कहानी - ठहरी हुई हवा
आज जो हो रहा है वैसा नार्मली होता नहीं है धीरज के साथ। हर सिग्नल पर गाड़ी रोकना पड़ रहा है मानो हरे रंग ने आज उसकी राशि से बिदा लेकर, लाल को स्थान दे दिया हो। कार गति पकड़ती कि बस्स्..अगला चौक लाल बत्ती जलाए उसे रोक देता।
मोबाइल की घंटी बजी पर चौक के पहले लाइन में खड़े होकर फोन उठाने की हिम्मत नहीं हुई उसकी। लालबत्ती बुझी और एक्सीलेटर में पैर दबाते हुए धीरज ने फोन उठा लिया।
"आ ही रहा हूँ घर, अब हर चौक पर रोक रहा है मुझे सिग्नल तो क्या उड़कर आऊँ?" पत्नी से झुंझलाते हुए कहा था कि दूसरी ओर से उससे भी ज़ोर की धमकी आई।
"अब बुढ़ापे में अपनी उम्र की तरह कार चलाओगे तो अटक कर ही आओगे। हजार बार बोली कि ओला-उबर की सुविधा है पर नहीं, अपनी कार निकालने का शौक जो है..।" अपनी पत्नी उमा की आगे की बड़बड़ बंद करके धीरज ने अपनी गति कम करनी शुरू कर दी। अगले चौक का सिग्नल गुस्से से लाल हो गया था।
"हे भगवान! सही कहती है उमा।" कुछ और बड़बड़ाता कि आगे उन्नीस-बीस साल की युवती, एकदम काँच से सटकर अंदर झाँक रही थी।
गोरा रंग, भूरी आंँखें, बाल भी भूरे, होंठों पर गुलाबी रंग की लिपिस्टिक पोती, गाल पर तिल और जरूरत से ज्यादा गहरे गले की टी-शर्ट। वह काँच को ठकठका रही थी।
"क्या है? क्या बेचना है? मैं नहीं खरीदता।" काँच को थोड़ा नीचे करते धीरज ने कहा और उस लड़की में किसी और को ढूँढते हुए कई साल पीछे निकल गया।
वही आँखें, वैसे ही बाल और कद-काठी परंतु वो तो ऐसी नहीं थी। दस साल की उम्र से लंबा कुर्ता, घेरदार लहंगा पहने आती और चुनरी को शरीर से लिपटाए रखती।
"दस साल की बच्ची को लबादा क्यों ढांक देती हो मुरनी।" धीरज की माँ दीपावली की साफ-सफाई करने, कपड़े-पर्दे धोकर लाने और लगाने वाली मुरनी से कहती।
"हमारी जात-बिरादरी में चोखी बात न माने दिद्दी। आज छोट्टि लगे, दो साल में बड़ी लगन लगेगी। आदत पड़ गई तो खुल्ली घूमा करेगी, सहर की छोकरियों की तरहा।" सामने से धीरज को आते देख वह झट मुँह पर घूँघट ले लेती थी।
"भैय्या आ रहो है दिद्दी, मैं चलूँ। काम हो सो भौंरी से खबर कर देओ।" और वह अपनी दस साल की बेटी पारबती को कमर से सटाए निकल जाती।
"अरे.. कॉलेज में पढ़ता है धीरज, तुम्हारे बच्चों के उम्र का है उसे भैय्या क्यों कहती हो?" माँ का बड़बड़ाना चालू रहता और वह हवा-हवाई हो जाती।
"तुम क्यों उसको अक्ल सिखाती रहती हो माँ? वो गंवार लोग हैं उनको उनके अनुसार ही जीने दो। छोटी सी बच्ची को स्कूल तो भेजते नहीं, पर्दे में रखना है तो तुम्हें क्या करना है?" माँ पर धीरज चिड़चिड़ा जाता।
समय बीतता रहा, धीरज ने कॉलेज की पढ़ाई करके, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी। एक बड़े सरकारी बैंक में नौकरी मिली और माँ-बाबूजी ने उसकी शादी की बातें शुरू कर दी।
अक्सर छुट्टियों में वो घर आता, मुरनी के साथ आने वाली पारबती अब बड़ी हो गई थी। अपने बंधनों, संस्कारों और बिरादरी की बातों में अपने को कैद रखने वाली पारबती को एक दोपहर धीरज ने देखा। हॉल का पर्दा लगा रही थी। दुबली-पतली, गोरी, भूरे लंबे बालों वाली सोलह-सत्रह साल की बहुत सुंदर लड़की पारबती। ताकत से पर्दा उठा कर, उसकी चुन्नटों की लोहे में डालकर चढ़ाती उस ग्रामीण सौंदर्य पर आसक्त होकर, सुध-बुध खो दिया था धीरज ने। शहरों के बनावटीपन से बिल्कुल भिन्न, सादा सौंदर्य छलक रहा था उस कमरे में।
धीरज धीरे-धीरे उसकी ओर खींचता चला गया और बिल्कुल पास जाकर उसे निहारने लगा। उसकी आँखें तो दिल की गहराई तक उतर रही थीं।
अचानक उसका संतुलन गड़बड़ा गया और वह स्टूल पर से गिरने लगी की धीरज ने उसे कमर से पकड़ लिया। भगवान ने मन की मुराद पूरी कर दी थी और उसने उसे पास सटा लिया। एक क्षण तो वह कुछ समझी ही नहीं फिर अपनी स्थिति देखकर चौंक गई।
धीरज को धकेल कर अपने से दूर किया और टुकुर-टुकुर देखने लगी।
"ऐ करमजली! भैय्या खड़ा सामने, तू का निहार रही, पर्दा तो कर। पारबती, कब सीखेगी तू ?" न जाने कहाँ से उसकी माई मुरनी आ धमकी और यह एकतरफा प्रेम-प्रसंग, कुछ मिनटों में अपने अंत तक पहुँच गया।
अब अक्सर धीरज छुट्टियों में आने लगा। आता तो कभी कमरे के पर्दे, कभी चादरें, कभी अपने ही भारी कपड़े धोने दे देता। पारबती आती, वह देखता रहता। अपना काम करके, चुपचाप निकल जाती। एक दिन जाते-जाते उसने पलटकर देखा। कमरे की खिड़की से एक जोड़ी पहचानी आँखें उसे ही देख रही थीं।
उसने अपनी चुनरी हटा ली, खुले भूरे लंबे बाल फहराने लगे। गजब की खूबसूरत पारबती, उसकी वो सौम्यता से भरी मुस्कान कोई कैसे भूल सकता था?
पीछे की हार्न बजाती कारों ने धीरज को वर्तमान में ला पटका।
"अरे बढ़ा भाई कार, बत्ती हरी हो गई है।" बाजू से गुजरते बाइक वाले ने कहा।
वो लड़की बाजू के कारवाले से कुछ कह रही थी। उसके हाथों में कुछ मोती की मालाएं, कुछ सजावटी सामान थे। कार आगे बढ़ाते हुए वह उसी को देख रहा था, थोड़ी फैशन में रंगी प्रतिकृति थी पारबती की। उसकी मुद्राओं, उसके हाव-भाव का मिलान जाने-अनजाने पारबती से करने लगा, कुछ भी मिलता-जुलता नहीं था सिवाय देह सौंदर्य के। कहाँ वो पूरे शरीर को ढांकने वाली, कहाँ ये गले की गहराइयों से अपने यौवन का दर्शन कराने वाली। उसकी नत आँखें, इसकी कुछ अलग ही से इशारे करती आँखें, साम्यता तो नहीं विरोधाभास में निबंध लिखा जा सकता था।
"पापा, आप कार मत ले जाया करो। मम्मा सबका दिमाग खराब कर देती हैं।" बरामदे पर ही बेटी ने सावधान करते हुए कहा।
"अब अभी से ड्रायविंग बंद कर दूँ क्या? अस्सी साल के लोग कार चलाते हैं, मुझे अभी से बूढ़ा बना रहे हो तुम लोग। तेरी शादी के बाद नहीं चलाऊंगा।" कहता हुआ धीरज अंदर चला गया।
दो महीने बाद ही बेटी की शादी थी और व्यवस्था के अनेक कामों के बीच भी धीरज, पारबती की उस प्रतिकृति को भूला नहीं था। पंडित जी की बताई सूची में से कुछेक वस्तुएं नहीं मिल पाईं थीं सो एक दोपहर ऑटो रिक्शा से मुख्य बाजार की ओर चला गया। विवाह विधि में लगने वाली छोटी-छोटी वस्तुओं की खरीदारी यानी पूरी तरह से भीड़ भाड़ में खपने का काम।
अभी सामान के लिए पूछताछ कर ही रहा था कि सूपा-टोकरी, कलश बेचने वाली ने कहा, "भैय्या, अगली गली में दाहिने चले जाओ। कंकन, मौरी सब बढ़िया मिल जाएगी। हाथ से बनाती है सुंदर, मोती वाली, रंग-बिरंगी मौरियाँ।" उसकी बताई दिशा में धीरज आगे बढ़ गया।
तुलसी विवाह के बाद पहले ही मुहूर्त में विवाह तय हुआ था बिटिया का इसीलिए विवाह सामग्री अभी कम ही उपलब्ध थीं वरना तो ये सारी गली रंगाए कलश, मिट्टी के चूल्हे, सिलबट्टे, सजे पीपे और लकड़ी के सुंदर खंब से पटी पड़ी रहती है।
मोड़ के कोने पर छतरी की छाँव किए, टोकरियों में शादी-ब्याह की चीजें लेकर एक औरत बैठी थी।
"कंकन और मौरी चाहिए।" उसने उससे कहा।
"कन्या वर दोनों के लिए चाहिए भैय्या?" चुनरी से ढंके चेहरे से दो आँखें झांकी।
"हाँ।" उन आंखों को गौर से देखते हुए धीरज ने कहा।
भूरी आँखें, सौम्यता से उठती झुकती हुई।
उसने टोकरियों में रखे अलग-अलग डिब्बे खोल दिए।
"वर के लिए इसमें हैं, कन्या के लिए दूसरे डिब्बे में। आप जो पसंद आए ले लो।" उसने दो-चार नमूने सामने फैला दिए।
धीरज नमूने भी देखता और उसकी ओर भी। कुछ देर ऐसा होता रहा और उस दिन सिग्नल पर मिली वह लड़की आ गई।
टाइट पैंट, पतली झीनी शर्ट से झांकता यौवन, लिपस्टिक से रंगे होंठ लिए वह सामने आ खड़ी हुई।
"ऐ बाबू, सामान ले रहा कि औरत ताड़ रहा। ये ऐसी नहीं है, बड़ी डरपोक है, डरती है समाज से, मैं नहीं डरती। बोल, क्या चाहिए?" धीरज के हाथों से कंकन छूट गया, पसीने से भीग कर वह चिल्लाया, "क्या बेकार बात करती है। उम्र की कोई समझ है क्या? तेरी उम्र की बेटी है मेरी, उसकी शादी का सामान ले रहा हूँ।" खड़ा हो गया था धीरज। अनजाने ही उसकी आवाज़ में बदलाव आ गया था।
"बहुत बदतमीज लड़की हो, अपनी माँ से भी ऐसी बात करती हो?" न जाने क्यों बोल गया वह।
"माफ़ कर दो भैय्या, बच्ची है। मेरे ही संस्कारों में कमी रह गई जो इसे सिखा नहीं पाई।" सामने हाथ जोड़े जो खड़ी हुई तो ओढ़नी खिसक गई। ज़माने की झुर्रियों ने भी, उसकी सौम्यता, सादगी को प्रभावित नहीं किया था।
शायद वो नहीं पहचान पाई थी या अनजान बन रही थी। नहीं-नहीं, अनजान बनने वालों में से नहीं थी वो और कोई कारण भी तो नहीं था अनजान बनने का।
"तू घर जा मुरनी। मैं दूकान उठाकर आती हूँ। बेकार की बातें करने से क्या अपना जीवन बदल जाएगा?" उसने अपनी बेटी को "मुरनी" पुकारा था। मुरनी तो उसकी माँ का नाम भी था। शायद अपनी माँ का नाम बेटी को दिया है। अब तो पारबती के पारबती होने पर कोई अविश्वास नहीं रहा धीरज को।
"आप जो पसंद है ले लो भैय्या। अपनी बच्ची के उमर की जानकर छोरी को माफी दे दो। आपकी बिटिया को सौभाग्य मिले, जोड़ा सुखी रहे।" उसकी भूरी आँखें पानी से भरा कटोरा बनी थीं।
"लेता हूँ।" धीरज ने टोकरी में रखी मौरियों को उलटना-पलटना चालू किया।
"ऐसा व्यवहार क्यों करती है तुम्हारी बेटी?" अपनी आवाज़ थोड़ी बदलते हुए धीरज ने पूछा।
"उसका दोष नहीं भैय्या, बाप को देखी ही नहीं। इसके जन्म के पहले ही उसने छोड़-छुट्टी कर ली थी सो बस, मेरे को कोसती है कि उसे छोड़-छुट्टी दी क्यों?" अपनी ओढ़नी शरीर पर लपेटते हुए कहने लगी, "समझती नहीं, जवान खून है कि औरतों को बंधन से छुट्टी नहीं मिलती। इसकी नानी ने बचपन में संभाला फिर ऊपर चली गई।" वह चुप हो गई। सामने वाले व्यक्ति के अपमान के बदले में, अपना जीवन खोल कर रख देने पर खुद संकोच कर रही थी।
एक इतिहास गुजर जाता है उम्र खड़ी रहती है। कलाकार बदलते हैं, जीवन का रंगमंच जारी रहता है और वो अपने दिग्दर्शक के अनुसार अपने किरदार को जीता है।
अपने बचपन से आज की उम्र तक धीरज ने भी, औरतों के तीन पीढ़ियों के कलेवर को देख लिया था।
कंकन, मौरी और कलश सजाने की मोती की झालरें पैक करवा कर धीरज ने कीमत से ज़्यादा पैसे टोकरी पर रख दिए। वर्षों से इस औरत के आसपास की हवा रुकी सी है पता नहीं कि इसने खुद को ढांक लिया या हवा ने अपने पंँख सिकोड़ लिए इसके आसपास।
"ये तो ज्यादा हैं भैय्या।" उसकी आँखें उठीं और हाथ में पैसे भी।
"रख लो, आजकल में बेटी का ब्याह होगा तो मेरे परिवार काआशीर्वाद समझ लेना।" मुँह तक उसका नाम "पारबती" आते-आते रुक गया क्योंकि वह भी समाज से डरने वाला एक डरपोक आदमी है। सामान लेकर चलता हुआ वह तेजी से बाज़ार की भीड़ में गुम हो गया।
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