सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

1222 1222 122पर दो ग़ज़लें



1222 1222 122

हमारे बीच अब कुछ भी नहीं है 
ज़मी दिल की मगर सूखी नहीं है।।1।।

मुखौटे लाख बदलें लोग चाहे
कभी फितरत मगर जाती नहीं है।।2।।

कहानी एक सी बचपन के सबकी
पुरानी हो नयी, बदली नहीं है।।3।।

एक दुनिया! लादवा हैं दांव तेरे
तेरी दी चोट भर पाती नहीं है।।4।।

उड़ा पंछी तड़पकर पिंजरे से 
जगत नश्वर में कुछ बाकी नहीं है।।5।।


तरही मिसरा-

चले आते हैं वो अक्सर गली में 
मगर वो बात पहले सी नहीं है।


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1222 1222 122

ज़रा जब मैं किसी के काम आया 
मिरे दिल को बहुत आराम आया।।1।।

सुबह ही गाँव में पहुंचा था अपने
लगा मुझको मैं चारों धाम आया।।2।।

भटकता *खोज में था नौकरी की*
नकारा हूँ यही इल्ज़ाम आया।।3।।


गया था गाँव अपना छोड़कर मैं
सुबह का भूला घर को शाम आया।।4।।
 

किया है प्यार उसने सिर्फ़ मुझसे
लिफाफे में अभी पैगाम आया।।5।।

जतन करता रहा काया का अपने
जली जब देह केवल राम आया।।6।।

किये उपवास पूजा और जप-तप
समय अंतिम नहीं प्रभु नाम आया।।7।।

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