पटल को सादर प्रणाम 🙏
आज मैं अपनी पसंदीदा लघुकथाओं में से एक, आदरणीय चंद्रेश छतलानी जी की लघुकथा "नीरव प्रतिध्वनि" सादर प्रेषित कर रही हूँ। इस पर मेरे विचार भी हैं।
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नीरव प्रतिध्वनि
हॉल तालियों से गूँज उठा, सर्कस में निशानेबाज की बन्दूक से निकली पहली ही गोली ने सामने टंगे खिलौनों में से एक खिलौना बतख को उड़ा दिया था। अब उसने दूसरे निशाने की तरफ इशारा कर उसकी तरफ बन्दूक उठाई। तभी एक जोकर उसके और निशानों के बीच सीना तान कर खड़ा हो गया।
निशानेबाज उसे देख कर तिरस्कारपूर्वक बोला, "हट जा।"
जोकर ने नहीं की मुद्रा में सिर हिला दिया।
निशानेबाज ने क्रोध दर्शाते हुए बन्दूक उठाई और जोकर की टोपी उड़ा दी।
लेकिन जोकर बिना डरे अपनी जेब में से एक सेव निकाल कर अपने सिर पर रख कर बोला “मेरा सिर खाली नहीं रहेगा।”
निशानेबाज ने अगली गोली से वह सेव भी उड़ा दिया और पूछा, "सामने से हट क्यों नहीं रहा है?"
जोकर ने उत्तर दिया, "क्योंकि... मैं तुझसे बड़ा निशानेबाज हूँ।"
"कैसे?" निशानेबाज ने चौंक कर पूछा तो हॉल में दर्शक भी उत्सुकतावश चुप हो गए।
“इसकी वजह से...” कहकर जोकर ने अपनी कमीज़ के अंदर हाथ डाला और एक छोटी सी थाली निकाल कर दिखाई।
यह देख निशानेबाज जोर-जोर से हँसने लगा।
लेकिन जोकर उस थाली को दर्शकों को दिखा कर बोला, “मेरा निशाना देखना चाहते हो... देखो...”
कहकर उसने उस थाली को ऊपर हवा में फैंक दिया और बहुत फुर्ती से अपनी जेब से एक रिवाल्वर निकाल कर उड़ती थाली पर निशाना लगाया।
गोली सीधी थाली से जा टकराई जिससे पूरे हॉल में तेज़ आवाज़ हुई – ‘टन्न्न्नन्न.....’
गोली नकली थी इसलिए थाली सही-सलामत नीचे गिरी। निशानेबाज को हैरत में देख जोकर थाली उठाकर एक छोटा-ठहाका लगाते हुए बोला, “मेरा निशाना चूक नहीं सकता... क्योंकि ये खाली थाली मेरे बच्चों की है...”
हॉल में फिर तालियाँ बज उठीं, लेकिन बहुत सारे दर्शक चुप भी थे उनके कानों में “टन्न्न्नन्न” की आवाज़ अभी तक गूँज रही थी।
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चंद्रेश कुमार छतलानी
नीरव प्रतिध्वनि ( मेरी प्रतिक्रिया)
रोटी, कपड़ा और मकान की मूलभूत आवश्यकता पर प्रायः सभी लघुकथाकारों ने कलम चलाई है परंतु कुछ लघुकथाएं हमारे दिलो-दिमाग में हमेशा के लिए अंकित हो जाती हैं। आदरणीय चंद्रेश छतलानी जी की लघुकथा "नीरव प्रतिध्वनि" पर मैं अपने विचार रख रही हूँ क्योंकि यह मेरी पसंदीदा लघुकथाओं में से है।
रोटी, भूख और भोजन की आग सबसे भयानक आग है और इसका चित्रण इस लघुकथा में स्पष्ट दिखाई देता है।
लघुकथाकार चंद्रेश छतलानी जी की इस लघुकथा का शीर्षक भी प्रभावित करता है। आवाज़ की प्रतिध्वनि से ज़्यादा शांति या मौन की गूँज अपना असर छोड़ती है। नीरव की जो प्रतिध्वनि होती है उसका असर कानों के द्वार पर नहीं अपितु हृदय के द्वार पर होता है। विचारों, भावनाओं एवं संवेदनाओं की उथल-पुथल और मंथन के लिए प्रतिध्वनि सशक्त कारक बनती है।
सर्कस पर आधारित यह लघुकथा, विषय वस्तु और कथानक के लिए अच्छी ज़मीन देती है। सर्कस में काम करने वाले लोग, पशु-पक्षी सभी सिर्फ़ और सिर्फ़ मनोरंजन का जरिया होते हैं। लोगों को हँसाने, खुश करने के लिए, चंद पैसों के लिए अपने जान जोखिम में डालकर, खुश दिखने वाले लोगों के हृदय के दुःख को समझने के लिए इस लघुकथा को बार-बार पढ़ना चाहिए।
इसके मुख्य किरदार निशानेबाज और जोकर हैं। निशानेबाज का काम उसे श्रेष्ठ कलाकार की श्रेणी में रखता है जिसका उसे अभिमान भी है। वह अपने अचूक निशाने का प्रदर्शन करके लोगों की तालियांँ और वाहवाही बटोरता है और सर्कस की टीम में अपनी जगह कायम रखता है।
जोकर, एक ऐसा किरदार जो अपने हाव-भाव, मुख मुद्रा और ऊल-जलूल हरकतों से लोगों को हँसाने का काम करता है और इस काम से उसे पैसे मिलते हैं। काम ऐसा कि अपने आत्मगौरव को ताक पर रखकर उसे, खुद की हँसी उड़ाने की आदत हो जाती है।
सर्कस में उसका स्थान निश्चित नहीं होता, बीच-बीच में आकर वह अपनी उपस्थिति दर्ज करा जाता है। लघुकथा में ऐसे एक जोकर पात्र के अचानक निशानेबाज के सामने खड़े होकर, निशाना लगाने की अपनी श्रेष्ठता साबित करने का सुंदर चित्रण किया है।
"मेरा सिर खाली नहीं रहेगा।" इस वाक्य के कितने अर्थ निकलते हैं।
मेरे सिर पर हमेशा एक बोझ रहता है।
मेरे सिर में जो मस्तिष्क है उसमें हमेशा विचारों का मेला रहता है कि आगे क्या करूँ कि लोग हँसें और मेरी जगह बनी रहे।
रोटी और बच्चों की चिंता हमेशा सिर पर रहती है।
जोकर का अपने सामर्थ्य, अपने गुण, क्षमता का खूबसूरत प्रदर्शन करके अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करना, उसकी अपनी व्यथा कहने का एक तरीका ही था। वो काबिल था कि सर्कस में उसे निशानेबाज का काम मिले परंतु उसका जोकर बनकर रोटी कमाने की मजबूरी थी।
जोकर का कहना, "मैं तुझसे बड़ा निशानेबाज हूँ।"
"कैसे?" निशानेबाज के पूछने पर अपनी कमीज़ से अपने बच्चों की छोटी थाली निकालकर, उसे अपने श्रेष्ठ होने का कारण बताना, काम की कुशलता का श्रेय अपने बच्चों की भूख, रोटी की व्यवस्था को देना, एक सरल चीज का भावपूर्ण चित्रण है।
जोकर और दिनों से अलग मानसिक स्थिति में था इसीलिए उसने निशानेबाज को खुली चुनौती भी दी और अपने को साबित भी कर दिया। इस घटना को सर्कस देखने वालों ने चाहे खेल का एक प्रायोजित हिस्सा समझा हो परंतु जोकर का सही निशाना और उसकी मर्मस्पर्शी आवाज़ ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया।
लघुकथाकार ने जोकर का टकराव निशानेबाज से करवाया क्योंकि वह एक ऐसे किरदार को माध्यम बनाना चाहते थे जो सशक्त, दबंग हो। वह चाहता तो पशु पक्षी के ट्रेनर, नृत्य करने वाले युवा, करतब दिखाने वाले लोगों से भी जोकर का वार्तालाप करवा सकता था परंतु पाठक पर प्रभाव उतना नहीं पड़ता जितना निशानेबाज से पड़ा।
थाली से टकराकर गोली की जो ध्वनि निकली, उसकी प्रतिध्वनि ने लोगों के हृदय में प्रवेश कर लिया था। बच्चों की भूख, परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था के लिए जोकर का किरदार निभा रहे आदमी की भी कुछ इच्छाएं, कुछ और करने की सोच हो सकती है, इस बात की भावपूर्ण अभिव्यक्ति लघुकथाकार ने की है।
मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों के ताने-बाने से बुनी यह लघुकथा सशक्त लघुकथा है। सटीक, सार्थक संवादों, घटनाक्रम की सरल प्रवाहमय प्रस्तुति ने, लघुकथा को चित्रित कर दिया है। अंत में सर्कस में बैठे लोगों की तरह पाठक भी उस प्रतिध्वनि को महसूस करने लगता है और लघुकथाकार अपने काम में सफल हो जाता है। गोली की थाली से टकराने की "टनन्न" के मौन की प्रतिध्वनि को पाठक सुनता है, उसकी वेदना की नमी को अपने अंतस में महसूस करता है। लघुकथा ने शब्दों की गागर में संवेदनाओं का सागर भर दिया है। हर एक संवाद सामने घटित होता जान पड़ता है।
लघुकथा के अंत के बारे में मुझे लगता है कि यदि -
"मेरा निशाना चूक नहीं सकता......मेरे बच्चों की है...।" के बाद..
हॉल में बैठे दर्शकों में चुप्पी थी सिर्फ "टन्न्नन" की प्रतिध्वनि गूंज रही थी।
अपनी इस छोटी सी प्रतिक्रिया के साथ मैं आदरणीय चंद्रेश छतलानी जी को, सार्थक सृजन के लिए अनंत शुभकामनाएंँ देती हूँ।
शर्मिला चौहान
ठाणे महाराष्ट्र
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