गुरुवार, 25 दिसंबर 2025

नववर्ष पर ग़ज़ल 221 2121 1221 212



221 2121 1221 212



गठरी को बांधे जाने को तैयार साल है 
इसको जो रोक ले कहो किसकी मजाल है।।1।।

अब बीत जाना उसको है ये जानता है वो
जाते हुए भी पर वो मचाता धमाल है।।2।।

अल्हड़ सी चाल चलते नया साल आ गया 
हैरान वो कि सामने तो भूतकाल है।।3।।

इक पल को हाथ थामे खड़े साथ साथ वो
इस पल में दोनों बीच नहीं अंतराल है।।4।।

जाता जो साल देता नसीहत नवीन को
अपने पे दंभ मत करो सब मोहजाल है।।5।।

जो आज है वो सामने  बीता तो कल हुआ
ये सत्य जान ले वही दर्शी त्रिकाल है।।6।।

यादों की मुट्ठी बांध नए साल में जिएं
हर साल अपने आप में बस बेमिसाल है।।7।।


***********

शर्मिला चौहान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें