सोमवार, 24 अगस्त 2026

कहानी - कुटुंबपाल

कुटुंबपाल 


कुटुंब, जहाँ बीस-पच्चीस लोगों का साथ खाना बने, सब साथ रहें और साथ ही लड़ाई-झगड़ा भी ज़ोरदार होता रहे।  ऐसे बड़े कुटुंब का एक छोटा सा हिस्सा थी वह। 'पूनो' कुटुंब का दिया नाम जिसने पूर्णिमा को स्नेह से समेट कर पूनो कर दिया था। मकान का कुछ हिस्सा पक्का, कुछ कच्चा परंतु दिल तो सबका बच्चा ही था। दरवाजे पर लकड़ी की तख्ती से दादाजी ने 'सिंह कुटुंब' लिखवाया था। पूनो की स्मृतियों में दादाजी की झलक साफ थी क्योंकि हमेशा बच्चों में बच्चों की तरह गाते-खेलते, लतीफे सुनाते, छुप्पन-छुपाई का हिस्सा भी बन जाते थे। दादी, उतनी ही अक्खड़, उनके पीछे छिपे बच्चों को दो थप्पड़ पड़ती और पकड़ा जाता वो अलग।

दादा जी के चार बेटे और दो बेटियाँ। बड़े उदय ताऊ जी और सुधा ताई। दूसरे नंबर पर किशोर ताऊजी और मीना ताई। तीसरे नंबर पर पूनो के पिताजी कमल और माँ गौरी। चौथे सबसे छोटे चाचा दीपक और चाची शीला। दो बुआ कमला और मंगला। अब बच्चों की गिनती ना भी करो तो दर्जन भर यह बड़े ही हो गए। दीपक चाचा और मंगला बुआ तो दूध-भात थे, कभी बड़ों में रहते ही नहीं थे दोनों। बड़े ताऊ जी के बच्चों के उम्र के आसपास रहने के कारण बस बच्चों में ही शामिल रहते थे। इस कुटुंब में आगे एक दर्जन बच्चों की भी एंट्री है।

अपने बंगले के सामने लॉन में कुर्सी पर बैठी सर्दियों की नरम मुलायम धूप का आनंद लेती पूनो नहीं.. अब तो पूर्णिमा, ने स्वेटर की डिजाइन को बड़ी कुशलता से पूरा किया। फंदों को गिराने-उठाने, घटाने-बढ़ाने और फिर एक निश्चित आकार दे देने में स्त्रियाँ तो माहिर होती हैं। अपनी जरूरतों, अपने सपनों, अपनी इच्छाओं के फंदों को कब घटा देती हैं और परिवार की जरूरतों, आशाओं को बुनकर तैयार करती हैं घर। यह स्वेटर वह अपनी नातिन ध्रुवी के लिए बना रही है। दो साल की प्यारी, गोल-मटोल ध्रुवी कितनी सुंदर लगेगी गुलाबी रंग के इस स्वेटर में, इस कल्पना से ही पूर्णिमा को खुशी होती है। आजकल तो बड़े कोई हाथ के बुने स्वेटर नहीं पहनते। 

बुनाई का एक ज़माना देखा था पूर्णिमा ने अपने कुटुंब में। यह कला अपनी दादी, ताइयों, माँ और बुआ से बहती हुई उसमें भी आ गई थी। सर्दियों की दोपहरी में, उन की रंग-बिरंगे लच्छियों को सुलझाकर गोले बनाना, नये नमूनों की तलाश में पत्रिकाओं का आदान-प्रदान करती ये स्त्रियाँ, गृहस्थी की बड़ी उलझनें भी साथ-साथ सुलझा लेती थीं।

"मैं सब्जियाँ लेने जा रहा हूंँ। तुम्हें चलना हो तो चलो वरना यह सब्जी अच्छी नहीं, वह ठीक नहीं कहती रहती हो।" हाथ में थैली लिए पूर्णिमा के पति अशोक खड़े थे। 
"अब अगले सप्ताह तक मुझे यह स्वेटर पूरा करना है तुम ही ले आओ सब्जियाँ, देखकर लाना तो अच्छी ही आएगी ना।" उसकी बात सुनकर सिर हिलाते हुए सब्जी मंडी के लिए अशोक प्रस्थान कर गए। उनको जाता देख, एक बार चारों तरफ नज़रें घूमाकर पूर्णिमा फिर से उस स्वेटर के फंदों और अपने कुटुंब की सुखद स्मृतियों में लीन हो गई।

 ऐसी सर्दियों में तो 'सिंह कुटुंब' का सौंदर्य द्विगुणित हो जाता था। सब्जियों का बाहुल्य उनकी कीमतों को घटा देता था और तब प्रति समय दो सब्जियों का आनंद लेने  वाला परिवार अपने आप को राज परिवार से कम नहीं समझता था।

दादाजी और दादी ने अपने बच्चों के काम बाँट रखे थे। अपनी दोनों बेटियों को भी उन्होंने बराबरी का काम दिया था। दोनों बुआ, सबके कपड़े तह करतीं, उनके कमरों में  रख देतीं, परदे बदलना, नाश्ता परोसना और बैठक की साज-सज्जा बड़ी खुशी से किया करती थीं। दोनों बुआ के साथ बड़े ताऊ जी की दोनों बेटियाँ भी गुपचुप काम किया करतीं। शाला से आने के बाद यूनिफॉर्म धोना और विशेष समय पर लोहा करना, सब बच्चे कर लेते थे।

 कितना सुंदर, कितना प्यारा समय था। एक-दूसरे के कपड़ों को धोकर उनके कमरे तक पहुंचाना, कोई मनमुटाव नहीं। आँगन के चूल्हे पर चादरों को उबलते पानी में खौलाकर, फिर ताई जी और मांँ उन्हें कुटेले से कूट-कूट कर साफ करते थे। मजाल है कि सूखती चादरों और तकिया के गिलाफ़ो को कोई हाथ भी लगा दे। दो-तीन बच्चों का काम छोटी बाल्टी से पानी लाकर टंकियों में भरना था, वो भी चड्डी-बनियान पहने दौड़कर अपना काम पूरा कर लेते।

भोजन का आनंद तो इतना कि अंत में खाने वालों की थालियों में साग, अचार-चटनी जैसी और अचार, चटनी-साग जैसे परसे जाते थे। हमेशा ही दोनों ताईजी, माँ और चाची सबके खाने के बाद, सिलबट्टे पर टमाटर-धनिया की चटनी पीसकर खाते थे। कुटुंबपाल सब्जियांँ भी कभी-कभी उनकी दादी तक नहीं पहुँच पाती थी।
दादा जी के साथ दोनों ताऊजी खाने बैठते। बाबूजी कभी-कभी उनके साथ बैठते वरना तो बाबूजी और चाचा बाद में ही खाना पसंद करते थे। खाते समय दादाजी पूरे दिन के काम का हिसाब-किताब पूछा करते तो नौकरी करने वाले बाबूजी और पढ़ाई करने वाले चाचा, कन्नी काट लेते थे।

 खेती का काम तो अंत तक दादाजी ही देखते थे। पूरे परिवार की दाल-रोटी यानी गेहूँ और अरहर की फसल भरपूर हो जाती थी खेतों में। दोनों ताऊ जी ने कपड़ों की दुकान डाली थी, दोनों मिलकर आधा-आधा समय बैठते और दुकान चलाते थे। बाबूजी प्राथमिक शाला की शिक्षक थे। बड़ी बुआ के रिश्ता भी उन्होंने दूसरे गाँव में एक शिक्षक से ही तय करवाया था।

दादाजी ने सबके काम, सबकी जिम्मेदारियांँ बाँट रखी थीं। दाल-रोटी खेती से और फल-सब्जियों की पूर्ति बड़े ताऊजी पर थी। त्योहारों पर सबके कपड़े बनवाने का जिम्मा छोटे ताऊजी पर था। बाबूजी, चावल,‌ तेल और रसोई के अलावा लगने वाले धुलाई का पावडर, साबुन का इंतजाम करते थे।

नए कपड़े बनवाने का जैसे मुहूर्त देखा जाता था। शादी-ब्याह, दीपावली या कभी किसी के जन्मदिन पर उसको नए कपड़े मिलते थे। आँगन में गाँव का दर्जी अपनी मशीन लिए आठ-पंद्रह दिनों का डेरा लगा लेता था। छोटे ताऊजी दुकान से कपड़ों की थान ले आते, इन्हीं थानों में से पूरे कुटुंब के कपड़े सिलवाए जाते थे। नमूनेदार बेल-फूल वाले थान लड़कियों के लिए आते थे और फैशन तो बढ़-चढ़कर था उस ज़माने का।
 किसी बच्ची को छोटी चुन्नट वाला घेर तो किसी को चौड़ी प्लेट्स की स्कर्ट चाहिए, किसी को चूड़ीदार तो किसी को घेरदार सलवार चाहिए होती थी। गाँव का वह दर्जी हर प्रकार की फरमाइश सधे हाथों से पूरी करता। दादी फलालेन के ब्लाउज पहनती थी तो बड़ी ताई जी पूरी आस्तीन के। छोटी ताई जी को जरी और कांच लगे आस्तीन बड़े पसंद आते थे और मां को रुबिया और सूती कपड़ों के ब्लाउज। चाची के ब्लाउजों की डिजाइन ढूंढते-ढूंढते दर्जी चाचा भी माथे पर हाथ लगा लेते थे।


किसी रिश्तेदार के यहां शादी पड़े या घर में कोई बड़ा कामकाज हो तो दर्जी चाचा की बहुत डिमांड बढ़ जाती। बार-बार बच्चों को उनके घर का फेरा लगाना पड़ता तब कहीं जाकर वो दर्शन देते। इन कपड़ों की थानों में से वह अपने परिवार के कपड़े भी सिल लिया करते। परिवार के साथ ही उसका खाना-पीना, चाय-नाश्ता उन पूरे दिनों दिन बंधा रहता था। पुरुषों के कपड़ों के लिए हल्के रंग के प्लेन गट्ठे आते।

 ताऊजी और दादाजी, दोनों ही धोती के साथ कुर्ता पहना करते थे। छोटे ताऊजी, बाबूजी और चाचा पैंट -कमीज पहनते थे। चाचा उस वक्त कॉलेज में पढ़ा करते थे और वे छोटे ताऊ जी के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते कि, "भैया मेरे लिए यह सादे कपड़े मत लाना कुछ लाइन वाले चमकीले रंग के लाना जैसे फलाने पिक्चर में राजेश खन्ना ने पहना था। उनके लिए दर्जी चाचा अलग-अलग कॉलर वाली अलग प्रकार के फिटिंग वाली कमीज़ें से बनाया करते थे। उस समय के बड़े फैशन डिजाइनर दर्जी चाचा और शो स्टॉपर दीपक चाचा थे।

यह तो हुई कपड़ों की बातें, अब जरा सब्जियों की दुनिया में भी कदम रखते हैं। कुटुंब के लिए सब्जियों का ठेका बड़े ताऊजी के कंधों पर था। मुझे लगता है सबसे बड़ा यही काम था जो ताऊजी ने सालों-साल संभाला। पाँच बजे कपड़ों की अपनी दुकान से निकल कर वह पैदल ही सब्जी मंडी जाते। छह-सात बजे जब सब्जी वाले अपना सामान कम कीमत में बेचकर निकलने की फिराक में रहते तो ताऊ जी बड़ी तादाद में सभी बची सब्जियाँ खरीद लाते। अब वह भी क्या करें बीस-बाइस लोगों के इस कुटुंब में भोजन का मुख्य आकर्षण तो सब्जियां ही थीं। कोई किलो दो किलो तो नहीं पूरे चार किलो सब्जी एक समय में लग जाया करती थी। 

भूरा कुम्हड़ा, लौकी, बैगन, पत्ता गोभी और आलू की तो पूरी बोरी ले आते थे ताऊजी। शायद कुटुंब ने ट्रकों आलू खाए होंगे जीवन में। सब्जियों की कमी के समय आलू मुख्य केंद्र होता था। फूलगोभी, बरबटी, पनीर, शिमला मिर्च यह सब सब्जियां विशेष दिन त्योहार पर ही बनती थीं। अरहर की दाल जब बनाई जाती थी तब बीस-पच्चीस किलो साबुत अरहर घर पर रख दिया करते थे जो कभी-कभी उबाल कर नाश्ते के काम आती थी।

सिलबट्टे पर पिसा हुआ मसाला, चूल्हे पर पकी सब्जियां जिनकी महक घर आंगन में फैला करती। सूखी मसालेदार सब्जियां कभी-कभार ही बनती थीं । हमेशा खूब रसदार, बड़ी कढ़ाही के कानों तक मसालेदार पानी में तैरती 'कुटुंबपाल' सब्जी ही परोसी जाती।

"चाची,  इतना रस क्यों रहता है सब्जी में? सूखे परवल, कटहल क्यों नहीं बनाते?"  रसोई इंचार्ज माँ थी तो ताऊ जी के बच्चे माँ से पूछा करते। 
"तुम्हारे ताऊजी से कहना तीन-चार की जगह पाँच-छह किलो सब्जियाँ लाया करें। यहाँ हर आदमी चार-पांँच रोटी के साथ दो कटोरी दाल और उतनी ही सब्जी खा लेता है। सूखी सब्जी बनाते रहे तो चल गया यह कुटुंब ।" माँ की जगह दोनों ताईजी कूद जातीं बच्चों के सामने।
इस पूरे कुटुंब के लिए सब्जियों की व्यवस्था करने वाले बड़े ताऊजी को दादाजी ने ही पहली बार "कुटुंबपाल" का उपनाम दिया था। सबके मन को बनाए रखना, गर्मियों में तरबूज, खरबूज और सर्दियों में गाजर लाकर "आज बच्चों के लिए गाजर का हलुआ बनाना छोटी" कहकर, अपने उपनाम को सार्थक करने वाले बड़े ताऊजी, आज भी पूर्णिमा की स्मृतियों में मुस्कुरा रहे थे।

 सब्जी रामायण का समापन टमाटर की किसी चटनी से करने में कोई संकोच नहीं है। चाहे सब्जी स्वादिष्ट हो न हो, रसदार हो सूखी भुनी हो, कुम्हड़े की हो भिंडी की हो, रसोई संभालने वालियों की थालियों के लिए बस अचार की तरह बचती थी और फिर सिलबट्टे पर पिसी जाती थी इन स्त्रियों के नित्य की साथी 'चटनी'। जिसे बड़े प्रेम से, दुनिया जहान के व्यंजनों की विधियां एक-दूसरे से साझा करते हुए, पहले तीनों फिर चौथी आई चाची भी चटकारे लेकर खाया करतीं।

"अपने लिए पहले ही थोड़ी सब्जी अलग रख लिया करो दुल्हन। रोज-रोज इस तरह चटनी के साथ खाना क्या अच्छा लगता है रसोई में जितनी बनेगी सारे पूरी खा जाएंगे तो तुम क्या रोज ही ऐसी रहोगी?" दादी अक्सर अपनी चारों बहुओं को रसोई में आकर कहा करती थीं।
सोने के पहले बच्चों को और दादाजी को दूध दिया जाता था। घर में ही एक भैंस और दो गायें थी। चाय, दही-छाछ, घर के ही दूध से बनता था। शाम को ताजा दुहा दूध उपले जला कर मिट्टी की हांडी में पकने रख दिया जाता था। पीला होता दूध अपनी खुशबू से सबका ध्यान खींच लेता। कुछ दूध रोटी खाना पसंद करते थे जिसमें दादाजी अपने फूलकांस के कटोरे में दूध-रोटी खाया करते थे। ऊपर से शक्कर डालने का बिल्कुल रिवाज नहीं था इस कुटुंब में।


ठेलों पर बिकने वाले बर्फ के गोले, कुल्फी, गुपचुप खरीदने के लिए बड़ी सिफारिश करनी पड़ती थी। पूर्णिमा ने याद किया एक बार बर्फ के गोले वाले की आवाज़ से लाचार बच्चों की गैंग ने एक दुपहरी छोटे ताऊ जी के कमरे से दस रूपए का नोट चुरा लिया। इस नोट में जी भर गोला खाए और कुल्ला करके मुंँह को साफ करने का असफल प्रयास करने वाले इन बच्चों की चोरी छुपी नहीं रही। छह बच्चों की इस गैंग का एक छोटा सदस्य ही मुखबिर बन गया। वह था पूर्णिमा का अपना छोटा भाई प्रमोद। 

जब ताई जी अपनी अलमारी, अपने बटुए, अपने कपड़ों और हर जगह उस दस के नोट को ढूंढ रही थीं तब इसी मुखबिर ने उस नोट की चोरी यात्रा का नमक-मिर्च लगाकर वर्णन कर दिया। उसे तो मुखबिरी का पुरस्कार मिला "ईमानदार बच्चा" और बाकी पाँचो की शाम को पेशी लग गई। कितने उठक-बैठक, कितनी डाँट, कितनी  विभूतियों से उनको नवाजा गया था, आज भी पूर्णिमा को हँसी आ गई।

"अकेली बैठी-बैठी कब तक हंँसती रहोगी? अब तो धूप भी बढ़ गई है।" गेट खोलकर अशोक सब्जियों का थैला लिए पूर्णिमा के साथ वाली कुर्सी पर बैठ गए। 
"सुबह तो इतनी ताजी सब्जियाँ मिलती हैं कि मजा आ जाता है।" उन्होंने उत्साह में भरकर एक-दो सब्जियांँ बानगी के रूप में दिखाईं।

"यह परवल लाया हूंँ, मौसम के पहले परवल, पचास रूपए पाव हैं। इन्हें एकदम सूखा बनाना। वाह! सूखे परवल का स्वाद ही निराला होता है।" सब्जियों के शौकीन अशोक ने पूर्णिमा की ओर देखकर कहा, "सूखे ही बनाना कुटुंबपाल नहीं जो तुम्हें पसंद है। कढ़ाई भर रस में तैरते चंद परवल के टुकड़ों को गोता लगाकर निकालना पड़ता है।" अशोक जी ने हंँसना शुरू किया तो पूर्णिमा भी हंँस पड़ी।

"अब न कुटुंब रहते न कुटुंबपाल! अब तो बड़ी चारदीवारियों से घिरे मकानों में सिर्फ दो-तीन प्राणी बसते हैं। जो चाहे तो रोज मनमोहन भोग भी खा सकते हैं।" अपने उस कुटुंब से आज दो प्राणियों तक के इस सफर को पूर्णिमा ने, पिछले कुछ घंटे में एक बार फिर जी लिया था।


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शर्मिला चौहान

रविवार, 23 अगस्त 2026

कहानी (मवाद) कथा रंग प्रतियोगिता में भेजी

मवाद (कहानी)


रोज की तरह बस से उतर कर दीपा बैग, साड़ी संभालती, हड़बड़ाती चाल से स्कूल की ओर बढ़ गई। बस स्टॉप से करीब दो सौ मीटर की दूरी पर है उसका स्कूल परंतु यह दूरी कभी-कभी बहुत लंबी जान पड़ती है उसे। उतनी ही लंबी जितना बचपन से आज तक का उसका जीवन। यदि बचपन का जीवन, जीवन था तो उसे आज भी अपने जीवन से उतना ही डर, उतनी ही नफरत हो जाती है। 

सामने गड्ढे के भरे पानी में चप्पल ने छपाक किया और साड़ी में छींटे पड़ ही गए। छींटों से तो उसकी पुरानी दोस्ती है। कुछ छींटे कपड़ों पर, कुछ शरीर पर और कुछ मन पर दाग छोड़ जाते हैं। आसपास से निकलते बच्चों को देखकर उसे कुछ सुकून मिला। बच्चों ने उसे देखकर हाथ हिलाया और "गुड मॉर्निंग टीचर" से संबोधित किया। क्षण भर के लिए उसका मन किसान के लहलहाते खेतों की तरह हरिया गया। इन मासूम बच्चों के चेहरों की खुशी, जीवन का उत्साह और निश्छल प्रेम ने ही उसे इस दुनिया में रहना, अपने लिए लड़ना और जीना सिखाया है।

स्कूल के गेट पर पहुंची ही थी कि प्रार्थना की घंटी बज गई। 
"ओह हो! अब स्टाफ रूम में जाकर रजिस्टर में दस्तखत करके आते तक तो हेडमास्टर सर और बाकी सब आ ही जाएंगे। दीपा लगभग दौड़ती हुई स्टाफ रूम की ओर भागी। रजिस्टर पर अपने दस्तखत करते हुए उसने सभी उपस्थित शिक्षकों के नाम पढ़ लिए और झपटकर बाहर प्रांगण की ओर वापस चल पड़ी। 

कक्षाओं को पार करते हुए कक्षा पाँचवी की खुली खिड़की के अंदर उसकी नजर चली गई। सारी तेजी, सारा उत्साह कपूर की तरह उड़ गया। हमेशा की तरह सलोनी एक कोने में चुपचाप खड़ी थी और दीवार को घूर रही थी। दीपा के पैरों में जैसे ब्रेक लग गया। वह उसे देखती रही फिर आवाज़ लगाई। 
"सलोनी, प्रार्थना शुरू हो रही है। सारी क्लास चली गई, तुम अकेली क्या कर रही हो?"  दीपा की आवाज का सलोनी पर कोई असर नहीं हुआ। 
"सलोनी चलो। प्रार्थना शुरू हो रही है बेटा। क्या सोच रही हो?" कहती हुई दीपा ने सलोनी का हाथ पकड़ा और प्रांगण की ओर बढ़ चली। 

दो-तीन ही कदम बढ़ाए थे कि सलोनी के हाथों के लाल-नीले चकतों ने वापस उसके पैरों में जंजीर डाल दी। सांवले हाथों की कांतिहीन मुरझाई त्वचा पर बच्ची के दुख और उसकी स्थिति का कच्चा चिट्ठा जगह-जगह अंकित था। हाथों के निशानों से हटी दृष्टि, सहज ही शरीर के अन्य अंगों पर घूमने लगी। कहीं रगड़, कहीं खरोच के निशान तो कहीं दबाव से पूरी गांठ बंधी पड़ी थी।

"हे ईश्वर! क्या यह उसका ही अतीत सलोनी के रूप में, उसके सामने फिर से खड़ा हो जाता है?" ढेर सारा अवसाद, पीड़ा दीपा की नजरों में छलछला गई।
"बेटा सलोनी, क्या हुआ बेटा? तुम्हारे हाथों गले और गर्दन पर इतने निशान कैसे हैं?"  दीपा पूछती चली गई परंतु सामने खड़े बचपन ने जैसे चुप्पी और रखी थी।
"चुप क्यों हों, मैंने कई बार पूछा है तुमसे? कुछ बोलोगी तभी पता चलेगा ना कि क्या सह रही हो?"  कुछ रोष से दीपा ने कहा। 

दस साल की बच्ची ने आँखें ऊपर उठाईं। सफेद बर्फ के सागर में एक काला, डूबता छोटा टापू जिसे किसी भी क्षण सफेदी अपने में समां लेने के लिए आतुर लगती थी। इसके अलावा दूर-दूर तक कुछ नहीं था उन आँखों में जिनमें दीपा कुछ खोज पाती। जमी सफेद बर्फ में पानी का हर कतरा ठोस बनकर समा गया था। कितनी वीरानी, कितनी चुप्पी और अथाह जमाव से, हिमखंड का टुकड़ा बनकर खड़ी थी सलोनी। 
"सलोनी तुम बैठो बेंच पर। मैं प्रार्थना के बाद आती हूंँ। मुझे तुमसे बात करनी है। तुम शांति से बैठो, मैं अभी आई।" दीपा ने सलोनी को बेंच पर बिठाया और दरवाजे से निकल कर प्रार्थना के लिए पहुंँच गई। 

शिक्षकों की पंक्ति में सबसे अंतिम खड़ी दीपा ने लोगों की चुभती नज़रों को महसूस किया। उसे अब फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह इस स्कूल की एक अच्छी टीचर है। विज्ञान सिर्फ पढ़ाती नहीं है बच्चों के दिमाग में एक-एक बात फिट कर देती है और उसी में उसको आनंद आता है। 

बनना तो कुछ और ही था परंतु टीचर वह भी प्राइमरी स्कूल की उसने सोचा नहीं था। बच्चों के सुरताल, राष्ट्रगीत की लयात्मक उतार-चढ़ाव भी दीपा के मन को बांध नहीं सके और वह हिरण की तरह कुलांचें भरता उसके बचपन में जा पहुंचा। 

पापा उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। सिर्फ सात साल की उम्र में उसके माँ-पापा उसे छोड़कर चले गए। एक दुर्घटना हुई और उसका सब कुछ खत्म हो गया। 

दादी कहती, "कैसी छोरी पैदा किए थे जो खा गई माँ-बाप को।" ऐसी स्त्री बच्ची का मन कैसे समझ पाती? बात-बात में हाथ उठाना, छड़ी से पीटना शायद उनके क्रोध को शांत करता परंतु सात साल की दीपा के शरीर, हृदय और आत्मा को यह घाव छील डालता था। घंटों भगवान घर में बैठकर, लड्डू गोपाल को नहलाती, कपड़े पहनाती और भोग चढ़ाती थी दादी। इस कन्हैया से बहुत शिकायत भी थी उनको।

"सारी जिनगी तो सेवा की थारी कान्हा। खुद आते बालक बनके इस छोरी को क्यों भेज दिया? मार के खा गई माँ-बाप को।" दरवाजे के बाहर से सुनती दीपा मन ही मन सोचती, "दादी पैदा होते साथ नहीं मरे थे मेरे माँ-पापा। सात साल रहे थे मेरे साथ। नया स्कूटर लिए थे और उसी से जब एक्सीडेंट हुआ था तब तो वह स्कूल गई थी तो दोनों की मृत्यु की जिम्मेदार वह कैसे हो गई?" परंतु दादी के सामने बोलने की हिम्मत नहीं थी उसकी।

खैर, शहर के किराए का घर छोड़कर, वह दादी के साथ हमेशा के लिए गांँव आ गई थी। गाँव क्या था, दूर-दूर इक्का-दुक्का घरों से बनी बस्ती, चार-छह दुकानें, एक चौक, एक हटरी, एक सरकारी पाठशाला, दर्जी, सुनार और साहूकार जिसने आधे गाँव को गिरवी में खरीद लिया था। 
"दादी, मुझे भी स्कूल जाना है। कक्षा दो पढ़ चुकी हूँ। अब तीन में दाखिला करवा दो।" बड़ी हिम्मत करके एक दिन दीपा ने दादी से पूछा।
"सकूल जाएगी, झंडा चढ़ाएगी? मास्टरनी बनना है क्या थारे को? घर का कामकाज मैं करती रहूँ बुढ़ापे में और तू मेमसाब बनी सकूल जाएगी।" दादी ने गुर्राकर पानी से भरा गिलास उसके मुँह पर दे मारा। 

आज भी दादी के तेवरों से झुलसते बचपन को, कटु-स्मृतियों के सागर में गहरा पैठे पाती है दीपा। गाँव का स्कूल, दूर से आने वाले शिक्षक, तेज बारिश हुई तो स्कूल बंद हो जाता क्योंकि कच्ची सड़कों से बच्चों और टीचरों का आना मुश्किल ही था। बच्चों को भी खेती का काम, मछलियाँ पकड़ने और पशुओं को चराने में आनंद आता था, स्लेट-पाटी लेकर ककहरा लिखने में नहीं। 

"माँजी, अपनी पोती को शाला भेजो ना। कक्षा दो पढ़ ली है तीन और पढ़ जाएगी तो प्राथमिक शिक्षा पूरी हो जाएगी।" एक दिन शाला से दो शिक्षक घर आए थे। प्रधानाध्यापक ने उन दोनों को घर-घर जाकर बच्चे जमा करके स्कूल लाने का काम सौंपा था शायद। 

 "सकूल जाने से क्या मिलेगा? अभी मेरे साथ खेतों पर जाती है, घर के कामकाज में मदद करती है, वह भी बंद कराने आए हो?" भारी आवाज से गरजी थी दादी और वे दोनों शिक्षक अपना बैग संभालते निकल गए।

नौ साल की होते-होते दीपा ने दादी की मार के डर से घर के काम, खेती के काम का पचास-साठ प्रतिशत तो सीख ही लिया था। स्कूल का वह छोटा-सा भवन, सामने तिरंगे का खंभा, आते-जाते बच्चे यह सब उसके दिल में गहरा उतरता गया। 

बच्चों ने तालियाँ बजाईं और दीपा आज के अपने इस स्कूल में वापस आ गई। टीचर्स आपस में बतिया रहे थे कि आज जिस बच्चे ने प्रार्थना के बाद सुविचार कहा, बहुत अच्छा बोला। बुराई, अत्याचार का सशक्त विरोध जरूरी है ऐसा उसने जोरदार उदाहरण सहित बोला। खैर, भाषणों में बोली जाने वाली हर बात जीवन में कितनी सही उतरती है यह तो वह खुद जानती थी या उसके जैसे चंद भुक्तभोगी लोग। 

बच्चे क्लास की तरफ और टीचर स्टाफ रूम की तरफ चल पड़े। दीपा फुर्ती से उस कमरे की ओर चली गई, जहाँ उसने सलोनी को छोड़ा था। उस कमरे में बच्चे बैठ रहे थे परंतु सलोनी कहीं नजर नहीं आई। दीपा ने सब तरफ अपनी दृष्टि घुमाई और फिर स्टाफ रूम की ओर चली गई।
"दीपा, आज मेरी क्लास ले लोगी क्या, मुझे कॉपियां जांचनी है?" साथ की भाषा अध्यापिका ने पूछा।

 "मेरी तो खुद की क्लास है अभी नंदा मैम। वैसे भी मैं आपका विषय नहीं पढ़ा सकती हूँ।" कहती हुई अपनी कक्षा की ओर दीपा चली गई। इन शिक्षकों को कॉपियां, उत्तर पुस्तिका जांचने के लिए किसी दूसरे टीचर को परेशान करने का जायज अधिकार कैसे मिल जाता है, पता नहीं। 

कक्षा चौथी की उपस्थिति लेने से लेकर पीरियड खत्म होते तक पूरे समय दीपा की नजरों में सलोनी का चेहरा, उसके हाथों में पड़ी लाल-नीली चित्तियां, उसकी वो बर्फ-सी जमी आँखें घूम रही थीं। ऐसा लगता था मानो उसके जीवन में कोई तूफान चल रहा है जिसे वह अपने इस शरीर में छुपा लेना चाहती है। 

स्टाफ रूम में जाना उसने जरूरी नहीं समझा और स्कूल के चारों ओर एक राउंड लगाते हुए सलोनी की तलाश में लग गई। यह छोटा-सा सरकारी स्कूल, अपनी शैक्षणिक उपलब्धियां, व्यवस्था, स्वच्छता और नियमबद्धता के लिए शहर में अपनी पहचान रखता है। स्कूल के अहाते में फूलों की क्यारियांँ, ईंट से व्यवस्थित सीमाएं, कचरे के ढक्कन वाले डिब्बे, सब कुछ व्यवस्थित रखा है। सभी कक्षाओं के बच्चे सप्ताह में एक बार, एक घंटा इस अहाते की देखभाल और सफाई करते हैं। 

आज सारा अहाता खाली था सिर्फ माली पानी का पाइप लिए पौधों को सींच रहा था। इस माली का बेटा भी इसी स्कूल में पढ़ता है। माली के अभिवादन का उत्तर देकर, उसने नीम के पेड़ के नीचे और पीछे सलोनी को तलाश किया। अपने खाली पीरियड में इससे पहले वह इस तरह कभी घूमी नहीं थी। उसे खिड़की से बच्चे, ब्लैक बोर्ड दिखाई दे रहे थे।

इस श्यामपट्ट  की तासीर भी विचित्र होती है। काला रहकर हर बच्चे के जीवन में उजियारा लाने के लिए  प्रयासरत होता है। इस पर चॉक से लिखी गई इबारतें बचपन को समृद्ध करती हैं और भविष्य का सुंदर खाका तैयार करती हैं।

 श्यामपट्ट  पर सफेद चॉक से उकेरे चित्रों ने, दीपा के बचपन को अपनी ओर खींच लिया था। दादी से चोरी-छिपे स्कूल की खिड़की से सटी, वह पढ़ाते शिक्षकों और दोहराते बच्चों में डूब जाती थी।

 उसके दसवें साल में प्रवेश ने दादी के हृदय की सुगबुगाहट बढ़ा दी थी। घर से बाहर अकेले निकलने पर पाबंदी लग गई। लहंगा-ब्लाउज पर सिर से चुन्नी जरूरी कर दिया, अपरिचितों के सामने न निकलने की बंदिश लगाई गई अर्थात बचा-खुचा बचपन भी छीन लिया था। 
दीपा को याद है कि एक दिन गाँव में दादी के दूर का कोई रिश्तेदार आया। दादी ने उस दिन हलुवा बनाया था शायद उनका कोई अपना बहुत सालों बाद आया था। दीपा पर नजर पड़ते ही उसने पूछा, "माधव भाई जी की छोरी है ना यह। शहर में भाईजी-भावज ने खूब मौज की थी छोरी ने भी की होगी। सकूटर में घूमते थे, अब देखो सर ढंके गांँव में सड़ रही है।"

और किसी ने यह बात कही होती तो दादी उसे भूंज कर खा जाती पर वह उनका कोई सिरचढ़ा अपना था तो "हांँ-हूंँ" करके दीपा की चुन्नी हटवा दी। दीपा की खुशी का ठिकाना नहीं था वह अनजाना रिश्तेदार, उसे अच्छा लगने लगा था। 

वह गाँव भर घूमता, घर में हलुआ-खीर उड़ाता और आते-जाते दीपा की हथेली पर पिपरमेंट नारंगी की गोलियांँ रख देता। जब गोलियां रखते उसकी हथेलियों ने दीपा की हथेली को मसला, तो दीपा की चीख पड़ी थी। अब उसका घूरना, गोलियां देना उसे पसंद नहीं आता था और उसे देखते ही वह खुद-ब-खुद अपने सिर पर चुन्नी ढंककर, उसी चुन्नी में सिमट जाती थी। 

दादी खेतों में जाती तो दीपा उनकी थैली, खाना पकड़े साथ जाती, उनके काम में हाथ बंटाती। वह रिश्तेदार दो दिनों से बीमार पड़ गया और दादी ने उसके चाय-पानी के वास्ते दीपा को घर में छोड़ दिया। वह आदमी बरामदे की चारपाई से उठकर, रसोई में भात पकाती दीपा से सटकर बैठ गया। उसकी चुनर हटा दी और पीठ पर से हाथ सरकाया हुआ, कमर तक ले गया। दीपा की छिटककर दूर हट गई और आँगन में भाग निकली। उसकी साँसें तेजी से चल रही थीं।

वह दौड़ती खेतों की और भागी। दादी को बताया तो वह सुनने को तैयार नहीं थी। शाम को सिर से पैर तक कंबल ओढ़ कर सोते, उस रिश्तेदार ने ऐसी कहानी गढ़ी कि दादी ने दीपा को छड़ी से खूब पीटा। 
"तेरे ब्याह के लिए घर-बार बतायेगा ये, तू इसे ही बदनाम करती है। झूठी, करमजली दो साल में तेरा ब्याह करके ही मेरी छाती हल्की होगी।" दीपा को आज की मार ने शरीर में कम, दिमाग में ज्यादा असर किया था।

उस मक्कार आदमी की आँखें, उसकी मंशा सब कुछ दीपा ने ताड़ लिया था। दूसरे दिन तो उसने जबर्दस्ती दीपा को खाट पर धकेल दिया और अपना मूंँछदार चेहरा उसके मुंँह पर लगाया ही था कि दैवयोग से उसी समय दर्जी चाचा की आवाज आई और वह हड़बड़ा कर ऊपर से उठ गया। बिखरे बालों, आँसू भरी आँखों से दीपा बाहर आ गई। दर्जी चाचा कपड़े की थैली लिए आँगन में बैठे थे। उसने उनकी ओर देखा और बिना रुके दरवाजे से बाहर भागती चली गई। स्कूल के अंदर जाकर ही दम लिया था उसने। आज न जाने क्यों इस स्कूल ने अपने दरवाजे उसके लिए खोल दिए थे। दो शिक्षक, जो उस दिन घर आए थे स्कूल बंद करके साइकिल लिए निकल रहे थे। उनके साथ एक शिक्षिका भी थीं। 

"मुझे बचा लो, मुझे पढ़ना है। वह आदमी बहुत बुरा है, दादी भी बहुत मारती-पीटती है।" कहती हुई दीपा ने सारी बातें कह डाली।
उस शिक्षिका ने दीपा को पास बुलाया और उसके गले, चेहरे तथा हाथों पर पड़े निशान को देखते रही। उसके हाथों पर लाल-नीले-काले  रंग के दाग, उसके जीवन की व्यथा सुना रहे थे।

"आज तुम घर जाओ कल हम पास के शहर में, सरकारी महिला बाल विकास कार्यालय में बात करके तुम्हारे लिए जरूर कुछ करेंगे। पुलिस की भी सहायता लेंगे। अभी पानी पियो, ठंडे मन से घर जाओ और आज किसी से कुछ मत कहना।" मरती क्या ना करती, वापस दादी की ओर खेत में आ गई। दादी के छड़ी खाते हुए घर आती उसने चुप्पी साध ली थी। घर पर वह हलुआ खाता और दादी की छड़ी से दीपा की पीठ उधड़ जाती। 

दो दिनों के बाद घर के सामने एक जीप आई थी। एक महिला पुलिस, दो पुरुष पुलिस, बाल विकास अधिकारी थे। घर पर कोई नहीं था तो वह खेत पर आ गए जहां दीपा और दादी से पूछताछ की। उस आदमी के बारे में पूछा तो दादी ने बताया कि वह तो कल वापस चला गया। सरपंच, गांव के बुजुर्गो और स्कूल के शिक्षकों ने दीपा की दादी को समझाया और दीपा को शहर बालिका आवास गृह में सुरक्षित रखने की सलाह दी। पुलिस, महिला बाल विकास विभाग के हस्तक्षेप से दादी कुछ ना बोल सकी या मन ही मन इस बला के टलने से सुकून महसूस कर रही होगी।

एक बार फिर से दीपा एक छोटे शहर में वापस आई थी। बालिका आवास गृह जहाँ उस जैसी और पन्द्रह लड़कियाँ थीं,अब उसका घर हो गया। पास की शाला में उसका कक्षा चार में दाखिला हुआ अब अपने आवास की अन्य लड़कियों के साथ वह फिर से शिक्षा की राह पर निकल पड़ी थी। ऐसा नहीं था कि इस बालिका आवास की अपनी खूबियाँ, अपने  किस्से, अपनी विडंबनाएँ नहीं थे परंतु शिक्षा का एक मार्ग इसी से होकर जाता था। सो अन्य लड़कियों के साथ अपने माँ-पापा की स्मृतियों को हृदय से लगाए, उसने परिस्थितियों से जूझना सीख लिया था। खुद भी पढ़ती और साथ की छोटी लड़कियों को भी पढ़ाती थी। पढ़ने-लिखने में अत्याधिक रुचि के कारण वह इस आवास गृह की सबसे होशियार छात्रा बन गई थी।

बारहवीं के बाद जहाँ दूसरी लड़कियों ने छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए थे, वहीं दीपा को डी.एड. की परीक्षा देकर टीचर की डिप्लोमा ट्रेनिंग पूरी करने का मौका मिला। उसे तो ग्रेजुएशन करने की बहुत इच्छा थी परंतु आवास गृह पर बढ़ती संख्याओं का दबाव था। सरकारी सहायता, ट्यूशन, दान, हस्तकला की चीज बनाकर बेचने के बाद भी खर्च पूरा नहीं पड़ता।

 सरकारी विज्ञापनों में प्राथमिक शाला शिक्षिका पद के लिए वैकेंसी निकली और दीपा की किस्मत ने इस बार अपना करिश्मा दिखाया। दीपा को कभी-कभी लगता है कि जैसे उसकी किस्मत को लड़की के दर्द भरे जीवन पर रहम आ गया था।
उसे दूर-दराज गाँव में पहली पोस्टिंग मिली। आवास गृह तो छूट गया पर वहाँ उसका बिताया समय अभी भी धरोहर की तरह, उसके दिल के कोने में धड़कता है। धीरे-धीरे जीवन की गाड़ी पटरी पर चल पड़ी और अपने उस आवास गृह में, वह आज भी एक निश्चित राशि हर महीने भेजना नहीं भूलती है।

 इस सफर में हेड ऑफिस के लेखाकार नरेंद्र से उसकी जान-पहचान हुई और फिर जीवनपथ पर सहयात्री बनकर दोनों आज अपनी गृहस्थी की गाड़ी संतुलित चला रहे हैं। पांँच  साल का एक बेटा भी है उनका, जिसे अभी-अभी स्कूल में डाला है। 

दूसरे कालखंड की समाप्ति का घंटा बजा और दीपा की नज़र झटके से कक्षा की खिड़की से हट गई। वह वापस तेजी से स्टाफ रूम की ओर अगली कक्षा की तैयारी के लिए चल पड़ी। बालिकाओं के शौचालय की ओर उसने देखा, उसे सलोनी दिखाई दी। 

"अब इस कालखंड का क्या करूँ?" इसी ऊहापोह में पड़ी उसके कदम सलोनी की ओर उठ गए। 
"कहा था ना तुम्हें कक्षा में बैठे रहना, कब से ढूंढ रही हूंँ तुम्हें। बात करना चाहती हूंँ तुमसे सलोनी क्योंकि ऐसी चोटें, घावों के निशान, दर्द और दागों को जिया है मैंने। मेरे बचपन के घावों में मवाद भर जाता है जब तुम्हें देखती हूँ।" उसने सलोनी का कमजोर हाथ थाम लिया। 

उसकी संवेदनाशून्य, बर्फ सी आँखों में झांकते हुए कहा, "प्लीज़, पाँच मिनट मेरा इंतजार यही करना। मैं छुट्टी का आवेदन देकर आती हूँ। हम कहीं और चल कर बात करेंगे, हर समस्या का समाधान होता है बेटा। आज तो बहुत जागरूकता है और यह शहर है जहाँ तुम्हारी आवाज जरूर सुनी जाएगी। मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी।"  एक आश्वासन, स्नेह और अपनेपन की सच्चाई ने, सामने खड़े बचपन को झकझोर दिया। बेमौसम वसंत ने दस्तक दी और आँखों में जमा हिमखंड पिघलने लगा था।

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शर्मिला चौहान

सोमवार, 10 अगस्त 2026

जागेश्वर धाम

जागेश्वर धाम:  देवभूमि शिव धाम 

सावन का महीना, वर्षा  की फुहारें और देवाधिदेव महादेव की भक्ति में लय होती सृष्टि। अधिकमास में की हुई उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित जागेश्वर धाम की यात्रा, आप सबके साथ साझा कर रही हूँ।

मई की गर्मी में, शीतलता का आभास कराने वाले इस सुंदर स्थान के दर्शन के लिए हम बारह लोगों का समूह था। कौसानी के निवास होटल से मिनी बस द्वारा हम जागेश्वर धाम पहुंचे। मंदिर से पाँच किलोमीटर पहले गाड़ियों को पार्क करके, वहाँ की जीप, कारों से मंदिर जाने की व्यवस्था है। 

जीप से उतरकर करीब एक किलोमीटर पैदल ही मंदिर तक चलना होता है। साफ संकरे रास्ते, दोनों ओर आकाश चूमती पहाड़ियांँ, दाहिने बाजू बहती जटा गंगा की स्वच्छ, शांत जलधारा और पहाड़ियों से होड़ लगाते देवदार के वृक्षों की कतारें।‌ एक किलोमीटर की दूरी लगता है कि पल भर में पूरी हो गई।

यह प्राचीन मंदिर, शिलाओं और पत्थरों से बना है। बड़ा प्रांगण और उसमें 108 मंदिर जिनमें शिवलिंग स्थापित थे। जिधर देखो, मंदिरों का कलश दिखाई देता है। चारों तरफ़ पहाड़ियांँ, जटा गंगा नदी का धीमा, लयबद्ध प्रवाह, देवदार से छनकर आती शीतल वायु, नीला स्वच्छ अंबर और मंदिर के मंत्रोच्चार का स्वर, अहा! अनुपम, अप्रतिम सौंदर्य। 

मुख्य मंदिर को बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के समकक्ष रखा जाता है।  दर्शनार्थियों की लाइन लगी थी और हम सब उसका हिस्सा बन गए। 

प्रांगण के मध्य भाग में पाँच पंडित महामृत्युंजय जाप हवन‌ कर रहे थे। उस वातावरण में गूँजता उनका मंत्रोच्चार, आज भी हृदय में समाहित है। 

कोने में दो जुड़वां वृक्ष हैं जो सदियों पुराने (पाँच सौ वर्ष करीब) हैं।  तनों की संरचना, ऊँचाई और फैलाव उन वृक्षों की उम्र खुद कहते लगते हैं। शिव-पार्वती के प्रतीक इन वृक्षों ने, सालों से प्रकृति के बदलते तेवरों को अनुभूत किया होगा। 

इस अनुभूति को हृदय में समेटे हम वापस निकले। सौ मीटर की दूरी पर छोटे-छोटे होटल, रेस्टोरेंट थे जहाँ गर्म, सादा और स्वादिष्ट भोजन करके हम वहीं कुछ कदमों की दूरी पर स्थित संग्रहालय देखने गए।

पुरातत्व विभाग का यह संग्रहालय जागेश्वर धाम मंदिर के प्रांगण के जो 108 शिवलिंग थे उनमें से कुछ को यहाँ संरक्षित रखा गया है। इसके अलावा आठवीं, नवमी शताब्दी की पत्थर की खंडित, भग्न प्रतिमाओं को सहेजकर रखा है। गणपति, शिव-पार्वती, नंदी, माता सरस्वती, विष्णु भगवान की प्राचीनतम प्रतिमाओं को यहाँ देखा जा सकता है।

इस सुंदर, पवित्र, शांत देवस्थान के दर्शन करके, हम सब अपने निवास स्थान होटल वापस चले गए। भगवान शिव की अनुभूति रोम-रोम से हृदय तक प्रवाहित होती रही। सावन के पवित्र माह में शिवजी के इस जागृत स्थान को लिखकर, ऐसा लग रहा है मैं आज भी वहीं हूँ।