सोमवार, 6 जुलाई 2026

1222 1222 122 दो ग़ज़लें


1222 1222 122

किसी के राज़ तो छिपते नहीं हैं 
 उखड़कर मुर्दे फिर गड़ते नहीं हैं।।1।।

हुई हैं मौन दीवारें घरों की
बड़े परिवार अब दिखते नहीं हैं।।2।।👌

अभी भी चलते हैं कुछ सिक्के खोटे
खरे तो ढूंढे से मिलते नहीं हैं।।3।।✔️

चले थे थोड़ी सी दूरी बनाकर 
पता था गुण ज़रा अच्छे नहीं हैं।।4।।✔️

हवा से टूट जाते हैं शजर वो
जो विपदा देखकर झुकते नहीं हैं।।5।।


हरिक चेहरे पे छाई है उदासी
हँसी के फूल अब खिलते नहीं हैं।।6।।👌

भरी जेबें हैं लेकिन दिल हैं खाली 
वहाँ अहसास अब बसते नहीं हैं।।7।।


तरही मिसरा:

अकेले में बहा लेते हैं आँसू
किसी के सामने रोते नहीं हैं।👌

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आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 

फ़िलबदीह- 70
पहला चरण 

221 2122  221 2122


ये ज़िंदगी हमारी, लाचार चल रही है
अच्छी भली थी पहले, बीमार चल रही है।।1।।

तूफ़ाने ज़िंदगी के, लगते बड़े थपेड़े 
उस पर हमारी नैया, मझधार चल रही है।।2।।

मौसम की मार सहना, मुश्किल बना है अब तो
अपनी भी उम्र सत्तर के, पार चल रही है।।3।।

हैं आंधियाँ समय की, कब तक बचायें खुद को, 
उलटी हवा तो अब भी, दमदार चल रही है।।4।।

सबकी ख़ुशी की खातिर, जीते रहें हैं हम तो
मर्ज़ी उन्हीं की अब भी, हर बार चल रही है।।5।।

तरही मिसरा:

रणभूमि बनती साक्षी, उन बांकुरों का हरदम 
बाजू कटे हैं फिर भी, तलवार चल रही है।।

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शर्मिला चौहान 
ठाणे महाराष्ट्र


शर्मिला चौहान

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