बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

बिठूर

बिठूर - एक पौराणिक, ऐतिहासिक और धार्मिक शहर (यात्रा वृत्तांत)


कानपुर से 25  किलोमीटर उत्तर में स्थित ऐतिहासिक एवं पौराणिक शहर बिठूर की यात्रा का सौभाग्य मिला। कानपुर से दोपहर कार द्वारा हम बिठूर की ओर चल पड़े। पवित्र नदी गंगा के किनारे स्थित इस शहर का जनजीवन साधारण है। जाते समय नये बने बड़े रिसोर्ट्स की सुंदरता आकर्षित करती है। संकरी गलियों से, बड़ी कठिनाई से कार जा रही थी और अंततः हम गंगाजी के ब्रह्मवर्त घाट पर पहुँच गए। 

घाट पर सुंदर मंच सजा था और राम लीला का मंचन हो रहा था। परशुराम-राम संवाद का दृश्य सामने था, कुछ देर हमने कलाकारों की इस विलुप्त होती कला का आनंद लिया और फिर घाट की ओर निकल गए। घाट पर पता चला कि आज शाम रावण दहन किया जाएगा।
"विजयादशमी तो हो गई, आज शरद पूर्णिमा है। आज रावण दहन होगा?" मैंने आश्चर्य से वहाँ के लोगों से पूछा।
"जी हाँ, यहां की परंपरा रही है। आज सुबह से रामलीला हो रही है और शाम को रावण दहन किया जाएगा। हर वर्ष यह  पूर्णिमा को मनाया जाता है।" लोगों के उत्तर से, एक नयी बात का पता चला।

 सूर्योदय के बाद सूर्य अपने बाल रूप में गगन में विचरण कर रहा थे। माँ गंगा अपने आवेग को समेटती, किनारों से टकराती अनवरत आगे बढ़ रही थीं। चौड़े पाट के दूसरी ओर कछार पर शुभ्र कांस जैसे शरद के आगमन का बखान करने में रत थी। 
ओह! प्रकृति का अप्रतिम सौंदर्य मंत्रमुग्ध कर देता है।  फूल, दीपक सब अपने अंक में समेटे गंगा की लहरों पर कुछ नौकाएं चल रही थीं। हमने भी नौका विहार करके ब्रह्मवर्त घाट पर बने विभिन्न घाटों के दर्शन किए। दशरथ घाट, कौशल्या घाट, सीता घाट, लक्ष्मण घाट जैसे और भी कई साफ-सुथरे घाट बने थे। 

वर्षा में गंगाजी के द्वारा लाई गई बालू किनारों और घाटों की सीढ़ियों तक जम गई थी। यहाँ ब्रह्मा जी का मंदिर है जहांँ उनकी पादुकाओं को पूजा जाता है। मान्यता यह है कि मनुष्यों की उत्पत्ति के पूर्व ब्रह्मा जी ने यहाँ तपस्या की थी।

हमारे नौकाचालक ने यह भी बताया कि भक्त ध्रुव ने इसी स्थान पर तपस्या की थी। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर तारे के रूप में उन्हें अपने पास स्थान दिया।
अब समय था कि कुछ देर रूककर, गंगा मैया के सौंदर्य को निहारते रहे। ऐसे ही सबसे पवित्र नदी नहीं बन गई। लोगों की बुराईयों, कमियों और लापरवाहियों के बावजूद उनका पालन-पोषण करने वाली, अपने किनारों पर संसार बसाने वाली माँ गंगे को प्रणाम करके हमने उनका आभार व्यक्त किया।
गंगा जी के बड़े और चौड़े पाटों के ऊपर से पुल बनाया गया है। बिठूर-परियर गंगा पुल उत्तर प्रदेश में गंगा जी पर बना सबसे बड़ा पुल है।
कुछ दूरी पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम स्थित है। लवकुश की जन्मस्थली और माँ सीता की कर्मस्थली यहाँ है। जगह-जगह रामायण की चौपाइयां अंकित हैं जो वाल्मीकि जी की अद्भुत देन का परिणाम हैं।

हम चलते घूमते कुछ तक गए थे। आगे भूनी मूंगफलियांँ बिक रही थीं, तो बैठकर उसका स्वाद लिया और हम बिठूर के ऐतिहासिक महत्व वाले स्थान पर जा पहुंँचे। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का एक मुख्य स्थान नाना राव साहब का महल। अब इसे संग्रहालय में तब्दील किया गया है। सोमवार को यह संग्रहालय पर्यटकों के लिए बंद होता है।

बड़े मुख्य द्वार से अन्दर आते हुए झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (मनु) की विशाल प्रतिमा दिखी। सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखी उस लोकप्रिय कविता को, जिसे दीवार पर लगाया था पढ़कर रानी के सामने नतमस्तक हो गए।  शौर्य, अद्भुत पराक्रम और अपार देशभक्ति की प्रतिमा सामने थी।

चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लगी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी।

 बहुत सुंदर संग्रहालय जिसमें संग्राम की तलवारें, ढाल, कपड़े, कटारों और कई महत्वपूर्ण वस्तुओं को संग्रहित किया गया है। बड़ा सा बगीचा, जिसमें बेल, नीम, आम के पेड़ और फूलों की क्यारियां थीं। घूमते हुए एक मोर ने इस वातावरण को और खूबसूरत बना दिया।

आगे बड़ी छतरी और उसके नीचे नाना साहब की दिव्य भव्य प्रतिमा बनी थी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपनी पूरी शक्ति से भारत को आजादी दिलाने का प्रयास करने वाले, विभिन्न मनसूबों को एकजुट करने वाले, अँग्रेजों को नाकों चने चबवा देने वाले नाना राव साहब के सामने सिर श्रद्धा से झुक गया। लक्ष्मीबाई का बचपन यहीं गुजरा था।

"नाना के संग खेली थी वह नाना के संग पढ़ती थी, 
बरछी ढाल कृपाण कटारी उसकी यही सहेली थी।"

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की तिकड़ी नाना साहब, तात्या टोपे और लक्ष्मीबाई के समर्पण को देश हमेशा याद रखेगा। 
एक सुंदर, सार्थक यात्रा के असीम आनंद को अनुभूत करते हम शाम को वापस आ गए। 


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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र)

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