मेघ तुम आने लगे
तप्त दग्ध धरा आतुर
रवि तपता खूब चातुर।
किरणों की उद्विग्न ज्वाला
धधकती है प्रकृति बाला।
आस बन छाने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।1।।
तृषित चातक बाट जोहे,
बूँद तेरी उसको मोहे।
छोड़ती निश्वास धरती,
प्रेम वो तुझसे ही करती।
हृदय भरमाने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।2।।
धरा का है प्रेम बंधन,
मेघ तू देता है अनधन।
रिक्त शुष्क धरा अंचल,
तू उड़ा फिरता है चंचल।
सपने सुस्ताने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।3।।
चीर कर छाती दिखाती,
पीर मन की है बताती।
बीज धारण न करेगी,
सृष्टि यह कैसे चलेगी?
लौटकर जाने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।4।।
रोक देगी वो सृजन को,
वाटिका, कुंजन, विजन को।
सुधा रस से भरी गागर,
मिलन का साक्षी सागर।
बूँद टपकाने लगे,
मेघ तुम आने लगे।।5।।
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शर्मिला चौहान
ठाणे महाराष्ट्र
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