कहानी - जादू की झप्पी
बालकनी में समाचार-पत्र पढ़ती सुमन चौंक पड़ी। उसकी पंद्रह साल का पोती ऋतिका ने कहा, "दादी, आज विश्व कैंसर दिवस है और हमारे स्कूल में जागरूकता कैंप लगाया है।" सुमन के गाल में प्यार करके बाय करती स्कूल बस की ओर भाग गई। ऋतिका तो चली गई परंतु सुमन अपने अतीत में डूबती चली गई।
वर्षों पहले जब मेडीकल रिपोर्ट ने सुमन के ब्रेस्ट कैंसर की आशंका को सही साबित कर दिया तब उसे लगा था कि दुनिया ख़त्म हो गई है। आँखों के सामने अँधेरा छा गया था। अपने से ज्यादा चिंता अपनों की थी उसे। कैंसर, नाम ही काफी है किसी की जीने की हिम्मत तोड़ने के लिए।
"सुमन, हम अच्छे से अच्छा इलाज करवाएंगे। तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगी।" उसके पति शेखर लगातार समझाते रहते। सुमन को उनकी आँखों में भी लहराता भय का सागर स्पष्ट दिखता था परंतु अडिग दीवार बने अपने पति के भविष्य का सोचकर सिहर जाती थी वो।
"मम्मी, आपको कभी कुछ नहीं होगा।" दोनों बेटे सुमन का हाथ थामकर कहा करते। बच्चों ने अपना काम खुद करने के साथ अपनी मम्मी का भी काम करने की कोशिश शुरू कर दी मानो अब समय ने उन्हें उम्र से बड़ा बना दिया था। बचपन से अचानक समझदारी तक लांघ आने का यह दौर, कल्पना से बाहर था।
एक जंग, जिसने परिवार के चार योद्धाओं को खुली चुनौती दे दी थी और सभी योद्धा अपने-अपने स्तर पर कमर कसकर तैयार हो रहे थे। आपरेशन का दिन तय करके डॉक्टर ने सुमन को हिम्मत बंधाते हुए कहा, " आपने सही समय पर जाँच कराई थी इसीलिए आपके पास इलाज का समय है। बस, आपकी हिम्मत, संयम और धैर्य की परीक्षा है और आप इसमें ज़रूर सफल होंगी।"
पति और बच्चे हौंसला बढ़ाते कि सब अच्छा होगा तो सुमन भी मानसिक रूप से आपरेशन और इलाज के प्रति आश्वस्त होने लगी।
जीवन अमूल्य और क्षणभंगुर भी होता है इसका अहसास सुमन शिद्दत से करने लगी थी। बच्चों को आने वाले समय से लड़ने के लिए उसने उन्हें रसोई में कुछ खाना बनाने की ट्रेनिंग भी देना शुरू कर दिया।
ऑपरेशन से कैंसर प्रभावित अंग को निकालने के पंद्रह दिनों बाद, जरूरत के अनुसार रेडिएशन और कीमो थेरेपी देने की प्रक्रिया के बारे में डॉक्टर ने बताया था।
"तुम्हारी अम्माँ को बुला लेते हैं सुमन, घर पर रहेंगी तो सहारा रहेगा।" शेखर ने कहा था।
"नहीं शेखर, इस उम्र में उन्हें यहाँ बुलाकर उनसे सेवा लेना बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। मैंने एक महीने के लिए रोटीवाली लगा लिया है। घर में आने के बाद मैं बैठे-बैठे काम तो करवा सकती हूँ।" सुमन अपनी इस बीमारी की सज़ा, किसी भी बुजुर्ग को नहीं देना चाहती थी।
"सुमन, ओ सुमन! आज क्या बालकनी की धूप में सूखकर पापड़ बनने की इच्छा है तुम्हें?" सुबह की सैर, मित्रों के साथ समय बिताकर शेखर कब घर आ गए थे सुमन को पता ही नहीं चला।
"सुखी हूँ, सूख नहीं रही हूँ। प्रकृति से मुफ्त में भेजी विटामिन डी ले रही हूँ।" सुमन ने महसूस किया कि सचमुच धूप चटक हो गई थी और त्वचा में चुभने लगी थी। अंदर आकर उसने रसोई से पानी पिया और शेखर को भी दिया।
सत्तर साल के ऊपर हो गए हैं शेखर परन्तु अभी भी अपने कामों के लिए किसी भी प्रकार से, किसी पर निर्भर नहीं हैं।
"उम्र बढ़ती जा रही है तो घर में काम करने वालों से कुछ काम करा लिया करो ना?" सुमन कहती तो मुस्कुरा कर शेखर जवाब देते।
"सुमी, बहुत अच्छा परिवार और बच्चे हैं हमारे। मैं रिटायर्ड हूँ पेंशन का कुछ हिस्सा खर्च करता हूँ परंतु बेटा-बहू दोनों काम करते हैं। सबकुछ खुले दिल से करते हैं दोनों। हमारे लिए तो जब तक हाथ-पैर चलते हैं मुझे शरीर से आश्रित नहीं होना हैं, बाकी आगे तो ईश्वर की इच्छा।"
सुमन और शेखर, दोनों बड़े बेटा-बहू के साथ बैंगलोर में रहते हैं। छोटा बेटा अपने परिवार के साथ लंदन में रहता है। साल में एक बार पूरा परिवार मिलता है और तब घर में त्यौहार का माहौल होता है। अपने परिवार के आपसी प्रेम और मेलजोल को देखकर पति-पत्नी अपनी इस कमाई पर बहुत खुश होते थे।
पानी पीकर सुमन तरोताजा हो गई। बेटा-बहू काम पर और पोती स्कूल चली गई थी। अब कुछ देर बाद खाना बनाने वाली आएगी और सुमन के निर्देशन में काम करके जाएगी।
रसोई में बहू क्षिप्रा ने आज बनवाने वाली सब्जियाँ निकाल रखी थीं। सहजन की फल्लियों का छिलका उतार कर, काटने के लिए प्लेट में लेकर सुमन हॉल में बैठ गई। शेखर ने टेलीविजन चालू किया और सामने कैंसर पीड़ितों की त्रासदी, उनके लिए समाजसेवी संस्थाओं के, सरकार के प्रयासों पर चर्चा दिखा रहे थे। पति-पत्नी ने एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्कुरा दिए।
सहजन के छिलके निकालती सुमन, परत दर परत फिर अपने उस समय में प्रवेश करने लगी, जिस समय को अपने जीवन से अलग कर पाने में वो आज भी कभी-कभी असफल हो जाती है।
ऑपरेशन के बाद कीमोथेरेपी और रेडिएशन का सिलसिला शुरू हुआ। उस विभाग में जाकर सुमन ने जवान, बूढ़ों और बच्चों का कष्ट देखा, सुमन का दिल और दुखी हो गया।
कीमोथेरेपी के तेज प्रभाव से, कई रोगियों के बाल झड़ चुके थे, त्वचा का रंग काला और झुलसा हुआ लगने लगा था। अपने काले, लंबे बालों को स्पर्श करके, वह फूट-फूट कर रो पड़ती।
कीमोथेरेपी के डर, मानसिक तनाव और दर्द से पहली बार तो सुमन पर कुछ बेहोशी छाने लगी।
डॉक्टर, नर्स दौड़कर आ गए। सुमन के अंदर का डर, उस बिस्तर पर मल-मूत्र के रूप में फैल गया था। उसे भान हुआ कि बीमारी के साथ अब उसका अपने शरीर पर भी नियंत्रण नहीं रहा।
अपराध-बोध और शर्म से भरी, सुमन उठकर बैठने लगी।
"रुको दीदी, मैं आपको साफ करती हूँ।" कहती हुई एक आया उसके बिस्तर, कपड़ों की सफाई करने लगी।
सुमन अपराध बोध, शर्म से नजरें झुकाए थी तो वो आया बोली, "दीदी, आज पहली थेरेपी है ना इसलिए आप डर गई। अगली बार बिल्कुल नहीं डरोगी और यदि फिर ऐसा हो जाएगा तो मैं साफ कर दूंगी।" बहुत प्यार से वह बोल रही थी।
सुमन ने उठकर उसे पास बुलाया, उसका हाथ पकड़ लिया और फिर गले से लगा लिया। इस झप्पी में प्रेम, आभार और बहुत सारा अपनापन समाया था। एक मिनट में कौन सी ऊर्जा का संचार हुआ पता नहीं।
"मैं अपने को संभालूंगी। मुझे जीतना है, इस बीमारी को हारना ही होगा। दुनिया में बहुत कुछ करना बाकी है अभी मुझे।" कहती हुई सुमन थेरेपी के लिए तैयार हो गई थी।
अस्पताल आते-जाते, कुछ नर्सों एवं सफाई सहयोगियों से, दिल का रिश्ता बन गया था। अपनी सेवाओं से लोगों को विकट परिस्थितियों में हिम्मत बनाने वाले इन स्वास्थ्य सहयोगियों की अपनी कितनी समस्याएं रहती हैं परंतु अनवरत सेवा में लगे इन योद्धाओं के समर्पण को सुमन दिल से महसूस करने लगी थी।
आज पच्चीस-तीस साल गुजर गए। सबकुछ ठीक चल रहा है तो आज कैंसर दिवस पर उस स्नेह भरी आया की याद से सुमन मुस्कुराने लगी।
वो समय, वो लोग, आस-पड़ोस और परिवार की हिम्मत ने कैंसर से लड़कर, उसे हराने में सफलता तो दी परन्तु इस प्रक्रिया ने उसके लंबे बालों को छीन लिया। जिनकी खूबसूरती के चर्चे होते थे वो बाल अब सिर पर नहीं थे। स्कार्फ बांधकर, चुन्नी लपेटकर चलने का शॉक, सुमन को कैंसर से भी भयानक लगता था। समारोहों, त्यौहारों पर तो उसकी उदासीनता सब महसूस करते परंतु बालों को जल्दी तो वापस नहीं लाया जा सकता था। समय के साथ चलते मौसम बदलते रहे और सुमन के सिर पर उगते बालों का कालापन देख-देखकर, भविष्य के प्रति आश्वस्त होती गई।
रेडिएशन की गर्मी से व्याकुल सुमन को अस्पताल के सामने नारियल पानी वाले का मुस्कुराहट भरा अभिवादन, आज भी याद है।
"नमस्ते दीदी, बैठकर आराम से पियो। आज तो आप पहले से ज़्यादा स्वस्थ लग रही हो।" वह सिर्फ नारियल पानी नहीं बेचता था, कैंसर से जूझने वालों की अंधेरी रातों में सहज ही भविष्य की रौशनी भी डालता था।
"आज खाना-वाना भी खाओगी सुमन देवी या उपवास का इरादा है।" रसोई में घुसते शेखर की आवाज़ से चौंक पड़ी सुमन।
सुमन दोपहर के दो बज गए थे, खाना बनाने वाली भी निकल गई थी और सुमन अपने उस समय में अटकी हुई, आज से दूर चली गई थी।
"चलिए, खाना खाते हैं।" कहती हुई वह थाली परोसने लगी और शेखर मुस्कुराते हुए सलाद काटने लगे।
खाने के बाद, दोनों आराम करने लगे और आज दिन विशेष ने सुमन को फिर से अतीत के पन्नों को पलटने में व्यस्त कर दिया।
सुमन को याद आने लगा कि उसे पाँच साल तक हर तीन महीने, छह महीने और फिर सालभर के अंतराल में पूरी शारीरिक जांच करवानी होती थी और वह तनाव, जाँच के परिणामों की चिंता में घुलती रहती। बाल आए तो परंतु कान तक ही फिर उनकी बाढ़ जैसे बंद हो गई कई दिनों तक। अपने अलग हुए स्त्रीत्व और मातृत्व की पहचान वाले अंग का दुःख फिर सुंदरता के प्रतीक माने जाने वाले बालों से बिछोह ने सुमन की चिड़चिड़ा बना दिया था।
अपने अतीत में डूबती हुई सुमन को नींद आ गई और शाम चार बजे, ग्रीन टी लेकर शेखर ने उसे जगाया।
"आज तो सारा टाइम टेबल अलग हो गया तुम्हारा, ऐसा होना भी चाहिए कभी-कभी। एक रूटीन भी इंसान में बोरियत भर देता है।" कहते हुए सुमन के हाथों में चाय का कप पकड़ाते हुए शेखर ने कहा।
शाम चार बजे ऋतिका स्कूल से वापस आई तो सुमन उसे देखती रह गई।
"दादी, आज मैंने अपने लंबे बालों से बारह इंच लंबाई के बाल काटकर, कैंसर पीड़ितों के लिए दिया है। कीमोथेरेपी के बाद गंजापन दूर करने के लिए समाजसेवी संस्थाओं ने यह कार्य स्कूल में किया था।" गर्व और खुशी से ऋतिका बता रही थी।
"दादी, बिना बालों के अपना चेहरा देखना कैंसर के रोगियों को और ज्यादा तकलीफ देता है ना इसीलिए इस संस्था ने लड़कियों से सहायता मांगी थी। मेरे लंबे काले बालों का इससे अच्छा प्रयोग और क्या हो सकता था दादी कि किसी के मन को सुकून मिलेगा। मेरे बाल तो फिर बढ़ जाएंगे।" अपने कान तक कटे बालों को छूकर ऋतिका ने कहा।
सुमन ने अपनी पोती को झप्पी दी, "मेरी पोती सबसे प्यारी बच्ची है दुनिया की। तुमने तो बहुत ही अच्छा काम किया है बेटा, किसी कैंसर पीड़ित को जीने का साधन दिया है। ईश्वर तुम्हें हमेशा खुश रखे बिटिया।" कहते हुए उसके माथे को चूमकर सुमन एक बार जीवन के प्रति, नव पीढ़ी के प्रति आशान्वित होकर फिर मुस्कुराने लगी।
***********
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें