👍👍मज़ाहिया ग़ज़ल कहने की बढ़िया कोशिश, शर्मिला जी. प्रशंसनीय.👏👏
221 1222 221 1222
जब देखो तो बांके जी, बीमार नज़र आते
पार्टी हो जहाँ कोई, दमदार नज़र आते।।1।।
दर्पण के खड़े आगे, वो देख परेशां हैं
चेहरे पे बुढ़ापे के आसार नज़र आते।।2।।
बालों में फिराते जब, ख़ुश होके कोई कंघा,
नीचे गिरे बालों के अंबार नज़र आते।।3।।
सिर पर जो बची थोड़ी, वो फ़स्ल छिपाने को
टोपी को लगा फिर वो तैयार नज़र आते।।4।।
चेहरे पे पड़ी झुर्री जीवन की धरोहर थी
वो भाग रहे पल की रफ़्तार नज़र आते।।5।।
जो शर्ट पहननी थी वह तोंद पे जा अटकी
कुर्ते से हया ढाँपे, बेज़ार नज़र आते।।6।।
सज धज के उन्होंने फिर, दर्पण को निहारा तो
अपने में कई उनको किरदार नज़र आते।।7।।✔️
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शर्मिला चौहान
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