तक की फिट पैंट, पैरों में चप्पल जो एक दृष्टि में लड़कियों की चप्पल लगती थी। गुलाबी रंग की तितली बनी चप्पल मैंने तो किसी लड़के को कभी पहना नहीं देखा था। 
"चप्पल तुम्हारी है?" कैसा बेतुका सवाल पूछा मैंने। 
क्षण भर वो मुझे घूरता रहा फिर बोला, "मानस सोसाइटी वाली मैडम ने अपनी छोकरी की चप्पल दी है गर्मी में मेरे पैर जलते थे इसीलिए।"
"ओह! अच्छा-अच्छा।" मैंने कहा और वह पलट कर जाते हुए बोला,"आंटी ने सामान खरीदा और बोला घर पहुंचा देना, वह मंदिर गई है।" उसने अपनी जेब से एक चॉकलेट निकाली और मुँह में डालता हुआ बेफिक्री से सीढ़ी से उतर गया।
सामान उठाकर मैंने रसोई के प्लेटफार्म पर रख दिया। मेरा मन कहीं उड़ जाने को बेचैन हो रहा था। सांसें कुछ बेकाबू होने लगीं और मैं बालकनी में रखी कुर्सी पर बैठ गया। वह लड़का सामने के गेट को पार करके, सड़क के दूसरी ओर चला गया था। कुछ हल्का सा लंगड़ा रहा था वह शायद उसकी चप्पल बेसाइज़ थी और उसके लिए आरामदायक नहीं थी। 
एक-दो दिनों से मानसूनी बादलों ने मुँह दिखाई शुरू कर दी थी। शाम से ही हवा तेज़ चलती, कुछ धूल के गुबार आसमान की ओर उठते और बचपन वाले की "भूत" का अस्तित्व साकार कर देते। बालकनी से सटा सोसाइटी का आम का पेड़ जिसकी एक बड़ी शाखा हमारी बालकनी पर नत थी। हवा से खिलवाड़ करते आम की शाखों और पत्तों में सरसराना शुरू किया मेरे हृदय की धड़कनों ने भी उस बेचैनी को महसूस किया।
आज उस लड़के के हावभाव, वेशभूषा, उम्र और काम ने मुझे कई सालों पुराने वाक़ये की ओर धकेल दिया। पहली पोस्टिंग थी मेरी। विवाह करके सुलभा को साथ लेकर गया था वहाँ। दूर-दूर बने घर, बीच में बड़े बगीचे और संकरे लंबे मकान। बरामदा, बैठक, बीच का एक कमरा,रसोई, पीछे आँगन, साइड में पानी की टंकी, स्नान घर, बर्तन साफ करने की जगह और पिछला दरवाजा। ग्रामीण बैंक में नौकरी लगी थी मेरी और बैंक के बाबू का मान था उस कस्बे में । पाठशाला के अध्यापकों, सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और बैंक के कर्मचारियों को पूरा गांव पहचानता था।
मैं तो बैंक के कामकाज, स्टाफ के सहयोग से अपने काम को ठीक से करने में लग गया परंतु सुलभा अपने समय का उपयोग मकान को घर बनाने में करती रही। कामकाज में सहायता के लिए उसे हमउम्र उर्मिला मिल गई थी। एक दिन उसके साथ बाजार जाकर सुलभा ने सिलबट्टा खरीद लिया।
"मिक्सी मिली है ना शादी में उसका क्या करोगी?" मैंने पूछा था।
 "मिक्सर में पिसी चटनी बिल्कुल अच्छी नहीं लगती, तो कभी-कभी चटनी और मसाला सिल पर ही पीस लिया करूंगी। अरे, एक्सरसाइज भी हो जाएगी और स्वादिष्ट खाना भी मिलेगा" सुलभा पक्की गृहिणी बनने के राह पर निकल पड़ी थी। 
खैर, सात-आठ महीने हो गए थे और आसपास के लोगों से हमारी जान पहचान भी हो गई।  मैंने लोन पर एक स्कूटर ले ली थी तो पंचर वाला, पेट्रोल पंप, किराने की दुकान, दर्जी सबसे राम-राम हो जाती थी। घर से कुछ दूरी पर एक पुराना होटल और उसी के सामने गन्ना रस बेचने वाला बैठता था। होटल पुरानी इतनी की दीवारों का असली रंग अब अपनी अस्मिता खो चुका था। बेंच और टेबल भी जगह-जगह छिल गए थे परंतु सेवा भाव से डटे थे। काउंटर पर जो बैठता उसके बाल और दाढ़ी का मेल चेहरे पर हो रहा था। आँखों में रंगीन चश्मा लगाए, अपनी तोंद को कमीज़ से छुपाए रखने का भरसक प्रयास करता हुआ वह आदमी हमेशा पान चबाते रहता था। उसके सामने काँच की शो केस में लड्डू, बर्फी, मैसूर पाक, पेड़े और पेठे सदियों से सजे दिखते थे।
ऐसा वर्णन पढ़कर आप यह ना समझना कि वहाँ सिर्फ मक्खियांँ भिनभिनाती थीं, वहाँ ग्राहकों की भी भीड़ हुआ करती थी। हलवाई सुबह-शाम गरम समोसे, कचौड़ी, जलेबी बनाता तो कद्रदान तीन-तीन, चार-चार दोने खा जाते। उसके होटल में साफ-सफाई, बर्तन उठाना, टेबल पर कपड़ा मारने के लिए कुछ तीन-चार लड़के दिखते थे। मैं तो बैंक से आते-जाते कभी-कभी सुलभा के लिए गरम समोसे, जलेबी बँधवा कर ले जाता था। मैं खुद बैठकर कभी नहीं खाता था इसलिए इन काम वालों से मेरा कोई सरोकार नहीं था।
कुछ दिनों से सुलभा की तबीयत ठीक नहीं लग रही थी। चक्कर आने, उल्टी होने से कमजोरी आ गई थी उसे।
"सुलभा, तुम अगर खुद अपना ध्यान नहीं रखोगी तो मैं तुम्हें माँ के पास छोड़ आऊंगा। क्या जरूरत है दिनभर काम करने की और इस सिलबट्टा को तो मैं रख ही देता हूंँ उठाकर।" तीसरा महीना लगने पर मैंने सुलभा को खूब डांटा-समझाया कि वह अपना खुद से ध्यान रखे। 
सहायिका उर्मिला बहुत मदद करती थी। सब्जी-भाजी साफ कर देती, गेहूँ पिसवा लाती और दुनिया जमाने की बातें सुलभा के साथ करके उसको बहलाये रखती थी।  एक दिन सुबह देर तक सुलभा उठी नहीं, मैंने उसे लेटे रहने की सलाह दी और चाय बना कर दिया। बैंक जाते-जाते खुद भी दो समोसे खा लिए और सुलभा के लिए गन्ना रस, कचौड़ी ले जाने की सोचने लगा। 
"कचौड़ी को आधे घंटे और लगेंगे बाबू, आपका घर नंबर बता दो छोकरा दे आएगा।" हलवाई ने कहा। 
मैंने सोचा रुक तो बैंक में देर हो जाएगी और सुलभा ने कुछ खाया भी नहीं है। वह आजकल कचौड़ी बहुत पसंद कर रही है। एक शीशी दिया था उसने कि गन्ना रस ले आना तो शीशी हलवाई के पास छोड़ कर, पैसे देकर मैं बैंक चला गया।
शाम को घर आया तो सुलभा तरो-ताजा लग रही थी।
 बोली, "सुबह की गरम कचौड़ी और गन्ना रस बेहद स्वादिष्ट थे। खाने के बाद मैं सब पचा गई और शाम के लिए कढ़ी-चावल भी बना कर रखें हैं।" मुझे बहुत अच्छा लगा, मैंने कहा, "गन्ना रस पसंद हो तो रोज ही शीशी दे दिया करो मैं शाम को आते हुए ले आया करूंगा।
"भोला ला देगा ना, बहुत अच्छा बच्चा है।"  उसने मुझसे कहा।
 "कौन भोला?" मैंने आश्चर्य से पूछा।
"वही जो कचौड़ी गन्ना रस दे गया था।" उसने बताया।
"तुमने नाम पता भी जान लिया, मैं तो पहचानता भी नहीं।" मैं आश्चर्य से कहा ।
"ग्यारह-बारह साल का बच्चा खाना लेकर आएगा तो क्या उसका नाम नहीं पूछूंगी?  मैंने तो उसे केला भी दिया था पर उसने लिया नहीं।" कहते हुए सुलभा उदास हो गई।
अब कभी गन्ना रस, कभी गरम जलेबी, पोहा जो सुलभा का मन होता, मैं बैंक जाते वक्त पैसे दे जाता और होटल वाला घर पहुँचा देता। सुलभा खुश तो रहती परंतु उस बच्चे के कुछ नहीं लेने से उदास हो जाती थी। "उस लड़के के लिए एक जोड़ी चप्पल या सैंडल ला दोगे, बेचारा नंगे पैर आता जाता है।" एक दिन सुलभा ने कहा। बस वह पीछे ही पड़ गई तो मैं सैंडल की जोड़ी खरीद लाया।
 छठवां महीना था और गांँव में मांँ ने सुलभा के सातवें महीने की गोद भराई का कार्यक्रम रखा था। उनकी चिट्ठी आई थी कि बहू को ले आओ सातवें महीने में बस ट्रेन से यात्रा करना ठीक नहीं होता। हमने सोचा शनिवार-रविवार को गांँव चले जाएंगे और घर में पहले अतिरिक्त सामान को सुलभा व्यवस्थित करने लगी। कुछ बचे हुए मिर्च-मसाले अच्छी तरह से धूप में रखकर वह पैक करने लगी।
सब तैयारी हो गई तब उर्मिला को घर के साफ-सफाई की हिदायत देकर, सभी निर्देश मुझे सुनाकर ही सुलभा ने घर के बाहर कदम बढ़ाया। 
"ओहहो! भोला के लिए सैंडल लाए थे मैं तो देना भूल ही गई और इस सप्ताह हमने होटल से कुछ मंगवाया भी नहीं।" उसके चेहरे पर उदासी और माथे पर बल पड़ गए थे। 
"अब चलो भी ट्रेन का समय हो रहा है वापस आकर मैं दे दूंगा उसे।" मैंने बात संभाली।
आसपास की महिलाओं ने उर्मिला के साथ सुलभा को बाहर तक विदाई दी। उसके मुंँह में दही शक्कर खिलाकर, शुभ समाचार भेजने की बात कही। 
कैसी नियति है ईश्वर की रक्त संबंध तो नहीं होता परंतु रक्त बनाने वाले की सब संतान है यही नाता हमारी संस्कृति का पोषक है। अपनापन, प्रेम भाव की नींव पर ही समाज का सुंदर ढांचा खड़ा है जहां स्वार्थ की रेत आ जाती है तो कंपन जन्म लेता है। सुलभा को छोड़कर दो-तीन दिन में ही मैं वापस आ गया था। उसके बिना घर सिर्फ मकान था, उसकी उपस्थिति का एहसास मुझे हर वक्त होता रहता। मन को समझा लेता कि सुलभा गांँव में परिवार के बीच रहेगी तो उसे अच्छा लगेगा फिर अगले महीने गोद भराई में तो मैं कुछ दिनों के लिए जाऊंगा ही। कुछ ही महीने बाद इस घर में बच्चों की किलकारियां गूंजेंगी। 
दो-तीन दिनों में मुझे आदत पड़ने लगी। सुबह उर्मिला झाड़ू पोंछा कर जाती, चाय के बर्तन धो जाती। मैं कभी चाय के साथ डबल रोटी खा लेता तो कभी बिस्किट का पैकेट खत्म कर देता। कुछ और बनाने का समय ही नहीं रहता था। शाम को दाल-भात या खिचड़ी बनाने में मुझे बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। इस बीच मैंने कई प्रकार की खिचड़ियां बनाईं।
सप्ताह भर बाद मुझे अचानक उसे सैंडल का ध्यान आया। दूसरे दिन बैंक जाते समय मैंने होटल में नाश्ता किया और पैसे देने के समय उस रंगीन चश्मे वाले से पूछा, "वह लड़का है ना जो मेरे घर सामान दे जाता था, क्या नाम है उसका… भोला, उसे आज शाम को घर भेज देना।" रंगीन चश्मे वाले ने मुंँह से कुछ कहा नहीं उसकी तोंड थरथराई तो पता चला वह हंँस रहा है। शाम को मैं घर पहुंचा तो देखा रसोई के फर्श में सारा दूध फैला था। मैंने शायद खिड़की खुली छोड़ दी थी और दूध का पतीला जाली वाली अलमारी में रखना भूल गया था।
"अरे यार! यह तो बड़ा काम हो गया अब इसे साफ करना पड़ेगा फिर खिचड़ी बनाई जाएगी।" ऑफिस के कपड़े बदलकर मैंने लूंगी लपेट ली और पोंछा लगाने लगा। दरवाजे की सांकल खड़खड़ाई।
"अब कौन है भाई इस समय!" मैं लुंगी ठीक करता हुआ बाहर निकला।
सामने वही होटल वाला बच्चा खड़ा था। दुबला-पतला, गोरा परंतु मैला, उलझे रुखे-सूखे बाल जो माथे से लटक कर आंँखों में घुसे जा रहे थे। लाल-धूसर सी कमीज़ जिसके बटन कुछ टूटे, कुछ खुले थे। पेंट तो इतनी चौड़ी कि उसमें उस जैसे दो समा जाएं। मैंने होटल में उसे देखा था परंतु इतने गौर से कभी नहीं। उसकी नज़रें नीचे थीं। मैंने उसे अंदर बुलाते हुए कहा, "तुम्हारे लिए कुछ लाया हूंँ देना था इसीलिए बुलवाया है। अंदर आ जाओ और दरवाजा टिका दो नहीं तो बिल्ली आ जाएगी।" कहता हुआ उसे बैठक में छोड़कर मैं अंदर वाले कमरे में चला गया।
करीब तीन-चार मिनटों बाद मैं वापस बैठक में पहुंचा। वहां का दृश्य देखकर मेरे हाथों से सैंडल का डिब्बा नीचे गिर गया। वह लड़का अपने कपड़े उतार कर, नंगा,  दीवार की तरफ मुंँह करके खड़ा था। मेरे हाथ पैर सुन्न  पड़ गए और शरीर पसीने से नहा गया। मैं उस पसीने के बहाव से बाहर आने के लिए छटपटाने लगा और जितना छटपटाता उतना ही मस्तिष्क विचारों के दलदल में फँसता चला जा रहा था। कुछ मिनटों तक शून्य में विचरते मस्तिष्क को अपनी मास्टरी का ख्याल आया। संवेदनाओं के तार झनझनाए और आदेश जिह्वा पर आ गया।
"क्या कर रहे हो पागल हो गए हो क्या? किसने यह सिखाया तुमको? तुम्हारा नाम भोला ही है ना! उठाओ अपने कपड़े पहनो!"  मैं गुस्से, अनजाने भय और दुख से उस लड़के पर चिल्लाया।
दो मिनट तक सब कुछ शांत रहा। मैं सिर पर हाथ रखकर सोफे पर बैठ गया। वह धीरे-धीरे मेरे करीब आया और उसने पैंट पहन ली। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, दृष्टि ऊपर की ही नहीं थी उसने। पूरे कपड़े पहनकर सर झुकाए खड़ा था।
" तुमने ऐसा क्यों किया? पहले भी ऐसा किया है कभी?"  मैंने दूसरा प्रश्न क्यों पूछा पता नहीं। उसके यंत्रवत व्यवहार से एक वयस्क आदमी कैसे पूछ सकता था यह प्रश्न।
"हांँ।" पहली बार उसने मुंँह खोला। नज़रें अभी भी नीचे जमीन पर थी।
"क्यों? कौन बोलता है करो, मैंने तो कुछ बोला ही नहीं और तुमने कपड़े उतार लिए। ऐसा कौन करता है?" मैंने कुछ आवेश से कहा।
"जो मुझे कुछ देता है वह सब लोग ऐसा करते हैं।" उसका स्वर सपाट था।
 "ऐसा कौन बोलता है बताओ मुझे।" मैं सब कुछ जान लेना चाहता था। 
वह चुप था। मैंने उसे पास बुलाया और सोफे पर बिठाया। मेरी उंगलियांँ उसके बालों पर फिरने लगीं। मेरी आंँखों से आंसू टपक कर उसके रूखे बालों को नम कर रहे थे।
"हे ईश्वर! इतने छोटे बच्चे पर इतना अत्याचार! कैसे और कब तक सहेगा यह?" मेरे दिल ने भी आँसू बहाना शुरू कर दिया था।
वह खड़ा हो गया। 
"मालिक को क्या बोलूं?" उसका कातर स्वर मेरे दिल में कतरा-कतरा कर टपकने लगा। 
"तेरे मालिक को सब पता है? वह रंगीन चश्मे वाला आदमी ना?" मैंने उससे पूछा।
"हाँ। वह मेरी सौतेली मांँ का यार है।  वही गांँव से लाया मेरे को। तीन-चार और लड़के हैं उसके पास। आपसे कल रुपया मांगेगा नहीं तो मेरे को खूब मारेगा। होटल में आपने ही मुझे शाम को भेजने कहा था ना।" पहली बार उसने नज़रें उठाईं।
सफेद आँखें लगता था पानी जमकर बर्फ बन गया है और कुछ समय बाद पुतलियांँ भी हिमखंडों में धंस जाएंगी।
 "क्या करूं, यह कैसी विडंबना आ गई भगवान!"  मैंने दिमाग पर जोर दिया और उस बच्चे से कहा, "तुम्हें तुम्हारा नाम, गांँव, पता सब मालूम है ना,  हम पुलिस के पास जाएंगे।"  एक आशा की किरण थी।
"हम तीन-चार लड़के हैं तो पुलिस वालों के पास रोज एक जाता है। वह मालिक फोकट में मिठाई-नमकीन हमारे से भेजता है पुलिस के पास।" उसकी आवाज ने सारे रास्ते बंद कर दिए।
अब मुझे अपनी नौकरी, अपनी इज्जत, इस कस्बे में अपने परिवार को रखने की सोच कर ही निर्णय लेना था। आखिरकार, मैं भी साफ-सुथरी छवि बनाए रखने वाला, पारिवारिक, संस्कारी आदमी होने में ही भलाई समझता था।
 "अपने मालिक से कहना कि मैं घर पर नहीं था। भाग जा, यह सैंडल ले जा मैडम ने तेरे लिए मंगवाए थे और दोबारा कभी इस घर में मत आना।" मैंने सैंडल उसके हाथों में पकड़ाया और उसकी ओर पीठ करके खड़ा हो गया। कुछ देर बाद दरवाजा खुलने और फिर बंद होने की आवाज आई। गेट की हल्की सी चरमराहट भी मुझे सुनाई दी।
मैं थोड़ा सा दरवाजा खोला और बाहर देखा। सड़क की बत्ती में उसे एक नियंत्रित मशीनी-चाल से चलते हुए अंधेरे में विलीन होते देखा। मेरे जीवन में भूकंप आया था इसके झटके शायद कई सालों तक मुझे हिलाते रहेंगे। उस रात मैंने छटपटाते हुए बिताई। मन में डर भी था कि वह मोटे रंगीन चश्मे वाला मुझ पर कोई आरोप ना लगा दे। सुबह-सुबह जब नींद लगी तो दूधवाले ने सांकल खटखटाई। 
नींद में  ऊंघता, बर्तन लिए मैं दूध लेने लगा।
"कल से दूध मत लाना। आज तक का पैसा ले जाओ, गांव जा रहा हूंँ। आने के बाद उर्मिला से खबर भेज दूंगा।" मेरे मुंह से निकलता गया। पैसे लेकर डिब्बा उठाए वह चला गया।
बैंक में मैंने सुलभा की तबीयत खराब होने की बात कहकर, गांँव जाने की तैयारी कर ली। शाम को सब पैक करके उर्मिला को बाहर आंँगन की सफाई करने की बात समझा कर मैं बस से निकलने के लिए तैयार ही था कि आंँगन में वह लड़का खड़ा था। उसकी नज़रें मुझ पर टिकी थीं। मैं एक क्षण के लिए घबरा गया था। उस एक क्षण में कई विचार मेरे मन में तूफान उठने लगे थे। 
"मैंने मालिक से बताया कि मैडम ने मुझे यह सैंडल दी है आप घर पर नहीं थे। मालिक ने मुझे चैक किया और आपको गंदी गालियां दी कि आपने उसकी कमाई खराब कर दी।" उसने वह सैंडल अपनी छाती से लगा लिया जैसे कोई नायाब हीरा मिल गया हो। उसके आंँखों की बर्फ पिघलने लगी थी। पुतलियांँ नमी में नहाकर चमकने लगी थीं। वह चला गया। मैं भी बस में बैठकर गांँव आ गया। मेरे अनमने रंग-ढंग को देखकर भाभी और चाचियांँ मुझे ताने मारने लगीं। सुलभा ने भी गुस्सा किया,  "इतनी जल्दी क्यों आ गए? यहां सब क्या बोलेंगे?"
किसी को क्या समझाता, कैसे बताता मेरी मानसिक स्थिति मुझे परेशान कर रही थी। गांव में ही रहते हुए मैंने स्थानांतरण की अर्जी भेज दी। सुलभा की अवस्था, पारिवारिक ज़िम्मेदारियों का हवाला देकर तीन-चार महीने बाद मुझे दूसरी जगह का आदेश मिल गया। इस बीच में बैंक के किसी बैचलर मित्र के यहां रहकर समय निकलता और बैंक के कुछ जरूरी काम निपटा कर वापस गांँव आ जाता था।
उत्तरा के जन्म के बाद मांँ को साथ लेकर हम पोस्टिंग वाली नयी जगह चले गए। सुलभा बच्ची के पालन-पोषण में व्यस्त होती गई और मैं अपने बैंक के कार्यभार में। समय ने उस घटना को धुंधलाना शुरू कर दिया था। 
"उत्तू के लिए चींचीं बजने वाली सैंडल लाना है, चलेगी तो खूब मजा आएगा।" सुलभा ने कहा और अचानक उसे कुछ याद आया। 
 "भोला के लिए सैंडल लाए थे, दिया था उसको? बेचारे के नंगे पैरों को देखकर बहुत बुरा लगता था तुमने?" वह भोला और उर्मिला को याद करने लगी। 
 "दे दिया था, बहुत खुश था वह।" मैंने कह तो  दिया परंतु उस घटना का जिक्र मैंने सुलभा से कभी नहीं किया। जो भोला के पैरों के जलन, उसके दुख से दुखी हो जाती थी, उसके अंग-अंग के दोहन का सुनकर शायद दिमागी संतुलन ही खो देती।
 "डिंग-डोंग, डिंग-डोंग!" डोर बेल बजी और मैं आज की दुनिया में वापस आ गया। 
दरवाजे से घुसती सुलभा बड़बड़ाई , "पाँच-छह बार घंटी बजाई पर तुम्हें सुनाई ही नहीं देता।" वह बाथरूम की ओर बढ़ गई।
 "बालकनी में बैठा था, यहां आवाज कम ही आती है ना।"  मैंने उत्तर दिया।
तुलसी के पास दीपक जलाती हुई वह बोली, "मंदिर जाते समय कुछ किराना सामान लेकर भेज दिया था जीतू से, लाया था ना?" उसने पूछा।
 "दे  गया था और अब किसी से घर तक सामान मंगवाने की जरूरत नहीं है। मैं रिटायर हो गया हूंँ खुद ले आऊंगा।  महीने भर के लिए सामानों की सूची बना लिया करो, सब ले आएंगे एक साथ यदि कुछ कम पड़ता है तो मैं ला सकता हूंँ।"  मैंने अपना निर्णय रख दिया।
 मेरे सेवानिवृत्त जीवन में काम की जरूरत को समझ कर, दीपक के आलोक में सुलभा के हल्के झुर्री पड़े गाल अनायास ही फैल गए।
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रविवार, 22 फ़रवरी 2026

अब तक प्रकाशित एकल एवं साझा साहित्य, प्राप्त पुरस्कारों का विवरण।

जीवनवृत्त (सहपत्र)

९ . अब तक प्राप्त पुरस्कारों का विवरण -

2020-21 "मुट्ठी भर क्षितिज" कहानी संग्रह को अखिल भारतीय लेखिका संघ म.प्र. द्वारा गिरजावती देवी पुरस्कार।

2023-24 "मुट्ठी भर क्षितिज" कहानी संग्रह को स्व. सिद्धार्थ वाटवे स्मृति विद्योत्तमा साहित्य शिरोमणि सम्मान नासिक महाराष्ट्र में प्राप्त।

2025 कथा समवेत अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता सुल्तानपुर में कहानी "गंध" को प्रथम पुरस्कार।

2025 शब्द निष्ठा लघु कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत।

2024 विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान दिल्ली द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में कहानी "दायरे" पुरस्कृत।

2024 "रोशनी की अमरबेल" कहानी संग्रह को क्षितिज कृति सम्मान।

2024 सुरेश शर्मा स्मृति सम्मान क्षितिज साहित्य संस्था इंदौर द्वारा प्रदत्त।

2023 निरंजन जमींदार स्मृति लघुकथा सम्मान क्षितिज साहित्य संस्था इंदौर द्वारा प्रदत्त।

2023 सिरसा हरियाणा द्वारा सुगनचंद मुक्तेश स्मृति लघुकथा सम्मान में लघुकथा "किरायेदार" को प्रथम स्थान प्राप्त।

2023 अहिल्यानगर महाराष्ट्र में लघुकथा "बदलते ज़ायके" को आचार्य जगदीश चंद्र स्मृति लघुकथा पुरस्कार प्राप्त।

2022- साहित्य समीर दस्तक पुरस्कार भोपाल प्राप्त।

"हकीकत" को श्रीमती कृष्णा देवी सारस्वत लघुकथा सम्मान भोपाल प्राप्त।

अंतरा समूह लेखन स्पर्धा में पुरस्कृत।

2021 कथा दर्पण साहित्य लघुकथा में लघुकथा "शक्ति" को प्रथम पुरस्कार।

2020 अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता में "सोंधी महक" को प्रथम पुरस्कार प्राप्त।

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 जीवनवृत्त (सहपत्र)

८ . प्रकाशित साहित्य - 

एकल संग्रह -

2019-  मुट्ठी भर क्षितिज (कहानी संग्रह)

2024- रोशनी की अमरबेल (कहानी संग्रह)

2024- सोंधी महक (लघुकथा संग्रह)

प्रकाशनाधीन -

 काके लागूं पाय (व्यंग्य संग्रह)
गंध (कहानी संग्रह)

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साझा संकलन -

2025- "आरथ अमित अति" 100शबदों की लघुकथाओं का संकलन।
लेखनी महोत्सव 25 में लघुकथाओं का साझा ई-संकलन।

2023- "काम जु आवै कामरी‌" मुहावरों की लघुकथाओं का संकलन।

 लघुकथाएं: इक्कीसवीं सदी के दो दशक।

"बोझ हम उठाते हैं" ( कुली जीवन पर संकलन)

2022- "हिंदी हाइकु कोश" संकलन।
 "आगाज़" साझा ग़ज़ल संकलन।
 "कतौता की कलियांँ" संकलन।

2021- "ज़िंदगी ज़िंदाबाद" कोरोना काल पर संकलन।

 "विभाजन त्रासदी की लघुकथाएं" संकलन।

 "समसामयिक लघुकथाएं"  संकलन।

2020- "सेदोका की सुगंध" संकलन।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

खुली फाइल पड़े छींटे (अट्टहास हेतु)

खुली फाइल, पड़े छीटे 

रंग, गुलाल के साथ कीचड़ के छीटे तो आम आदमी रोज ही झेलता है और इससे ज़्यादा रंगीनी उसके क्लास में फिट नहीं बैठती। खास लोगों को खास प्रकार के छींटों से सज्जित होने की आदत होती है जब तक छींटों की बौछार ना हो वो खास किस्म की कैटेगरी में नहीं रखे जा सकते। समाचार-पत्रों, टेलीविजन और सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके खास जीवन के रंगों की झलकियांँ देखने वाला आम आदमी ही होता है।‌आम लोगों की तरह आम दाग, धब्बों से परहेज करने वाला खास वर्ग के दागों की महिमा भी उनकी तरह अपार होती है।

अक्सर होली के रंग-बिरंगे त्यौहार पर साफ-सफेद कपड़ों में, चुटकी भर रंग चिपकाए घूमने वाले लोगों को, बड़ी फ़ाइलों, बड़े केस के खुलने से लगने वाले छींटे पसंद आते हैं। कोई सामान्य थोड़े ही हैं कि बस पोत लिए रंग, गुलाल दस-बीस रूपयों का और बन गए रंगीला रे। रंगीलेपन के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, तुम क्या जानो आम आदमी। 

बांकेलाल भी आम आदमी ही थे। होली के दो दिन पहले सड़क पार करते समय, पीठ पर फचाक..करता गुब्बारा फूटा। तैश में आकर हाई वाल्यूम में चिल्लाए, "अभी से रंग मार रहे हो, हिम्मत है तो सामने आओ। पीठ पर वार करते हो।" उन्होंने सारी कोशिशें कर लीं कि कमीज़ किस रंग से रंगी है देख पाएं परंतु असफल रहे। मन ही मन खुश हो रहे थे कि अभी पचास की उम्र में भी उनको रंगने वालों की कमी नहीं है। आम आदमी तो चंद रंगों से भीगकर ही, खुशी से पूरा जीवन निकालने के लिए पैदा होता है। 

घर पहुँच कर अपने रंगने के रंगीन किस्सों का रंग, पत्नी पर चढ़ाते कि सामने का दृश्य देख बांकेलाल का रंग उतर गया।
"होली पर दीवाली की सफाई क्यों कर रही हो?" आलमारी की सारी डायरियांँ, पुरानी नयी फाइलों का ढेर लगाए बैठी पत्नी से बांकेलाल ने पूछा।
"सफाई तो करनी ही पड़ेगी ना, ना जाने किस फाइल में क्या मिल जाए?" उसकी आँखों के पैनेपन‌ ने बांकेलाल को और खास बना दिया। किसी की फाइलें निकाली जाए, जाँच-पड़ताल हो, आस-पड़ोस में कुछ कानाफूसी हो, आम आदमी बैठे ठाले खास बन जाता है।
खास किस्म की दबी-छुपी फ़ाइलों के पन्ने बाद में खुलते हैं पहले उनके खुलने का संदेश, सोशल मीडिया पर वाइरस की तरह वाइरल हो जाता है।‌ हर चैनल, हर पोस्ट अपनी अपनी रंगीन कहानियों का पिटारा खोले, टी.आर.पी.और लाइक्स कमेंट्स बटोरने में लग जाते हैं। 
बांकेलाल की पत्नी ने डायरियों के पन्ने खोले और व्रत त्यौहार की कथा की तरह बांचने लगीं। पोंछा लगाती सहायिका, बच्चों के ट्यूशन टीचर खड़े होकर चटकारे लेकर, बांकेलाल जी के अतीत का स्वाद चख रहे थे।

"पुरानी बातों को क्यों पढ़ रही हो, दूसरे की डायरी पढ़ना सभ्यता नहीं है।" बांकेलाल ने डायरी छीनते हुए कहा।
"तुम आदमियों को अच्छी तरह समझती हैं औरतें, कितने दिनों दौरे में निकालते थे, भूली नहीं हूँ।" बड़बड़ाती हुई वो बिस्तर पर मुँह लपेटे सो गईं।

खास किस्म के लोगों की, खास समय, खास अवसर की विदेश में फाइल क्या खुली, छोटे बड़े सरकारी, गैर-सरकारी कार्यरत, सेवानिवृत्त सभी आम लोगों के जीवन में झांकने वालों की संख्या में अकस्मात इजाफा हो गया।

सात दिनों तक की बढ़ी टी. आर. पी. ने, टेलीविजन के समाचारों को फुल टाइम उस फाइल का कवर पेज बना दिया। उसका असर आम आदमी की जिंदगी को बदरंग कर देगा, बांकेलाल से बेहतर कौन समझ सकता है। दूसरों की खुलती फाइल ने उनकी होली में संदेह की फुलझड़ी, आरोपों के फटाके फोड़ दिए हैं।

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सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

चुनावी बिगुल पर लुढ़कते लोटे..नई दुनिया अधबीच रायपुर 17/2/2026

चुनावी बिगुल पर लुढ़कते लोटे


ताँबे, पीतल, कांँसे और स्टील के लोटों की तरह, अपनी विशिष्टता लिए बिना पेंदी के लोटे, चुनावी समर के पालों में लुढ़कते देखे जा सकते हैं। गुणवत्ता के मामले में पानी से भरते ही डोलने वाले इन लोटों से स्थिर सरकार की इच्छा रखना, जनमानस की मृगतृष्णा वृत्ति का एक बढ़िया उदाहरण है। खेतों में सुबह-सुबह फारिग होने के लिए भी बिन पेंदी के लोटे साथ लेना, आने वाली विपदा को बुलावा देना है। अपना मत देकर अपने पाँच साल इनको सौंपना, कितनी विपदाओं को  आमंत्रित करना है, समझा जा सकता है।

 इस गुणवत्ता से परिपूर्ण बांकेलाल ने पिछली पार्टी छोड़ दी और इस पार्टी की ओर लुढ़क गए। कार्यक्रमों में दरी बिछाने से लेकर नेताजी की कार का दरवाजा खोलना, रात-रात भर गाँव शहर की गलियों की धूल छानने से मंच का संचालन करना और सबके आगे-पीछे चिपककर फोटो खींचवाने वाले कर्मठ, वाकपटु बांकेलाल को जब पार्टी टिकट नहीं मिली तब उन्हें दूसरी ओर लुढ़कने में अपने भविष्य नज़र आया।

नगरपालिका के चुनावों की घोषणा हुई और नुक्कड़ की टपरी पर, चाय सुड़कते बांकेलाल ने हमें रोक लिया।

"इस बार जीत गई पार्टी तो ये कचरे का ढेर, खुला नाला, पीने के पानी की समस्या दूर हो जाएगी।" उन्होंने गर्दन लचकाई।
"आपकी पार्टी का चिन्ह घोड़ा है ना।" हमने पक्का किया।
"अजी घोड़ा अमीरों की शान है। हम तो गरीब, साधारण लोगों के आदमी हैं तो हमने वो भाई-भतीजावाद वाली पार्टी ही छोड़ दी। अब हमारी पार्टी का चिन्ह है..।" दूर चरती भैंस की ओर उन्होंने अँगुली दिखा दी।
"अच्छा।" हमारे नैन पिटारे के ढक्कन से खुल गए।

पहली पार्टी गुलाब चिन्ह को त्याग घोड़े की ओर लुढ़के अब भैंस पर रीझे बांकेलाल ने भैंस के लाभ, उसकी ग्रामीणता संग पार्टी को जोड़ने का अद्भुत प्रयास किया।

टपरी पर मजमा जमाकर उन्होंने भैंस को राष्ट्रीय प्राणी घोषित कर दिया।
चुनाव सिर पर खड़ा हुआ और गली-मोहल्लों पोस्टरों से सज गए। बेरोज़गारी इन दिनों दुम दबाए, मुँह छिपाए बैठी थी।

 समोसा, कचौड़ी और शाम को मिलने वाले सौ रूपयों ने इलाके के सभी नवजवानों की बेरोजगारी समाप्त कर दी थी।

जिसकी दीवारों, छतों पर  जिस पार्टी का बैनर, पोस्टर फड़फड़ाता, उसकी जेब में नोट भी फड़फड़ाते। कई घरों की दीवारें एक साथ दो-दो, तीन-तीन उम्मीदवारों के पोस्टर सीने से लगाए, घर मालिक की जेबें भारी कर रही थीं।

पोस्टरों के बाज़ार में, कोने की जगह में बाँकेलाल की तस्वीर नज़र आई।  चुनाव चिन्ह देखकर हमने चश्मा साफ किया। भैंस की जगह चूहा देखकर, हमें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। 

उनके द्वारा प्रदत्त रोजगार वाले दो युवक, आटो रिक्शा पर चिल्लाते हुए घूम रहे थे।

"इस क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी बांकेलाल जी को, गणेश जी के वाहन  'चूहा' निशान पर वोट देकर विजयी बनाइए।" 

गुलाब से घोड़ा, घोड़े से भैंस और अब चूहे पर लुढ़कते इस पोस्टर पर चिपके बांकेलाल, शायद इस नये चिन्ह पर विरदावली तैयार करने में जुट गए थे।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

जोगीरा..होली

होली पर जोगीरा


1.फागुन में फगुनाता आया, छैला बांकेलाल।
कहीं निगाहें कहीं निशाना, डगमग होती चाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

2 .मंद हुई है गुंडागर्दी, बढ़ता यूपी आज।
दुनिया देख रही है सारी, बुलडोजर का राज।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

3 . जमकर ढ़ोल बजाता आता, हर मौसमी चुनाव।
जनता सब कुछ जान गई है, उल्टे पड़ते दाँव।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

4 .पीकर भांग मस्त चुन्नू ने, कुत्ते से की बात।
 तू तो जंगल का था राजा, कबसे बदली जात।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

5 .रासरंग में डूबे बांके, रंग लगाते लाल।
बीबी नहीं पड़ोसन थी वो, सिर पर बचे न बाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा...

6 . भारत की इक ओल्ड पार्टी, जाती हार चुनाव।
ईवीएम को दोषी कहती, डूबी उनकी नाव।
जोगीरा सा रा रा रा रा..

7 .नया बखेड़ा रोज उठाते, बांके जी का जोश।
हाथ जेब में डाले रहते, दुनिया का ना होश।
जोगीरा सा रा रा रा रा..
8 .तंत्र बुद्धि से खींची फोटो, खूब मारते शान।
पास दिखे पहचान न आए, झूठा गढ़ते ज्ञान।
जोगीरा सा रा रा रा रा..
9 . मुँह पर रंग लगाकर आए, घर में बांकेलाल।
भैया कहती आई पत्नी, होली बड़ी कमाल।
जोगीरा सा रा रा रा रा...

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

रंग ले चुनरिया - व्यंग्य

रंग ले चुनरिया (व्यंग्य यात्रा के लिए भेजी)


फागुन का खुमार प्रकृति की हर चीज़ पर हावी था। पेड़-पौधों, मौसम ने होली का रंगीलापन शुरू किया तो बांकेलाल भी, फगुनाई की बयार से बौरा गए। टेलीविजन चालू किया तो लोकसभा में विराजमान  खास सभासदों के बीच, छींटें-बौछार का नज़ारा देखने को मिला। एक ने उठकर सामने बैठे विपक्षी के तीन-चार पीढ़ियों तक रंग डाल दिया और खुद बेदाग बैठ गए।

मेजों पर हाथ पटककर, आने वाली होली के ढोल-नगाड़ों का पूर्वाभ्यास, ललामी पर था। कुछ अपने मन की भड़ास निकाल कर, जेब में हाथ डाले घर की चाबी खोजते तुरंत निकल गए। 
पक्ष-विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप के गुब्बारे फेंके जा रहे थे जिन्हें कभी-कभी सामने बैठे स्पीकर महाशय पकड़ लेते। अक्सर तो इन गुब्बारों से बचकर वो भी बेदाग दिखने को लालायित रहते। इस भवन में कई रंगों की चूनर लहरा रही थी। भगवा, हरी, नीली के बीच तीन रंगों की वो चूनर जो माँ भारती को पसंद है, कहीं दब गई थी।

रोज-रोज की चिल्ल-पों से परेशान पत्नी ने तीखी बौछार की, "दिन-रात इनकी महाभारत में बैठे संजय की तरह कॉमेंट्री करते हो, जरा कभी कुछ अच्छा भी देख लिया करो।" बांकेलाल ने आज्ञा का पालन करते हुए चैनल बदला तो समाचार लग गया।
तूफानी गति से शब्दों की बरसात करते उस प्रवक्ता की सांसें फूल रही थीं। बांकेलाल को लगा कि उसका विकराल रूप, उनकी ही  धड़कन बंद ना कर दे, उन्होंने झट चैनल बदल दिया।

सामने मंच पर कवि जाति के चार लोग बैठे थे। प्रायोजित कार्यक्रम में श्वेत कुर्ता, गालों पर करीने से लगाया लाल, गुलाबी और पीला रंग, होली की वास्तविकता से दूर फिल्मी लग रहा था। सामने प्लेट में ए.आई. से बने सजे गुझियों को देखकर पत्नी भिनभिनाईं।

"औरों के घर बन गए गुझिया, हमारे यहाँ तो बस अकेले मरो खपो।" फिर कहने लगीं, "तुम्हारी कविताओं से कम परेशान हैं क्या हम, जरा कुछ ढ़ंग का लगाओ।" 

अच्छे चैनल, अच्छा समय, अच्छा कार्यक्रम, अच्छे दिन को तलाशते बांकेलाल ने एक चैनल पर विराम लिया।
सामने हीरो-हीरोइन बगीचे में होली की धूम मचा रहे थे। हीरो की पत्नी‌ और हीरोइन का पति, दोनों की इस मस्ती में कभी इसको देखते कभी उसको। बांकेलाल को लगा यही हाल देश की जनता का है जो कभी सरकार की बातों पर मुड़ती है तो कभी विपक्षी दल की ओर देखती है।
"ये फूहड़ गाना लगाकर क्या दिखाना है। बताओ, पत्नी सामने बैठी है और दूसरे की बीबी को रंग लगा रहा है।" बांकेलाल की पत्नी गुर्राई।

बांकेलाल कोई बहस नहीं चाहते थे। बस चैनल बदलने ही वाले थे कि बिजली बंद हो गई। आसपास सबके घर टेलीविजन चालू देख, बांकेलाल के दिमाग की बत्ती जल गई। पिछले दो महीनों से बिजली बिल भरा नहीं था उन्होंने, चप्पल पहने और तुरंत बाहर हो गए।
"अंकल, नगरपालिका के चुनाव में जीत गए तो अगले साल पूरे वार्ड के‌ लिए होली का आयोजन करवा देंगे। खाना, गाना और पीना भी फ्री..!" उस नवयुवक ने रंग-बिरंगा जाल फेंका।
उस रंग-बिरंगे जाल को अपनी झक सफेद बत्तीसी से काटते हुए बांकेलाल मंजिल की ओर बढ़ गए।

बिल भरकर बांकेलाल ने कर्मचारी से कहा, "बिल तो भर दिया, तुरंत बिजली चालू करवा दो। त्यौहार का समय है।" 
"आपने दो महीने सोचा फिर पैसे भरे, हमको दो दिन की तो मोहलत दो।"  कर्मचारी को भी तो रंगारंग होली करने का अधिकार था।
"दो दिन क्यों भाई, जैसे काटा वैसे जोड़ दो‌ अभी।" बांकेलाल अर्दली की तरह मिमियाने लगे।

"काटने और जोड़ने में फ़र्क है साहब।" उसने दार्शनिकता की चूनर ओढ़ ली थी।‌ 
"बिजली चालू करने वाला आज छुट्टी पर है।" काउंटर पर बैठे उस कर्मचारी ने बेफिक्री से कहा।
"कमाल करते हो, एक आदमी पर पूरा बिजली विभाग टिका है क्या?" बांकेलाल का रंग गुस्से से बदलने लगा।
"साहब, एक आदमी पर पूरा देश टिका है। दूसरे आदमी पर पूरा विपक्ष टिका है तो क्या बिजली विभाग इस देश से बाहर है?" अब उसकी चूनर विशुद्ध राजनैतिक थी।

"अर्जेंट हो तो पूरे हजार लगेंगे, आपके घर पहुँचने से पहले, महंगाई की तरह तेजी से दौड़ती बिजली पहुँच जाएगी।" वह जीते हुए उम्मीदवार की तरह मुस्कुरा रहा था।
पत्नी का कुपित चेहरा ध्यान आते ही बांकेलाल ने जेब से गुलाबी रंग की शॉल वाले तीन बापू, नीले रंग से सजे चार निकालकर काउंटर पर रख दिए। बापू को सफेद रुमाल में लपेटकर फौरन उसने जेब के हवाले कर लिया। 
"वाह बापू, लकड़ी टेककर, सहारा लेकर चलते थे लेकिन अब तो सरपट एक जेब से दूसरी जेब में भागते हो। लगता है मेरी जेब आपको आरामदायक नहीं लगी।" मन ही मन सोचते बांकेलाल घर की ओर वापस हुए।

रास्ते में मिठाई की दूकान देखकर जेब टटोली। एक गुलाबी बापू अभी भी पैर जमाए मिले। 
"लड्डू कैसे भाई?" बांकेलाल ने मिठाई वाले से पूछा। 
"शुद्ध घी के बारह सौ  रुपए किलो, दूसरे हजार।" उसने बताया।
"बाप रे बाप, दो महीने पहले तो दाम आधे थे।" बांकेलाल की आँखें रसगुल्लों की तरह फ़ैल गई।
"बजट देखा ना आपने, किस चीज में कमी मिली जो आपको मिठाई कम में चाहिए।" बेफिक्री से बोला, "जो चाँदी का वर्क लगा हुआ लड्डू है उसका तो आप दाम ही मत पूछो। वह आपके जेब का नहीं है।"  आम आदमी की जेब का पता उसके चेहरे से हो जाता है।

गुलाबी बापू को सीने से लगाए बांकेलाल घर आ रहे थे। सोसायटी के लोगों ने घेरकर प्रश्नों की बारिश कर दी।
"आपने होली के आयोजन का पैसा दिया?" एक बोला।
"आप तो रंग स्पांसर करने वाले थे ना, आज शाम तक दे दीजिएगा। कल सुबह से ही ड्रम में घोल देंगे।" दूसरे ने कहा।
"कौन-कौन सा रंग लाना है?" बांकेलाल पूछने लगे।
"जिस रंग में आप अपने को रंगे देखना चहते हो, वही ले आना।" पहले ने कहा। 
घर आते हुए, खूबसूरत रंगों की दुनिया में विचरते बांकेलाल, सोसायटी के फैले पानी पर फिसल गए। चेहरे का रंग धूसर, श्यामल हो गया।
घर का दरवाजा खुला तो पत्नी टेलीविजन पर चलते गाने के साथ सुर मिला रही थी।
"लाल ना रंगाऊं मैं हरी ना रंगाऊं, श्याम रंग में रंग दे चुनरिया..।" 

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

लघु कहानी - बदलाव

कहानी - बदलाव 


जब से लड़कियों ने क्रिकेट का बल्ला दुनिया में घुमाया, तीन बच्चों की अम्माँ सुनीता का मन भी अपनी दोनों बड़ी बेटियों के प्रति पलटने लगा है। अब अपने दिल का दस प्रतिशत टुकड़ा, वो छोटी संतान और इकलौते बेटे हीरा के मोहजाल से निकाल कर दोनों बेटियों सोना और नीलम को देने की कोशिश करतीं।‌

"स्कूल में खेलकूद और पी.टी.का पीरियड होता है ना?" खेलकूद के नाम से चिढ़ने वाली अपनी अम्माँ का रंग बदलते देखा, बेटियांँ आश्चर्य करतीं।
"अम्माँ, सप्ताह में दो बार ही होता है पी.टी.और खेलकूद का पीरियड। आपसे जूते लाने को कहा तो वो तो मंगाती नहीं हो, हम दोनों को डाँट पड़ती है।" छोटी बेटी नीलम ने कहा।
"तुमसे तो बात करना पाप है, रोज नयी चीज़ चाहिए दोनों को।" कहती हुई अम्माँ सात साल के हीरा को मुनक्का डला दूध पिलाने लगी।

चौदह की सोना और बारह की नीलम बताना चाहती थीं कि ऐसा दूध उनके लिए भी जरूरी है। साथ की बाकी लड़कियाँ बोर्नविटा, बूस्ट डालकर रोज दूध पीती थीं पर उनकी अम्माँ समझती ही नहीं।
अब तीन बच्चों की अम्माँ सुनीता समझती तो सब थी परंतु नौकरीपेशा पति की सीमित कमाई में क्या-क्या पूरा करती।  इकलौते बेटे हीरा को वंश का दीपक जानकर उसे ही मेवा, दूध दिया करती। आखिर बेटियों को तो ब्याह कर दूसरे घर जाना है।

सोना और नीलम, बहुत होशियार, सुंदर, सुगठित देह की लड़कियां हैं।‌ पहले तो अम्माँ खेलकूद की सख्त विरोधी थीं और अब क्रिकेट खेलने के पीछे पड़ गईं हैं।

"दीदी, मुझे क्रिकेट अच्छा नहीं लगता। मुझे खो-खो, कबड्डी पसंद है परंतु अम्माँ खेलने ही नहीं देती।" नीलम ने कहा।
"पहले तो जूते और कपड़े लेने के डर से हमें खेलकूद प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लेने देते थे, अब क्रिकेट के भक्त बन गए। लगता है कि बस आज खेलो कल पैसे मिल जाएंगे।" सोना ने छोटी बहन को बताया, "मालूम कोच सर ने सबको क्रिकेट किट लेने कहा है। अच्छे जूते, बैट सब कितना महंगा है।" बेचारी बढ़ती बच्ची अपने घर का बजट समझती थी।

ऐसा नहीं है कि उन दोनों को अपने घर परिवार में अपने लिए लड़ना पड़ता था, आस-पड़ोस भी मौके के ताक में रहते।
"सुनीता, तेरी बेटियों की कद-काठी तो बड़ी अच्छी है।‌ अभी से सत्रह-अठारह की लगती हैं। संभालना, आजकल जमाना अच्छा नहीं है।" पड़ोस की शर्मा आंटी जब-जब लड़कियों को देखतीं, अपनी चिंता जाहिर कर देतीं।‌

सोना और नीलम मन मसोसकर रह जातीं। कई बार मुँह तक आ जाता कि कह दें, "आंटी जी, अपने बेटे की फ़िक्र करो जो लड़कियों के स्कूल के पास खड़ा हर लड़की को छेड़ता है। चार दिनों पहले ही उसकी जमकर पिटाई की थी लड़कियों ने।" 
बोलते तो अम्माँ बवाल कर देतीं।
लड़कियों को सलाह देने वाले, रोक-टोक करने वालों की कभी कमी नहीं होती। बालिका से किशोरी होती लड़कियों के शारीरिक बदलाव, बदलती जरूरतों के कारण वे सबकी दृष्टि के केंद्र में रहती हैं।

समय के साथ सुनीता ने लड़कियों की ओर से ध्यान हटाकर, बेटे के पालन-पोषण की ओर केंद्रित कर लिया था। उसके लिए अँग्रेजी ट्यूशन, रोज उबला अंडा और दूध, रात को भिगोया बादाम, मुनक्का नियमित करने के लिए, सुनीता ने अचार बनाकर बेचने का घरेलू काम भी शुरू कर दिया।

पिताजी सब कुछ समझते थे परंतु अपनी कमाई की सीमाएं जानते थे। बड़ी होती बेटियों के लिए कुछ नहीं कर पाने का उनको दुःख सताता था।
"कभी-कभी बादाम, दूध दोनों बच्चियों को भी दे दिया कर सुनीता। उनको इस उम्र में जरूरत है।" बेटियां आगे मातृत्व संभालेंगी, इस बात से पिता उनके स्वास्थ्य के चिंता दिखाते।

"मुझे तो कुछ समझता ही नहीं है बेकार ही तीन-तीन बच्चे पैदा करके बड़ा कर रही हूँ। अरे, जितने पैसे घर में आते हैं उसमें किसी एक को ही दूध मेवा मिल सकता है।  अब इन दोनों के बाद एक बेटा हुआ है तो उसे ही देती हूँ। दुश्मन नहीं हूँ लड़कियों की, मैं खुद तो नहीं खाती।"कहती हुई सुनीता रो पड़ती।

अपनी माँ की चौथी और अंतिम संतान थी सुनीता। चार-चार बेटियों के चलते, उनकी माँ को सास-ससुर, परिवार के, आस-पड़ोस की कटु बातों को झेलना पड़ता था।‌ लड़कियों के नाम से डरने लगी थी सुनीता और उसे भी पहले दो बेटियांँ ही हुईं।

सोना ने क्रिकेट में और नीलम ने कबड्डी में नाम लिखा लिया।‌ दोनों दौड़ने में, प्रेक्टिस में बहुत मेहनत करने लगीं। पिताजी ने इस बार ओव्हर टाइम करके, दोनों बेटियों को नए जूते भी दिलवा दिए।

दोनों लड़कियों के हौंसलों को बल मिला। अपने पिता का समर्थन, उनका प्रेम मिलते ही वो खिल उठीं।‌ सुबह उठकर दौड़तीं, स्कूल से आकर गृहकार्य करके फिर शाम को स्कूल में प्रेक्टिस करने चली जातीं। 

"दिमाग खराब हो गया क्या तेरा सुनीता, जो लड़कियों को क्रिकेट, कबड्डी खेलने भेजती है। दो-दो घंटे प्रेक्टिस करती हैं दोनों।‌ कुछ ऊँचनीच हो जाएगी, तब पछताएगी।" सुनीता की सहेलियां, दूर पास के रिश्तेदार बोलते।
अब सुनीता अपने किए पर पछताती कि क्यों उसी ने लड़कियों को खेलकूद की ओर ढकेला।
किशोर बच्चियों की अपनी अलग ही समस्याएं होती हैं। वो शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रुप से अपने आपसे, बाहरी और आंतरिक बदलावों से लड़ती रहती हैं। ना वो व्यस्क होती हैं ना बालिका।‌ दुनिया उन्हें नहीं समझती और वो दुनिया को समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होते।

स्कूल की जिलास्तरीय टीम में सोना का चयन हो गया और सब खुश हो गए।‌
"हमारे स्कूल टीम की आलराउंडर है आपकी बेटी।‌ कम साधनों में, कड़ी मेहनत से उसने टीम में जगह बनाई है।" स्कूल के कोच ने सोना के पिता से कहा।

आज पिताजी तीनों बच्चों के लिए फल‌ और मिठाईयां लेकर आए थे। 
"सुनीता, हमारी तीनों ही बच्चे रतन हैं।‌ सोना, नीलम और हीरा, हमने नाम भी तो ऐसा लगा है। सोना पढ़ाई के साथ स्कूल क्रिकेट टीम में आ गई। नीलम पढ़ती भी है और कबड्डी भी खेलती है। आज कोच सर बता रहे थे।" पिताजी ने कुछ रूककर कहा, "अपनी बेटियों को समझकर, हम ही साथ नहीं देंगे तो कौन देगा, और दोनों बहनों को देखकर हीरा भी बढ़िया ही करेगा। अब से घर में जो भी फल, मेवा, दूध रहे, तीनों को बराबर देना।" पिताजी ने अम्माँ की ओर देखा और कहा, "बच्चियों को समानता का अधिकार सबसे पहले घर में मिले तो बाहर तो वो खुद लड़ लेंगी।" बात अम्माँ ने महसूस की।‌

किशोर होती बेटियांँ पिताजी और अम्माँ के पास चिपक गईं जैसे आश्वासन देती हों कि आपका साथ है तो अब वे सारी दुनिया जीत ही लेंगी।


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं.9967674585

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बिठूर

बिठूर - एक पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक शहर (यात्रा वृत्तांत)


कानपुर से 25  किलोमीटर उत्तर में स्थित ऐतिहासिक एवं पौराणिक शहर बिठूर की यात्रा का सौभाग्य मिला। कानपुर से दोपहर कार द्वारा हम बिठूर की ओर चल पड़े। पवित्र नदी गंगा के किनारे स्थित इस शहर का जनजीवन साधारण है। जाते समय नये बने बड़े रिसोर्ट्स की सुंदरता आकर्षित करती है। संकरी गलियों से, बड़ी कठिनाई से कार जा रही थी और अंततः हम गंगाजी के ब्रह्मवर्त घाट पर पहुँच गए। 

घाट पर सुंदर मंच सजा था और राम लीला का मंचन हो रहा था। परशुराम-राम संवाद का दृश्य सामने था, कुछ देर हमने कलाकारों की इस विलुप्त होती कला का आनंद लिया और फिर घाट की ओर निकल गए। घाट पर पता चला कि आज शाम रावण दहन किया जाएगा।
"विजयादशमी तो हो गई, आज शरद पूर्णिमा है। आज रावण दहन होगा?" मैंने आश्चर्य से वहाँ के लोगों से पूछा।
"जी हाँ, यहां की परंपरा रही है। आज सुबह से रामलीला हो रही है और शाम को रावण दहन किया जाएगा। हर वर्ष यह  पूर्णिमा को मनाया जाता है।" लोगों के उत्तर से, एक नयी बात का पता चला।

 सूर्योदय के बाद सूर्य अपने बाल रूप में गगन में विचरण कर रहा थे। माँ गंगा अपने आवेग को समेटती, किनारों से टकराती अनवरत आगे बढ़ रही थीं। चौड़े पाट के दूसरी ओर कछार पर शुभ्र कांस जैसे शरद के आगमन का बखान करने में रत थी। 
ओह! प्रकृति का अप्रतिम सौंदर्य मंत्रमुग्ध कर देता है।  फूल, दीपक सब अपने अंक में समेटे गंगा की लहरों पर कुछ नौकाएं चल रही थीं। हमने भी नौका विहार करके ब्रह्मवर्त घाट पर बने विभिन्न घाटों के दर्शन किए। दशरथ घाट, कौशल्या घाट, सीता घाट, लक्ष्मण घाट जैसे और भी कई साफ-सुथरे घाट बने थे। 

वर्षा में गंगाजी के द्वारा लाई गई बालू किनारों और घाटों की सीढ़ियों तक जम गई थी। यहाँ ब्रह्मा जी का मंदिर है जहांँ उनकी पादुकाओं को पूजा जाता है। मान्यता यह है कि मनुष्यों की उत्पत्ति के पूर्व ब्रह्मा जी ने यहाँ तपस्या की थी।

हमारे नौकाचालक ने यह भी बताया कि भक्त ध्रुव ने इसी स्थान पर तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर तारे के रूप में उन्हें अपने पास स्थान दिया।
अब समय था कि कुछ देर रूककर, गंगा मैया के सौंदर्य को निहारते रहे। ऐसे ही सबसे पवित्र नदी नहीं बन गई। लोगों की बुराईयों, कमियों और लापरवाहियों के बावजूद उनका पालन-पोषण करने वाली, अपने किनारों पर संसार बसाने वाली माँ गंगे को प्रणाम करके हमने उनका आभार व्यक्त किया।
गंगा जी के बड़े और चौड़े पाटों के ऊपर से पुल बनाया गया है। बिठूर-परियर गंगा पुल उत्तर प्रदेश में गंगा जी पर बना सबसे बड़ा पुल है।
कुछ दूरी पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम स्थित है। लवकुश की जन्मस्थली और माँ सीता की कर्मस्थली यहाँ है। जगह-जगह रामायण की चौपाइयां अंकित हैं जो वाल्मीकि जी की अद्भुत देन का परिणाम हैं।

हम चलते घूमते कुछ तक गए थे। आगे भूनी मूंगफलियांँ बिक रही थीं, तो बैठकर उसका स्वाद लिया और हम बिठूर के ऐतिहासिक महत्व वाले स्थान पर जा पहुंँचे। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का एक मुख्य स्थान नाना राव साहब का महल। अब इसे संग्रहालय में तब्दील किया गया है। सोमवार को यह संग्रहालय पर्यटकों के लिए बंद होता है।

बड़े मुख्य द्वार से अन्दर आते हुए झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (मनु) की विशाल प्रतिमा दिखी। सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी उस लोकप्रिय कविता को, जिसे दीवार पर लगाया था पढ़कर रानी के सामने नतमस्तक हो गए।  शौर्य, अद्भुत पराक्रम और अपार देशभक्ति की प्रतिमा सामने थी।

चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लगी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

 बहुत सुंदर संग्रहालय जिसमें संग्राम की तलवारें, ढाल, कपड़े, कटारों और कई महत्वपूर्ण वस्तुओं को संग्रहित किया गया है। बड़ा सा बगीचा, जिसमें बेल, नीम, आम के पेड़ और फूलों की क्यारियां थीं। घूमते हुए एक मोर ने इस वातावरण को और खूबसूरत बना दिया।

आगे बड़ी छतरी और उसके नीचे नाना साहब की दिव्य भव्य प्रतिमा बनी थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूरी शक्ति से भारत को आजादी दिलाने का प्रयास करने वाले, विभिन्न मनसूबों को एकजुट करने वाले, अँग्रेजों को नाकों चने चबवा देने वाले नाना राव साहब के सामने सिर श्रद्धा से झुक गया। लक्ष्मीबाई का बचपन यहीं गुजरा था।

"नाना के संग खेली थी वह नाना के संग पढ़ती थी, 
बरछी ढाल कृपाण कटारी उसकी यही सहेली थी।"

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की तिकड़ी नाना साहब, तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई के समर्पण को देश हमेशा याद रखेगा। 
एक सुंदर, सार्थक यात्रा के असीम आनंद को अनुभूत करते हम शाम को वापस आ गए। 


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

1222 1222 122पर दो ग़ज़लें



1222 1222 122

हमारे बीच अब कुछ भी नहीं है 
ज़मी दिल की मगर सूखी नहीं है।।1।।

मुखौटे लाख बदलें लोग चाहे
कभी फितरत मगर जाती नहीं है।।2।।

कहानी एक सी बचपन के सबकी
पुरानी हो नयी, बदली नहीं है।।3।।

एक दुनिया! लादवा हैं दांव तेरे
तेरी दी चोट भर पाती नहीं है।।4।।

उड़ा पंछी तड़पकर पिंजरे से 
जगत नश्वर में कुछ बाकी नहीं है।।5।।


तरही मिसरा-

चले आते हैं वो अक्सर गली में 
मगर वो बात पहले सी नहीं है।


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1222 1222 122

ज़रा जब मैं किसी के काम आया 
मिरे दिल को बहुत आराम आया।।1।।

सुबह ही गाँव में पहुंचा था अपने
लगा मुझको मैं चारों धाम आया।।2।।

भटकता *खोज में था नौकरी की*
नकारा हूँ यही इल्ज़ाम आया।।3।।


गया था गाँव अपना छोड़कर मैं
सुबह का भूला घर को शाम आया।।4।।
 

किया है प्यार उसने सिर्फ़ मुझसे
लिफाफे में अभी पैगाम आया।।5।।

जतन करता रहा काया का अपने
जली जब देह केवल राम आया।।6।।

किये उपवास पूजा और जप-तप
समय अंतिम नहीं प्रभु नाम आया।।7।।

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सोमवार, 12 जनवरी 2026

आ.योगराज प्रभाकर सर की समीक्षा, लघुकथा दर्पण मंच

सभी सुधि साथियों ने इन रचनाओं पर अपनी उत्कृष्ट टिप्पणियाँ दी, अत: मेरे कहने के लिए कुछ ख़ास नहीं बचा। बहरहाल , मुझे इन रचनाओं में कुछ कमियाँ दिखीं, मात्र उन्हीं का उल्लेख कर रहा हूँ।

1. लघुकथा- शक्ति

रोज की तरह मीनू आज भी मूर्ति  वाली गली में जा खड़ी हुई। //सात साल की बच्ची बड़े ध्यान से, मूर्तिकार बाबा के काम को देखती रहती।//  (*यह सात साल की बच्ची कौन है?*) पास ही मजदूरों की झोपड़-पट्टी में रहती है। आज बाबा मूर्ति पूरी करने वाले हैं।
उसने पूरी मूर्ति बनते हुए देखा है। देवी का शरीर, हाथ-पैर और चेहरा, सबकुछ एक-एक कर बनता गया। बाबा ने जैसे माटी में जान फूंँक दी है।
"कितनी सुंदर है देवी माँ! आँखें तो और किसी की ऐसी न होगी।" //सोचते हुए// (*यह लेखकीय प्रवेश है*)  मीनू सूखी मिट्टी के ढ़ेर पर बैठ गई।
अपने नन्हें हाथों से मुट्ठी भर-भर कर मिट्टी, इधर-उधर करने लगी। //उसके छोटे भाई को उसकी माँ साथ लेकर काम पर जाती है और मीनू सारा दिन यहाँ-वहाँ खेलती भटकती रहती। भूख लगती तो अपनी झोपड़ी खोलकर, सुबह की रखी रोटी-भात खा लेती और फिर बाहर।// (*अनावश्यक पंक्ति*)
//उस झोपड़-पट्टी में उसकी उम्र के सभी बच्चे ऐसे ही हैं। जो बारह -तेरह साल के हैं वो कहीं ना कहीं काम करने लगे हैं।//   (*अनावश्यक पंक्ति*)
"मैं बिल्कुल देवी माँ जैसी हूँ, वैसे ही लंबे बाल हैं मेरे भी।" अपने तेल लगे काले, लंबे बालों को हाथों से नापने लगी।
"अरे बाबा! आज आपने देवी माँ को ये क्या दे दिया हाथों में?" उछलकर मूर्तिकार बाबा के सामने पहुँच गई मीनू।
"ये तो अस्त्र-शस्त्र हैं देवी के। तलवार, कटार, गदा, धनुष सब है।" मूर्तिकार ने कहा।
"ये क्यों रखती हैं देवी?" मासूम सा प्रश्न किया मीनू ने।
"राक्षसों, बुरे लोगों से लड़ने के लिए, उनको हराने के लिए।" मूर्तिकार अपना काम करते हुए बच्ची की जिज्ञासा शांत कर रहा था।
"मैं भी तो देवी जैसी हूँ बाबा! मेरे बाल भी देखो लंबे हैं परंतु मैं राक्षसों से नहीं लड़ सकती। मेरे पास अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं।" मीनू ने धीमी आवाज में कहा।
मूर्तिकार बाबा हाथ धोकर अपने घर के अंदर चले गए।  //बाबा ने मीनू को बैग में पुस्तकें, कलम, और एक स्लेट दे दी।// (*बेहद अस्वाभाविक सी बात लगती है, यहाँ आदर्शवाद/भावुकता हावी हो गई है*)
देवी का श्रृंगार पूरा हो गया था।
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2.लघुकथा - जीत का फंडा

प्रश्नकर्ता - अपनी नई पुस्तक के लिए विश्वस्तर पुरस्कार विजेता लेखक श्री रमेश देव जी का हमारे चैनल पर हार्दिक स्वागत है।
नमस्कार एवं अभिनंदन आपका सर।
लेखक- (हाथ जोड़कर) आपके चैनल एवं सभी दर्शकों को नमस्कार, धन्यवाद।
प्रश्नकर्ता - सर, पुरस्कार प्राप्त करने के बाद आज देश में आपका प्रथम साक्षात्कार हमारे चैनल पर है। हमारे दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मुझे कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि हमारी टी.आर.पी. रिकार्ड तोड़ देगी।
लेखक - आपने मुझे अपने चैनल पर आमंत्रित किया, मेरा सौभाग्य है।
प्रश्नकर्ता - सर,आपने कितनी पुस्तकें लिखीं और अपने शुरुआती दौर के बारे में हमारे दर्शकों को थोड़ा बताइए।
लेखक- मैंने अपने कॉलेज के दिनों से लिखना शुरू किया था। नुक्कड़ नाटकों और गीत लिखने का शौक था। (मुस्कुराते हुए) कई नाटकों का दोस्तों के साथ मंचन भी किया। कहानियों और फिर उपन्यास विधा पर कलम चलाई।
मेरे करीब बीस एकल-संग्रह आए हैं।
प्रश्नकर्ता - सर,आपकी पूर्व में लिखित पुस्तकों को पाठकों ने दिल से सराहा परंतु राष्ट्रीय स्तर पर आपको कोई पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ।
इस नई पुस्तक को देश में उतनी ख्याति नहीं मिली परंतु विश्व स्तर पर विजेता रही। इसका क्या कारण है सर?
लेखक- (मौन)
प्रश्नकर्ता - सर, आज  हजारों की संख्या में जुड़े हमारे दर्शकों को यह जानने की बहुत इच्छा है। आप का उत्तर ही उनका समाधान करेगा।
लेखक- देखिए, शुरूआती दौर में मैं अपने सुख, अपने आनंद के लिए लिखता था। धीरे-धीरे मैंने लोगों की पसंद-नापसंद जानकर लिखना शुरू किया। लोगों से सराहना तो मिली पर कोई पुरस्कार नहीं मिला।
यह पुस्तक, मैंने विश्वस्तर के निर्णायकों के दिलोदिमाग का, सूक्ष्म अध्ययन करके लिखी और पुरस्कार जीतने में सफल रहा।
(अचानक दर्शकों का ग्राफ तेजी से नीचे आने लगा)
*प्रश्नकर्ता अथवा लेखक लिखने की आवश्यकता नहीं थी, बातचीत से ही यह क्लियर हो जाता है)*
*लघुकथा में कुछ भी ब्रेकेट में नहीं लिखा जाता, ऐसा एकांकी/नाटक शैली में होता है।* 
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3.लघुकथा - मन की बात

सुमित्रा ने माँ के सिरहाने पानी भरा लोटा धरते हुए कहा,  "तालाब जा रही हूँ। नहाते, कपड़े धोते तक एक दो छोटी मछली भी मिलेगी तो ले आऊंँगी । बहुत दिनों से तुझे मछली-भात खाना है ना ?" खटिया पर पड़ी माँ की आँखें चमकने लगीं।
सिर पर से कपड़ों का बंँधा बोझा उतारकर, तालाब के किनारे रख अपना पुराना, हाथों से बांँधा छोटा जाल फेंक दिया।
"आज मछली फंँस जाए तो खाने में मजा आ जाए।" कपड़े को कुटेले से पीटती सुमित्रा ने लार गटक ली।
सिर पर माटी लगाकर बाल धोए और कपड़े पहनते हुए, तालाब में स्वयं को निहारते हुए स्वयं पर लजाने लगी।
लहरें आती तो प्रतिबिंब फैल जाता अतः उठती लहरों के स्थिर होने का, वह दिल थामकर इंतजार करने लगती।
सहसा, जाल में हलचल हुई और सुमित्रा की खुशी से चीख निकल पड़ी। लगभग आधे फुट की खूबसूरत, गोल-मटोल, चाँदी की तरह चमकीली मछली तड़फड़ा रही थी।
जाली समेटकर उस मछली को पानी के कलसे में डाल, सुमित्रा धुले कपड़ों का गट्ठर बनाने लगी।
मछली की तड़फड़ाहट  उसे बेचैन कर रही थी। उसे अंजुरी में भरकर देखा तो लगा उसकी आंँखें नम हैं। मूक आँखों की भाषा सुमित्रा के हृदय पर दस्तक देने लगी।
एक क्षण बाद ही उसे पानी में वापस छोड़ते हुए बोली, "जा, तेरी माँ भी रास्ता देख रही होगी।" कपड़ों का गट्ठर अपने सिर पर धरे, पार पर फैली करमता भाजी तोड़ते चली। 
 //अब मुंँह में भाजी का स्वाद असीम तृप्ति दे रहा था।// (*यह पंक्ति अनावश्यक है*)
*तड़फड़ा=छटपटा*  
*तड़फड़ाहट=छटपटाहट*
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4 . लघुकथा - चिंगारी

दुलारी ने आँगन में बीड़ी फूंँकते लखना को देखा तो बस बिगड़ गई।
"अरे! भिनसारे कोई बीड़ी फूँकता है भला? निकल पड़ो तो कोई काम भी मिले।" एक सप्ताह से बिना काम के, घर में बैठे पति से त्रस्त हो गई थी दुलारी।
"काम मिलता ही नहीं तो क्या चोरी करूँ?"तल्ख स्वर में लखना ने जवाब दिया।
"उमर हो रही है तुम्हारे साथ, सब जानती हूँ। एक-दो घर पूछा और फिर चार दोस्तों में दिन बिता के खाने के टैम हाजिर।" आज दुलारी के तेवर भी तेज़ थे।
"चार घर पोंछा-बर्तन क्या कर लेती है, अपने आप को मालकिन समझ रही है।" गुर्राते हुए लखना ने बची बीड़ी को पैर से मसल दिया।
लखना के पैरों तले रौंदी बीड़ी ने दुलारी को अपने पुराने दिनों की याद दिला दी।
गाँव की सबसे सुंदर लड़की थी दुलारी। पाँच कक्षा पढ़ी भी थी। सोलह में ब्याह दी गई लखना से और बीस तक तो दो बच्चों की माँ बन गई थी।
लखना लकड़ी का काम करता था। फर्नीचर, दरवाजे सब बनाता था परंतु स्वभाव का तेज और शरीर से आलसी। किसी ठेकेदार के नीचे टिककर काम ना करता। घर की जरुरतों को पूरा करने के लिए दुलारी आसपास की बिल्डींग में काम करने लगी थी।
लखना के खाँसने से दुलारी की तंद्रा टूटी। हाथ में पानी का गिलास भरकर लखना के पास गई।
"कहती हूँ बीड़ी मत फूँको। फेफड़ा खराब हो रहा है। सब जगह लिखा रहता है कि बीड़ी पीना बुरी बात है।" कहते हुए पानी का गिलास उसके हाथ में पकड़ा दिया।
बेकार बैठकर दोनों जून  खाना खाने का आनंद लेने वाला मर्द जाग गया। (*इसे मर्द का नहीं शैतान का जागना कहते हैं*)
//गिलास की झनझनाहट हुई और दुलारी का माथा छिल गया।// (*केवल झनझनाहट से माथा कैसे छिल गया?*) माथे से छलकती रक्त बूँदों ने दुलारी को, उसका अस्तित्व बता दिया।दुलारी की आँखों में चिंगारी धधकने लगी थी।
अगले कुछ क्षणों में अपनी मर्दानगी भूलकर, हाथ पैर बचाता लखना काम की खोज में निकल गया था। (*ऐसा ज़ालिम मर्द आँखों की चिंगारी देखकर घबरा गया? यह बिलकुल अस्वाभिक लग रहा है*)
कुचली बीड़ी में एक चिंगारी अब भी चमक रही थी।
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5.लघुकथा - किरायेदार

मधु को आठवाँ महीना लग गया था। दिन-रात वह गर्भस्थ शिशु को, अपने पेट पर  हाथ रखकर स्पर्श किया करती।
बाहर की हल्की ठंड और सूर्य की बादलों संग लुका-छिपी के बीच मधु, ऊनी कपड़ों को तार पर फैला रही थी। पेट पर एक झटका सा पड़ा और उसकी सिसकी निकल गई।
"अब आखिरी महीने में क्यों अड़चन बढ़ा रही है? शांति से बैठी रह, मैं जो करती हूँ चाकरी।" अपनी सास की आवाज़ सुनकर मधु का मुँह कसैला हो गया।
 सामने नज़र उठाई तो जमुना काकी के कमरे में किराये से रहने वाला जोड़ा, अपनी गृहस्थी समेटकर गाड़ी में डाल रहा था।
"बच्चा पेट में घूमता है माँ, लात मारता है मानो मुझे बता रहा हो कि अब मैं बाहर आने वाला हूँ।" मधु ने अपनी सास से कहा।
"तू समझती क्यों नहीं, तेरे अपने बच्चे की अच्छी परवरिश शिक्षा के लिए, इस घर को ठीक कराने के लिए ही तो तूने दूसरे का बच्चा अपने पेट में पाला है। इससे ज़्यादा प्रेम लगाना ठीक नहीं। कुछ दिनों बाद ये अपने माँ-बाप के पास चला जाएगा।" सास ने मधु को समझाते हुए कहा।
"पता है मुझे। रोजी मजदूरी करने वाले परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए, उस घर की स्त्री को अपनी कोख का सौदा करना पड़ता है।" मधु की आंँखों के सामने वो कागज़ात घूम गए जिन पर उसने हस्ताक्षर किए थे।
सामान लदी गाड़ी की घरघराहट से मधु चौंक पड़ी। अपने बरामदे में खड़ी जमुना काकी, जाते हुए उस किरायेदार जोड़े को विदा करते हुए पल्लू से आँखें पोंछ रही थी।
अपने ढहते हुए घर को घूरती मधु ने, एक बार फिर अपने नम हाथों से पेट को छू लिया मानो अपने ‌इस किरायेदार से घर खाली करने की तारीख जानना चाहती हो।
*(यह अच्छी लघुकथा है)*
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शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

1212 1212 1212 1212 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 

फ़िलबदीह - 57

1212  1212  1212  1212


लपेटी सृष्टि सारी ने, वो साड़ी है कमाल की
सफेद रंग से सजी, ज्यों सजनी शीतकाल की।।1।।

पले जो नन्हा गर्भ में, करे वो मूक प्रार्थना 
दे शक्ति माँ ही पोसती, ये महिमा गर्भनाल की।।2।।

समानता ही मूल है, ये सृष्टि खूब जानती
पवन, किरण, नदी, गगन, ये देन हैं दयाल की।।3।।

घटे बढ़े गिरे उठे, ये पूंजी का बजार है 
ये देख धड़कने बढ़ीं, बेचारे उस दलाल की।।4।।

न फ़िक्र रोटी पानी की, न नौकरी का डर ही था
वो दोस्तों का साथ ही, हैं यादें बालकाल की।।5।।

तरही मिसरा-

ये कोरी कोरी डायरी, लिखूं भी तो लिखूं मैं क्या 
न जाने खो गई कहाँ धनक तिरे ख़याल की।।

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शर्मिला चौहान