जागेश्वर धाम: देवभूमि शिव धाम
सावन का महीना, वर्षा की फुहारें और देवाधिदेव महादेव की भक्ति में लय होती सृष्टि। अधिकमास में की हुई उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित जागेश्वर धाम की यात्रा, आप सबके साथ साझा कर रही हूँ।
मई की गर्मी में, शीतलता का आभास कराने वाले इस सुंदर स्थान के दर्शन के लिए हम बारह लोगों का समूह था। कौसानी के निवास होटल से मिनी बस द्वारा हम जागेश्वर धाम पहुंचे। मंदिर से पाँच किलोमीटर पहले गाड़ियों को पार्क करके, वहाँ की जीप, कारों से मंदिर जाने की व्यवस्था है।
जीप से उतरकर करीब एक किलोमीटर पैदल ही मंदिर तक चलना होता है। साफ संकरे रास्ते, दोनों ओर आकाश चूमती पहाड़ियांँ, दाहिने बाजू बहती जटा गंगा की स्वच्छ, शांत जलधारा और पहाड़ियों से होड़ लगाते देवदार के वृक्षों की कतारें। एक किलोमीटर की दूरी लगता है कि पल भर में पूरी हो गई।
यह प्राचीन मंदिर, शिलाओं और पत्थरों से बना है। बड़ा प्रांगण और उसमें 108 मंदिर जिनमें शिवलिंग स्थापित थे। जिधर देखो, मंदिरों का कलश दिखाई देता है। चारों तरफ़ पहाड़ियांँ, जटा गंगा नदी का धीमा, लयबद्ध प्रवाह, देवदार से छनकर आती शीतल वायु, नीला स्वच्छ अंबर और मंदिर के मंत्रोच्चार का स्वर, अहा! अनुपम, अप्रतिम सौंदर्य।
मुख्य मंदिर को बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के समकक्ष रखा जाता है। दर्शनार्थियों की लाइन लगी थी और हम सब उसका हिस्सा बन गए।
प्रांगण के मध्य भाग में पाँच पंडित महामृत्युंजय जाप हवन कर रहे थे। उस वातावरण में गूँजता उनका मंत्रोच्चार, आज भी हृदय में समाहित है।
कोने में दो जुड़वां वृक्ष हैं जो सदियों पुराने (पाँच सौ वर्ष करीब) हैं। तनों की संरचना, ऊँचाई और फैलाव उन वृक्षों की उम्र खुद कहते लगते हैं। शिव-पार्वती के प्रतीक इन वृक्षों ने, सालों से प्रकृति के बदलते तेवरों को अनुभूत किया होगा।
इस अनुभूति को हृदय में समेटे हम वापस निकले। सौ मीटर की दूरी पर छोटे-छोटे होटल, रेस्टोरेंट थे जहाँ गर्म, सादा और स्वादिष्ट भोजन करके हम वहीं कुछ कदमों की दूरी पर स्थित संग्रहालय देखने गए।
पुरातत्व विभाग का यह संग्रहालय जागेश्वर धाम मंदिर के प्रांगण के जो 108 शिवलिंग थे उनमें से कुछ को यहाँ संरक्षित रखा गया है। इसके अलावा आठवीं, नवमी शताब्दी की पत्थर की खंडित, भग्न प्रतिमाओं को सहेजकर रखा है। गणपति, शिव-पार्वती, नंदी, माता सरस्वती, विष्णु भगवान की प्राचीनतम प्रतिमाओं को यहाँ देखा जा सकता है।
इस सुंदर, पवित्र, शांत देवस्थान के दर्शन करके, हम सब अपने निवास स्थान होटल वापस चले गए। भगवान शिव की अनुभूति रोम-रोम से हृदय तक प्रवाहित होती रही। सावन के पवित्र माह में शिवजी के इस जागृत स्थान को लिखकर, ऐसा लग रहा है मैं आज भी वहीं हूँ।
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