आदरणीय अनिल सर और सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏
फ़िलबदीह-68
दूसरा चरण
2212 1212 2212 1212
दुनिया में आदमी को गर, कोई मक़ाम चाहिए
मिहनत के साथ ही जुबां, पे कुछ लगाम चाहिए।।1।।
देखो जिधर उधर नज़र, आते हैं ख़ास सब यहाँ
दुनिया चलाने को मगर, कुछ लोग आम चाहिए।।2।।
अपना लिखा अज़ीज़ है, हमको भी जान लो मगर
लोगों के मन जो बस सके, वो इक कलाम चाहिए।।3।।
है भागती सी ज़िंदगी, है हड़बड़ी में आदमी
दिन रात काम करके फिर(तस्कीने-दिल के वास्ते ), छोटी सी शाम चाहिए।।4।।
चुपचाप काम कर सकें, हैं ऐसे लोग कम यहाँ
लोगों को आज काम कम, पर ज़्यादा नाम चाहिए।।5।।
आकाश पर चमकता वो, इक चाँद ही बहुत है पर
तन्हाइयों से जूझने, तारे तमाम चाहिए।।6।।
इस ज़िंदगी में धूप कुछ, कुछ छाँव भी बनी रहे
तन-मन थके जो धूप से, थोड़ा विराम चाहिए।।7।।
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शर्मिला चौहान
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