गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

खुली फाइल पड़े छींटे (अट्टहास हेतु)

खुली फाइल, पड़े छीटे 

रंग, गुलाल के साथ कीचड़ के छीटे तो आम आदमी रोज ही झेलता है और इससे ज़्यादा रंगीनी उसके क्लास में फिट नहीं बैठती। खास लोगों को खास प्रकार के छींटों से सज्जित होने की आदत होती है जब तक छींटों की बौछार ना हो वो खास किस्म की कैटेगरी में नहीं रखे जा सकते। समाचार-पत्रों, टेलीविजन और सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनके खास जीवन के रंगों की झलकियांँ देखने वाला आम आदमी ही होता है।‌आम लोगों की तरह आम दाग, धब्बों से परहेज करने वाला खास वर्ग के दागों की महिमा भी उनकी तरह अपार होती है।

अक्सर होली के रंग-बिरंगे त्यौहार पर साफ-सफेद कपड़ों में, चुटकी भर रंग चिपकाए घूमने वाले लोगों को, बड़ी फ़ाइलों, बड़े केस के खुलने से लगने वाले छींटे पसंद आते हैं। कोई सामान्य थोड़े ही हैं कि बस पोत लिए रंग, गुलाल दस-बीस रूपयों का और बन गए रंगीला रे। रंगीलेपन के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, तुम क्या जानो आम आदमी। 

बांकेलाल भी आम आदमी ही थे। होली के दो दिन पहले सड़क पार करते समय, पीठ पर फचाक..करता गुब्बारा फूटा। तैश में आकर हाई वाल्यूम में चिल्लाए, "अभी से रंग मार रहे हो, हिम्मत है तो सामने आओ। पीठ पर वार करते हो।" उन्होंने सारी कोशिशें कर लीं कि कमीज़ किस रंग से रंगी है देख पाएं परंतु असफल रहे। मन ही मन खुश हो रहे थे कि अभी पचास की उम्र में भी उनको रंगने वालों की कमी नहीं है। आम आदमी तो चंद रंगों से भीगकर ही, खुशी से पूरा जीवन निकालने के लिए पैदा होता है। 

घर पहुँच कर अपने रंगने के रंगीन किस्सों का रंग, पत्नी पर चढ़ाते कि सामने का दृश्य देख बांकेलाल का रंग उतर गया।
"होली पर दीवाली की सफाई क्यों कर रही हो?" आलमारी की सारी डायरियांँ, पुरानी नयी फाइलों का ढेर लगाए बैठी पत्नी से बांकेलाल ने पूछा।
"सफाई तो करनी ही पड़ेगी ना, ना जाने किस फाइल में क्या मिल जाए?" उसकी आँखों के पैनेपन‌ ने बांकेलाल को और खास बना दिया। किसी की फाइलें निकाली जाए, जाँच-पड़ताल हो, आस-पड़ोस में कुछ कानाफूसी हो, आम आदमी बैठे ठाले खास बन जाता है।
खास किस्म की दबी-छुपी फ़ाइलों के पन्ने बाद में खुलते हैं पहले उनके खुलने का संदेश, सोशल मीडिया पर वाइरस की तरह वाइरल हो जाता है।‌ हर चैनल, हर पोस्ट अपनी अपनी रंगीन कहानियों का पिटारा खोले, टी.आर.पी.और लाइक्स कमेंट्स बटोरने में लग जाते हैं। 
बांकेलाल की पत्नी ने डायरियों के पन्ने खोले और व्रत त्यौहार की कथा की तरह बांचने लगीं। पोंछा लगाती सहायिका, बच्चों के ट्यूशन टीचर खड़े होकर चटकारे लेकर, बांकेलाल जी के अतीत का स्वाद चख रहे थे।

"पुरानी बातों को क्यों पढ़ रही हो, दूसरे की डायरी पढ़ना सभ्यता नहीं है।" बांकेलाल ने डायरी छीनते हुए कहा।
"तुम आदमियों को अच्छी तरह समझती हैं औरतें, कितने दिनों दौरे में निकालते थे, भूली नहीं हूँ।" बड़बड़ाती हुई वो बिस्तर पर मुँह लपेटे सो गईं।

खास किस्म के लोगों की, खास समय, खास अवसर की विदेश में फाइल क्या खुली, छोटे बड़े सरकारी, गैर-सरकारी कार्यरत, सेवानिवृत्त सभी आम लोगों के जीवन में झांकने वालों की संख्या में अकस्मात इजाफा हो गया।

सात दिनों तक की बढ़ी टी. आर. पी. ने, टेलीविजन के समाचारों को फुल टाइम उस फाइल का कवर पेज बना दिया। उसका असर आम आदमी की जिंदगी को बदरंग कर देगा, बांकेलाल से बेहतर कौन समझ सकता है। दूसरों की खुलती फाइल ने उनकी होली में संदेह की फुलझड़ी, आरोपों के फटाके फोड़ दिए हैं।

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