सोमवार, 18 मई 2026

2122 2122 212 पर ग़ज़ल




फ़िलबदीह-66 
प्रथम चरण 
क़ाफ़िया -आन
रदीफ़ - है
शा'इरा- ममता किरण जी

2122  2122  212


बाद बरसों पक रहा पकवान है
घर में आया आज इक मेहमान है।।1।।

बाँच लेता चेहरे से भावों को जो
वो बिना डिग्री के भी विद्वान है।।2।।

दो निवाले साथ में परिवार के
खा सके वो आदमी धनवान है।।3।।

चंद बूँदें रक्त की दें ज़िंदगी 
कर सको तो बस बड़ा यह दान है।।4।।

पोटली में बांध किरणों को चला
सूर्य का लो हो रहा अवसान है।।5।।

है सिकुड़ती नदियों की अपनी व्यथा
फिर भी मानव उनसे क्यूँ अनजान है।।6।।

ढूंढता था सब जगह मैं रात-दिन 
हाट में बिकता मिला ईमान है।।7।।


तरही मिसरा -

ज़िंदगी से हार जाना है ग़लत 
जी के दिखला तब कहूं इंसान हैं।

*********

शर्मिला चौहान

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें