सोमवार, 24 अगस्त 2026

कहानी - कुटुंबपाल

कुटुंबपाल 


कुटुंब, जहाँ बीस-पच्चीस लोगों का साथ खाना बने, सब साथ रहें और साथ ही लड़ाई-झगड़ा भी ज़ोरदार होता रहे।  ऐसे बड़े कुटुंब का एक छोटा सा हिस्सा थी वह। 'पूनो' कुटुंब का दिया नाम जिसने पूर्णिमा को स्नेह से समेट कर पूनो कर दिया था। मकान का कुछ हिस्सा पक्का, कुछ कच्चा परंतु दिल तो सबका बच्चा ही था। दरवाजे पर लकड़ी की तख्ती से दादाजी ने 'सिंह कुटुंब' लिखवाया था। पूनो की स्मृतियों में दादाजी की झलक साफ थी क्योंकि हमेशा बच्चों में बच्चों की तरह गाते-खेलते, लतीफे सुनाते, छुप्पन-छुपाई का हिस्सा भी बन जाते थे। दादी, उतनी ही अक्खड़, उनके पीछे छिपे बच्चों को दो थप्पड़ पड़ती और पकड़ा जाता वो अलग।

दादा जी के चार बेटे और दो बेटियाँ। बड़े उदय ताऊ जी और सुधा ताई। दूसरे नंबर पर किशोर ताऊजी और मीना ताई। तीसरे नंबर पर पूनो के पिताजी कमल और माँ गौरी। चौथे सबसे छोटे चाचा दीपक और चाची शीला। दो बुआ कमला और मंगला। अब बच्चों की गिनती ना भी करो तो दर्जन भर यह बड़े ही हो गए। दीपक चाचा और मंगला बुआ तो दूध-भात थे, कभी बड़ों में रहते ही नहीं थे दोनों। बड़े ताऊ जी के बच्चों के उम्र के आसपास रहने के कारण बस बच्चों में ही शामिल रहते थे। इस कुटुंब में आगे एक दर्जन बच्चों की भी एंट्री है।

अपने बंगले के सामने लॉन में कुर्सी पर बैठी सर्दियों की नरम मुलायम धूप का आनंद लेती पूनो नहीं.. अब तो पूर्णिमा, ने स्वेटर की डिजाइन को बड़ी कुशलता से पूरा किया। फंदों को गिराने-उठाने, घटाने-बढ़ाने और फिर एक निश्चित आकार दे देने में स्त्रियाँ तो माहिर होती हैं। अपनी जरूरतों, अपने सपनों, अपनी इच्छाओं के फंदों को कब घटा देती हैं और परिवार की जरूरतों, आशाओं को बुनकर तैयार करती हैं घर। यह स्वेटर वह अपनी नातिन ध्रुवी के लिए बना रही है। दो साल की प्यारी, गोल-मटोल ध्रुवी कितनी सुंदर लगेगी गुलाबी रंग के इस स्वेटर में, इस कल्पना से ही पूर्णिमा को खुशी होती है। आजकल तो बड़े कोई हाथ के बुने स्वेटर नहीं पहनते। 

बुनाई का एक ज़माना देखा था पूर्णिमा ने अपने कुटुंब में। यह कला अपनी दादी, ताइयों, माँ और बुआ से बहती हुई उसमें भी आ गई थी। सर्दियों की दोपहरी में, उन की रंग-बिरंगे लच्छियों को सुलझाकर गोले बनाना, नये नमूनों की तलाश में पत्रिकाओं का आदान-प्रदान करती ये स्त्रियाँ, गृहस्थी की बड़ी उलझनें भी साथ-साथ सुलझा लेती थीं।

"मैं सब्जियाँ लेने जा रहा हूंँ। तुम्हें चलना हो तो चलो वरना यह सब्जी अच्छी नहीं, वह ठीक नहीं कहती रहती हो।" हाथ में थैली लिए पूर्णिमा के पति अशोक खड़े थे। 
"अब अगले सप्ताह तक मुझे यह स्वेटर पूरा करना है तुम ही ले आओ सब्जियाँ, देखकर लाना तो अच्छी ही आएगी ना।" उसकी बात सुनकर सिर हिलाते हुए सब्जी मंडी के लिए अशोक प्रस्थान कर गए। उनको जाता देख, एक बार चारों तरफ नज़रें घूमाकर पूर्णिमा फिर से उस स्वेटर के फंदों और अपने कुटुंब की सुखद स्मृतियों में लीन हो गई।

 ऐसी सर्दियों में तो 'सिंह कुटुंब' का सौंदर्य द्विगुणित हो जाता था। सब्जियों का बाहुल्य उनकी कीमतों को घटा देता था और तब प्रति समय दो सब्जियों का आनंद लेने  वाला परिवार अपने आप को राज परिवार से कम नहीं समझता था।

दादाजी और दादी ने अपने बच्चों के काम बाँट रखे थे। अपनी दोनों बेटियों को भी उन्होंने बराबरी का काम दिया था। दोनों बुआ, सबके कपड़े तह करतीं, उनके कमरों में  रख देतीं, परदे बदलना, नाश्ता परोसना और बैठक की साज-सज्जा बड़ी खुशी से किया करती थीं। दोनों बुआ के साथ बड़े ताऊ जी की दोनों बेटियाँ भी गुपचुप काम किया करतीं। शाला से आने के बाद यूनिफॉर्म धोना और विशेष समय पर लोहा करना, सब बच्चे कर लेते थे।

 कितना सुंदर, कितना प्यारा समय था। एक-दूसरे के कपड़ों को धोकर उनके कमरे तक पहुंचाना, कोई मनमुटाव नहीं। आँगन के चूल्हे पर चादरों को उबलते पानी में खौलाकर, फिर ताई जी और मांँ उन्हें कुटेले से कूट-कूट कर साफ करते थे। मजाल है कि सूखती चादरों और तकिया के गिलाफ़ो को कोई हाथ भी लगा दे। दो-तीन बच्चों का काम छोटी बाल्टी से पानी लाकर टंकियों में भरना था, वो भी चड्डी-बनियान पहने दौड़कर अपना काम पूरा कर लेते।

भोजन का आनंद तो इतना कि अंत में खाने वालों की थालियों में साग, अचार-चटनी जैसी और अचार, चटनी-साग जैसे परसे जाते थे। हमेशा ही दोनों ताईजी, माँ और चाची सबके खाने के बाद, सिलबट्टे पर टमाटर-धनिया की चटनी पीसकर खाते थे। कुटुंबपाल सब्जियांँ भी कभी-कभी उनकी दादी तक नहीं पहुँच पाती थी।
दादा जी के साथ दोनों ताऊजी खाने बैठते। बाबूजी कभी-कभी उनके साथ बैठते वरना तो बाबूजी और चाचा बाद में ही खाना पसंद करते थे। खाते समय दादाजी पूरे दिन के काम का हिसाब-किताब पूछा करते तो नौकरी करने वाले बाबूजी और पढ़ाई करने वाले चाचा, कन्नी काट लेते थे।

 खेती का काम तो अंत तक दादाजी ही देखते थे। पूरे परिवार की दाल-रोटी यानी गेहूँ और अरहर की फसल भरपूर हो जाती थी खेतों में। दोनों ताऊ जी ने कपड़ों की दुकान डाली थी, दोनों मिलकर आधा-आधा समय बैठते और दुकान चलाते थे। बाबूजी प्राथमिक शाला की शिक्षक थे। बड़ी बुआ के रिश्ता भी उन्होंने दूसरे गाँव में एक शिक्षक से ही तय करवाया था।

दादाजी ने सबके काम, सबकी जिम्मेदारियांँ बाँट रखी थीं। दाल-रोटी खेती से और फल-सब्जियों की पूर्ति बड़े ताऊजी पर थी। त्योहारों पर सबके कपड़े बनवाने का जिम्मा छोटे ताऊजी पर था। बाबूजी, चावल,‌ तेल और रसोई के अलावा लगने वाले धुलाई का पावडर, साबुन का इंतजाम करते थे।

नए कपड़े बनवाने का जैसे मुहूर्त देखा जाता था। शादी-ब्याह, दीपावली या कभी किसी के जन्मदिन पर उसको नए कपड़े मिलते थे। आँगन में गाँव का दर्जी अपनी मशीन लिए आठ-पंद्रह दिनों का डेरा लगा लेता था। छोटे ताऊजी दुकान से कपड़ों की थान ले आते, इन्हीं थानों में से पूरे कुटुंब के कपड़े सिलवाए जाते थे। नमूनेदार बेल-फूल वाले थान लड़कियों के लिए आते थे और फैशन तो बढ़-चढ़कर था उस ज़माने का।
 किसी बच्ची को छोटी चुन्नट वाला घेर तो किसी को चौड़ी प्लेट्स की स्कर्ट चाहिए, किसी को चूड़ीदार तो किसी को घेरदार सलवार चाहिए होती थी। गाँव का वह दर्जी हर प्रकार की फरमाइश सधे हाथों से पूरी करता। दादी फलालेन के ब्लाउज पहनती थी तो बड़ी ताई जी पूरी आस्तीन के। छोटी ताई जी को जरी और कांच लगे आस्तीन बड़े पसंद आते थे और मां को रुबिया और सूती कपड़ों के ब्लाउज। चाची के ब्लाउजों की डिजाइन ढूंढते-ढूंढते दर्जी चाचा भी माथे पर हाथ लगा लेते थे।


किसी रिश्तेदार के यहां शादी पड़े या घर में कोई बड़ा कामकाज हो तो दर्जी चाचा की बहुत डिमांड बढ़ जाती। बार-बार बच्चों को उनके घर का फेरा लगाना पड़ता तब कहीं जाकर वो दर्शन देते। इन कपड़ों की थानों में से वह अपने परिवार के कपड़े भी सिल लिया करते। परिवार के साथ ही उसका खाना-पीना, चाय-नाश्ता उन पूरे दिनों दिन बंधा रहता था। पुरुषों के कपड़ों के लिए हल्के रंग के प्लेन गट्ठे आते।

 ताऊजी और दादाजी, दोनों ही धोती के साथ कुर्ता पहना करते थे। छोटे ताऊजी, बाबूजी और चाचा पैंट -कमीज पहनते थे। चाचा उस वक्त कॉलेज में पढ़ा करते थे और वे छोटे ताऊ जी के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते कि, "भैया मेरे लिए यह सादे कपड़े मत लाना कुछ लाइन वाले चमकीले रंग के लाना जैसे फलाने पिक्चर में राजेश खन्ना ने पहना था। उनके लिए दर्जी चाचा अलग-अलग कॉलर वाली अलग प्रकार के फिटिंग वाली कमीज़ें से बनाया करते थे। उस समय के बड़े फैशन डिजाइनर दर्जी चाचा और शो स्टॉपर दीपक चाचा थे।

यह तो हुई कपड़ों की बातें, अब जरा सब्जियों की दुनिया में भी कदम रखते हैं। कुटुंब के लिए सब्जियों का ठेका बड़े ताऊजी के कंधों पर था। मुझे लगता है सबसे बड़ा यही काम था जो ताऊजी ने सालों-साल संभाला। पाँच बजे कपड़ों की अपनी दुकान से निकल कर वह पैदल ही सब्जी मंडी जाते। छह-सात बजे जब सब्जी वाले अपना सामान कम कीमत में बेचकर निकलने की फिराक में रहते तो ताऊ जी बड़ी तादाद में सभी बची सब्जियाँ खरीद लाते। अब वह भी क्या करें बीस-बाइस लोगों के इस कुटुंब में भोजन का मुख्य आकर्षण तो सब्जियां ही थीं। कोई किलो दो किलो तो नहीं पूरे चार किलो सब्जी एक समय में लग जाया करती थी। 

भूरा कुम्हड़ा, लौकी, बैगन, पत्ता गोभी और आलू की तो पूरी बोरी ले आते थे ताऊजी। शायद कुटुंब ने ट्रकों आलू खाए होंगे जीवन में। सब्जियों की कमी के समय आलू मुख्य केंद्र होता था। फूलगोभी, बरबटी, पनीर, शिमला मिर्च यह सब सब्जियां विशेष दिन त्योहार पर ही बनती थीं। अरहर की दाल जब बनाई जाती थी तब बीस-पच्चीस किलो साबुत अरहर घर पर रख दिया करते थे जो कभी-कभी उबाल कर नाश्ते के काम आती थी।

सिलबट्टे पर पिसा हुआ मसाला, चूल्हे पर पकी सब्जियां जिनकी महक घर आंगन में फैला करती। सूखी मसालेदार सब्जियां कभी-कभार ही बनती थीं । हमेशा खूब रसदार, बड़ी कढ़ाही के कानों तक मसालेदार पानी में तैरती 'कुटुंबपाल' सब्जी ही परोसी जाती।

"चाची,  इतना रस क्यों रहता है सब्जी में? सूखे परवल, कटहल क्यों नहीं बनाते?"  रसोई इंचार्ज माँ थी तो ताऊ जी के बच्चे माँ से पूछा करते। 
"तुम्हारे ताऊजी से कहना तीन-चार की जगह पाँच-छह किलो सब्जियाँ लाया करें। यहाँ हर आदमी चार-पांँच रोटी के साथ दो कटोरी दाल और उतनी ही सब्जी खा लेता है। सूखी सब्जी बनाते रहे तो चल गया यह कुटुंब ।" माँ की जगह दोनों ताईजी कूद जातीं बच्चों के सामने।
इस पूरे कुटुंब के लिए सब्जियों की व्यवस्था करने वाले बड़े ताऊजी को दादाजी ने ही पहली बार "कुटुंबपाल" का उपनाम दिया था। सबके मन को बनाए रखना, गर्मियों में तरबूज, खरबूज और सर्दियों में गाजर लाकर "आज बच्चों के लिए गाजर का हलुआ बनाना छोटी" कहकर, अपने उपनाम को सार्थक करने वाले बड़े ताऊजी, आज भी पूर्णिमा की स्मृतियों में मुस्कुरा रहे थे।

 सब्जी रामायण का समापन टमाटर की किसी चटनी से करने में कोई संकोच नहीं है। चाहे सब्जी स्वादिष्ट हो न हो, रसदार हो सूखी भुनी हो, कुम्हड़े की हो भिंडी की हो, रसोई संभालने वालियों की थालियों के लिए बस अचार की तरह बचती थी और फिर सिलबट्टे पर पिसी जाती थी इन स्त्रियों के नित्य की साथी 'चटनी'। जिसे बड़े प्रेम से, दुनिया जहान के व्यंजनों की विधियां एक-दूसरे से साझा करते हुए, पहले तीनों फिर चौथी आई चाची भी चटकारे लेकर खाया करतीं।

"अपने लिए पहले ही थोड़ी सब्जी अलग रख लिया करो दुल्हन। रोज-रोज इस तरह चटनी के साथ खाना क्या अच्छा लगता है रसोई में जितनी बनेगी सारे पूरी खा जाएंगे तो तुम क्या रोज ही ऐसी रहोगी?" दादी अक्सर अपनी चारों बहुओं को रसोई में आकर कहा करती थीं।
सोने के पहले बच्चों को और दादाजी को दूध दिया जाता था। घर में ही एक भैंस और दो गायें थी। चाय, दही-छाछ, घर के ही दूध से बनता था। शाम को ताजा दुहा दूध उपले जला कर मिट्टी की हांडी में पकने रख दिया जाता था। पीला होता दूध अपनी खुशबू से सबका ध्यान खींच लेता। कुछ दूध रोटी खाना पसंद करते थे जिसमें दादाजी अपने फूलकांस के कटोरे में दूध-रोटी खाया करते थे। ऊपर से शक्कर डालने का बिल्कुल रिवाज नहीं था इस कुटुंब में।


ठेलों पर बिकने वाले बर्फ के गोले, कुल्फी, गुपचुप खरीदने के लिए बड़ी सिफारिश करनी पड़ती थी। पूर्णिमा ने याद किया एक बार बर्फ के गोले वाले की आवाज़ से लाचार बच्चों की गैंग ने एक दुपहरी छोटे ताऊ जी के कमरे से दस रूपए का नोट चुरा लिया। इस नोट में जी भर गोला खाए और कुल्ला करके मुंँह को साफ करने का असफल प्रयास करने वाले इन बच्चों की चोरी छुपी नहीं रही। छह बच्चों की इस गैंग का एक छोटा सदस्य ही मुखबिर बन गया। वह था पूर्णिमा का अपना छोटा भाई प्रमोद। 

जब ताई जी अपनी अलमारी, अपने बटुए, अपने कपड़ों और हर जगह उस दस के नोट को ढूंढ रही थीं तब इसी मुखबिर ने उस नोट की चोरी यात्रा का नमक-मिर्च लगाकर वर्णन कर दिया। उसे तो मुखबिरी का पुरस्कार मिला "ईमानदार बच्चा" और बाकी पाँचो की शाम को पेशी लग गई। कितने उठक-बैठक, कितनी डाँट, कितनी  विभूतियों से उनको नवाजा गया था, आज भी पूर्णिमा को हँसी आ गई।

"अकेली बैठी-बैठी कब तक हंँसती रहोगी? अब तो धूप भी बढ़ गई है।" गेट खोलकर अशोक सब्जियों का थैला लिए पूर्णिमा के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गए। 
"सुबह तो इतनी ताजी सब्जियाँ मिलती हैं कि मजा आ जाता है।" उन्होंने उत्साह में भरकर एक-दो सब्जियांँ बानगी के रूप में दिखाईं।

"यह परवल लाया हूंँ, मौसम के पहले परवल, पचास रूपए पाव हैं। इन्हें एकदम सूखा बनाना। वाह! सूखे परवल का स्वाद ही निराला होता है।" सब्जियों के शौकीन अशोक ने पूर्णिमा की ओर देखकर कहा, "सूखे ही बनाना कुटुंबपाल नहीं जो तुम्हें पसंद है। कढ़ाई भर रस में तैरते चंद परवल के टुकड़ों को गोता लगाकर निकालना पड़ता है।" अशोक जी ने हंँसना शुरू किया तो पूर्णिमा भी हंँस पड़ी।

"अब न कुटुंब रहते न कुटुंबपाल! अब तो बड़ी चारदीवारियों से घिरे मकानों में सिर्फ दो-तीन प्राणी बसते हैं। जो चाहे तो रोज मनमोहन भोग भी खा सकते हैं।" अपने उस कुटुंब से आज दो प्राणियों तक के इस सफर को पूर्णिमा ने, पिछले कुछ घंटे में एक बार फिर जी लिया था।


***********

शर्मिला चौहान

रविवार, 23 अगस्त 2026

कहानी (मवाद) कथा रंग प्रतियोगिता में भेजी

मवाद (कहानी)


रोज की तरह बस से उतर कर दीपा बैग, साड़ी संभालती, हड़बड़ाती चाल से स्कूल की ओर बढ़ गई। बस स्टॉप से करीब दो सौ मीटर की दूरी पर है उसका स्कूल परंतु यह दूरी कभी-कभी बहुत लंबी जान पड़ती है उसे। उतनी ही लंबी जितना बचपन से आज तक का उसका जीवन। यदि बचपन का जीवन, जीवन था तो उसे आज भी अपने जीवन से उतना ही डर, उतनी ही नफरत हो जाती है। 

सामने गड्ढे के भरे पानी में चप्पल ने छपाक किया और साड़ी में छींटे पड़ ही गए। छींटों से तो उसकी पुरानी दोस्ती है। कुछ छींटे कपड़ों पर, कुछ शरीर पर और कुछ मन पर दाग छोड़ जाते हैं। आसपास से निकलते बच्चों को देखकर उसे कुछ सुकून मिला। बच्चों ने उसे देखकर हाथ हिलाया और "गुड मॉर्निंग टीचर" से संबोधित किया। क्षण भर के लिए उसका मन किसान के लहलहाते खेतों की तरह हरिया गया। इन मासूम बच्चों के चेहरों की खुशी, जीवन का उत्साह और निश्छल प्रेम ने ही उसे इस दुनिया में रहना, अपने लिए लड़ना और जीना सिखाया है।

स्कूल के गेट पर पहुंची ही थी कि प्रार्थना की घंटी बज गई। 
"ओह हो! अब स्टाफ रूम में जाकर रजिस्टर में दस्तखत करके आते तक तो हेडमास्टर सर और बाकी सब आ ही जाएंगे। दीपा लगभग दौड़ती हुई स्टाफ रूम की ओर भागी। रजिस्टर पर अपने दस्तखत करते हुए उसने सभी उपस्थित शिक्षकों के नाम पढ़ लिए और झपटकर बाहर प्रांगण की ओर वापस चल पड़ी। 

कक्षाओं को पार करते हुए कक्षा पाँचवी की खुली खिड़की के अंदर उसकी नजर चली गई। सारी तेजी, सारा उत्साह कपूर की तरह उड़ गया। हमेशा की तरह सलोनी एक कोने में चुपचाप खड़ी थी और दीवार को घूर रही थी। दीपा के पैरों में जैसे ब्रेक लग गया। वह उसे देखती रही फिर आवाज़ लगाई। 
"सलोनी, प्रार्थना शुरू हो रही है। सारी क्लास चली गई, तुम अकेली क्या कर रही हो?"  दीपा की आवाज का सलोनी पर कोई असर नहीं हुआ। 
"सलोनी चलो। प्रार्थना शुरू हो रही है बेटा। क्या सोच रही हो?" कहती हुई दीपा ने सलोनी का हाथ पकड़ा और प्रांगण की ओर बढ़ चली। 

दो-तीन ही कदम बढ़ाए थे कि सलोनी के हाथों के लाल-नीले चकतों ने वापस उसके पैरों में जंजीर डाल दी। सांवले हाथों की कांतिहीन मुरझाई त्वचा पर बच्ची के दुख और उसकी स्थिति का कच्चा चिट्ठा जगह-जगह अंकित था। हाथों के निशानों से हटी दृष्टि, सहज ही शरीर के अन्य अंगों पर घूमने लगी। कहीं रगड़, कहीं खरोच के निशान तो कहीं दबाव से पूरी गांठ बंधी पड़ी थी।

"हे ईश्वर! क्या यह उसका ही अतीत सलोनी के रूप में, उसके सामने फिर से खड़ा हो जाता है?" ढेर सारा अवसाद, पीड़ा दीपा की नजरों में छलछला गई।
"बेटा सलोनी, क्या हुआ बेटा? तुम्हारे हाथों गले और गर्दन पर इतने निशान कैसे हैं?"  दीपा पूछती चली गई परंतु सामने खड़े बचपन ने जैसे चुप्पी और रखी थी।
"चुप क्यों हों, मैंने कई बार पूछा है तुमसे? कुछ बोलोगी तभी पता चलेगा ना कि क्या सह रही हो?"  कुछ रोष से दीपा ने कहा। 

दस साल की बच्ची ने आँखें ऊपर उठाईं। सफेद बर्फ के सागर में एक काला, डूबता छोटा टापू जिसे किसी भी क्षण सफेदी अपने में समां लेने के लिए आतुर लगती थी। इसके अलावा दूर-दूर तक कुछ नहीं था उन आँखों में जिनमें दीपा कुछ खोज पाती। जमी सफेद बर्फ में पानी का हर कतरा ठोस बनकर समा गया था। कितनी वीरानी, कितनी चुप्पी और अथाह जमाव से, हिमखंड का टुकड़ा बनकर खड़ी थी सलोनी। 
"सलोनी तुम बैठो बेंच पर। मैं प्रार्थना के बाद आती हूंँ। मुझे तुमसे बात करनी है। तुम शांति से बैठो, मैं अभी आई।" दीपा ने सलोनी को बेंच पर बिठाया और दरवाजे से निकल कर प्रार्थना के लिए पहुंँच गई। 

शिक्षकों की पंक्ति में सबसे अंतिम खड़ी दीपा ने लोगों की चुभती नज़रों को महसूस किया। उसे अब फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह इस स्कूल की एक अच्छी टीचर है। विज्ञान सिर्फ पढ़ाती नहीं है बच्चों के दिमाग में एक-एक बात फिट कर देती है और उसी में उसको आनंद आता है। 

बनना तो कुछ और ही था परंतु टीचर वह भी प्राइमरी स्कूल की उसने सोचा नहीं था। बच्चों के सुरताल, राष्ट्रगीत की लयात्मक उतार-चढ़ाव भी दीपा के मन को बांध नहीं सके और वह हिरण की तरह कुलांचें भरता उसके बचपन में जा पहुंचा। 

पापा उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। सिर्फ सात साल की उम्र में उसके माँ-पापा उसे छोड़कर चले गए। एक दुर्घटना हुई और उसका सब कुछ खत्म हो गया। 

दादी कहती, "कैसी छोरी पैदा किए थे जो खा गई माँ-बाप को।" ऐसी स्त्री बच्ची का मन कैसे समझ पाती? बात-बात में हाथ उठाना, छड़ी से पीटना शायद उनके क्रोध को शांत करता परंतु सात साल की दीपा के शरीर, हृदय और आत्मा को यह घाव छील डालता था। घंटों भगवान घर में बैठकर, लड्डू गोपाल को नहलाती, कपड़े पहनाती और भोग चढ़ाती थी दादी। इस कन्हैया से बहुत शिकायत भी थी उनको।

"सारी जिनगी तो सेवा की थारी कान्हा। खुद आते बालक बनके इस छोरी को क्यों भेज दिया? मार के खा गई माँ-बाप को।" दरवाजे के बाहर से सुनती दीपा मन ही मन सोचती, "दादी पैदा होते साथ नहीं मरे थे मेरे माँ-पापा। सात साल रहे थे मेरे साथ। नया स्कूटर लिए थे और उसी से जब एक्सीडेंट हुआ था तब तो वह स्कूल गई थी तो दोनों की मृत्यु की जिम्मेदार वह कैसे हो गई?" परंतु दादी के सामने बोलने की हिम्मत नहीं थी उसकी।

खैर, शहर के किराए का घर छोड़कर, वह दादी के साथ हमेशा के लिए गांँव आ गई थी। गाँव क्या था, दूर-दूर इक्का-दुक्का घरों से बनी बस्ती, चार-छह दुकानें, एक चौक, एक हटरी, एक सरकारी पाठशाला, दर्जी, सुनार और साहूकार जिसने आधे गाँव को गिरवी में खरीद लिया था। 
"दादी, मुझे भी स्कूल जाना है। कक्षा दो पढ़ चुकी हूँ। अब तीन में दाखिला करवा दो।" बड़ी हिम्मत करके एक दिन दीपा ने दादी से पूछा।
"सकूल जाएगी, झंडा चढ़ाएगी? मास्टरनी बनना है क्या थारे को? घर का कामकाज मैं करती रहूँ बुढ़ापे में और तू मेमसाब बनी सकूल जाएगी।" दादी ने गुर्राकर पानी से भरा गिलास उसके मुँह पर दे मारा। 

आज भी दादी के तेवरों से झुलसते बचपन को, कटु-स्मृतियों के सागर में गहरा पैठे पाती है दीपा। गाँव का स्कूल, दूर से आने वाले शिक्षक, तेज बारिश हुई तो स्कूल बंद हो जाता क्योंकि कच्ची सड़कों से बच्चों और टीचरों का आना मुश्किल ही था। बच्चों को भी खेती का काम, मछलियाँ पकड़ने और पशुओं को चराने में आनंद आता था, स्लेट-पाटी लेकर ककहरा लिखने में नहीं। 

"माँजी, अपनी पोती को शाला भेजो ना। कक्षा दो पढ़ ली है तीन और पढ़ जाएगी तो प्राथमिक शिक्षा पूरी हो जाएगी।" एक दिन शाला से दो शिक्षक घर आए थे। प्रधानाध्यापक ने उन दोनों को घर-घर जाकर बच्चे जमा करके स्कूल लाने का काम सौंपा था शायद। 

 "सकूल जाने से क्या मिलेगा? अभी मेरे साथ खेतों पर जाती है, घर के कामकाज में मदद करती है, वह भी बंद कराने आए हो?" भारी आवाज से गरजी थी दादी और वे दोनों शिक्षक अपना बैग संभालते निकल गए।

नौ साल की होते-होते दीपा ने दादी की मार के डर से घर के काम, खेती के काम का पचास-साठ प्रतिशत तो सीख ही लिया था। स्कूल का वह छोटा-सा भवन, सामने तिरंगे का खंभा, आते-जाते बच्चे यह सब उसके दिल में गहरा उतरता गया। 

बच्चों ने तालियाँ बजाईं और दीपा आज के अपने इस स्कूल में वापस आ गई। टीचर्स आपस में बतिया रहे थे कि आज जिस बच्चे ने प्रार्थना के बाद सुविचार कहा, बहुत अच्छा बोला। बुराई, अत्याचार का सशक्त विरोध जरूरी है ऐसा उसने जोरदार उदाहरण सहित बोला। खैर, भाषणों में बोली जाने वाली हर बात जीवन में कितनी सही उतरती है यह तो वह खुद जानती थी या उसके जैसे चंद भुक्तभोगी लोग। 

बच्चे क्लास की तरफ और टीचर स्टाफ रूम की तरफ चल पड़े। दीपा फुर्ती से उस कमरे की ओर चली गई, जहाँ उसने सलोनी को छोड़ा था। उस कमरे में बच्चे बैठ रहे थे परंतु सलोनी कहीं नजर नहीं आई। दीपा ने सब तरफ अपनी दृष्टि घुमाई और फिर स्टाफ रूम की ओर चली गई।
"दीपा, आज मेरी क्लास ले लोगी क्या, मुझे कॉपियां जांचनी है?" साथ की भाषा अध्यापिका ने पूछा।

 "मेरी तो खुद की क्लास है अभी नंदा मैम। वैसे भी मैं आपका विषय नहीं पढ़ा सकती हूँ।" कहती हुई अपनी कक्षा की ओर दीपा चली गई। इन शिक्षकों को कॉपियां, उत्तर पुस्तिका जांचने के लिए किसी दूसरे टीचर को परेशान करने का जायज अधिकार कैसे मिल जाता है, पता नहीं। 

कक्षा चौथी की उपस्थिति लेने से लेकर पीरियड खत्म होते तक पूरे समय दीपा की नजरों में सलोनी का चेहरा, उसके हाथों में पड़ी लाल-नीली चित्तियां, उसकी वो बर्फ-सी जमी आँखें घूम रही थीं। ऐसा लगता था मानो उसके जीवन में कोई तूफान चल रहा है जिसे वह अपने इस शरीर में छुपा लेना चाहती है। 

स्टाफ रूम में जाना उसने जरूरी नहीं समझा और स्कूल के चारों ओर एक राउंड लगाते हुए सलोनी की तलाश में लग गई। यह छोटा-सा सरकारी स्कूल, अपनी शैक्षणिक उपलब्धियां, व्यवस्था, स्वच्छता और नियमबद्धता के लिए शहर में अपनी पहचान रखता है। स्कूल के अहाते में फूलों की क्यारियांँ, ईंट से व्यवस्थित सीमाएं, कचरे के ढक्कन वाले डिब्बे, सब कुछ व्यवस्थित रखा है। सभी कक्षाओं के बच्चे सप्ताह में एक बार, एक घंटा इस अहाते की देखभाल और सफाई करते हैं। 

आज सारा अहाता खाली था सिर्फ माली पानी का पाइप लिए पौधों को सींच रहा था। इस माली का बेटा भी इसी स्कूल में पढ़ता है। माली के अभिवादन का उत्तर देकर, उसने नीम के पेड़ के नीचे और पीछे सलोनी को तलाश किया। अपने खाली पीरियड में इससे पहले वह इस तरह कभी घूमी नहीं थी। उसे खिड़की से बच्चे, ब्लैक बोर्ड दिखाई दे रहे थे।

इस श्यामपट्ट  की तासीर भी विचित्र होती है। काला रहकर हर बच्चे के जीवन में उजियारा लाने के लिए  प्रयासरत होता है। इस पर चॉक से लिखी गई इबारतें बचपन को समृद्ध करती हैं और भविष्य का सुंदर खाका तैयार करती हैं।

 श्यामपट्ट  पर सफेद चॉक से उकेरे चित्रों ने, दीपा के बचपन को अपनी ओर खींच लिया था। दादी से चोरी-छिपे स्कूल की खिड़की से सटी, वह पढ़ाते शिक्षकों और दोहराते बच्चों में डूब जाती थी।

 उसके दसवें साल में प्रवेश ने दादी के हृदय की सुगबुगाहट बढ़ा दी थी। घर से बाहर अकेले निकलने पर पाबंदी लग गई। लहंगा-ब्लाउज पर सिर से चुन्नी जरूरी कर दिया, अपरिचितों के सामने न निकलने की बंदिश लगाई गई अर्थात बचा-खुचा बचपन भी छीन लिया था। 
दीपा को याद है कि एक दिन गाँव में दादी के दूर का कोई रिश्तेदार आया। दादी ने उस दिन हलुवा बनाया था शायद उनका कोई अपना बहुत सालों बाद आया था। दीपा पर नजर पड़ते ही उसने पूछा, "माधव भाई जी की छोरी है ना यह। शहर में भाईजी-भावज ने खूब मौज की थी छोरी ने भी की होगी। सकूटर में घूमते थे, अब देखो सर ढंके गांँव में सड़ रही है।"

और किसी ने यह बात कही होती तो दादी उसे भूंज कर खा जाती पर वह उनका कोई सिरचढ़ा अपना था तो "हांँ-हूंँ" करके दीपा की चुन्नी हटवा दी। दीपा की खुशी का ठिकाना नहीं था वह अनजाना रिश्तेदार, उसे अच्छा लगने लगा था। 

वह गाँव भर घूमता, घर में हलुआ-खीर उड़ाता और आते-जाते दीपा की हथेली पर पिपरमेंट नारंगी की गोलियांँ रख देता। जब गोलियां रखते उसकी हथेलियों ने दीपा की हथेली को मसला, तो दीपा की चीख पड़ी थी। अब उसका घूरना, गोलियां देना उसे पसंद नहीं आता था और उसे देखते ही वह खुद-ब-खुद अपने सिर पर चुन्नी ढंककर, उसी चुन्नी में सिमट जाती थी। 

दादी खेतों में जाती तो दीपा उनकी थैली, खाना पकड़े साथ जाती, उनके काम में हाथ बंटाती। वह रिश्तेदार दो दिनों से बीमार पड़ गया और दादी ने उसके चाय-पानी के वास्ते दीपा को घर में छोड़ दिया। वह आदमी बरामदे की चारपाई से उठकर, रसोई में भात पकाती दीपा से सटकर बैठ गया। उसकी चुनर हटा दी और पीठ पर से हाथ सरकाया हुआ, कमर तक ले गया। दीपा की छिटककर दूर हट गई और आँगन में भाग निकली। उसकी साँसें तेजी से चल रही थीं।

वह दौड़ती खेतों की और भागी। दादी को बताया तो वह सुनने को तैयार नहीं थी। शाम को सिर से पैर तक कंबल ओढ़ कर सोते, उस रिश्तेदार ने ऐसी कहानी गढ़ी कि दादी ने दीपा को छड़ी से खूब पीटा। 
"तेरे ब्याह के लिए घर-बार बतायेगा ये, तू इसे ही बदनाम करती है। झूठी, करमजली दो साल में तेरा ब्याह करके ही मेरी छाती हल्की होगी।" दीपा को आज की मार ने शरीर में कम, दिमाग में ज्यादा असर किया था।

उस मक्कार आदमी की आँखें, उसकी मंशा सब कुछ दीपा ने ताड़ लिया था। दूसरे दिन तो उसने जबर्दस्ती दीपा को खाट पर धकेल दिया और अपना मूंँछदार चेहरा उसके मुंँह पर लगाया ही था कि दैवयोग से उसी समय दर्जी चाचा की आवाज आई और वह हड़बड़ा कर ऊपर से उठ गया। बिखरे बालों, आँसू भरी आँखों से दीपा बाहर आ गई। दर्जी चाचा कपड़े की थैली लिए आँगन में बैठे थे। उसने उनकी ओर देखा और बिना रुके दरवाजे से बाहर भागती चली गई। स्कूल के अंदर जाकर ही दम लिया था उसने। आज न जाने क्यों इस स्कूल ने अपने दरवाजे उसके लिए खोल दिए थे। दो शिक्षक, जो उस दिन घर आए थे स्कूल बंद करके साइकिल लिए निकल रहे थे। उनके साथ एक शिक्षिका भी थीं। 

"मुझे बचा लो, मुझे पढ़ना है। वह आदमी बहुत बुरा है, दादी भी बहुत मारती-पीटती है।" कहती हुई दीपा ने सारी बातें कह डाली।
उस शिक्षिका ने दीपा को पास बुलाया और उसके गले, चेहरे तथा हाथों पर पड़े निशान को देखते रही। उसके हाथों पर लाल-नीले-काले  रंग के दाग, उसके जीवन की व्यथा सुना रहे थे।

"आज तुम घर जाओ कल हम पास के शहर में, सरकारी महिला बाल विकास कार्यालय में बात करके तुम्हारे लिए जरूर कुछ करेंगे। पुलिस की भी सहायता लेंगे। अभी पानी पियो, ठंडे मन से घर जाओ और आज किसी से कुछ मत कहना।" मरती क्या ना करती, वापस दादी की ओर खेत में आ गई। दादी के छड़ी खाते हुए घर आती उसने चुप्पी साध ली थी। घर पर वह हलुआ खाता और दादी की छड़ी से दीपा की पीठ उधड़ जाती। 

दो दिनों के बाद घर के सामने एक जीप आई थी। एक महिला पुलिस, दो पुरुष पुलिस, बाल विकास अधिकारी थे। घर पर कोई नहीं था तो वह खेत पर आ गए जहां दीपा और दादी से पूछताछ की। उस आदमी के बारे में पूछा तो दादी ने बताया कि वह तो कल वापस चला गया। सरपंच, गांव के बुजुर्गो और स्कूल के शिक्षकों ने दीपा की दादी को समझाया और दीपा को शहर बालिका आवास गृह में सुरक्षित रखने की सलाह दी। पुलिस, महिला बाल विकास विभाग के हस्तक्षेप से दादी कुछ ना बोल सकी या मन ही मन इस बला के टलने से सुकून महसूस कर रही होगी।

एक बार फिर से दीपा एक छोटे शहर में वापस आई थी। बालिका आवास गृह जहाँ उस जैसी और पन्द्रह लड़कियाँ थीं,अब उसका घर हो गया। पास की शाला में उसका कक्षा चार में दाखिला हुआ अब अपने आवास की अन्य लड़कियों के साथ वह फिर से शिक्षा की राह पर निकल पड़ी थी। ऐसा नहीं था कि इस बालिका आवास की अपनी खूबियाँ, अपने  किस्से, अपनी विडंबनाएँ नहीं थे परंतु शिक्षा का एक मार्ग इसी से होकर जाता था। सो अन्य लड़कियों के साथ अपने माँ-पापा की स्मृतियों को हृदय से लगाए, उसने परिस्थितियों से जूझना सीख लिया था। खुद भी पढ़ती और साथ की छोटी लड़कियों को भी पढ़ाती थी। पढ़ने-लिखने में अत्याधिक रुचि के कारण वह इस आवास गृह की सबसे होशियार छात्रा बन गई थी।

बारहवीं के बाद जहाँ दूसरी लड़कियों ने छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए थे, वहीं दीपा को डी.एड. की परीक्षा देकर टीचर की डिप्लोमा ट्रेनिंग पूरी करने का मौका मिला। उसे तो ग्रेजुएशन करने की बहुत इच्छा थी परंतु आवास गृह पर बढ़ती संख्याओं का दबाव था। सरकारी सहायता, ट्यूशन, दान, हस्तकला की चीज बनाकर बेचने के बाद भी खर्च पूरा नहीं पड़ता।

 सरकारी विज्ञापनों में प्राथमिक शाला शिक्षिका पद के लिए वैकेंसी निकली और दीपा की किस्मत ने इस बार अपना करिश्मा दिखाया। दीपा को कभी-कभी लगता है कि जैसे उसकी किस्मत को लड़की के दर्द भरे जीवन पर रहम आ गया था।
उसे दूर-दराज गाँव में पहली पोस्टिंग मिली। आवास गृह तो छूट गया पर वहाँ उसका बिताया समय अभी भी धरोहर की तरह, उसके दिल के कोने में धड़कता है। धीरे-धीरे जीवन की गाड़ी पटरी पर चल पड़ी और अपने उस आवास गृह में, वह आज भी एक निश्चित राशि हर महीने भेजना नहीं भूलती है।

 इस सफर में हेड ऑफिस के लेखाकार नरेंद्र से उसकी जान-पहचान हुई और फिर जीवनपथ पर सहयात्री बनकर दोनों आज अपनी गृहस्थी की गाड़ी संतुलित चला रहे हैं। पांँच  साल का एक बेटा भी है उनका, जिसे अभी-अभी स्कूल में डाला है। 

दूसरे कालखंड की समाप्ति का घंटा बजा और दीपा की नज़र झटके से कक्षा की खिड़की से हट गई। वह वापस तेजी से स्टाफ रूम की ओर अगली कक्षा की तैयारी के लिए चल पड़ी। बालिकाओं के शौचालय की ओर उसने देखा, उसे सलोनी दिखाई दी। 

"अब इस कालखंड का क्या करूँ?" इसी ऊहापोह में पड़ी उसके कदम सलोनी की ओर उठ गए। 
"कहा था ना तुम्हें कक्षा में बैठे रहना, कब से ढूंढ रही हूंँ तुम्हें। बात करना चाहती हूंँ तुमसे सलोनी क्योंकि ऐसी चोटें, घावों के निशान, दर्द और दागों को जिया है मैंने। मेरे बचपन के घावों में मवाद भर जाता है जब तुम्हें देखती हूँ।" उसने सलोनी का कमजोर हाथ थाम लिया। 

उसकी संवेदनाशून्य, बर्फ सी आँखों में झांकते हुए कहा, "प्लीज़, पाँच मिनट मेरा इंतजार यही करना। मैं छुट्टी का आवेदन देकर आती हूँ। हम कहीं और चल कर बात करेंगे, हर समस्या का समाधान होता है बेटा। आज तो बहुत जागरूकता है और यह शहर है जहाँ तुम्हारी आवाज जरूर सुनी जाएगी। मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी।"  एक आश्वासन, स्नेह और अपनेपन की सच्चाई ने, सामने खड़े बचपन को झकझोर दिया। बेमौसम वसंत ने दस्तक दी और आँखों में जमा हिमखंड पिघलने लगा था।

**************

शर्मिला चौहान

सोमवार, 10 अगस्त 2026

जागेश्वर धाम

जागेश्वर धाम:  देवभूमि शिव धाम 

सावन का महीना, वर्षा  की फुहारें और देवाधिदेव महादेव की भक्ति में लय होती सृष्टि। अधिकमास में की हुई उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित जागेश्वर धाम की यात्रा, आप सबके साथ साझा कर रही हूँ।

मई की गर्मी में, शीतलता का आभास कराने वाले इस सुंदर स्थान के दर्शन के लिए हम बारह लोगों का समूह था। कौसानी के निवास होटल से मिनी बस द्वारा हम जागेश्वर धाम पहुंचे। मंदिर से पाँच किलोमीटर पहले गाड़ियों को पार्क करके, वहाँ की जीप, कारों से मंदिर जाने की व्यवस्था है। 

जीप से उतरकर करीब एक किलोमीटर पैदल ही मंदिर तक चलना होता है। साफ संकरे रास्ते, दोनों ओर आकाश चूमती पहाड़ियांँ, दाहिने बाजू बहती जटा गंगा की स्वच्छ, शांत जलधारा और पहाड़ियों से होड़ लगाते देवदार के वृक्षों की कतारें।‌ एक किलोमीटर की दूरी लगता है कि पल भर में पूरी हो गई।

यह प्राचीन मंदिर, शिलाओं और पत्थरों से बना है। बड़ा प्रांगण और उसमें 108 मंदिर जिनमें शिवलिंग स्थापित थे। जिधर देखो, मंदिरों का कलश दिखाई देता है। चारों तरफ़ पहाड़ियांँ, जटा गंगा नदी का धीमा, लयबद्ध प्रवाह, देवदार से छनकर आती शीतल वायु, नीला स्वच्छ अंबर और मंदिर के मंत्रोच्चार का स्वर, अहा! अनुपम, अप्रतिम सौंदर्य। 

मुख्य मंदिर को बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के समकक्ष रखा जाता है।  दर्शनार्थियों की लाइन लगी थी और हम सब उसका हिस्सा बन गए। 

प्रांगण के मध्य भाग में पाँच पंडित महामृत्युंजय जाप हवन‌ कर रहे थे। उस वातावरण में गूँजता उनका मंत्रोच्चार, आज भी हृदय में समाहित है। 

कोने में दो जुड़वां वृक्ष हैं जो सदियों पुराने (पाँच सौ वर्ष करीब) हैं।  तनों की संरचना, ऊँचाई और फैलाव उन वृक्षों की उम्र खुद कहते लगते हैं। शिव-पार्वती के प्रतीक इन वृक्षों ने, सालों से प्रकृति के बदलते तेवरों को अनुभूत किया होगा। 

इस अनुभूति को हृदय में समेटे हम वापस निकले। सौ मीटर की दूरी पर छोटे-छोटे होटल, रेस्टोरेंट थे जहाँ गर्म, सादा और स्वादिष्ट भोजन करके हम वहीं कुछ कदमों की दूरी पर स्थित संग्रहालय देखने गए।

पुरातत्व विभाग का यह संग्रहालय जागेश्वर धाम मंदिर के प्रांगण के जो 108 शिवलिंग थे उनमें से कुछ को यहाँ संरक्षित रखा गया है। इसके अलावा आठवीं, नवमी शताब्दी की पत्थर की खंडित, भग्न प्रतिमाओं को सहेजकर रखा है। गणपति, शिव-पार्वती, नंदी, माता सरस्वती, विष्णु भगवान की प्राचीनतम प्रतिमाओं को यहाँ देखा जा सकता है।

इस सुंदर, पवित्र, शांत देवस्थान के दर्शन करके, हम सब अपने निवास स्थान होटल वापस चले गए। भगवान शिव की अनुभूति रोम-रोम से हृदय तक प्रवाहित होती रही। सावन के पवित्र माह में शिवजी के इस जागृत स्थान को लिखकर, ऐसा लग रहा है मैं आज भी वहीं हूँ।

मंगलवार, 28 जुलाई 2026

चंद्रेश छतलानी जी की लघुकथा समीक्षा

पटल को सादर प्रणाम 🙏 

आज मैं अपनी पसंदीदा लघुकथाओं में से एक, आदरणीय चंद्रेश छतलानी जी की लघुकथा "नीरव प्रतिध्वनि" सादर प्रेषित कर रही हूँ। इस पर मेरे विचार भी हैं।

*********

नीरव प्रतिध्वनि


हॉल तालियों से गूँज उठा, सर्कस में निशानेबाज की बन्दूक से निकली पहली ही गोली ने सामने टंगे खिलौनों में से एक खिलौना बतख को उड़ा दिया था। अब उसने दूसरे निशाने की तरफ इशारा कर उसकी तरफ बन्दूक उठाई। तभी एक जोकर उसके और निशानों के बीच सीना तान कर खड़ा हो गया।  
निशानेबाज उसे देख कर तिरस्कारपूर्वक बोला, "हट जा।"
जोकर ने नहीं की मुद्रा में सिर हिला दिया।
निशानेबाज ने क्रोध दर्शाते हुए बन्दूक उठाई और जोकर की टोपी उड़ा दी।
लेकिन जोकर बिना डरे अपनी जेब में से एक सेव निकाल कर अपने सिर पर रख कर बोला “मेरा सिर खाली नहीं रहेगा।”
निशानेबाज ने अगली गोली से वह सेव भी उड़ा दिया और पूछा, "सामने से हट क्यों नहीं रहा है?"
जोकर ने उत्तर दिया, "क्योंकि... मैं तुझसे बड़ा निशानेबाज हूँ।"
"कैसे?" निशानेबाज ने चौंक कर पूछा तो हॉल में दर्शक भी उत्सुकतावश चुप हो गए।
“इसकी वजह से...” कहकर जोकर ने अपनी कमीज़ के अंदर हाथ डाला और एक छोटी सी थाली निकाल कर दिखाई।
यह देख निशानेबाज जोर-जोर से हँसने लगा।
लेकिन जोकर उस थाली को दर्शकों को दिखा कर बोला, “मेरा निशाना देखना चाहते हो... देखो...” 
कहकर उसने उस थाली को ऊपर हवा में फैंक दिया और बहुत फुर्ती से अपनी जेब से एक रिवाल्वर निकाल कर उड़ती थाली पर निशाना लगाया।
गोली सीधी थाली से जा टकराई जिससे पूरे हॉल में तेज़ आवाज़ हुई – ‘टन्न्न्नन्न.....’
गोली नकली थी इसलिए थाली सही-सलामत नीचे गिरी। निशानेबाज को हैरत में देख जोकर थाली उठाकर एक छोटा-ठहाका लगाते हुए बोला, “मेरा निशाना चूक नहीं सकता... क्योंकि ये खाली थाली मेरे बच्चों की है...”
हॉल में फिर तालियाँ बज उठीं, लेकिन बहुत सारे दर्शक चुप भी थे उनके कानों में “टन्न्न्नन्न” की आवाज़ अभी तक गूँज रही थी।
-०-

चंद्रेश कुमार छतलानी


नीरव प्रतिध्वनि ( मेरी प्रतिक्रिया)


रोटी, कपड़ा और मकान की मूलभूत आवश्यकता पर प्रायः सभी लघुकथाकारों ने कलम चलाई है परंतु कुछ लघुकथाएं हमारे दिलो-दिमाग में हमेशा के लिए अंकित हो जाती हैं। आदरणीय चंद्रेश छतलानी जी की लघुकथा "नीरव प्रतिध्वनि" पर मैं अपने विचार रख रही हूँ क्योंकि यह मेरी पसंदीदा लघुकथाओं में से है। 

रोटी, भूख और भोजन की आग सबसे भयानक आग है और इसका चित्रण इस लघुकथा में स्पष्ट दिखाई देता है।

लघुकथाकार चंद्रेश छतलानी जी की इस लघुकथा का शीर्षक भी प्रभावित करता है। आवाज़ की प्रतिध्वनि से ज़्यादा शांति या मौन की गूँज अपना असर छोड़ती है। नीरव‌ की जो प्रतिध्वनि होती है उसका असर कानों के द्वार पर नहीं अपितु हृदय के द्वार पर होता है। विचारों, भावनाओं एवं संवेदनाओं की उथल-पुथल और मंथन के लिए प्रतिध्वनि सशक्त कारक बनती है।

सर्कस पर आधारित यह लघुकथा, विषय वस्तु और कथानक के लिए अच्छी ज़मीन देती है। सर्कस में काम करने वाले लोग, पशु-पक्षी सभी सिर्फ़ और सिर्फ़ मनोरंजन का जरिया होते हैं। लोगों को हँसाने, खुश करने के लिए, चंद पैसों के लिए अपने जान जोखिम में डालकर, खुश दिखने वाले लोगों के हृदय के दुःख को समझने के लिए इस लघुकथा को बार-बार पढ़ना चाहिए।

इसके मुख्य किरदार निशानेबाज और जोकर हैं। निशानेबाज का काम उसे श्रेष्ठ कलाकार की श्रेणी में रखता है जिसका उसे अभिमान भी है। वह अपने अचूक निशाने का प्रदर्शन करके लोगों की तालियांँ और  वाहवाही बटोरता है और सर्कस की टीम में अपनी जगह कायम रखता है‌। 

जोकर, एक ऐसा किरदार जो अपने हाव-भाव, मुख मुद्रा और ऊल-जलूल हरकतों से लोगों को हँसाने का काम करता है और इस काम से उसे पैसे मिलते हैं। काम ऐसा कि अपने आत्मगौरव को ताक पर रखकर उसे, खुद की हँसी उड़ाने की आदत हो जाती है। 

सर्कस में उसका स्थान निश्चित नहीं होता, बीच-बीच में आकर वह अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाता है। लघुकथा में ऐसे एक जोकर पात्र के अचानक निशानेबाज के सामने खड़े होकर, निशाना लगाने की अपनी श्रेष्ठता साबित करने का सुंदर चित्रण किया है। 
"मेरा सिर खाली नहीं रहेगा।" इस वाक्य के कितने अर्थ निकलते हैं।
मेरे सिर पर हमेशा एक बोझ रहता है।
मेरे सिर में जो मस्तिष्क है उसमें हमेशा विचारों का मेला रहता है कि आगे क्या करूँ कि लोग हँसें और मेरी जगह बनी रहे। 
रोटी और बच्चों की चिंता हमेशा सिर पर रहती है।

जोकर का अपने सामर्थ्य, अपने गुण, क्षमता का खूबसूरत प्रदर्शन करके अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करना, उसकी अपनी व्यथा कहने का एक तरीका ही था। वो काबिल था कि सर्कस में उसे निशानेबाज का काम मिले परंतु उसका जोकर बनकर रोटी कमाने की मजबूरी थी। 

जोकर का कहना, "मैं तुझसे बड़ा निशानेबाज हूँ।" 
"कैसे?" निशानेबाज के पूछने पर अपनी कमीज़ से अपने बच्चों की छोटी थाली निकालकर, उसे अपने श्रेष्ठ होने का कारण बताना, काम की कुशलता का श्रेय अपने बच्चों की भूख, रोटी की व्यवस्था को देना, एक सरल चीज का भावपूर्ण चित्रण है। 

जोकर और दिनों से अलग मानसिक स्थिति में था इसीलिए उसने निशानेबाज को खुली चुनौती भी दी और अपने को साबित भी कर दिया। इस घटना को सर्कस देखने वालों ने चाहे खेल का एक प्रायोजित हिस्सा समझा हो परंतु जोकर का सही निशाना और उसकी  मर्मस्पर्शी आवाज़ ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। 

लघुकथाकार ने जोकर का टकराव निशानेबाज से करवाया क्योंकि वह एक ऐसे किरदार को माध्यम बनाना चाहते थे जो सशक्त, दबंग हो।‌ वह चाहता तो पशु पक्षी के ट्रेनर, नृत्य करने वाले युवा, करतब दिखाने वाले लोगों से भी जोकर का वार्तालाप करवा सकता था परंतु पाठक पर  प्रभाव उतना नहीं पड़ता जितना निशानेबाज से पड़ा।

थाली से टकराकर गोली की जो ध्वनि निकली, उसकी प्रतिध्वनि ने लोगों के हृदय में प्रवेश कर लिया था। बच्चों की भूख, परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था के लिए जोकर का किरदार निभा रहे आदमी की भी कुछ इच्छाएं, कुछ और करने की सोच हो सकती है, इस बात की   भावपूर्ण अभिव्यक्ति लघुकथाकार ने की है।

मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों के ताने-बाने से बुनी यह लघुकथा सशक्त लघुकथा है। सटीक, सार्थक संवादों, घटनाक्रम की सरल प्रवाहमय प्रस्तुति ने, लघुकथा को चित्रित कर दिया है। अंत में सर्कस में बैठे लोगों की तरह पाठक भी उस प्रतिध्वनि को महसूस करने लगता है और लघुकथाकार अपने काम में सफल हो जाता है। गोली की थाली से टकराने की "टनन्न" के मौन की प्रतिध्वनि को पाठक सुनता है, उसकी वेदना की नमी को अपने अंतस में महसूस करता है। लघुकथा ने शब्दों की गागर में संवेदनाओं का सागर भर दिया है। हर एक संवाद सामने घटित होता जान पड़ता है। 

लघुकथा के अंत के बारे में मुझे लगता है कि यदि -

"मेरा निशाना चूक नहीं सकता......मेरे बच्चों की है...।" के बाद..

हॉल में बैठे दर्शकों में चुप्पी थी सिर्फ "टन्न्नन" की प्रतिध्वनि गूंज रही थी।


अपनी इस छोटी सी प्रतिक्रिया के साथ मैं आदरणीय चंद्रेश छतलानी जी को, सार्थक सृजन के लिए अनंत शुभकामनाएंँ देती हूँ।‌



शर्मिला चौहान 
ठाणे महाराष्ट्र

सोमवार, 27 जुलाई 2026

सैनिकों पर ग़ज़ल 221 2122 221 2122



221 2122 221 2122


माँ भारती का रक्षक, है सच्चा लाल सैनिक
सीमा पे है खड़ा जो, बनकर के ढाल सैनिक।।1।

है झुंड़ शत्रुओं का, हँसता बढ़े वो आगे 
चलता है मस्त देखो, हाथी की चाल सैनिक।।2।।

आराम और छुट्टी, उसके लिए नहीं कुछ 
सीमा पे रहता चौकस, है सालों-साल सैनिक।।3।।

त्यौहार पर्व बचपन, उसकी बड़ी धरोहर 
अपनों की बातें करके, होता निहाल सैनिक।।4।।

सांझी खुशी के अवसर, बढ़-चढ़ के है मनाता 
दुख अपना साझा करना, जाता है टाल सैनिक।।5।।

रणबांकुरा निडर वो, इंसान सीधा सच्चा 
महसूस करता दिल से, लोगों का हाल सैनिक।।6।।

चरणों में भारती के, जीवन किया है अर्पण 
झुकने कभी न देगा, माता का भाल सैनिक।।7।।

************

शर्मिला चौहान

बुधवार, 15 जुलाई 2026

कहानी - जादू की झप्पी

कहानी - जादू की झप्पी 


बालकनी में समाचार-पत्र पढ़ती सुमन चौंक पड़ी। उसकी पंद्रह साल का पोती ऋतिका ने कहा, "दादी, आज विश्व कैंसर दिवस है और हमारे स्कूल में जागरूकता कैंप लगाया है।" सुमन के गाल में प्यार करके बाय करती स्कूल बस की ओर भाग गई। ऋतिका तो चली गई परंतु सुमन अपने अतीत में डूबती चली गई।

वर्षों पहले जब मेडीकल रिपोर्ट ने सुमन के ब्रेस्ट कैंसर की आशंका को सही साबित कर दिया तब उसे लगा था कि दुनिया ख़त्म हो गई है। आँखों के सामने अँधेरा छा गया था। अपने से ज्यादा चिंता अपनों की थी उसे। कैंसर, नाम ही काफी है किसी की जीने की हिम्मत तोड़ने के लिए।

"सुमन, हम अच्छे से अच्छा इलाज करवाएंगे।  तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी।" उसके पति शेखर लगातार समझाते रहते। सुमन‌ को उनकी आँखों में भी लहराता भय का सागर स्पष्ट दिखता था परंतु अडिग दीवार बने अपने पति के भविष्य का सोचकर सिहर जाती थी वो।

"मम्मी, आपको कभी कुछ नहीं होगा।" दोनों बेटे सुमन का हाथ थामकर कहा करते। बच्चों ने अपना काम खुद करने के साथ अपनी मम्मी का भी काम करने की कोशिश शुरू कर दी मानो अब समय ने उन्हें उम्र से बड़ा बना दिया था। बचपन से अचानक समझदारी तक लांघ आने का यह दौर, कल्पना से बाहर था।

एक जंग, जिसने परिवार के चार योद्धाओं को खुली चुनौती दे दी थी और सभी योद्धा अपने-अपने स्तर पर कमर कसकर तैयार हो रहे थे। आपरेशन का दिन तय करके डॉक्टर ने सुमन को हिम्मत बंधाते हुए कहा, " आपने सही समय पर जाँच कराई थी इसीलिए आपके पास इलाज का समय है। बस, आपकी हिम्मत, संयम और धैर्य की परीक्षा है और आप इसमें ज़रूर सफल होंगी।" 

पति और बच्चे हौंसला बढ़ाते कि सब अच्छा होगा तो सुमन भी मानसिक रूप से आपरेशन और इलाज के प्रति आश्वस्त होने लगी।

जीवन अमूल्य और क्षणभंगुर भी होता है इसका अहसास सुमन शिद्दत से करने लगी थी। बच्चों को आने वाले समय से लड़ने के लिए उसने उन्हें रसोई में कुछ खाना बनाने की ट्रेनिंग भी देना शुरू कर दिया।
ऑपरेशन से कैंसर प्रभावित अंग को निकालने के पंद्रह दिनों बाद, जरूरत के अनुसार रेडिएशन और कीमो थेरेपी देने की प्रक्रिया के बारे में डॉक्टर ने बताया था।

"तुम्हारी अम्माँ को बुला लेते हैं सुमन, घर पर रहेंगी तो सहारा रहेगा।" शेखर ने कहा था।
"नहीं शेखर, इस उम्र में उन्हें यहाँ बुलाकर उनसे सेवा लेना बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। मैंने एक महीने के लिए रोटीवाली लगा लिया है। घर में आने के बाद मैं बैठे-बैठे काम तो करवा सकती हूँ।" सुमन अपनी इस बीमारी की सज़ा, किसी भी बुजुर्ग को नहीं देना चाहती थी।

"सुमन, ओ सुमन! आज क्या बालकनी की धूप में सूखकर पापड़ बनने की इच्छा है तुम्हें?" सुबह की सैर, मित्रों के साथ समय बिताकर शेखर कब घर आ गए थे सुमन को पता ही नहीं चला। 

"सुखी हूँ, सूख नहीं रही हूँ। प्रकृति से मुफ्त में भेजी विटामिन डी ले रही हूँ।" सुमन ने महसूस किया कि सचमुच धूप चटक हो गई थी और त्वचा में चुभने लगी थी। अंदर आकर उसने रसोई से पानी पिया  और शेखर को भी दिया। 

सत्तर साल के ऊपर हो गए हैं शेखर परन्तु अभी भी अपने कामों के लिए किसी भी प्रकार से, किसी पर निर्भर नहीं हैं।
"उम्र बढ़ती जा रही है तो घर में काम करने वालों से कुछ काम करा लिया करो ना?" सुमन कहती तो मुस्कुरा कर शेखर जवाब देते।

"सुमी, बहुत अच्छा परिवार और बच्चे हैं हमारे। मैं रिटायर्ड हूँ पेंशन का कुछ हिस्सा खर्च करता हूँ परंतु बेटा-बहू दोनों काम करते हैं। सबकुछ खुले दिल से करते हैं दोनों। हमारे लिए तो जब तक हाथ-पैर चलते हैं मुझे शरीर से आश्रित नहीं होना हैं, बाकी आगे तो ईश्वर की इच्छा।" 

सुमन और शेखर, दोनों बड़े बेटा-बहू के साथ बैंगलोर में रहते हैं। छोटा बेटा अपने परिवार के साथ लंदन में रहता है। साल में एक बार पूरा परिवार मिलता है और तब घर में त्यौहार का माहौल होता है। अपने परिवार के आपसी प्रेम और मेलजोल को देखकर पति-पत्नी अपनी इस कमाई पर बहुत खुश होते थे।

पानी पीकर सुमन तरोताजा हो गई। बेटा-बहू काम पर और पोती स्कूल चली गई थी। अब कुछ देर बाद खाना बनाने वाली आएगी और सुमन के निर्देशन में काम करके जाएगी।

रसोई में बहू क्षिप्रा ने आज बनवाने वाली सब्जियाँ निकाल रखी थीं। सहजन की फल्लियों का छिलका उतार कर, काटने के लिए प्लेट में लेकर सुमन हॉल में बैठ गई। शेखर‌ ने टेलीविजन चालू किया और सामने कैंसर पीड़ितों की त्रासदी, उनके लिए समाजसेवी संस्थाओं के, सरकार के प्रयासों पर चर्चा दिखा रहे थे। पति-पत्नी ने एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्कुरा दिए।

सहजन के छिलके निकालती सुमन, परत दर परत फिर अपने उस समय में प्रवेश करने लगी, जिस समय को अपने जीवन से अलग कर पाने में वो आज भी कभी-कभी असफल हो जाती है। 

ऑपरेशन के बाद कीमोथेरेपी और रेडिएशन का सिलसिला शुरू हुआ। उस विभाग में जाकर सुमन ने जवान, बूढ़ों और बच्चों का कष्ट देखा, सुमन का दिल और दुखी हो गया।
कीमोथेरेपी के तेज प्रभाव से, कई रोगियों के बाल झड़ चुके थे, त्वचा का रंग काला और झुलसा हुआ लगने लगा था। अपने काले, लंबे बालों को स्पर्श करके, वह फूट-फूट कर रो पड़ती। 

कीमोथेरेपी के डर, मानसिक तनाव और दर्द से पहली बार तो सुमन पर कुछ बेहोशी छाने लगी। 
डॉक्टर, नर्स दौड़कर आ गए। सुमन के अंदर का डर, उस बिस्तर पर मल-मूत्र के रूप में फैल गया था। उसे भान हुआ कि बीमारी के साथ अब उसका अपने शरीर पर भी नियंत्रण नहीं रहा। 

अपराध-बोध और शर्म से भरी, सुमन उठकर बैठने लगी।
"रुको दीदी, मैं आपको साफ करती हूँ।" कहती हुई एक आया उसके बिस्तर, कपड़ों की सफाई करने लगी।
सुमन अपराध बोध, शर्म से नजरें झुकाए थी तो वो आया बोली, "दीदी, आज पहली थेरेपी है ना इसलिए आप डर गई। अगली बार बिल्कुल नहीं डरोगी और यदि फिर ऐसा हो जाएगा तो मैं साफ कर दूंगी।" बहुत प्यार से वह बोल रही थी।

सुमन ने उठकर उसे पास बुलाया, उसका हाथ पकड़ लिया और फिर गले से लगा लिया। इस झप्पी में प्रेम, आभार और बहुत सारा अपनापन समाया था। एक मिनट में कौन सी ऊर्जा का संचार हुआ पता नहीं।
"मैं अपने को संभालूंगी। मुझे जीतना है, इस बीमारी को हारना ही होगा। दुनिया में बहुत कुछ करना बाकी है अभी मुझे।" कहती हुई सुमन थेरेपी के लिए तैयार हो गई‌ थी।

अस्पताल आते-जाते, कुछ नर्सों एवं सफाई सहयोगियों से, दिल का रिश्ता बन गया था।  अपनी सेवाओं से लोगों को विकट परिस्थितियों में हिम्मत बनाने वाले इन स्वास्थ्य सहयोगियों की अपनी कितनी समस्याएं रहती हैं परंतु अनवरत सेवा में लगे इन योद्धाओं के समर्पण को सुमन दिल से महसूस करने लगी थी।

आज पच्चीस-तीस साल गुजर गए। सबकुछ ठीक चल रहा है तो आज कैंसर दिवस पर उस स्नेह भरी आया की याद से सुमन मुस्कुराने लगी।

वो समय, वो लोग, आस-पड़ोस और परिवार की हिम्मत ने कैंसर से लड़कर, उसे हराने में सफलता तो दी परन्तु इस प्रक्रिया ने उसके लंबे बालों को छीन लिया। जिनकी खूबसूरती के चर्चे होते थे वो बाल अब सिर पर नहीं थे। स्कार्फ बांधकर, चुन्नी लपेटकर चलने का शॉक, सुमन को कैंसर से भी भयानक लगता था। समारोहों, त्यौहारों पर तो उसकी उदासीनता सब महसूस करते परंतु बालों को जल्दी तो वापस नहीं लाया जा सकता था। समय के साथ चलते मौसम बदलते रहे और सुमन के सिर पर उगते बालों का कालापन देख-देखकर, भविष्य के प्रति आश्वस्त होती गई।

रेडिएशन की गर्मी से व्याकुल सुमन को अस्पताल के सामने नारियल पानी वाले का मुस्कुराहट भरा अभिवादन, आज भी याद है। 
"नमस्ते दीदी, बैठकर आराम से पियो। आज तो आप पहले से ज़्यादा स्वस्थ लग रही हो।" वह सिर्फ नारियल पानी नहीं बेचता था, कैंसर से जूझने वालों की अंधेरी रातों में सहज ही भविष्य की रौशनी भी डालता था।

"आज खाना-वाना भी खाओगी सुमन देवी या उपवास का इरादा है।" रसोई में घुसते शेखर की आवाज़ से चौंक पड़ी सुमन। 
सुमन दोपहर के दो बज गए थे, खाना बनाने वाली भी निकल गई थी और सुमन अपने उस समय में अटकी हुई, आज से दूर चली गई थी।

"चलिए, खाना खाते हैं।" कहती हुई वह थाली परोसने लगी और शेखर मुस्कुराते हुए सलाद काटने लगे।
खाने के बाद, दोनों आराम करने लगे और आज दिन विशेष ने सुमन को फिर से अतीत के पन्नों को पलटने में व्यस्त कर दिया।

सुमन को याद आने लगा कि उसे पाँच साल तक हर तीन महीने, छह महीने और  फिर सालभर के अंतराल में पूरी शारीरिक जांच करवानी होती थी और वह तनाव, जाँच के परिणामों की चिंता में घुलती रहती। बाल आए तो परंतु कान तक ही फिर उनकी बाढ़ जैसे बंद हो गई कई दिनों तक। अपने अलग हुए स्त्रीत्व और मातृत्व की पहचान वाले अंग का दुःख फिर सुंदरता के प्रतीक माने जाने वाले बालों से बिछोह ने सुमन की चिड़चिड़ा बना दिया था।

अपने अतीत में डूबती हुई सुमन को नींद आ गई और शाम चार बजे, ग्रीन टी लेकर शेखर ने उसे जगाया।

"आज तो सारा टाइम टेबल अलग हो गया तुम्हारा, ऐसा होना भी चाहिए कभी-कभी। एक रूटीन भी इंसान में बोरियत भर देता है।" कहते हुए सुमन के हाथों में चाय का कप पकड़ाते हुए शेखर ने कहा।

‌शाम चार बजे ऋतिका स्कूल से वापस आई तो सुमन उसे देखती रह गई।
"दादी, आज मैंने अपने लंबे बालों से बारह इंच लंबाई के बाल काटकर, कैंसर पीड़ितों के लिए  दिया है। कीमोथेरेपी के बाद गंजापन दूर करने के लिए समाजसेवी संस्थाओं ने यह कार्य स्कूल में किया था।" गर्व और खुशी से ऋतिका बता रही थी।

"दादी, बिना बालों के अपना चेहरा देखना कैंसर के रोगियों को और ज्यादा तकलीफ देता है ना इसीलिए इस संस्था ने लड़कियों से सहायता मांगी थी। मेरे लंबे काले बालों का इससे अच्छा प्रयोग और क्या हो सकता था दादी कि किसी के मन को सुकून मिलेगा। मेरे बाल तो फिर बढ़ जाएंगे।" अपने कान तक कटे बालों को छूकर ऋतिका ने कहा।

 सुमन ने अपनी पोती को झप्पी दी, "मेरी पोती सबसे प्यारी बच्ची है दुनिया की। तुमने तो बहुत ही अच्छा काम किया है बेटा, किसी कैंसर पीड़ित को जीने का साधन दिया है। ईश्वर तुम्हें हमेशा खुश रखे बिटिया।" कहते हुए उसके माथे को चूमकर सुमन एक बार जीवन के प्रति, नव पीढ़ी के प्रति आशान्वित होकर फिर मुस्कुराने लगी।


***********

सोमवार, 6 जुलाई 2026

1222 1222 122 दो ग़ज़लें


1222 1222 122

किसी के राज़ तो छिपते नहीं हैं 
 उखड़कर मुर्दे फिर गड़ते नहीं हैं।।1।।

हुई हैं मौन दीवारें घरों की
बड़े परिवार अब दिखते नहीं हैं।।2।।👌

अभी भी चलते हैं कुछ सिक्के खोटे
खरे तो ढूंढे से मिलते नहीं हैं।।3।।✔️

चले थे थोड़ी सी दूरी बनाकर 
पता था गुण ज़रा अच्छे नहीं हैं।।4।।✔️

हवा से टूट जाते हैं शजर वो
जो विपदा देखकर झुकते नहीं हैं।।5।।


हरिक चेहरे पे छाई है उदासी
हँसी के फूल अब खिलते नहीं हैं।।6।।👌

भरी जेबें हैं लेकिन दिल हैं खाली 
वहाँ अहसास अब बसते नहीं हैं।।7।।


तरही मिसरा:

अकेले में बहा लेते हैं आँसू
किसी के सामने रोते नहीं हैं।👌

**************

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 

फ़िलबदीह- 70
पहला चरण 

221 2122  221 2122


ये ज़िंदगी हमारी, लाचार चल रही है
अच्छी भली थी पहले, बीमार चल रही है।।1।।

तूफ़ाने ज़िंदगी के, लगते बड़े थपेड़े 
उस पर हमारी नैया, मझधार चल रही है।।2।।

मौसम की मार सहना, मुश्किल बना है अब तो
अपनी भी उम्र सत्तर के, पार चल रही है।।3।।

हैं आंधियाँ समय की, कब तक बचायें खुद को, 
उलटी हवा तो अब भी, दमदार चल रही है।।4।।

सबकी ख़ुशी की खातिर, जीते रहें हैं हम तो
मर्ज़ी उन्हीं की अब भी, हर बार चल रही है।।5।।

तरही मिसरा:

रणभूमि बनती साक्षी, उन बांकुरों का हरदम 
बाजू कटे हैं फिर भी, तलवार चल रही है।।

************

शर्मिला चौहान 
ठाणे महाराष्ट्र


शर्मिला चौहान

बुधवार, 1 जुलाई 2026

भाव तृप्ति (वर्षा पर)

भाव तृप्ति 


उमस से व्याकुल थी विरही धरा
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।

मेघ सज-धज के जब छाने लगे,
गीत बरखा के सब गाने लगे।
मेघ गर्जन से मानव जब डरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।1।।

डालियों पर हवा लगी झूलने, 
गर्मियों की दाह लगी भूलने।
बूँदों ने पत्तों का कलश भरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।2।।

बूँदों के गीत की रिमझिम बजी
नाचती बूँदों से धरती सजी।
प्रेम मेघ धरा का सबसे खरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।3।।

बरखा ने तन-मन को भिगो दिया,
बंद आँखों से हृदय को छू लिया।
तृप्ति का भाव चेहरों पर भरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।4।।


*************

शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं.9967674585

रविवार, 28 जून 2026

2212 1212 2212 1212 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर और सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 


फ़िलबदीह-68
दूसरा चरण 

2212 1212  2212 1212


दुनिया में आदमी को गर, कोई मक़ाम चाहिए 
मिहनत के साथ ही जुबां, पे कुछ लगाम चाहिए।।1।।

देखो जिधर उधर नज़र, आते हैं ख़ास सब यहाँ
दुनिया चलाने को मगर, कुछ लोग आम चाहिए।।2।।

अपना लिखा अज़ीज़ है, हमको भी जान लो मगर
लोगों के मन जो बस सके, वो इक कलाम चाहिए।।3।।

है भागती सी ज़िंदगी, है हड़बड़ी में आदमी 
दिन रात काम करके फिर(तस्कीने-दिल के वास्ते ), छोटी सी शाम चाहिए।।4।।

चुपचाप काम कर सकें,  हैं ऐसे लोग कम यहाँ
लोगों को आज काम कम, पर ज़्यादा नाम चाहिए।।5।।

आकाश पर चमकता वो, इक चाँद ही बहुत है पर 
तन्हाइयों से जूझने, तारे तमाम चाहिए।।6।।

इस ज़िंदगी में धूप कुछ, कुछ छाँव भी बनी रहे 
तन-मन थके जो धूप से, थोड़ा विराम चाहिए।।7।।

*********

शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 26 जून 2026

मेघ तुम आने लगे (गीत)

मेघ तुम आने लगे


तप्त दग्ध धरा आतुर 
रवि तपता खूब चातुर।
किरणों की उद्विग्न ज्वाला 
धधकती है प्रकृति बाला।
आस बन छाने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।1।।

तृषित चातक बाट जोहे,
बूँद तेरी उसको मोहे।
छोड़ती निश्वास धरती,
प्रेम वो तुझसे ही करती।
हृदय भरमाने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।2।।

धरा का है प्रेम बंधन,
मेघ तू देता है अनधन।
रिक्त शुष्क धरा अंचल,
तू उड़ा फिरता है चंचल।
सपने सुस्ताने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।3।।

चीर कर छाती दिखाती,
पीर मन की है बताती।
बीज धारण न करेगी,
सृष्टि यह कैसे चलेगी?
लौटकर जाने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।4।।

रोक देगी वो सृजन को,
वाटिका, कुंजन, विजन को।
सुधा रस से भरी गागर,
मिलन का साक्षी सागर।
बूँद टपकाने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।5।।


***********

शर्मिला चौहान 
ठाणे महाराष्ट्र

शुक्रवार, 12 जून 2026

सुरंग सुंदरी (कहानी)

सुरंग सुंदरी (कहानी)


पीठ पर बैग, हाथों में कैमरे का स्टैंड लिए नीरज पहाड़ियों में घूम रहा था। कंधे से कन्धा जोड़े, आकाश को छू लेने के लिए लालायित इन पहाड़ियों के आकर्षण से बंधा वह हर  क्षेत्र के पर्वतीय इलाकों में घूमकर ब्लॉग बनाता है। अपनी ब्लॉगर के रूप में पहचान बनाने के लिए, उसने पिछले दो सालों में बहुत मेहनत की और अब उसके ब्लॉग सब्सक्राइबर्स की संख्या अच्छी होने लगी थी।

पहाड़ियों के ढलान वाली पगडंडी पर पैर जमाते हुए उतरने लगा था, बहुत नीचे कुछ ज्यादा ही हरियाली और समतल दिखाई दे रहा था। 

स्वच्छ आकाश का रंग भूरियाने लगा।‌ नीले-सफेद रंगों के ऊपर  श्यामल भूरा लिहाफ हौले-हौले ओढ़ता सूरज, अपना तेवर समेटे, मेघों में दुबक गया।

"अरे यार! अभी आसमान साफ था और अब बादल आ गए, बस यही खराबी है पहाड़ियों की, मौसम बदलते देर नहीं लगती।" बारिश के आसार देखकर नीरज दुखी हो गया। वह जल्दी कदम बढ़ाते, ढलान से उतरने लगा। 

मौसम के बदलते तेवर के साथ हवाओं ने भी अपना रूप बदल लिया। सनसनाती, कानों में सीटियां बजाती और शक्ति से ढकेलती वो भी अपनी तीव्रता दिखाने लगीं।

"ये वैभव भी बस्स! काम करने साथ आया पर खाने-पीने का जो शौक है ना, पेट ख़राब करके रिसोर्ट में सो रहा है आज। मैं भी आराम करता तो ठीक था, आज का दिन ही बुरा है।" नीचे समतल की हरियाली, घुमावदार पगडंडियों, हवा से झूमकर योग की मुद्राएं करते पेड़ों को इस बदलते मौसम में शूट न कर पाने की कसक नीरज को परेशान कर रही थी।

कम समय में ही बादलों के समूह ने नीले आसमान के नीचे अपनी पूरी दुनिया बसा ली। इंद्रदेव ने अपना इंद्रजाल चला दिया था। बादलों के ठहाकों से पहाड़ियांँ थरथराने लगीं, नीरज के पैर पत्थरों पर जम गए। उसने बैग से रेनकोट निकाला और तभी बादलों की गड़गड़ाहट के साथ बिजली की चमक से उसकी आँखें चौंधिया गईं। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता था। लकड़ियाँ बीनने, कंदमूल-फल लेने आने वाले पहाड़ी लोग, पहाड़ी मौसम के तेवर भांपकर समय से ही निकल जाते हैं।

गर्जना इतनी भयानक कि लगा मानो आसमान का टुकड़ा फटकर, पहाड़ियों पर बिखर जाना चाहता हो। पीठ पर लदी भारी बैग, हाथों में कैमरा स्टैंड और धुआं-धुआं होता मौसम, उसे कुछ ही दूरी पर दिख रही चट्टानी खोह में रूकना बेहतर लगा।

"क्या ही खूबसूरत जगह है यह!" चश्मा साफ़ करते हुए नीरज उस खोह को निहारने लगा। एक बड़े सीप के आकार की खोह, जो करीब दस-बारह फीट लंबी-चौड़ी थी, बहुत ही शांत जगह लगी।
"ऐसी ही जगहों में शायद ऋषि-मुनि ध्यान लगाते रहे होंगे।" उसने अपने रेनकोट की टोपी निकाली और वहीं बैठ गया। जेब से फोन निकालकर वैभव को कॉल करने लगा।

इस पर्वतीय प्रदेश में पावस का आनंद लेते नेटवर्क ने भी अपने हाथ उठा लिए थे।‌ 
"यहाँ तो वैसे भी नेटवर्क की समस्या है और इस गुफा-कंदरा में तो आने की उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। अच्छा किया वैभव ने जो आज आराम से रिसोर्ट में रह गया, मेरा ही दिन ख़राब था जो आया इस पहाड़ी मौसम का आनंद लेने।" ख़ुद से  बातें करते हुए उसने आसपास नज़र दौड़ाई। खोह की अंदरूनी चट्टानों पर चमकीले बारीक पत्थर जगमगा रहे थे। उसने उन्हें स्पर्श किया तो उनमें एक ऊर्जा शरीर तक तरंगित होती जान पड़ रही थी। 

उसने उसी क्षण बैग से कैमरा निकाला और लैंस ठीक करने लगा। पत्थरों का सौंदर्य जो नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता था उसे कैमरे की आँखें  कैद करने लगीं। सीप के आकार के उस खोह के, सबसे अंतिम संकरे भाग में कोई आकृति सी दिखाई दे रही थी। 
"कोई मनुष्य है या पशु, साधु या कोई शैतान?" मन ही मन विचार करते  हुए उसने आवाज़ दी, "कौन है यहाँ?" नीरज ने दो कदम बढ़ा लिए थे।
"बोलो तो, कुछ उत्तर दो? बोल नहीं सकते क्या?" अब आवाज़ और तेज़ थी उसकी।
"यही तो खराबी है तुम शहरी लोगों में, शोर-शराबा खूब करते हो। शांति की तलाश में आकर इन पहाड़ियों को अशांत कर देते हो।" किसी स्त्री की मधुर परंतु तीखा स्वर खोह में गूंज गया। 
"तुम, तुम तो लड़की हो? इस समय इस अंधेरी खोह में क्यों छिपी बैठी हो?" नीरज का प्रश्न था।
"मैं छिपी बैठी हूँ? नहीं तो, तुमने मुझे नहीं देखा मैं क्या करूँ?" वह उस संकरे भाग से उठकर खड़ी हो गई। उसकी पीठ नीरज की ओर थी। शरीर का इंच-इंच माप, किसी सौंदर्य प्रतियोगिता के तय पैमानों सा बना हुआ। उस पर काली लंबे बालों का कमर तक झूलना उसे प्रामाणिक सुंदरी करार कर रहे थे। वह हौले से पलटी और बिजली की चमक उसके ऊपर पड़ी। बला की खूबसूरत थी वह लड़की। दूधिया रंग, बड़ी आँखें, तीखी नाक और होंठों की उपमा सोचता वह मूर्तिवत खड़ा रह गया। उस खोह में दो प्रतिमाएं ध्यानमग्न, पत्थरों के साथ तादात्म्य स्थापित कर रहीं थीं।

बादलों की गड़गड़ाहट हुई और नीरज में जैसे चैतन्य का प्रवाह हुआ।
"तुम कौन हो?" पूछ्ते हुए नीरज की जुबां लड़खड़ा रही थी।
"पहाड़ियांँ मेरी, मैं पहाड़ों की लड़की, यह प्रश्न तो मुझे पूछना चाहिए।" उसके गुलाबी होठों के बीच शुभ्र दंत-पंक्तियाँ झिलमिला रही थीं। नीरज ने सोचा, "काश, वह कवि या शायर होता।"
"मैं  ब्लॉगर हूँ, पहाड़ी गाँवों, वहाँ की परंपराओं, लोकगीतों, लोकगाथाओं को कैमरे में कैद करके लोगों तक पहुँचाता हूँ।" नीरज धाराप्रवाह बोल रहा था, "मेरा दोस्त भी साथ रहता है आज वो नहीं आया इसलिए मुझे अकेले तकलीफ़ हो रही है।" नीरज ने देखा वह लड़की लगातार मुस्कुरा रही थी।
"तुम क्या कर रही हो यहाँ?" नीरज ने हड़बड़ाते हुए पूछा।
"मैं तो रोज आती हूँ कंदमूल, जंगली फल लेने। इस खोह में बहुत शांति मिलती है इसलिए यहांँ कुछ देर आराम करती हूँ।" कहती हुई वह फिर संकरे भाग की ओर मुँह करके खड़ी हो गई।
"शांति है यहाँ? मुझे तो भयानक सन्नाटा लगता है।" नीरज बड़बड़ाने लगा।
"तुम तो ब्लॉगर हो, ऐसी जगह तो तुम्हारे कैमरे के लिए वरदान है फिर भी परेशान हो रहे हो!" वह कहती रही, "एक बात बताऊं जो बहुत कम लोग जानते है इस जगह के बारे में, शायद तुम्हारे काम की हो।" उसने पलटकर नीरज की आँखों में आँखें डालकर कहा।

गजब का आकर्षण था उसकी आंँखों में, नीरज को लगा कि जैसे उस झील में वह डूबने लगा है। उसने लड़की की ओर एक कदम और बढ़ा लिया।

"इस खोह में एक अंदरुनी रास्ता है जो बाहर के मौसम से प्रभावित हुए बिना सुरक्षित उस सुंदर झील तक ले जाता है।" कहती हुई वह उस संकरे भाग के सामने से हट गई। उसके किनारे होते ही संकरे भाग से एक सुरंगनुमा रास्ता दिखाई देने लगा।

"ओह.. वाह! अद्भुत , सचमुच! आजतक ऐसी जगह के बारे में न पढ़ा न देखा।" नीरज जोरों से चीख पड़ा।
"तुम शोर बहुत करते हो। ब्लॉग बनाना है तुम्हें इस गुप्त रास्ते का?" उस  लड़की ने आँखों ही आँखों से नीरज को टटोला।
"बनाना तो है, काश वैभव साथ होता, अकेले सब हेंडल करने में बड़ी मुश्किल होती है।" नीरज ने सरलता से कहा।

"मैं हूँ ना, मुझे सिखा देना, मैं साथ दूंगी।" उसने अब नीरज की ओर कदम बढ़ाया।
बाहर गड़गड़ाहट हुई और बिजली की चमक के साथ नीरज को उसकी पास आती सांसें,  शरीर से आने वाली पहाड़ी फूलों की खुशबू अपने में समाती मालूम हुई। उसने आगे बढ़कर नीरज का हाथ पकड़ लिया। उसके हाथों की नर्माहट और शरीर की गर्माहट से इस खोह में सुगबुगाहट हो गई।

नीरज  उसके हाथ के स्पर्श को, आँखें मूँदकर  आत्मसात करना चाहता था। 
"चलो, उठाओ अपना सामान। आज तुम्हारे जीवन का सबसे अच्छा ब्लॉग बनेगा।" कहती हुई वो आगे चलने लगी।

संकरा, चट्टानी और कुछ अंधेरा सुरंगी रास्ता नीरज को धीरे चलने पर मजबूर कर रहा था। कैमरे का स्टैंड लेकर चलना कठिन था।
"इसको छोड़ दो, वापसी में ले लेना। अभी सिर्फ कैमरे से फोटो खींच लेना।" वह कहती हुई आगे चलने लगी और नीरज ने यंत्रवत हाथों के उस स्टैंड को वहीं छोड़ दिया।
दो-ढाई फुट चौड़ी, करीब सात-आठ फुट ऊंची यह लंबी सुरंग थी।  वह सामने पायल छनकाती चली जा रही थी जैसे फूलों की चादर पर पैर रख रही हो।

"रूको भी, तुम पहाड़ी हो मैं नहीं। इतनी तेजी से मैं नहीं चल सकता।" कुछ हांफते हुए नीरज रुक गया।

वह पलटी और नीरज के पास आ गई। 
"सचमुच तुम बहुत शोर मचाते हो। अब एक बार रास्ता देख लो, झील से वापसी के समय फोटो खींच लेना। और हाँ, अंधेरे से डर लगता हो तो फोन की लाइट जला लो।" वह मोहक अंदाज में मुस्कुरा रही थी।

"अरे हाँ, नेटवर्क नहीं है पर टार्च तो जला सकता हूँ।" खुद पर झुंझलाते हुए नीरज ने फोन निकालकर टार्च जला लिया। अब रास्ता कुछ साफ दिखाई देने लगा था। 

वह सुंदरता की मूर्ति थी। सिर से पैर तक खूबसूरत। उसने फिर नीरज का हाथ पकड़ लिया और चलने लगी।
"तुम कौन सा परफ्यूम लगाती हो?" नीरज मंत्रमुग्ध सा पूछने लगा।
"परफ्यूम..!" वह रुक गई।
"ये तुम्हारे शरीर से जो ख़ुशबू आ रही है, वह कौन सी है?" नीरज के नथुनों से पहाड़ी फूलों की खुशबू, उस लड़की की देह गंध से मिलकर हृदय तक उतर रही थी।

"महक तो इस पहाड़ की है, इस मिट्टी की है। मुझमें वहीं तो घुला है।" कहती हुई वह चलने ही वाली थी कि नीरज का पैर पत्थर से टकराया और वह गिरने लगा। उस लड़की ने अपनी बाँहें बढ़ाकर उसे रोक लिया, वह उसके सीने से लिपटा था। उसकी सांसों के उतार-चढ़ाव को अपने सीने पर महसूस कर रहा था और आज इस समय से यहीं रुक जाने की प्रार्थना कर रहा था।

दुनिया का बेहतरीन परफ्यूम उसकी सांसों से दिलो-दिमाग में उतरता जा रहा था। नीरज का फोन फिसल कर गिर गया। उसकी आंखें बंद थीं और वह अपनी ज़िंदगी के इस खूबसूरत समय को हमेशा के लिए हृदय में उतार लेना चाहता था। यही वह खूबसूरत झील होगी जिसकी तलाश में वह पहाड़ियों में भटकता फिर रहा था। बाहरी मौसम का अब इस सुरंग में कोई प्रभाव नहीं था। दो सजीव मूर्तियांँ, एक-दूसरे से लिपटी हुई मानो पथरीली सुरंग में भित्तिचित्र बनकर चिपक गई हों।

"अबे नीरज, उठ ना! कितना सोएगा, हाथी घोड़े बेचकर सो रहा है तू तो। आज का समाचार पत्र तो पढ़ ले फिर बनाना ब्लॉग!" कमरे में आकर वैभव ने सोते हुए नीरज को झिंझोड़ कर उठाया।

"कैमरा ऑन कर वैभव, स्टैंड में फिट करता हूँ। बहुत सुंदर सुरंग है और यह लड़की दुनिया की सबसे सुंदर लड़की। उसका परफ्यूम, ओह मैंने नाम नहीं पूछा उसका..! क्या नाम होगा..?" नीरज बड़बड़ा रहा था।
"क्या बकवास कर रहा है तू? भांग खा लिया क्या? कल शाम से हम इस रिसोर्ट में बैठे हैं बारिश के कारण, तू कब सुरंग में गया, और हाँ लड़की भी मिली थी।" कहते हुए वैभव ने आज का समाचार पत्र नीरज के सामने फैला दिया।

"नाश्ते के बाद से खूब सो रहा है तू और मैं रिसेप्शन में बैठकर टेलीविजन, पुस्तकें और समाचार पढ़ता रहा। दो-तीन बार तो बिजली बंद हुई परंतु तेरी नींद नहीं खुली। अब जरा इस समाचार पर नज़र डाल और बता यहाँ रुकना है या बारिश बंद होने पर वापस चलें?" वैभव ने आज दिनभर का लेखा-जोखा दिया।

नीरज आँखें मलता हुआ समाचार पढ़ने लगा।
"पहाड़ियों की गुप्त सुरंग में ब्लॉग बनाने वाले ब्लॉगर को मानू झील के किनारे मृत पाया गया है। शरीर पर किसी भी चोट के निशान नहीं हैं। उसके कैमरे का स्टैंड पहाड़ी की एक गुफा में मिला। कैमरा और फोन अब तक प्राप्त नहीं हुआ है।" नीरज की आवाज़ घरघराने लगी।
"गाँववालों ने उस मृत देह की पुष्टि की क्योंकि पिछले एक सप्ताह से यह ब्लॉगर इस क्षेत्र में घूम घूमकर ब्लॉग बना रहा था।" अंतिम शब्द पढ़ते तक नीरज की आँखों के सामने अँधेरा छा गया। समाचार पत्र हाथों से सरक गया और अब एक बार फिर उसने अपनी सुध-बुध खो दिया था।


*******

शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं. 9967674585

शुक्रवार, 5 जून 2026

कुंडलियां

[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 1 .   मेघ

काले मेघा छा रहे, जन जीवन की आस।
लाते जल भरकर कलश, बुझे जीव की प्यास।।
बुझे जीव की प्यास, वसुधा भी तृप्ति पाती।
आँचल में भर नेह, हरी हो वह मुस्काती।।
बैलों को ले साथ, चलें किसान मतवाले।
उमड़-घुमड़ बरसात, बरसते मेघा काले।।

************
[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 2 .    बचपन

सारे बंधन से अलग, बच्चों की है जात।
जीवन बचपन का सहज, कोमल मन की बात।।
कोमल मन की बात, प्रेम की दुनिया सारी।
दौलत का ना मोल, अनूठी भोली न्यारी।।
मित्रों से संसार, बनाते रिश्ते प्यारे।
बचपन के दिन चार, तोड़ दे बंधन सारे।।

*****************
[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 3 .     माता

माता का नाता सदा, जग में बड़ा महान।
पाले पोसे कोख में, देती जीवन दान।।
देती जीवन दान, प्रसव की सहती पीड़ा।
बालक करे विकास, उठाती जननी बीड़ा।।
बच्चों में ही प्राण, सदा उनका हित भाता।
धन्य वही इंसान, जिसके पास है माता।।

***********
[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 4 .     नदी

ऊँचे पर्वत से उतर, आई वसुधा गोद।
सागर पिय को ढूंढ़ती, भरी छलकती मोद।।
भरी छलकती मोद, समेटे निर्मल धारा।
दोनों ओर किनार, नीर पीता जग सारा।।
वर्षा उछले धार, बहे गर्मी में नीचे।
नदियों का उपकार, विचार सिखाती ऊँचे।।

*********
[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 5 .     जीवन

छाया धूप है बिखरी, जीवन ऐसा गाँव।
सुख-दुख में चलता रहे, लगा वक्त के पाँव।।
लगा वक्त के पाँव, स्वयं से होड़ लगाता।
बहे अश्रु की धार, कभी मुस्काता आता।।
चलता यह निर्बाध, दिखाता अपनी माया।
जीवन का यह सार, सहेज लो धूप-छाया।।

************
[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 6 .      बेटा-बेटी

बेटी बेटा एक सम, दोनों संतति रूप।
मान बढ़ाते वंश का, सुंदर भाव अनूप।।
सुंदर भाव अनूप, दोनों हृदय को भाते।
उत्तम गुण संस्कार, काम अच्छे कर पाते।।
बेटे गुणों की खान, बेटियाँ प्रेमल पेटी।
खूब कमाएँ नाम, जगत में बेटा बेटी।।

******************
[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 7 .  भाषा

भाषा अपनी प्राण सम, माँ ने दी पहचान।
संग सजी सब बोलियांँ, भारत की हैं शान।।
भारत की हैं शान, प्यार अपनापन भरतीं।
बहता सहज प्रवाह, ज्ञानमय दुनिया करतीं।।
सीखो जितना खूब, सब पर और उपभाषा।
करना कभी न त्याग, बोलो सदा निज भाषा।।

*******
[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 8 . पुस्तक 

पुस्तक सागर ज्ञान की, डूब सके तो डूब।
मोती जीवन के भरे, होगी कभी न ऊब।।
होगी कभी न ऊब, साथी यही है सच्ची।
बुद्धि को दे ख़ुराक, कराती माथा पच्ची।।
खुलते ज्ञान कपाट, शब्द जब देते दस्तक।
शर्मिला कहे बात, साथ में रखना पुस्तक।।

******"
[05/06, 12:24] Sharmila Chouhan: 9 .  फोन

नवयुग की नव देन है, यह मोबाइल फोन।
जैसी मर्ज़ी आदमी, बदलता रिंग टोन।
बदलता रिंग टोन, झटपट मैसेज देखे।
घड़ी घड़ी की रील, दिखाता खुद के लेखे।। 
फोन बना जासूस, आया घोर अब कलयुग।
सबके हाथों बैंक, सिखाता सबकुछ नवयुग।।

*********
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 10 . छाता 

छाता उपयोगी बहुत, हर  मौसम की शान।
गर्मी बारिश में सदा, रखता सबका मान।।
रखता सबका मान, रहे फैशन में आगे।
काला या रंगीन, ग्राहक सोचकर मांगे।।
शाला दफ्तर हाट, बैठ कांधे पर आता।
कहे 'शर्मिला' बात, साथ में  रखना छाता।।

**********
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 11 . चिंता 

सारी दुनिया फेर में, चिंता है दिन-रात।
आती नित नव रूप में, बढ़ जाती जब बात।।
बढ़ जाती जब बात, मन को चैन ना आए।
होता चित्त अधीर, हल जब तक नहीं पाए।।
होते सभी शिकार, बच्चे नर और नारी।
ढूंढ़ रहे सब राह,‌ चिंताएं खूब सारी।।

*******
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 12 . निंदा

मानव मन का भाव है, निंदा सबद रसाल।
निंदा रस का दायरा, होता बहुत विशाल।।
होता बहुत विशाल, क्षणिक सुख दे जाता है।
निंदा से हो तृप्त, आदमी सो पाता है।।
निंदा ऐसी सोच, आदमी बनता दानव।
पकड़ो अपने कान, बनो तुम पहले मानव।।

*******
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 13 . समय

दुनिया में बलवान है, समय वक्त या काल।
चाहे कितना भी करो, समझ न आए चाल।।
समझ न आए चाल, नचाता सबको आगे।
आये कभी न हाथ, निरंतर सरपट भागे।।
कदम मिलाना साथ, कहलाते तभी गुनिया।
समय बनाता लोग, गाँव देश और दुनिया।।

*********
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 14 . प्रकृति 

सुंदर प्रकृति बड़ी नटी, क्षण क्षण बदले रूप।
मौसम ऋतुओं से सजी, ढलती सब अनुरूप।।
ढलती सब अनुरूप, जादू चले फिर इसका।
धरती अंबर वायु, गुणगान करते जिसका।।
पंछी नदियांँ फूल, गिरि ताल और समंदर।
शोभित है संसार, सचमुच प्रकृति है सुंदर।।

*******
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 15 . तुलसी 

महिमा तुलसी की बड़ी, जग में है विख्यात।
रोगों से रक्षा करे, वसुधा की सौगात।।
वसुधा की सौगात, हरिप्रिया यह कहलाती।
सनातनी के द्वार, हमेशा पूजी जाती।।
कार्तिक पावन मास, सभी पर्वों की गरिमा।
प्रबोधिनी दिन लोग, गा रहे तुलसी महिमा।।

**********
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 16 .  सावन

सावन की छटा अनुपम, सजे प्रकृति सुकुमार।
मरकत की चूनर पहन, शोभे रूप अपार।।
शोभे रूप अपार, नदी तालों में पानी।
झरते मोती धार, करते मेघ मनमानी।।
पूजा व्रत त्यौहार, माह यह सबसे पावन।
हल ले चले किसान, बरसता रिमझिम सावन।।

*****
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 17 .  बिटिया 

बिटिया चिड़िया एक सम, खेलें आँगन छाँव
मीठी बोली बोलतीं, नन्हें रखतीं पाँव।।
नन्हें रखतीं पाँव, बसेरा कुछ दिन करतीं।
नेह प्रेम का भाव, हृदय खुशियों से भरतीं।।
भवन हो घर मकान, चाहे महल या कुटिया।
सुखी वही परिवार, जहाँ हों चिड़िया बिटिया।।

********
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 18 . पानी 

पानी होता सरल मन, घुले मिले सब संग।
मिलता जिसके साथ भी, ढल जाता उस रंग।।
ढल जाता उस रंग, गुण यही बड़ा निराला।
करता सबकुछ दान, बने बादल मतवाला।।
कीमत है अनमोल, बात यह जिसने जानी
बचत करें सब लोग, धरा का धन है पानी।।

***********
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 19 .  युद्ध 

सालों से इस देश ने, खूब सहे हैं युद्ध।
महापुरूषों ने किया, जनमानस को शुद्ध।।
जनमानस को शुद्ध, सकल जग जूझ रहा है।
वही पुरानी चाह, वर्चस्व सूझ रहा है।।
सबके अपने दाँव, रोकना हिम्मत वालों।
बनता फिर जब देश, लगते हैं कई सालों।।

******
[05/06, 12:25] Sharmila Chouhan: 20 . सागर

सागर की क्षमता विपुल, सिखलाता है धीर।
अंदर जल की सृष्टि है, दिखता पर गंभीर।।
दिखता पर गंभीर, नदियाँ उसमें समातीं।
चंचल लहरें शोर, तटों पर खूब मचातीं।।
रत्नों के भंडार, छलके अमृत का गागर।
धीर वीर मतिवान, वसुधा गोद में सागर।।

*******

हास्य कुंडलियांँ


अखबार पढ़ सुबह-सुबह, चौंके बांकेलाल।
पार्टी खटमल नाम की, बनी हाल-फिलहाल।।
बनी हाल-फिलहाल, देने  वाली है धरना।
खाना पीना मुफ्त, काम ख़ास नहीं करना।।
अवसर सुंदर आज, लेंगे युवा  हिस्सा बढ़।
खुश हैं बांकेलाल, आज सुबह अखबार पढ़।।

*************

नारे कर तैयार वो, पहुंचे नियत स्थान।
कोई दिखा न सामने, खाली था मैदान।।
खाली था मैदान, पुलिस की संख्या भारी।
देखो खेले कौन, धुरंधर अपनी पारी।।
बांके थे लाचार, रूप बदले थे सारे।
लगते थे कुछ और, रंग बदले से नारे।।

**********

धक्के खाकर पेट भर, तब हो बांके बोर।
आगे-पीछे देखते, निकले घर की ओर।।
निकले घर की ओर, भूख-प्यास करे व्याकुल।
मिले समोसे चार, रास ना आए बिल्कुल।।
गर्मी पड़े अपार, खटमल नहीं थे पक्के।
लौटे बांकेलाल, खाकर मुफ्त के धक्के।।

**********

शर्मिला चौहान

सोमवार, 1 जून 2026

गीत- भाव तृप्ति या तृप्त धरा

भाव तृप्ति 


उमस से व्याकुल थी विरही धरा
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।

मेघ सज-धज के जब छाने लगे,
गीत बरखा के सब गाने लगे।
मेघ गर्जन से मानव जब डरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।1।।

डालियों पर हवा लगी झूलने, 
गर्मियों की दाह लगी भूलने।
बूँदों ने पत्तों का कलश भरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।2।।


जीवन आधार जल है मानते,
बूँद अमृत तुल्य है ये जानते।
प्रेम मेघ धरा का सबसे खरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।3।।

बूँदों ने तन-मन को भिगो दिया,
बंद आँखों से हृदय को छू लिया।
तृप्ति का भाव चेहरों पर भरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।4।।


*************

शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं.9967674585

सोमवार, 18 मई 2026

2122 2122 212 पर ग़ज़ल




फ़िलबदीह-66 
प्रथम चरण 
क़ाफ़िया -आन
रदीफ़ - है
शा'इरा- ममता किरण जी

2122  2122  212


बाद बरसों पक रहा पकवान है
घर में आया आज इक मेहमान है।।1।।

बाँच लेता चेहरे से भावों को जो
वो बिना डिग्री के भी विद्वान है।।2।।

दो निवाले साथ में परिवार के
खा सके वो आदमी धनवान है।।3।।

चंद बूँदें रक्त की दें ज़िंदगी 
कर सको तो बस बड़ा यह दान है।।4।।

पोटली में बांध किरणों को चला
सूर्य का लो हो रहा अवसान है।।5।।

है सिकुड़ती नदियों की अपनी व्यथा
फिर भी मानव उनसे क्यूँ अनजान है।।6।।

ढूंढता था सब जगह मैं रात-दिन 
हाट में बिकता मिला ईमान है।।7।।


तरही मिसरा -

ज़िंदगी से हार जाना है ग़लत 
जी के दिखला तब कहूं इंसान हैं।

*********

शर्मिला चौहान

शनिवार, 9 मई 2026

1222 1222 1222 122पर ग़ज़ल

1222 1222 1222 122

बुरी नज़रों से मैं तुझको बचाना चाहती हूँ
इसी छोटे से आँचल में छुपाना चाहती हूँ।।1।।

बड़े होने का तेरा सपना ही जीवन है मेरा
उसे ही मैं हकीकत अब बनाना चाहती हूँ।।2।।


बहुत मुश्किल से पहुँचाया तुझे ऊंचाइयों पर
हँसी इक पर तेरी सब कुछ भुलाना चाहती हूँ।।3।।

तेरी राहों के सारे कण्टकों को बीनकर मैं
उन्हीं राहों को फूलों से सजाना चाहती हूँ।।4।।

कमाने में लगा तू भूल घर की दाल रोटी 
पका कर अपने हाथों से खिलाना चाहती हूँ।।5।।

अकेले रात में आए नहीं जब नींद तुझको
तेरे कानों में लोरी गुनगुनाना चाहती हूँ।।6।।

मुझे भगवान बस सेहत व लंबी उम्र दे दे
तेरे बच्चों को बाँहों में झुलाना चाहती हूँ।।7।।


***********

शर्मिला चौहान

गुरुवार, 7 मई 2026

योद्धा ( दायरे संग्रह)

योद्धा  (कहानी)


आज का दिन विजय के लिए सपनों के सच होने का दिन था। इस वर्दी के लिए उसने और उसकी माँ गीता ने जीवन भर मेहनत की थी। अपनी पहली पोस्टिंग के साथ उसे राज्य के उस जिले का कार्यभार संभालना था, जहाँ जाने से अनुभवी ऑफिसर भी कतराते थे। यूपीएससी की परीक्षाओं के बाद करीब दो साल की कड़ी ट्रेनिंग पूरी करके, आज उसे उसका लक्ष्य मिला था। 

आज शाम की विदाई पार्टी के बाद कल की ही ट्रेन टिकट उसने बुक करवा ली थी। माँ के पास जाकर सात दिन उनके साथ रहकर, उसे अपनी पोस्टिंग की जगह जाना था। सामान पैक करके उसने सामने रखी दो तस्वीरें जिसमें एक हनुमान जी की और एक अपने बचपन की, हाथों में उठा ली। अपने परिवार की उस  तस्वीर में डूबता चला गया। कुछ बातें उसे याद हैं और कुछ माँ से सुन-सुनकर बड़ा हुआ है।

इस तस्वीर में वह सात साल का है। उसके साथ उसके पापा, उसके हीरो, सीनियर सुपरीटेंडेंट ऑफ पुलिस अतुल वर्मा और माँ, जीप के पास खड़े हैं। अपने बचपन की यादों को वह फिर से सहेजने लगा था। पापा की पोस्टिंग हर तीन साल में अलग जगह हो जाती थी। फोटो वाली वह जगह उसके यादों में जीवित थी। यह पापा की सरकारी जीप थी। पापा की वर्दी, उनका रुतबा, उनके मान-सम्मान को वह अपना आदर्श मानने लगा था। जीप लेकर ड्राइवर अंकल आते तो वह पहले एक चक्कर घूम कर आता था। पापा की जीप को उस सड़क के अंतिम छोर तक जाते देखता रहता और सैल्यूट करता था। 

इस नक्सलवादी जगह में पोस्टिंग होने पर माँ ने बहुत विरोध किया था। 
"गीता, जिस दिन इस सेवा को ज्वाइन करते हैं उसी दिन अपना सर्वस्व देश के नाम कर देते हैं पुलिसवाले। वहां के लोग भी तो रहते होंगे तो एक पुलिस अधिकारी का परिवार क्यों नहीं रह सकता? वैसे तुम चाहो तो अपने माता-पिता के पास भी रह सकती हो। मैं छुट्टियों में आता जाता रहूंगा।" पापा के विचार बिल्कुल स्पष्ट थे।
 
आखिरकार, पापा के ड्यूटी ज्वाइन करने के करीब दो महीने बाद माँ कुछ सामान और मुझे लेकर उनके पास आ गई। समाचार पत्रों में लगातार इन आदिवासी क्षेत्र में बढ़ते नक्सलवाद और आतंक की खबरें, माँ को विचलित कर दिया करती थीं। यहाँ आने के बाद यहाँ की सुंदरता, शुद्ध वातावरण और स्वच्छंद हवाओं ने कुछ ही दिनों में माँ का मन मोह लिया था। बड़ा सा बंगला, चारों ओर हरियाली, दूर से दिखता तालाब और गाँव वालों का पूजा स्थल सब कुछ फिल्मी लगता था। 

"यहाँ की सब्जियां, दालें बहुत स्वादिष्ट हैं, कीमत भी कम है।" माँ अपने बजट से खुश थी। 
"भोले-भाले आदिवासी लोग हैं। अभी भी वस्तु विनिमय पर भरोसा करते हैं बेचारे। अपनी उपज की सही कीमत भी नहीं लगा पाते हैं, ऐसे में हमारे-तुम्हारे जैसे शहरी लोग इनको लूट लेते हैं।" हँसते हुए पापा ने कहा और माँ गुस्सा हो जाती थीं।

पापा को सब "बड़े साहब" कहा करते थे। लोग आम, तेंदू, कटहल, तालाब की मछलियाँ देने आते थे। पापा सभी को धन्यवाद सहित कुछ रुपए, बच्चों के लिए कपड़े, पुरुषों के लिए धोती दिया करते थे। हम जब भी शहर या किसी बड़े कस्बे में जाते तो वहां के हाट-बाजार से यह सब चीज खरीद लाया करते थे। 

मुझे दूर के एक ठीक-ठाक स्कूल में भर्ती किया गया था। सरकारी गाड़ी से स्कूल आना-जाना होता था। जब कभी कहीं नक्सली हमला होता तो डर से स्कूल बंद हो जाया करता था। आने वाले शिक्षकों को अपनी जान का डर था। वह भी तीस-चालीस किलोमीटर दूर से बसों में आया करते थे। मेरी पढ़ाई का हाल बेहाल देखकर माँ बड़ी चिंतित रहती थी।
"अरे! यह सब तुम घर में करवा सकती हो और यहाँ कोई जिंदगी भर थोड़े ही रहना है। दो-तीन सालों में दूसरी पोस्टिंग आ ही जाती है।" पापा ने मेरी पढ़ाई की समस्या भी हल कर दी।

अपने कड़े अनुशासन और नक्सली आतंकवाद को खत्म करने के हौंसले के कारण, पापा ने चप्पे-चप्पे पर पुलिस का जाल बिछा दिया। आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए वे खुद अपने क्षेत्र में आने वाले सभी पुलिस थानों का लगातार निरीक्षण करते रहते। वहां के सामान्य लोगों के दिलों में उनकी सच्चाई और ईमानदारी ने घर बना लिया था। शुरू में तो सब कुछ शांत था शायद दुश्मन इस पुलिस वाले की चाल समझने में लगे थे। चार महीने बाद उनकी सरगर्मियां बढ़ने लगीं।

एक दिन उन्होंने हाट में आकर लूटपाट किया और विरोध करने पर एक कांस्टेबल को मार डाला। उनका नेता बिसमा, जिस पर सरकार ने बीस हज़ार का इनाम रखा था, उसने लोगों को खुलेआम धमकाया और पुलिस वालों से दूर रहने की सलाह दी। उस रात पापा घर नहीं आए, माँ और मैं रात भर उनका रास्ता देखते रहे। पापा सुबह उस कांस्टेबल की पत्नी और दो बच्चों को अपने साथ, अपने बंगले में सुरक्षित रखने के लिए लेकर आए।

उस दिन के बाद उन नक्सलियों के पूरे गिरोह की गहरी पड़ताल एसएसपी अतुल वर्मा के नेतृत्व में होने लगी। कौन, कब, कहाँ आता-जाता है? कितनी मात्रा में हथियार, बम हैं और कहाँ-कहाँ तक उनकी पहुँच है। उनको सहयोग करने वालों, आश्रय देने वालों, जरूरत का सामान पहुंचाने वालों को ढूंढ कर निकाले जाने की खबर फैल गई। भनक मिलते ही पुलिस दस्ता ठिकानों पर हमला कर देता और इस तरह दो-दो, चार-चार नक्सली मारे जाने लगे। 

जंगलों में छुपकर नक्सलवाद फैलाने वालों के पैरों तले जमीन हिलने लगी। एक जांबाज पुलिस अधिकारी ने खलबली मचा दी थी। 
"अगले आदेश तक शाला, हाट, पशु मेला सब बंद रखे जाएंगे। झुंड में कोई नहीं घूमेगा, सब पर नियंत्रण रखा जाएगा।"  पुलिस महकमा खूंखार नक्सलियों से निपटने की हर संभव कोशिश कर रहा था। जब शिकंजा कसा तो कुछ गिरफ्तार हुए और कुछ का एनकाउंटर करना पड़ा और उनके ठिकानों से बड़े हथियारों का जमावड़ा सील किया गया। 

मेरा सातवां जन्मदिन था। माँ ने पापा को शाम पाँच बजे मंदिर में आने के लिए कहा था। मैं और माँ तालाब के पास वाले उस देवस्थान के दर्शन के लिए चले गए। थोड़ी ही देर बाद पापा भी अपनी जीप से वहाँ आए। ड्राइवर अंकल और दो कांस्टेबल उनके साथ थे। सड़क पर जीप खड़ी थी और ढलान से उतरते हुए पापा मंदिर की ओर बढ़ रहे थे। तभी नक्सलियों के एक दल ने चारों तरफ से उनको घेर लिया। जीप के बाहर खड़े दोनों कांस्टेबलों को गोलियों से भून डाला। पापा को उन्होंने घुटने पर बैठ जाने के लिए कहा। गोलियों की आवाज़ से घबराकर माँ ने मंदिर के अंदर वाले झरोखे से इस भयानक दृश्य को देखा। 

माँ बाहर की ओर भागने लगी तो मंदिर के पुजारी ने उन्हें पकड़ लिया और कहने लगा,"मार डालही बहन जी। लैका ला बचा लैवो, बड़े साहब के निसानी हे।"  
मैंने भी उस झरोखे से अपने पापा को हाथ ऊपर किए, घुटनों के बल बेबस देखा। माँ शून्य खड़ी थी फिर उस पुजारी ने, मंदिर के गर्भगृह का एक पत्थर हटाकर सुरंग में हमें उतार दिया। संवेदनाशून्य सी माँ और रोता हुआ मैं, न जाने कितने देर चलते रहे। अंधेरे में टकराकर हाथ-पैर छिल गए, पैरों में नुकीले पत्थरों के चुभने से खून बहने लगा। थोड़ी सी रौशनी ने आगे का रास्ता साफ किया।

 धूल भरी पगडंडी सामने थी। उसपर पैरों को घसीटते चले जा रहे थे। पगडंडी सामने की पक्की सड़क से मिल गई। शाम गहरा गई थी, बिना बिजली की इस सड़क पर अंधकार का साया था। एक मोटरसाइकिल की आवाज़ आई और किनारे पर खड़े हमने देखा, पुलिस वर्दी में दो लोग थे। 

मैंने जोर से आवाज दी और वो रुक गए। मैंने अपना परिचय बताया और पापा के साथ हुआ इस भयानक हादसे की जानकारी उनको दी। वह दोनों भी सकते में आ गए। उन्होंने तुरंत हेड क्वार्टर से संपर्क किया और गश्त में लगे सभी दलों को सावधान कर दिया। पुलिस की गाड़ी आ गई और हम दोनों को सुरक्षित अस्पताल पहुंचाया गया। 

माँ बिल्कुल चुप, शून्य रहीं। चाचा, नानाजी, मामा सब आ गए। पापा का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। जब मेरे हाथों से पापा को मुखाग्नि दिलवाई गई तब माँ फूट-फूटकर रो पड़ी। वहाँ से हम नानाजी के साथ चले आए थे। 

विजय ने हाथ में रखी तस्वीर को अपने सीने से लगाकर फिर उसे सूटकेस में रख लिया। दूसरे दिन वह अपनी माँ के पास पहुंच गया था। यह माँ की अभिलाषा और पापा के अधूरे कार्य, देश के प्रति उनके समर्पण की भावना का परिणाम था जो आज मैं वर्दी पहनकर माँ के सामने खड़ा था। नानाजी और नानी नहीं रहे थे। उन्होंने अपने घर का एक हिस्सा माँ के नाम कर दिया था। दूसरे बड़े हिस्से में मामाजी और उनका परिवार रहते थे। मामाजी ने हमेशा ही माँ की और मेरी सहायता की, हमें आधार दिया। यह कैसी नियति थी कि आज से उन्नीस-बीस साल पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए शहीद हुए सीनियर एसएसपी अतुल वर्मा ने जिस क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाया था, आज उनका बेटा एसपी विजय वर्मा भी इसी दिशा में अपने कदम बढ़ा रहा था।

माँ ने उसके साथ जाने की जिद की तो विजय ने उन्हें दो-तीन महीने के बाद ले जाने का वचन दिया। वहाँ  पहुंचने के बाद विजय का स्वागत हुआ क्योंकि आजकल सरकार का पूरा ध्यान, पूरी शक्ति नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ने में लगी हुई थी। लोगों में वस्तु विनिमय न के बराबर था। थोड़ी आधुनिकता आ गई थी और भाषा की समस्या भी कम हुई थी। कुछ कच्ची-कुछ पक्की सड़कें बन रही थीं सिर्फ एक ही चीज नहीं बदली थी वह डर, खौफ़ जिसमें आज भी लोग जीते थे।

सरकारी गेस्ट हाउस में रूक कर अगले दिन विजय ने अपना कार्यभार संभाल लिया। एक इंस्पेक्टर और एक कांस्टेबल को साथ लेकर पहले ही दिन उसने अपने क्षेत्र में आने वाले कुछ थानों का जायज़ा लिया। अभी सरकारी व्यवस्था मजबूत हुई थी और पुलिस महकमे को विश्वास, शक्ति और हौंसला मिला था। भरपूर मात्रा में हथियार, जैकेट्स सरकार मांग पर भेजती थी। 

अगले दिन विजय ने गूगल मैप पर अपना पुराना घर, स्कूल, तालाब और मंदिर सर्च किया। वहाँ जाकर देखा बंगले में साफ-सफाई, रंग-रोगन का काम चालू था शायद सभी क्वार्टर और बंगलो को अलॉटमेंट के लिए तैयार किया जा रहा था। तालाब के पास का मंदिर ठीक-ठाक बन गया था।
 अपने हेड क्वार्टर में वापस आकर विजय ने नक्सलियों की पूरी फाइल खोल दी।
 "सर आठ बज गए हैं आप गेस्ट हाउस नहीं जाएंगे?" ड्यूटी पर तैनात इंस्पेक्टर ने पूछा।
"कुछ खाने का मंगवा लेता हूँ यहीं, खाकर सोने चला जाऊंगा।" फाइलों पर आँखें गड़ाए विजय ने कहा।

 नक्सलवाद की शुरुआत से हर दो-चार सालों में बढ़ते सरगनाओं की फाइलें, तस्वीरों को देखते एक पन्ने पर उसकी दृष्टि अटक गई। वही साल, वही अपराध, वही पुराना चेहरा जो उसके ज़हन में रहता था। बीस साल पहले का ईनामी नक्सली 'बिसमा'। बाजू में उसकी हाल-फिलहाल की तस्वीर भी लगी थी जिसमें मूँछ  अधपकी, गाल थोड़े और लटके और आँखें बिल्कुल पहले की सी। ईनामी राशि दस लाख हो गई थी। 

सिर पर हथौड़े बरसने लगे विजय के। सरकारी तंत्रों, पुलिस, सेना सुरक्षा बलों को भी धोखा देकर आज हजारों की संख्या में फैले, समाज के इन नासूरों को जड़ से खत्म करने की सोच बलवती हो गई। उसे लग रहा था कि आज कहीं दिख जाए तो आज ही उसका काम तमाम कर दिया जाए। आजकल सरकार ने इन नक्सलियों को जीवन की मुख्य धारा में शामिल करने और आत्म समर्पण के लिए मजबूर करने का बीड़ा उठाया है। बहुत ही विषम परिस्थितियों में एनकाउंटर की छूट थी। 

 सैनिक बलों और पुलिस दस्तों, सीमा सुरक्षा बलों के बढ़ते वर्चस्व से घबराकर बहुत से नक्सलवादियों ने बंदूकें छोड़ भी दी थीं परंतु अभी भी इन जंगलों में उनकी बड़ी तादाद मौजूद थी। आसपास के प्रांतों की सीमाओं से, पुलिस की आँखों में धूल झोंककर वे सरलता से आवाजाही करते थे।

विजय रात दो बजे गेस्ट हाउस जाकर सो गया। अगले दिन से ही जंगलों की मैपिंग, नक्सलियों के संभावित ठौर-ठिकानों की रैकी का प्लान चालू हो गया। कुछ नए जवान, जो उत्साही और जोशिले थे तथा कुछ अनुभवी अधिकारी और कांस्टेबल। बाहरी दुनिया को खबर किए बिना खुफिया तौर पर काम होने लगा। सरेंडर करने वालों को सरकारी सुविधा और नौकरी का दाना, गांँव वालों के द्वारा फैलाया जाने लगा।

दो महीने बाद एक बड़ा मेला था। हर वर्ष ही गाँव वाले, तीन दिनों तक इस मेले का आयोजन करते थे। आसपास के सभी गाँवों, कस्बों , शहरों की चीजें इस मेले में बिकती थीं। लोकसंगीत, नृत्य और ग्रामीण वाद्यों की सुंदर प्रस्तुति की जाती थी। खबरियों से प्राप्त सूचना के आधार पर यह तय था कि इन तीन दिनों में एक दिन नक्सलियों का दल, अपना हिस्सा वसूलने जरूर आएगा।

 पुरुष एवं महिला पुलिस कर्मियों को प्रशिक्षित किया जाने लगा। हर चार स्टॉल के बाद सरकारी प्रशिक्षित महिलाओं और पुरुषों की दुकान रखने की योजना थी।  केंद्र से भी कुछ नामी अधिकारियों और सुरक्षा बलों को धीरे-धीरे लाया जाने लगा। 
"तेरे क्वार्टर का तय नहीं हुआ क्या विजय? तू मुझे कब लेकर जाने वाला है?" माँ ने पूछा।
"अगले महीने पक्का आता हूँ माँ। तब तक क्वार्टर भी मिल जाएगा।" विजय अभी खुद ही घर लेना नहीं चाहता था। गेस्ट हाउस की जिंदगी, उसे अपने कॉलेज और ट्रेनिंग की याद दिलाती थी।

मेले के पहले दिन नेताओं ने, सरकारी कड़े बंदोबस्त में उद्घाटन और भाषण बाजी की। मेले में हर तरफ रंग-बिरंगा जीवन, अपनी वेशभूषा और संस्कृति से सराबोर होकर उमड़ रहा था। आज प्लानिंग के साथ पूरी टीम सतर्क रही। कुछ ही कांस्टेबल वर्दी में थी बाकी अधिकारी वर्ग महिला और पुरुष दल सभी यहाँ के आम लोगों में घुल मिल गए थे। पूरी सतर्कता के साथ पुलिस काम कर रही थी। 

पहला दिन सुगबुगाहट में बीत गया। दूसरे दिन मेला अपनी जवानी में था। झूले में बच्चों के झूलने की आवाजें , लोकगीतों की धुन लाउडस्पीकर में चलती घोषणाओं के बीच सादे कपड़ों में विजय, अपनी पिस्तौल संभालकर, सुरक्षा जैकेट पहने मेले से बाहर निकल गया। उसके थोड़ी-थोड़ी देर में दो महिलाएं सिर पर टोकरियां लिए और दो पुरुष रंग-बिरंगी लकड़ी लिए बाहर आ गए। इधर-उधर दृष्टि घुमाता हुआ विजय, देहाती अंदाज़ में मलंग चाल से गुनगुनाता हुआ मेले के मुख्य द्वार की विपरीत दिशा में करीब दो ढाई सौ मीटर दूर निकल गया। 
उसने अपने पीछे आने वाले अपने साथियों की उपस्थिति का अंदाजा लिया। पीपल के पेड़ के नीचे कुछ लोग दिख रहे थे। धीरे-धीरे चलता हुआ विजय उन बैठे लोगों के विपरीत दिशा में बैठ गया। उसने अपना गमछा निकला और मुँह पोंछने लगा। सिर पर टोकरी ली महिला पुलिसकर्मियों ने भी, पेड़ की छांव में, जमीन पर ही डेरा जमा लिया।
"मेला में सामान नहीं बिकिस का?" चौपाल पर बैठे एक ने उनसे पूछा।
"बिक गे, सुस्ता के जाबो संझा तक अऊ ले आबो।" क्षेत्र की बोली पर अधिकार था उन प्रशिक्षित महिलाओं को।

 उनमें से थोड़े मोटे और तेज दृष्टि वाले ने अपना मुँह पोंछा और जेब से तंबाकू लेकर हथेली पर मलने लगा। उसने कुछ इशारा किया और उनमें से दो उठकर मेले की ओर चलने लगे। उनके कुछ ही मिनट में एक और उस दिशा में बढ़ चला अब पीपल के नीचे सिर्फ दो रह गए थे। विजय उस तेज नज़र वाले, बड़ी आँखों वाले आदमी को, फाइल में छपी बिसमा के वर्तमान की फोटो से मिलाने लगा। जब पूरी तरह से मैच हो गया तब विजय ने टोकरी ली महिलाओं की ओर देखा और सामने से आते अपने दो इंस्पेक्टर्स को, जो रंग-बिरंगी लकड़ी लिए आ रहे थे। उन्हें अपनी ओर ताकता देखकर बिजली की गति से अपनी पिस्तौल संभाले झपटकर चौपाल की दूसरी ओर चढ़ गया।

टोकरी में से अपनी पिस्तौल निकालकर बिजली की तेजी से दोनों महिला पुलिसकर्मी सामने आ गईं। विजय ने बैठे  हुए उन दोनों नक्सलियों के पीछे से अपने दोनों हाथों से दोनों रिवाल्वर उनकी कनपटी पर सटा दिया। उनके पास रखी थैली छीनकर दोनों महिलाओं ने उन्हें नीचे उतार कर घुटने पर बैठने के लिए मजबूर कर दिया।
 
"जरा भी इधर-उधर हाथ सरकाए तो खोपड़ी खोल दूँगा।" गुर्राते हुए विजय ने दोनों को लात मार कर नीचे पटक दिया और पीठ पर चढ़ गया। इंस्पेक्टर और उसकी साथी ने सबको  कव्हर किया और महिलाओं ने सशक्त बलों को सूचित किया। मेले में गए नक्सलियों को उनके पहनावे के आधार पर तुरंत पहचान कर रोक दिया गया। दो को गिरफ्तार किया गया और एक ने भागने की कोशिश की तो पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर दिया।

"विजय, इसने बीस साल पहले तेरे पापा को मार डाला था। तेरे परिवार को बर्बाद कर दिया था। आज तेरे सामने तेरा अपराधी खड़ा है, चला दे गोली। वैसे भी सरकार ने कई सालों से इस पर ईनाम रखा है।"  विजय ठीक उनके सामने खड़ा था। उसकी आँखें अंगार बरसा रही थीं।
 तभी उन दोनों ने अपने हाथ ऊपर कर दिए। घुटनों के बल बैठकर आत्मसमर्पण की मांग करने लगे। 

 "यह सब नाटक है इनका, चला गोली उनकी बातों में मत आना विजय।" विजय का मन चीख रहा था।
 "नहीं सर नहीं, यह गलत है। सरकार ने उनको सरेंडर करवाने पर बल दिया है। उन्होंने आत्मसमर्पण कर लिया है इसलिए मारना ठीक नहीं है।"  सशस्त्र बल अधिकारी ने विजय को समझाया।
 "आपने अपनी योजना से इतने बड़े नक्सली, आतंकवादी को पकड़ा है सर। आगे इसका उपचार सरकार ही करे तो अच्छा होगा।"  सभी ने उसे समझाया।
"हम पुलिस वाले हमेशा कानून में कैद रहते हैं।" पापा की बातें, उनकी आवाज़ विजय के कानों में गूंजने लगी।

 पिछले पच्चीस सालों से इन जंगलों को आतंक का अड्डा बनाकर, लोगों से वसूली करने, पुलिस वालों को मारने, पुलिस चौकियों को नष्ट करने वाले बिसमा और उसके तीन साथियों के आत्म समर्पण और एक के एनकाउंटर को, अगले दिन देश के अखबारों ने मुख्य पृष्ठ पर जगह दी। नव नियुक्त जांबाज एसपी विजय वर्मा की बुद्धि और साहस का उल्लेख, देश के हर अखबार में किया गया।

दूसरे दिन अपना वही बंगला अपने नाम अलॉट करके, विजय ने दो दिनों बाद की ट्रेन टिकट बुक कर ली। आखिर माँ को वापस इस जगह लाना जो था।


*****************


यह मेरी मौलिक, स्वरचित, अप्रकाशित एवं अप्रसारित रचना है।

शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)400610
मो.नं. 9967674585

रविवार, 3 मई 2026

2122 1122 1122 22

2122 1122 1122  22

युद्ध दुनिया में छिड़ा गुम हुई ख़ुशहाली है 
सारी दुनिया की फ़िज़ा इसने बदल डाली है।। 1।।

बम धमाकों से सुरक्षित न रहे बच्चे भी 
सूनी हैं शाला सभी ज़िंदगी अब काली है।।2।।

मुट्ठी भर अन्न बचा कैसे चले यह जीवन 
पेट में दाना नहीं आई ये कंगाली है।।3।।

देखते देखते हो जाते शहर पूरे तबाह
जिस शहर में गिरे बम होता शहर ख़ाली है।।4।।

बम धमाकों से डरी दुनिया को बेबस देखा
रुकवा दे युद्ध को जो सच्चा वो बलशाली है।।5।।


**********

शर्मिला चौहान

शनिवार, 2 मई 2026

बंगला नंबर ३०४

बंगला नंबर ३०४


बीजू तेजी से कदम बढ़ाता हुआ ३०४ बंगले के पास पहुंच जाना चाहता था। मई के महीने में सूरज सात बजे तक थकता ही नहीं, पता नहीं बारह-तेरह घंटे की ड्यूटी करने में उसे कितना आनंद आता है। अपने एक हाथ में थैली पकड़े और दूसरे से आँखों पर अर्ध पारदर्शक छज्जा बनाता, वह चार बजे की उतरती धूप से कदम मिला रहा था। बीजू सोचने लगा, उतरती उम्र, उतरता सूरज और मद्धम पड़ता दीया पूरी शक्ति से दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करने में लगे रहते हैं। हल्की सी मुस्कान उसके होठों पर फैल रही थी परंतु सूखी पपड़ियों से होठों के मोड़ों में कहीं गुम हो गई। 

वह भी उतरती उम्र में आ गया है। साठ साल के ऊपर तो ढलान आने लगती है और वह तो उससे भी चार पार कर गया है। बंगले का बड़ा गेट दिखने लगा था। सबसे सुंदर, सबसे हरा-भरा और रंगीन फूलों से खुशनुमा है बंगला नंबर ३०४। गेट पर लोहे की गोलाई वाली कमान पर एक ओर से लाल-गुलाबी गुच्छे वाले फूलों की बेल, तो दूसरी ओर से घंटी के आकार के बैंगनी फूलों की बेलें बढ़ रही थीं। गेट के बीच में दोनों बेलें आपस में एक-दूसरे को स्पर्श करके विपरीत दिशा में बढ़ती चली गई और एक दूसरे के संपूरक होती गईं।
गेट के सीखचों से हाथ डालकर बीजू ने कुंडी खोलने का प्रयास किया और सफल हुआ। इस बंगले ने सूरज को ठेंगा दिखाते हुए अपनी ठंडक का वर्चस्व बनाए रखा है। आम का पेड़ जहां फलों के बोझ से झुका जा रहा है, वहीं रातरानी, जूही की बेलों ने बंगले की ऊंचाई से होड़ लगा रखी है। 

वह आम के तने से टिककर बैठ गया। आठ-दस साल पुराना होगा यह पेड़। उसके छालों की दरारों में चीटियों ने अपनी आवाजाही बना रखी थी। आज ही इनका इंतजाम करना होगा वरना यह चीटियां जड़ों को खोखला कर देंगी।
 सामने डालियों पर झूलती-लटकती कैरियां जैसे किसी पूजा के मंडप में घंटियां लगी हैं। 
दीवार से सटी, एक डेढ़-फीट चौड़ी गेंदे की क्यारियां बीजू के हृदय की धड़कन थीं। इन बंगलों में कहीं भी गेंदे के फूलों को लोग जगह ही नहीं देते हैं। बंगला नंबर ३०४ गेंदे की क्यारी रखने वाला एकलौता बंगला है। बस बीजू को लगता गेंदे उन्हीं घरों में पनपते हैं जहां जमीन से जुड़ी संवेदनाएं पनपती हैं। जब मैडम जी ने उससे बाग की देखभाल करने की बात पूछी थी तो इन्हीं विविध रंगों में खिले, छोटे-बड़े गेंदों के फूलों को देखकर उसने सहर्ष काम स्वीकार कर लिया था।

 थैली में से पानी की बोतल निकाल कर गट-गट पीने लगा तभी बरामदे में से कठोर आवाज आई। 
"कौन है, क्या चाहिए? अंदर कैसे आ गए?" आवाज से बीजू पहचान गया कि आज साहब घर पर हैं।
साहब बारह-पंद्रह दिनों में रविवार को ही आते हैं, आज तो बुधवार है और ऐसे अचानक..खैर!
"माली हूँ साहब। मैडम जी ने आठ महीने पहले काम पर लगाया है। अभी शाम को पानी डालना है इसीलिए आया हूँ।" यह साहब से  पहली मुलाकात थी तो अपनी जगह पर खड़े होकर बीजू ने कहा। 
"शाम को काम है और चार बजे आ गए! यह मेरा बंगला है कोई रेस्ट हाउस नहीं जहाँ आराम करो। जाओ छह बजे आना।" कहते हुए उन्होंने बरामदे की खिड़की का पर्दा खींच लिया।

"हे भगवान! इतनी धूप में सोचा था कि थोड़ा आराम करूँ फिर लॉन की घास काट कर, पौधों में पानी डाल दूँ। कितना कसैला आदमी है।" मन ही मन सोचता हुआ थैली उठाकर बीजू थके कदमों से वापस गेट की ओर बढ़ गया। कुछ ही दूरी पर नगरनिगम का बगीचा था, वहीं कोने की बेंच में बैठ गया। पानी के फव्वारे में जमा पानी पंछियों के लिए तालाब बन पड़ा था। अपनी छोटी चोंच में बूंद भरते और गटक लेते फिर किनारे में थोड़े से भरे पानी को पंखों से अपने ऊपर फेंक लेते।  
"थोड़े में खुश रहने वाले यह पंछी और वह देखो इतने बड़े बंगले का मालिक।" बीजू बड़बड़ाया।

छह बजने वाले थे। धीरे-धीरे चलता बीजू वापस बंगला ३०४ की ओर बढ़ने लगा। सूरज के उतार ने हवाओं को स्वच्छंदता सौंप दी थी। अब वह लपट की तरह नहीं, थोड़ी ठंडक लिए हुए शरीर को स्पर्श कर रही थी। बीजू ने लॉन में पहुँचकर अपनी कैंची निकाली और लॉन में लगी घास को सलीके से संवारने लगा। उसकी तन्मयता और घास काटने की सुघड़ता से कुछ ही देर में, लॉन ने नया रूप का लिया। सूखी पत्तियों को झाड़ कर, किनारे रखी टोकरी में भर दिया फिर पानी का पाइप सीधा किया और नल से जोड़ने लगा। सबसे पहले उसने गेंदों के पौधों को जी भर नहलाया, हाथों से सहलाने लगा जैसे बेमौसम कलियाँ लिए खड़े, इन पौधों की हौंसला-आफज़ाई कर रहा हो। 

सहसा, उसकी निगाह सड़क के दूसरी ओर वाले बंगले के ऊपरी कमरे में रहने वाले नए लड़के-लड़की पर पड़ी। कभी-कभी दोनों को ऑफिस से साथ आते देखा था। कभी शायद घर से काम करते थे दोनों। मन ही मन हँस पड़ा वह। देखते-देखते जमाना कितना बदल गया। अब ऑफिस घर में आ जाता है और लड़का-लड़की बिना शादी ब्याह किए एक ही घर में रहते हैं। वह दोनों बालकनी में खड़े सूरज की मद्धम पड़ती रोशनी को देख रहे थे। हाथ में शायद चाय-कॉफी का मग रखा था। उस लड़की ने बालकनी में स्टैंड रख कर, दो गमलों में गेंदे के पौधे रखें थे। शाम को पानी डालती बीजू को दिखती थी। बड़े प्यार से छोटे पौधे को बड़ा होते देखा करती थी। उसके उस फूल विशेष के प्रेम ने बीजू के मन में उसके प्रति अपनापन जगाया था। 

 माली को बंगले के बगीचे में पानी डालते देख उसे लड़की ने उंगलियों से "सुंदर" बगीचे का इशारा किया। एक क्षण के लिए बीजू को लगा किसी ने उसे चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया हो। किसी को इस तरह देखना कोई अच्छी बात तो नहीं। सोचते हुए बीजू ने उस लड़की की ओर एक मुस्कुराहट उछाल दी। करीब सात बजे वह गेट बंद करके, अपने घर की ओर निकल गया।

 आज मैडम जी दिखाई ही नहीं दीं वरना वह गर्मियों में नींबू-पानी, छांछ, पना कुछ ना कुछ जरूर देती थीं। वह जितने देर काम करता मैडम जी भी पूरे उत्साह से हर पौधे की जतन करतीं।
"मैडम जी, मैं कई घरों में बगीचे की देखभाल करता हूँ पर आप सिर्फ साथ में बगीचे का काम करती हैं। बाकी घरों में मैं खुद काम करके निकल जाता हूँ।" एक शाम मैडम जी को खुद के साथ गुलाबों की कटिंग करता देख बीजू ने पूछा था। 
"पेड़-पौधे तो बच्चों की तरह होते हैं इन्हें किसी दूसरे के हाथों पूरा कैसे सौंप दिया जाए? अच्छा लगता है उनकी देखभाल, साज-संभाल करना मुझे।" मैडम जी ने उसे 'दूसरे' से संबोधित किया परंतु बीजू को उनका पौधों के प्रति यह अपनापन अच्छा लगा।


अपनी खोली से आई उमस भरी हवा बीजू को बहुत बुरी लगी। उसने हाथ पांव धोकर, लोटा भर पानी दरवाजे के दोनों ओर रखें गमलों में डाला। दिनभर की तपन झेलते गेंदे के पौधों को सहलाकर मानो उनका दुःख कम कर देना चाहता हो। उसकी बेटी तारा का पसंदीदा फूल गेंदा। तारा का अधूरा बचपन और उसके स्वयं की जवानी का जो समय मजदूरों की बस्ती में बीता, उस खोली के बाहर भी छोटा आंगन था।  
"बाबूजी, मैं एक पौधा चुरा कर लाई हूँ। बहुत सुन्दर फूल होते हैं पीले, नारंगी।" एक शाम जब वह काम से लौटा तो तारा ने उससे कहा।
"चोरी किया, क्यों बेटी?" बीजू ने आश्चर्य से पूछा।
"क्योंकि चुराने से पौधे जल्दी फूल देते हैं, मेरी सहेली ने बताया है।" कहती हुई उसने बीजू से गड्ढा खुदवाकर पौधा लगा दिया। 
अपनी जान की तरह जतन करती, जानवरों से बचाने के लिए चारों तरफ़ छोटी लकड़ियों की बाड़ बनवाई थी। जब खुद पानी पीती उसे भी सींच आती।

जिस दिन पहला फूल खिला, उस पीले जंगली फूल से खोली में बसंत आ गया और तारा के जीवन में भी। एक फूल ने उस बच्ची के ममत्व को जगा दिया था। अपनी बेटी की इस खुशी ने धीरे-धीरे, ईंट गारे में डूबे मजदूर बीजू को उस फूल विशेष का प्रेमी बना दिया। अब तो सात-आठ पौधे आंगन में लहलहाने लगे थे।
"लोग तो रंग-बिरंगे गुलाब पसंद करते हैं, तुम्हें गेंदा क्यों पसंद है?" बीजू ने तारा से पूछा।
"क्योंकि ये सुंदर भी हैं और इनमें कांटे नहीं हैं इसलिए।" बेटी की प्यारी बातों को याद करके, आँखें भर आईं बीजू की।
गैस पर चाय चढ़ाया और कल की ब्रेड ढूंढने लगा। रात का खाना यही खाता है सालों से वह। सुबह भात-साग बनाकर दिनभर के लिए ठूंस जाता है। वैसे कुछ घर हैं जहां काम करते समय शरबत, चाय और कभी-कभी नाश्ता मिल जाता है।

बाहर खाट पर गुदड़ी डालकर बीजू लेट गया। आज आकाश साफ था फिर भी दो-चार तारे दिखाई दे रहे थे। इन्हीं के जैसे चमकती थी उसकी बेटी तारा जो अब शायद इन्हीं में से कोई एक होगी। नज़रें  बेटी को तलाशने लगीं। रोज ही याद करता था वह अपनी बच्ची को। कुछ लोग इतने अच्छे, इतने सच्चे और प्यारे होते हैं कि भगवान के घर जल्दी चले जाते हैं।

 अचानक मैडम जी का चेहरा उसकी आंखों के सामने घूमने लगा। 
"नहीं-नहीं, मैडम जी क्यों जाएंगी भगवान के घर!" उसने अपना सिर झटक दिया मानो उसे ख्याल को मीलों दूर तक फेंक देना चाहता है। 
करवट बदलता रहा बहुत देर, नींद ही नहीं आई उसको। जाने अनजाने ३०४ बंगले वाली मैडम की सूरत घूम जाती और साथ ही उनके पति यानी साहब जी की आवाज भी। 
"मेरे पति काम के सिलसिले में ज्यादातर बाहर रहते हैं। किसी शनिवार-रविवार आते हैं।" बताया था मैडम जी ने। आसपास से पता चलने पर उसने कभी मैडम जी से उनके बाल बच्चों के बारे में नहीं पूछा बच्चों के नहीं होने का दुख यदि वह भोग रही थी तो बच्चे के न रहने को का दुख वह स्वयं भोग रहा था।

एक दुख ही तो है जो धर्म-जाति, रूपए-पैसे, ऊँच-नीच, लिंग किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करता। वह अपने-आप को ऊंचा उठाकर झेल जाने की प्रवृत्ति तलाश करता है या उस प्रवृत्ति का निर्माण कर देता है। दो दुखी एक-दूसरे से मिलकर राहत की सांस लेते हैं। यही बंधन मैडम जी और बीजू के बीच बनता जा रहा था। 
पर बातें तो बतंगड़ बनकर सारी दुनिया में फैल जाती हैं। शादी के बीस-बाइस वर्षों तक बाल बच्चों की कमी रही इसीलिए मैडम जी फूल पौधों पर अपना वात्सल्य उड़ेल देती थीं। एक-एक नई कली, नई पत्तियों के निकलने का हिसाब रहता था उनके पास। 

 पिछले महीने की बात है, देसी गुलाब की टहनी लचक गई। नयी टहनी थी पता नहीं कैसे टूट गई। इतने गुलाबों के बीच, मैडम जी ने उसकी देखभाल में घंटों बिता दिए। बड़े बांस की छोटी कमची से  बांधकर उसे आधार दिया। उस टहनी को चिपकाने वाले टेप से कुछ देर लपेटा और फिर धागे से बांध कर रखा। जड़ के पास नयी मिट्टी और खाद डाल दिया। उनकी सेवा देखकर बीजू को लगता कि इस बगीचे की असली माली तो मैडम जी ही हैं। 
मैडम जी के बारे में सोचते-सोचते बीजू की आँख लग गई और जब खुली तो सूरज चढ़ आया था। बिस्तर-खाट समेट कर, नहा-धोकर बीजू ने चाय चढ़ाई। खौलती चाय ने नथुनों में घुसकर दिमाग में नशा बढ़ा दिया। चाय बनते तक भात का बर्तन तैयार कर दिया। आज भात, अचार के साथ खा लेगा अब साग बनाने का समय तो नहीं था।

अभी चाय पीकर कप धो ही रहा था कि बाहर जोरों की आवाज सुनाई दी। गाली-गलौज, हो-हल्ला की जानकारी लेने के लिए कमीज पहनकर वह बाहर निकल गया। एक आदमी को सब बुरी तरह पीट रहे थे। एक औरत उसे चप्पलों से, डंडे से मार-मार कर गालियाँ दे रही थी। 
"क्या हुआ भाई!  क्या किया इसने?" बीजू ने एक पड़ोसी से पूछा। 
"बीजू भाई यह राक्षस है राक्षस। अपने गज्जू का दोस्त है, रोज आता-जाता था उसके घर। आज घर पर कोई नहीं था तो आकर गज्जू की दस साल की बच्ची को खोली में बंद करके जबरदस्ती..।"  उसका वाक्य अधूरा छूट गया और बीजू अपना सिर थाम कर, पास की एक दीवार से टिक गया। 
वक्त बदलता है पर लोग नहीं। कैसी विडंबना है कि बेटी के माँ-बाप के लिए दुनिया हमेशा दानव ही रहती है। अपने को बटोरता, समेटता भारी कदमों से अपनी खोली की ओर आ गया बीजू।

तारा, उसकी अपनी बेटी तारा, उसकी आँखों का तारा थी। बीवी ने तो उसको पैदा कर दिया और दो महीने का छोड़कर अपनी जीवनयात्रा पूरी कर ली थी। उसने तारा को सीने से लगाकर एक-एक पल सहेजा था। बच्ची को दूध पिलाने से लेकर उसकी टट्टी-पेशाब, उसको नहलाना-धुलाना और जब थोड़ी सी बड़ी हुई तो उसे पास की एक पड़ोसन के पालनाघर में छोड़कर, वह काम पर जाता था। यह बरसों की नित्य की दैनंदिनी बन गई थी। 

तारा का बबलाना, उसको बाबा कहना, पहला कदम बढ़ाना सब कुछ चलचित्र की भांति कौंध गया। चोटी गूंथने में तारा उसकी मरम्मत कर दिया करती थी।
"बाबा, एक चोटी ऊंची एक नीचे है। अच्छे से तो बनाओ।" वह कई बार रिबन खोल देती। उसका ठुनकना, लड़ियाना जैसे बीजू के जीवन का केंद्र था। सात-आठ बरस की हो गई तब तो बड़ी समझदार हो गई थी। कभी-कभी उसकी नानी आ जाता करती थी, साथ में कुछ दिन रहकर उसे दुनियादारी समझाती थी। चाय बनाना भी सिखा दिया था उन्होंने। 
 "बाबा, आज मैं चाय बनाऊंगी तुम बैठो।"  दिनभर ईंट गारे में लगे पिता को जैसे दुनिया का सुकून मिल गया। उसकी प्यारी बातों से जीवन में रस घुल जाता था। मजदूरों की बस्ती में सभी एक-दूसरे के साथी बन जाते हैं। कोई सब्जी-तरकारी दे जाता तो कोई त्यौहार का पकवान। कुछ दोस्तों से बीजू का अच्छा नाता था तो तारा उनके बच्चों के साथ खेलती, उनके घर जाती थी।
"बाबा, आज भुवन काका ने जलेबी दी थी।"  एक शाम तारा ने बताया।
"अच्छा! भुवन की तो तबीयत खराब है, वह तो काम पर भी नहीं आ रहा है। कल उसका हाल पूछकर आऊंगा।" बीजू ने तारा से कहा और शाम की रोटी पानी का इंतजाम करने लगा।

दूसरे दिन भी ठीहे पर भुवन नहीं दिखा।
"क्यों बे गणपत, भुवन को क्या हुआ काम पर नहीं आता।" बीजू ने एक साथी से पूछा।
 "कुछ दमा का अटैक आया है कहता था। कहता था दो-चार दिन आराम करके काम पर आएगा। उसके बीवी-लड़का भी गांव गए हैं जब आ जाएं तब उसकी देखभाल होगी।" गणपत कहता रहा और बीजू सोच में पड़ गया, "बीवी बच्चा नहीं है तो बीमार भुवन जलेबी क्यों लाया? तारा को देने घर क्यों आया?" बीजू जितना सोचता उतने ही संदेह की खाई गहराती जाती। 
"घर में मेरे ना रहने पर क्यों आया होगा भुवन?" बीजू की घड़ी की सुई अटक गई थी।

 उसका मन बिल्कुल नहीं लग रहा था। उसने आधे दिन की छुट्टी ठेकेदार से मांगी और बस्ती की ओर आ गया। पहले भुवन के घर गया ताला देख कर तुरंत अपनी खोली की ओर निकल गया। खोली के आंगन में सन्नाटा था 
"पता नहीं, आज तारा अंदर सो गई क्या वरना तो आँगन में ही खेलती है।"  सोचता हुआ बीजू सब तरफ नजर दौड़ाने लगा। खोली के अंदर से दबी-घुटी सी सांस की घरघराहट कानों तक पहुंची।
"तारा, खोल बेटा दरवाजा खोल। क्या हुआ तेरी तबीयत तो ठीक है ना?" दरवाजा पीटते हुए बीजू चिल्लाया। पागल-बौखलाए पिता ने चीखना शुरू कर दिया। दरवाजे को दो-चार लातें मारकर तोड़ दिया और अंदर चला गया। एक आदमी उसे धक्का देकर बाहर की ओर भागा। बीजू गिर पड़ा परंतु भागते आदमी को पहचान गया। 
 "कमीना, नमकहराम, गद्दार राक्षस!"  गालियां देता बीजू चारपाई की ओर दौड़ा।
 तारा, उसकी फूल सी बच्ची, बिखरे बाल, मुँह-नाक से खून बह रहा था। अपनी बच्ची को छाती से लगाकर बाहों में उठाए चूमने लगा बीजू।

हल्की सांस का आभास हुआ तो वैसे ही बच्ची को उठाए बाहर की ओर भागा। आसपड़ोस के लोग जमा होने लगे थे। बीजू, बेटी को दोनों हाथों में उठाएं दौड़ता-भागता गाँव के चिकित्सा केंद्र में पहुंचा। पड़ोसी पीछे-पीछे भागते आ रहे थे। वहां जो डॉक्टर था उसने बच्ची को मृत घोषित कर दिया। अपनी तारा को अपने सीने से लगाए बीजू पागलों की तरह गाँव में घूम रहा था। लोगों ने समझा बूझकर बच्ची का अंतिम संस्कार किया। उसी जगह पर बैठा रहता था बीजू। जब तेरह दिन हो गए तब वह अपनी खोली में गया। कुछ सामान एक थैली में भरकर, बेटी की तस्वीर लेकर निकल गया। खोली खाली थी, बीजू के दिल की तरह वीरान और सुनसान। आंगन में लगाए गेंदे के पौधे सूख गए थे। उनकी ओर देखकर बीजू का कलेजा मुँह को आ गया।
महीने भर के अंदर उसने भुवन को ढूंढकर को मार डाला। लोगों के सामने तब तक उसका गला दबाता रहा जब तक सांसों की घरघराहट बंद नहीं हो गई। खुद ही पुलिस थाने में जाकर अपना अपराध कबूल कर लिया था। उसकी स्वीकारोक्ति, हत्या का मकसद, गाँव वालों की गवाही से उसे हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

शहर के बड़े जेल में बीजू अपने जीवन के दिन निकाल रहा था। ना कोई इच्छा ना कोई उद्देश्य। तारा की फोटो उसने विशेष अनुरोध करके अपने पास रख लिया था। जेलर साहब दुनियादारी के रंग और इंसान को समझते थे। उन्होंने उसे बाग का काम सौंप दिया। फूलों-पौधों में अपना सुख तलाशना सिखाया। धीरे-धीरे बीजू का मन इन क्यारियों को हरा-भरा बनाने में रमने लगा था। 

रविवार, जेलर साहब के क्वार्टर के बगीचे में भी निराई-गुड़ाई कर आता था। जेलर साहब की दस-बारह साल की बेटी उसे माली चाचा कहती थी।  बीजू हमेशा उसे फूलों का गुलदस्ता दिया करता था।
"आप मेरीगोल्ड के फूल क्यों नहीं लगाते?" एक दिन बच्ची ने पूछा।
मेरीगोल्ड का अर्थ जानने के बाद बीजू ने खुशी से उस अहाते में गेंदे के कई पौधे लगा दिए और उसके फूलों को देखकर खुश होती बच्ची के चेहरे में डूबकर तारा को ढूंढने लगता था। 
अपने शांत स्वभाव, काम में मन लगाने की आदत, नियमित दिनचर्या और जेलर साहब के प्रमाण पत्र ने उसकी आजीवन सजा को बीस साल की कैद में बदल दिया। जेलर साहब तो दूसरी जेल में चले गए परंतु बीजू उनको आज तक नहीं भूला है। 

पड़ोस के उस हो-हल्ले और उस आदमी के कुकर्म ने जैसे बीजू को तीस साल पीछे धकेल दिया था। सिर, हाथ-पैर सब दुख रहा था। मन व्याकुल था तो खाट पर पसर गया। उस मासूम बच्ची और उसके मां-बाप के हृदय की वेदना को, उनकी छटपटाहट जैसे बाँट लेना चाहता था। करीब चार बजे घर से निकला। सब सुनसान था मानो कुछ घटा ही नहीं। सब अपने कामों में लगे थे। वह भी धीरे-धीरे अपना काम करने बंगलों की ओर चल पड़ा। सबने पूछा कि, "आज देर क्यों किया?" अंत में ३०४ बंगले की ओर गया। गेट पर ताला लगा था। मन में सोच-विचार करता वापस आ रहा था कि देखा सामने बंगले के वह दोनों लड़का-लड़की खूब जोर-जोर से लड़ रहे थे। तभी काँच का कुछ टूटने की आवाज भी आई।
आज के दिन इतना देख चुका था कि बिना रुके अपने रास्ते निकल गया। भूख-प्यास से नींद नहीं आ रही थी तो रात को दस बजे चौक की दुकान से समोसा लाकर खाया फिर पानी पीकर सोने की कोशिश करने लगा। आज आकाश में तारे नहीं दिख रहे थे शायद आज उन्हें भी जमीन की ओर देखने में शर्म आ रही थी। इंसानी कृत्यों से सारी सृष्टि दुखी हो जाती है। 
"मैडम जी कहां गई? वह लड़का-लड़की इतना झगड़ा क्यों कर रहे थे?" उसने याद किया कि अपने जीवन की कहानी, अपने जेल की जिंदगी के बारे में उसने मैडम जी को बताया था। सुनकर उनकी आँखों में आँसू आ गए थे। इन्हीं विचारों में डूबकर अंततः उसे नींद आ गई।

अगले दिन चाय पीकर काम पर जल्दी चला गया। बहुत धूप होती है तो बगीचों में आजकल पानी भी ज्यादा लगता है और सूखे पत्तों का कचरा भी अधिक रहता है। नगरनिगम के बगीचे के माली से थोड़ी बातचीत हुई और फिर वह कॉलोनी के बंगलो की ओर चला गया। ३०४ बंगले के सामने वाले उस लड़की-लड़का के जोड़े में से लड़की सामान एक गाड़ी में डाल रही थी। वह चुपचाप खड़ा देखता रहा समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है।
गाड़ी में सामान भरकर उसने बीजू की ओर देखा। अपनी बालकनी के दोनों गमलों को बीजू के हवाले करते हुए बोली, "इनका ध्यान रखना आप! उसको छोड़ कर जा रही हूँ। मेरी कमाई से किराया, मेरी कमाई से घर का मेंटेनेंस, अपना पैसा अलग रखेगा और दूसरी लड़कियों के साथ मौज-मस्ती करेगा.. मेरी ही क़िस्मत खराब थी।"  गुस्से से भरी हुई वह कार में बैठी और चली गई।
उसकी कार निकली और लड़का अपना सामान लेकर फोन से टैक्सी बुला रहा था। बीजू को देखा तो एक क्षण के लिए ठिठक गया फिर वह भी टैक्सी में बैठकर निकल गया।
"हे भगवान! यह साथ रहते थे अब अलग हो गए। क्या अब किसी और से शादी-ब्याह करके फिर से घर बसाएंगे।" आश्चर्य और दुःख से भरा वह बंगला ३०४ की और चला गया। 

आज गेट खुला था। कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। गेट पर और बंगले के द्वार पर बड़ा नेम प्लेट था जिस पर मैडम जी का नाम लिखा था। पहले तो आदमी यानी साहब का नाम था। उसने हाथ में पकड़े दोनों गमले जमीन पर रख दिए। सोच-विचार में पड़ा वह पानी का पाइप ढूंढने लगा। तभी द्वार खुला और मैडम जी आईं।
 उन्होंने पूछा, "नेम प्लेट देख रहे हो बीजू? अब मैं इस घर की मालकिन हूँ। मैंने यह घर अपने नाम कर लिया और उनको हमेशा के लिए उनकी पत्नी और बच्चों के लिए मुक्त कर दिया।" 
 बीजू टकटकी बांधे देख रहा था। एक औरत की सालों दबी कुंठाएं, इच्छाओं को सीने में दबाने के बाद कैसा लावा फूट जाता है?
"मैं अपने माता-पिता से छिपकर, उस व्यक्ति के साथ अपना घर छोड़कर आ गई थी जो पहले ही विवाहित था। मुझे पहले धोखे में रखा बाद में मेरी स्थिति मुझे बता दी।" मैडम जी में गहरी सांस भरी।
"आज उसको भी मुक्त कर दिया और मैं भी मुक्त हो गई। इन दोहरे संबंधों का अंधकार मुझे ही लील गया। मेरे एक ग़लत निर्णय ने, मुझे सारे जीवन का दर्द दे दिया। मेरा कोई अपना नहीं रहा।" कहते हुए उनकी आँखें गीली हो गईं। 
"देखो! वह टूटी टहनी वाला पौधा देखो। उस टूटी टहनी ने अपने आपको संभाल लिया है और अब उसमें नये फूल आएंगे।" मैडम जी ने बात को अलग दिशा दी।
"हाँ, समय सब घाव भर देता है मैडम जी। देखिए, बेमौसम आज गेंदे का फूल भी तो खिला है। कितनी दिलेरी और हिम्मत से इसने अपने लिए इस समय का चुनाव किया है।" मौसमी फूलों के बीच इठलाते गेंदे ने इस मौसम को बसंत में बदल दिया था।


**********