भाव तृप्ति
उमस से व्याकुल थी विरही धरा
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।
मेघ सज-धज के जब छाने लगे,
गीत बरखा के सब गाने लगे।
मेघ गर्जन से मानव जब डरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।1।।
डालियों पर हवा लगी झूलने,
गर्मियों की दाह लगी भूलने।
बूँदों ने पत्तों का कलश भरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।2।।
बूँदों के गीत की रिमझिम बजी
नाचती बूँदों से धरती सजी।
प्रेम मेघ धरा का सबसे खरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।3।।
बरखा ने तन-मन को भिगो दिया,
बंद आँखों से हृदय को छू लिया।
तृप्ति का भाव चेहरों पर भरा,
सृष्टि का सब ताप वर्षा ने हरा।।4।।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
मो.नं.9967674585
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