चुनावी बिगुल पर लुढ़कते लोटे
ताँबे, पीतल, कांँसे और स्टील के लोटों की तरह, अपनी विशिष्टता लिए बिना पेंदी के लोटे, चुनावी समर के पालों में लुढ़कते देखे जा सकते हैं। गुणवत्ता के मामले में पानी से भरते ही डोलने वाले इन लोटों से स्थिर सरकार की इच्छा रखना, जनमानस की मृगतृष्णा वृत्ति का एक बढ़िया उदाहरण है। खेतों में सुबह-सुबह फारिग होने के लिए भी बिन पेंदी के लोटे साथ लेना, आने वाली विपदा को बुलावा देना है। अपना मत देकर अपने पाँच साल इनको सौंपना, कितनी विपदाओं को आमंत्रित करना है, समझा जा सकता है।
इस गुणवत्ता से परिपूर्ण बांकेलाल ने पिछली पार्टी छोड़ दी और इस पार्टी की ओर लुढ़क गए। कार्यक्रमों में दरी बिछाने से लेकर नेताजी की कार का दरवाजा खोलना, रात-रात भर गाँव शहर की गलियों की धूल छानने से मंच का संचालन करना और सबके आगे-पीछे चिपककर फोटो खींचवाने वाले कर्मठ, वाकपटु बांकेलाल को जब पार्टी टिकट नहीं मिली तब उन्हें दूसरी ओर लुढ़कने में अपने भविष्य नज़र आया।
नगरपालिका के चुनावों की घोषणा हुई और नुक्कड़ की टपरी पर, चाय सुड़कते बांकेलाल ने हमें रोक लिया।
"इस बार जीत गई पार्टी तो ये कचरे का ढेर, खुला नाला, पीने के पानी की समस्या दूर हो जाएगी।" उन्होंने गर्दन लचकाई।
"आपकी पार्टी का चिन्ह घोड़ा है ना।" हमने पक्का किया।
"अजी घोड़ा अमीरों की शान है। हम तो गरीब, साधारण लोगों के आदमी हैं तो हमने वो भाई-भतीजावाद वाली पार्टी ही छोड़ दी। अब हमारी पार्टी का चिन्ह है..।" दूर चरती भैंस की ओर उन्होंने अँगुली दिखा दी।
"अच्छा।" हमारे नैन पिटारे के ढक्कन से खुल गए।
पहली पार्टी गुलाब चिन्ह को त्याग घोड़े की ओर लुढ़के अब भैंस पर रीझे बांकेलाल ने भैंस के लाभ, उसकी ग्रामीणता संग पार्टी को जोड़ने का अद्भुत प्रयास किया।
टपरी पर मजमा जमाकर उन्होंने भैंस को राष्ट्रीय प्राणी घोषित कर दिया।
चुनाव सिर पर खड़ा हुआ और गली-मोहल्लों पोस्टरों से सज गए। बेरोज़गारी इन दिनों दुम दबाए, मुँह छिपाए बैठी थी।
समोसा, कचौड़ी और शाम को मिलने वाले सौ रूपयों ने इलाके के सभी नवजवानों की बेरोजगारी समाप्त कर दी थी।
जिसकी दीवारों, छतों पर जिस पार्टी का बैनर, पोस्टर फड़फड़ाता, उसकी जेब में नोट भी फड़फड़ाते। कई घरों की दीवारें एक साथ दो-दो, तीन-तीन उम्मीदवारों के पोस्टर सीने से लगाए, घर मालिक की जेबें भारी कर रही थीं।
पोस्टरों के बाज़ार में, कोने की जगह में बाँकेलाल की तस्वीर नज़र आई। चुनाव चिन्ह देखकर हमने चश्मा साफ किया। भैंस की जगह चूहा देखकर, हमें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।
उनके द्वारा प्रदत्त रोजगार वाले दो युवक, आटो रिक्शा पर चिल्लाते हुए घूम रहे थे।
"इस क्षेत्र के निर्दलीय प्रत्याशी बांकेलाल जी को, गणेश जी के वाहन 'चूहा' निशान पर वोट देकर विजयी बनाइए।"
गुलाब से घोड़ा, घोड़े से भैंस और अब चूहे पर लुढ़कते इस पोस्टर पर चिपके बांकेलाल, शायद इस नये चिन्ह पर विरदावली तैयार करने में जुट गए थे।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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