सोमवार, 12 जनवरी 2026

आ.योगराज प्रभाकर सर की समीक्षा, लघुकथा दर्पण मंच

सभी सुधि साथियों ने इन रचनाओं पर अपनी उत्कृष्ट टिप्पणियाँ दी, अत: मेरे कहने के लिए कुछ ख़ास नहीं बचा। बहरहाल , मुझे इन रचनाओं में कुछ कमियाँ दिखीं, मात्र उन्हीं का उल्लेख कर रहा हूँ।

1. लघुकथा- शक्ति

रोज की तरह मीनू आज भी मूर्ति  वाली गली में जा खड़ी हुई। //सात साल की बच्ची बड़े ध्यान से, मूर्तिकार बाबा के काम को देखती रहती।//  (*यह सात साल की बच्ची कौन है?*) पास ही मजदूरों की झोपड़-पट्टी में रहती है। आज बाबा मूर्ति पूरी करने वाले हैं।
उसने पूरी मूर्ति बनते हुए देखा है। देवी का शरीर, हाथ-पैर और चेहरा, सबकुछ एक-एक कर बनता गया। बाबा ने जैसे माटी में जान फूंँक दी है।
"कितनी सुंदर है देवी माँ! आँखें तो और किसी की ऐसी न होगी।" //सोचते हुए// (*यह लेखकीय प्रवेश है*)  मीनू सूखी मिट्टी के ढ़ेर पर बैठ गई।
अपने नन्हें हाथों से मुट्ठी भर-भर कर मिट्टी, इधर-उधर करने लगी। //उसके छोटे भाई को उसकी माँ साथ लेकर काम पर जाती है और मीनू सारा दिन यहाँ-वहाँ खेलती भटकती रहती। भूख लगती तो अपनी झोपड़ी खोलकर, सुबह की रखी रोटी-भात खा लेती और फिर बाहर।// (*अनावश्यक पंक्ति*)
//उस झोपड़-पट्टी में उसकी उम्र के सभी बच्चे ऐसे ही हैं। जो बारह -तेरह साल के हैं वो कहीं ना कहीं काम करने लगे हैं।//   (*अनावश्यक पंक्ति*)
"मैं बिल्कुल देवी माँ जैसी हूँ, वैसे ही लंबे बाल हैं मेरे भी।" अपने तेल लगे काले, लंबे बालों को हाथों से नापने लगी।
"अरे बाबा! आज आपने देवी माँ को ये क्या दे दिया हाथों में?" उछलकर मूर्तिकार बाबा के सामने पहुँच गई मीनू।
"ये तो अस्त्र-शस्त्र हैं देवी के। तलवार, कटार, गदा, धनुष सब है।" मूर्तिकार ने कहा।
"ये क्यों रखती हैं देवी?" मासूम सा प्रश्न किया मीनू ने।
"राक्षसों, बुरे लोगों से लड़ने के लिए, उनको हराने के लिए।" मूर्तिकार अपना काम करते हुए बच्ची की जिज्ञासा शांत कर रहा था।
"मैं भी तो देवी जैसी हूँ बाबा! मेरे बाल भी देखो लंबे हैं परंतु मैं राक्षसों से नहीं लड़ सकती। मेरे पास अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं।" मीनू ने धीमी आवाज में कहा।
मूर्तिकार बाबा हाथ धोकर अपने घर के अंदर चले गए।  //बाबा ने मीनू को बैग में पुस्तकें, कलम, और एक स्लेट दे दी।// (*बेहद अस्वाभाविक सी बात लगती है, यहाँ आदर्शवाद/भावुकता हावी हो गई है*)
देवी का श्रृंगार पूरा हो गया था।
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2.लघुकथा - जीत का फंडा

प्रश्नकर्ता - अपनी नई पुस्तक के लिए विश्वस्तर पुरस्कार विजेता लेखक श्री रमेश देव जी का हमारे चैनल पर हार्दिक स्वागत है।
नमस्कार एवं अभिनंदन आपका सर।
लेखक- (हाथ जोड़कर) आपके चैनल एवं सभी दर्शकों को नमस्कार, धन्यवाद।
प्रश्नकर्ता - सर, पुरस्कार प्राप्त करने के बाद आज देश में आपका प्रथम साक्षात्कार हमारे चैनल पर है। हमारे दर्शकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मुझे कहने में कोई संकोच नहीं होगा कि हमारी टी.आर.पी. रिकार्ड तोड़ देगी।
लेखक - आपने मुझे अपने चैनल पर आमंत्रित किया, मेरा सौभाग्य है।
प्रश्नकर्ता - सर,आपने कितनी पुस्तकें लिखीं और अपने शुरुआती दौर के बारे में हमारे दर्शकों को थोड़ा बताइए।
लेखक- मैंने अपने कॉलेज के दिनों से लिखना शुरू किया था। नुक्कड़ नाटकों और गीत लिखने का शौक था। (मुस्कुराते हुए) कई नाटकों का दोस्तों के साथ मंचन भी किया। कहानियों और फिर उपन्यास विधा पर कलम चलाई।
मेरे करीब बीस एकल-संग्रह आए हैं।
प्रश्नकर्ता - सर,आपकी पूर्व में लिखित पुस्तकों को पाठकों ने दिल से सराहा परंतु राष्ट्रीय स्तर पर आपको कोई पुरस्कार प्राप्त नहीं हुआ।
इस नई पुस्तक को देश में उतनी ख्याति नहीं मिली परंतु विश्व स्तर पर विजेता रही। इसका क्या कारण है सर?
लेखक- (मौन)
प्रश्नकर्ता - सर, आज  हजारों की संख्या में जुड़े हमारे दर्शकों को यह जानने की बहुत इच्छा है। आप का उत्तर ही उनका समाधान करेगा।
लेखक- देखिए, शुरूआती दौर में मैं अपने सुख, अपने आनंद के लिए लिखता था। धीरे-धीरे मैंने लोगों की पसंद-नापसंद जानकर लिखना शुरू किया। लोगों से सराहना तो मिली पर कोई पुरस्कार नहीं मिला।
यह पुस्तक, मैंने विश्वस्तर के निर्णायकों के दिलोदिमाग का, सूक्ष्म अध्ययन करके लिखी और पुरस्कार जीतने में सफल रहा।
(अचानक दर्शकों का ग्राफ तेजी से नीचे आने लगा)
*प्रश्नकर्ता अथवा लेखक लिखने की आवश्यकता नहीं थी, बातचीत से ही यह क्लियर हो जाता है)*
*लघुकथा में कुछ भी ब्रेकेट में नहीं लिखा जाता, ऐसा एकांकी/नाटक शैली में होता है।* 
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3.लघुकथा - मन की बात

सुमित्रा ने माँ के सिरहाने पानी भरा लोटा धरते हुए कहा,  "तालाब जा रही हूँ। नहाते, कपड़े धोते तक एक दो छोटी मछली भी मिलेगी तो ले आऊंँगी । बहुत दिनों से तुझे मछली-भात खाना है ना ?" खटिया पर पड़ी माँ की आँखें चमकने लगीं।
सिर पर से कपड़ों का बंँधा बोझा उतारकर, तालाब के किनारे रख अपना पुराना, हाथों से बांँधा छोटा जाल फेंक दिया।
"आज मछली फंँस जाए तो खाने में मजा आ जाए।" कपड़े को कुटेले से पीटती सुमित्रा ने लार गटक ली।
सिर पर माटी लगाकर बाल धोए और कपड़े पहनते हुए, तालाब में स्वयं को निहारते हुए स्वयं पर लजाने लगी।
लहरें आती तो प्रतिबिंब फैल जाता अतः उठती लहरों के स्थिर होने का, वह दिल थामकर इंतजार करने लगती।
सहसा, जाल में हलचल हुई और सुमित्रा की खुशी से चीख निकल पड़ी। लगभग आधे फुट की खूबसूरत, गोल-मटोल, चाँदी की तरह चमकीली मछली तड़फड़ा रही थी।
जाली समेटकर उस मछली को पानी के कलसे में डाल, सुमित्रा धुले कपड़ों का गट्ठर बनाने लगी।
मछली की तड़फड़ाहट  उसे बेचैन कर रही थी। उसे अंजुरी में भरकर देखा तो लगा उसकी आंँखें नम हैं। मूक आँखों की भाषा सुमित्रा के हृदय पर दस्तक देने लगी।
एक क्षण बाद ही उसे पानी में वापस छोड़ते हुए बोली, "जा, तेरी माँ भी रास्ता देख रही होगी।" कपड़ों का गट्ठर अपने सिर पर धरे, पार पर फैली करमता भाजी तोड़ते चली। 
 //अब मुंँह में भाजी का स्वाद असीम तृप्ति दे रहा था।// (*यह पंक्ति अनावश्यक है*)
*तड़फड़ा=छटपटा*  
*तड़फड़ाहट=छटपटाहट*
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4 . लघुकथा - चिंगारी

दुलारी ने आँगन में बीड़ी फूंँकते लखना को देखा तो बस बिगड़ गई।
"अरे! भिनसारे कोई बीड़ी फूँकता है भला? निकल पड़ो तो कोई काम भी मिले।" एक सप्ताह से बिना काम के, घर में बैठे पति से त्रस्त हो गई थी दुलारी।
"काम मिलता ही नहीं तो क्या चोरी करूँ?"तल्ख स्वर में लखना ने जवाब दिया।
"उमर हो रही है तुम्हारे साथ, सब जानती हूँ। एक-दो घर पूछा और फिर चार दोस्तों में दिन बिता के खाने के टैम हाजिर।" आज दुलारी के तेवर भी तेज़ थे।
"चार घर पोंछा-बर्तन क्या कर लेती है, अपने आप को मालकिन समझ रही है।" गुर्राते हुए लखना ने बची बीड़ी को पैर से मसल दिया।
लखना के पैरों तले रौंदी बीड़ी ने दुलारी को अपने पुराने दिनों की याद दिला दी।
गाँव की सबसे सुंदर लड़की थी दुलारी। पाँच कक्षा पढ़ी भी थी। सोलह में ब्याह दी गई लखना से और बीस तक तो दो बच्चों की माँ बन गई थी।
लखना लकड़ी का काम करता था। फर्नीचर, दरवाजे सब बनाता था परंतु स्वभाव का तेज और शरीर से आलसी। किसी ठेकेदार के नीचे टिककर काम ना करता। घर की जरुरतों को पूरा करने के लिए दुलारी आसपास की बिल्डींग में काम करने लगी थी।
लखना के खाँसने से दुलारी की तंद्रा टूटी। हाथ में पानी का गिलास भरकर लखना के पास गई।
"कहती हूँ बीड़ी मत फूँको। फेफड़ा खराब हो रहा है। सब जगह लिखा रहता है कि बीड़ी पीना बुरी बात है।" कहते हुए पानी का गिलास उसके हाथ में पकड़ा दिया।
बेकार बैठकर दोनों जून  खाना खाने का आनंद लेने वाला मर्द जाग गया। (*इसे मर्द का नहीं शैतान का जागना कहते हैं*)
//गिलास की झनझनाहट हुई और दुलारी का माथा छिल गया।// (*केवल झनझनाहट से माथा कैसे छिल गया?*) माथे से छलकती रक्त बूँदों ने दुलारी को, उसका अस्तित्व बता दिया।दुलारी की आँखों में चिंगारी धधकने लगी थी।
अगले कुछ क्षणों में अपनी मर्दानगी भूलकर, हाथ पैर बचाता लखना काम की खोज में निकल गया था। (*ऐसा ज़ालिम मर्द आँखों की चिंगारी देखकर घबरा गया? यह बिलकुल अस्वाभिक लग रहा है*)
कुचली बीड़ी में एक चिंगारी अब भी चमक रही थी।
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5.लघुकथा - किरायेदार

मधु को आठवाँ महीना लग गया था। दिन-रात वह गर्भस्थ शिशु को, अपने पेट पर  हाथ रखकर स्पर्श किया करती।
बाहर की हल्की ठंड और सूर्य की बादलों संग लुका-छिपी के बीच मधु, ऊनी कपड़ों को तार पर फैला रही थी। पेट पर एक झटका सा पड़ा और उसकी सिसकी निकल गई।
"अब आखिरी महीने में क्यों अड़चन बढ़ा रही है? शांति से बैठी रह, मैं जो करती हूँ चाकरी।" अपनी सास की आवाज़ सुनकर मधु का मुँह कसैला हो गया।
 सामने नज़र उठाई तो जमुना काकी के कमरे में किराये से रहने वाला जोड़ा, अपनी गृहस्थी समेटकर गाड़ी में डाल रहा था।
"बच्चा पेट में घूमता है माँ, लात मारता है मानो मुझे बता रहा हो कि अब मैं बाहर आने वाला हूँ।" मधु ने अपनी सास से कहा।
"तू समझती क्यों नहीं, तेरे अपने बच्चे की अच्छी परवरिश शिक्षा के लिए, इस घर को ठीक कराने के लिए ही तो तूने दूसरे का बच्चा अपने पेट में पाला है। इससे ज़्यादा प्रेम लगाना ठीक नहीं। कुछ दिनों बाद ये अपने माँ-बाप के पास चला जाएगा।" सास ने मधु को समझाते हुए कहा।
"पता है मुझे। रोजी मजदूरी करने वाले परिवार के सपनों को पूरा करने के लिए, उस घर की स्त्री को अपनी कोख का सौदा करना पड़ता है।" मधु की आंँखों के सामने वो कागज़ात घूम गए जिन पर उसने हस्ताक्षर किए थे।
सामान लदी गाड़ी की घरघराहट से मधु चौंक पड़ी। अपने बरामदे में खड़ी जमुना काकी, जाते हुए उस किरायेदार जोड़े को विदा करते हुए पल्लू से आँखें पोंछ रही थी।
अपने ढहते हुए घर को घूरती मधु ने, एक बार फिर अपने नम हाथों से पेट को छू लिया मानो अपने ‌इस किरायेदार से घर खाली करने की तारीख जानना चाहती हो।
*(यह अच्छी लघुकथा है)*
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