कहानी - बदलाव
जब से लड़कियों ने क्रिकेट का बल्ला दुनिया में घुमाया, तीन बच्चों की अम्माँ सुनीता का मन भी अपनी दोनों बड़ी बेटियों के प्रति पलटने लगा है। अब अपने दिल का दस प्रतिशत टुकड़ा, वो छोटी संतान और इकलौते बेटे हीरा के मोहजाल से निकाल कर दोनों बेटियों सोना और नीलम को देने की कोशिश करतीं।
"स्कूल में खेलकूद और पी.टी.का पीरियड होता है ना?" खेलकूद के नाम से चिढ़ने वाली अपनी अम्माँ का रंग बदलते देखा, बेटियांँ आश्चर्य करतीं।
"अम्माँ, सप्ताह में दो बार ही होता है पी.टी.और खेलकूद का पीरियड। आपसे जूते लाने को कहा तो वो तो मंगाती नहीं हो, हम दोनों को डाँट पड़ती है।" छोटी बेटी नीलम ने कहा।
"तुमसे तो बात करना पाप है, रोज नयी चीज़ चाहिए दोनों को।" कहती हुई अम्माँ सात साल के हीरा को मुनक्का डला दूध पिलाने लगी।
चौदह की सोना और बारह की नीलम बताना चाहती थीं कि ऐसा दूध उनके लिए भी जरूरी है। साथ की बाकी लड़कियाँ बोर्नविटा, बूस्ट डालकर रोज दूध पीती थीं पर उनकी अम्माँ समझती ही नहीं।
अब तीन बच्चों की अम्माँ सुनीता समझती तो सब थी परंतु नौकरीपेशा पति की सीमित कमाई में क्या-क्या पूरा करती। इकलौते बेटे हीरा को वंश का दीपक जानकर उसे ही मेवा, दूध दिया करती। आखिर बेटियों को तो ब्याह कर दूसरे घर जाना है।
सोना और नीलम, बहुत होशियार, सुंदर, सुगठित देह की लड़कियां हैं। पहले तो अम्माँ खेलकूद की सख्त विरोधी थीं और अब क्रिकेट खेलने के पीछे पड़ गईं हैं।
"दीदी, मुझे क्रिकेट अच्छा नहीं लगता। मुझे खो-खो, कबड्डी पसंद है परंतु अम्माँ खेलने ही नहीं देती।" नीलम ने कहा।
"पहले तो जूते और कपड़े लेने के डर से हमें खेलकूद प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लेने देते थे, अब क्रिकेट के भक्त बन गए। लगता है कि बस आज खेलो कल पैसे मिल जाएंगे।" सोना ने छोटी बहन को बताया, "मालूम कोच सर ने सबको क्रिकेट किट लेने कहा है। अच्छे जूते, बैट सब कितना महंगा है।" बेचारी बढ़ती बच्ची अपने घर का बजट समझती थी।
ऐसा नहीं है कि उन दोनों को अपने घर परिवार में अपने लिए लड़ना पड़ता था, आस-पड़ोस भी मौके के ताक में रहते।
"सुनीता, तेरी बेटियों की कद-काठी तो बड़ी अच्छी है। अभी से सत्रह-अठारह की लगती हैं। संभालना, आजकल जमाना अच्छा नहीं है।" पड़ोस की शर्मा आंटी जब-जब लड़कियों को देखतीं, अपनी चिंता जाहिर कर देतीं।
सोना और नीलम मन मसोसकर रह जातीं। कई बार मुँह तक आ जाता कि कह दें, "आंटी जी, अपने बेटे की फ़िक्र करो जो लड़कियों के स्कूल के पास खड़ा हर लड़की को छेड़ता है। चार दिनों पहले ही उसकी जमकर पिटाई की थी लड़कियों ने।"
बोलते तो अम्माँ बवाल कर देतीं।
लड़कियों को सलाह देने वाले, रोक-टोक करने वालों की कभी कमी नहीं होती। बालिका से किशोरी होती लड़कियों के शारीरिक बदलाव, बदलती जरूरतों के कारण वे सबकी दृष्टि के केंद्र में रहती हैं।
समय के साथ सुनीता ने लड़कियों की ओर से ध्यान हटाकर, बेटे के पालन-पोषण की ओर केंद्रित कर लिया था। उसके लिए अँग्रेजी ट्यूशन, रोज उबला अंडा और दूध, रात को भिगोया बादाम, मुनक्का नियमित करने के लिए, सुनीता ने अचार बनाकर बेचने का घरेलू काम भी शुरू कर दिया।
पिताजी सब कुछ समझते थे परंतु अपनी कमाई की सीमाएं जानते थे। बड़ी होती बेटियों के लिए कुछ नहीं कर पाने का उनको दुःख सताता था।
"कभी-कभी बादाम, दूध दोनों बच्चियों को भी दे दिया कर सुनीता। उनको इस उम्र में जरूरत है।" बेटियां आगे मातृत्व संभालेंगी, इस बात से पिता उनके स्वास्थ्य के चिंता दिखाते।
"मुझे तो कुछ समझता ही नहीं है बेकार ही तीन-तीन बच्चे पैदा करके बड़ा कर रही हूँ। अरे, जितने पैसे घर में आते हैं उसमें किसी एक को ही दूध मेवा मिल सकता है। अब इन दोनों के बाद एक बेटा हुआ है तो उसे ही देती हूँ। दुश्मन नहीं हूँ लड़कियों की, मैं खुद तो नहीं खाती।"कहती हुई सुनीता रो पड़ती।
अपनी माँ की चौथी और अंतिम संतान थी सुनीता। चार-चार बेटियों के चलते, उनकी माँ को सास-ससुर, परिवार के, आस-पड़ोस की कटु बातों को झेलना पड़ता था। लड़कियों के नाम से डरने लगी थी सुनीता और उसे भी पहले दो बेटियांँ ही हुईं।
सोना ने क्रिकेट में और नीलम ने कबड्डी में नाम लिखा लिया। दोनों दौड़ने में, प्रेक्टिस में बहुत मेहनत करने लगीं। पिताजी ने इस बार ओव्हर टाइम करके, दोनों बेटियों को नए जूते भी दिलवा दिए।
दोनों लड़कियों के हौंसलों को बल मिला। अपने पिता का समर्थन, उनका प्रेम मिलते ही वो खिल उठीं। सुबह उठकर दौड़तीं, स्कूल से आकर गृहकार्य करके फिर शाम को स्कूल में प्रेक्टिस करने चली जातीं।
"दिमाग खराब हो गया क्या तेरा सुनीता, जो लड़कियों को क्रिकेट, कबड्डी खेलने भेजती है। दो-दो घंटे प्रेक्टिस करती हैं दोनों। कुछ ऊँचनीच हो जाएगी, तब पछताएगी।" सुनीता की सहेलियां, दूर पास के रिश्तेदार बोलते।
अब सुनीता अपने किए पर पछताती कि क्यों उसी ने लड़कियों को खेलकूद की ओर ढकेला।
किशोर बच्चियों की अपनी अलग ही समस्याएं होती हैं। वो शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रुप से अपने आपसे, बाहरी और आंतरिक बदलावों से लड़ती रहती हैं। ना वो व्यस्क होती हैं ना बालिका। दुनिया उन्हें नहीं समझती और वो दुनिया को समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होते।
स्कूल की जिलास्तरीय टीम में सोना का चयन हो गया और सब खुश हो गए।
"हमारे स्कूल टीम की आलराउंडर है आपकी बेटी। कम साधनों में, कड़ी मेहनत से उसने टीम में जगह बनाई है।" स्कूल के कोच ने सोना के पिता से कहा।
आज पिताजी तीनों बच्चों के लिए फल और मिठाईयां लेकर आए थे।
"सुनीता, हमारी तीनों ही बच्चे रतन हैं। सोना, नीलम और हीरा, हमने नाम भी तो ऐसा लगा है। सोना पढ़ाई के साथ स्कूल क्रिकेट टीम में आ गई। नीलम पढ़ती भी है और कबड्डी भी खेलती है। आज कोच सर बता रहे थे।" पिताजी ने कुछ रूककर कहा, "अपनी बेटियों को समझकर, हम ही साथ नहीं देंगे तो कौन देगा, और दोनों बहनों को देखकर हीरा भी बढ़िया ही करेगा। अब से घर में जो भी फल, मेवा, दूध रहे, तीनों को बराबर देना।" पिताजी ने अम्माँ की ओर देखा और कहा, "बच्चियों को समानता का अधिकार सबसे पहले घर में मिले तो बाहर तो वो खुद लड़ लेंगी।" बात अम्माँ ने महसूस की।
किशोर होती बेटियांँ पिताजी और अम्माँ के पास चिपक गईं जैसे आश्वासन देती हों कि आपका साथ है तो अब वे सारी दुनिया जीत ही लेंगी।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं.9967674585
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