1222 1222 1222 1222
कभी साली कभी सरहज, ये रिश्ता ही लुभाता है
रहे भाभी जो होली में, मज़ा दुगुना हो जाता है।।1।।
नगाड़े ढोल बाजे ले, है टोली फाग की आई
दुपट्टा ओढ़ कर बांके, कमर मोटी हिलाता हैं।।2।।
करे चालू वो गाड़ी को, जो रूठी प्रेमिका सी थी
बिना चाबी लगाए ही, वो अब गाड़ी चलाता है।।3।।
बनी गुझिया बने पूरन, धरी प्लेटों में सब सज के
हुए मधुमेह रोगी सब, करेला रास आता है।।4।।
चढ़ा है रंग फगुआ का, उमर की बात मत छेड़ो
चचा सत्तर का नाचे तो, जवां छोरा लजाता है।।5।।
तरही मिसरा:
कभी बचपन कभी यौवन, बुढ़ापा तो लगा हरदम
मगर जो है जवां दिल वो, सदा होली मनाता है।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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