शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

1212 1212 1212 1212 पर ग़ज़ल

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 

फ़िलबदीह - 57

1212  1212  1212  1212


लपेटी सृष्टि सारी ने, वो साड़ी है कमाल की
सफेद रंग से सजी, ज्यों सजनी शीतकाल की।।1।।

पले जो नन्हा गर्भ में, करे वो मूक प्रार्थना 
दे शक्ति माँ ही पोसती, ये महिमा गर्भनाल की।।2।।

समानता ही मूल है, ये सृष्टि खूब जानती
पवन, किरण, नदी, गगन, ये देन हैं दयाल की।।3।।

घटे बढ़े गिरे उठे, ये पूंजी का बजार है 
ये देख धड़कने बढ़ीं, बेचारे उस दलाल की।।4।।

न फ़िक्र रोटी पानी की, न नौकरी का डर ही था
वो दोस्तों का साथ ही, हैं यादें बालकाल की।।5।।

तरही मिसरा-

ये कोरी कोरी डायरी, लिखूं भी तो लिखूं मैं क्या 
न जाने खो गई कहाँ धनक तिरे ख़याल की।।

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शर्मिला चौहान

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