[18/02, 15:31] Sharmila Chouhan:
"यात्रा"
चौक पर खड़ा, सीमेंट का पुराना खंभा परसों रात गिर गया। अस्सी वर्षीय गोविंद सिंह जी, आज सुबह उस क्षत विक्षत, धराशाही खंभे के पास चुपचाप खड़े थे।
एक समय था जब गोविंद सिंह जी की सभाएँ, समारोह इसी खंभे के नीचे हुआ करते थे। वक्त बदला, पार्टियाँ बदली, लोग और हालात भी। अब तो चौक के चाय की टपरी वाला, अस्सी साल के बूढ़े नेता को टोहता है कि एक कप चाय पीने के बाद कब जाएँगे।
कितनी ही सभाओं, समारोहों का साक्षी था खंभा। नेताओं की तस्वीर, बड़े बड़े बैनर, चुनाव के पोस्टर थामकर, खंभे की कमर दुख गई थी और परसों तो टूट ही गई।
आज अचानक जिले के पालक मंत्री के आगमन की सूचना मिली और पार्टी के कार्यकर्ताओं में हलचल होने लगी।
"शाम को मंत्री जी यहाँ संबोधित करेंगे और इस खंभे को अभी गिरना था।" नए खंभे के लिए गड्ढा खुदवाते हुए एक कार्यकर्ता झल्लाया।
"हाँ यार, अब जल्दबाजी में नया खंभा लगाना ही पड़ेगा। चौक का मजा खराब हो गया।" दूसरे कार्यकर्ता ने गिरे खंभे को घूरते हुए कहा।
खंभे की आत्मा तिलमिला गई।
दोपहर को बड़े से ट्रक में, मान सम्मान के साथ नए खंभे को लाया गया। लंबी आयु की कामना करते हुए, कुछ लोगों के करकमलों से उसे खड़ा किया। खुदे गड्ढे में पैर जमाए, खंभा आसमान को झाँकने लगा। पालक मंत्री की तस्वीर उसके शरीर पर चिपका दी गई।
जमीन पर पड़ा, पुराना खंभा दो दिनों से लोगों की ठोकरें और कुत्तों की जगविदित प्रिय क्रिया को झेलता कराह रहा था।
"ट्रक में इस सीमेंट के टूटे खंभे को भरकर शहर के बाहर डाल दो। कचरा साफ करो।" एक नवजवान कार्यकर्ता चिल्लाया।
टुकडों में बंटे, उस बूढ़े पुराने खंभे को ट्रक में ठूँसा जा रहा था। खंभे का एक छोटा टुकड़ा, अपने हाथों से उठाकर, गोविंद सिंह जी ने ट्रक पर रख दिया।
आगे बढ़ते ट्रक की दिशा में, थके बूढ़े कदम, कुछ दूर साथ चलने लगे।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
१८/०२/२०२१
[19/02, 17:31] Sharmila Chouhan:
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"खुशी"
सुबह से काम की तलाश में भटकते गनपत को, भूख लग गई थी। बड़ी इमारत के सामने एक बार कोशिश करना चाहा।
"क्या है, कौन हो? गेट के अंदर कैसे आ गए?" चौकीदार ने घुड़की दी।
"काम चाहिए साहब। बाग की साफ-सफाई, छोटी-मोटी मरम्मत का काम, कोई भी काम दिलवा दो।" चौकीदार को 'साहब' संबोधित करते, गनपत बिल्कुल नहीं हिचकिचाया।
"अभी बाहर के लोगों को कोई काम नहीं देता, कोरोना का डर है ना। जा भाई।" स्वयं के लिए 'साहब'का संबोधन चौकीदार को तृप्त कर गया था और आवाज में नरमी आ गई।
सड़क के किनारे ही बड़े पेड़ के नीचे गनपत डिब्बा खोलकर खाना खाने लगा।
खाते हुए उसकी आंखें नम हो रहीं थीं। पाँच साल की बेटी मनु का अगले सप्ताह जन्मदिन आ रहा है और उसने कहा है कि," बाबा, मुझे लंबे बालों वाली, सुंदर गुड़िया देना ना। मुझे खेलना है उससे।"
आधा खाना खाकर गनपत ने डिब्बा बंद कर दिया, "काम ही नहीं मिल रहा तो कहाँ से गुड़िया लूँगा ?" सामने की बड़ी इमारतों को देखकर ना जाने क्यों उसे चिड़ हो रही थी। आँखों के सामने बेटी का प्यारा सा चेहरा घूम रहा था।
सामने की एक इमारत का बड़ा गेट खुला और कामवाली बाहर आई। उसने बड़ी भरी थैली को कचरे के डिब्बे में डाल दिया और निकल गई।
उत्सुकता से गनपत उस कचरे के डिब्बे को झाँकनें लगा। रंग-बिरंगे कागजों की कतरनें, पुरानी टूटी चीजों के बीच, नीली आँखों वाली, पलक बंद करने वाली और लंबे बालों वाली सुंदर सी गुड़िया पड़ी थी।
गनपत की तो जैसे लाॅटरी निकल पड़ी। कचरे में से गुड़िया निकाल कर, उसे अपने पास के पानी से पोंछने लगा।
"ऐ..! क्या कर रहा है? बता ?" चौकीदार भागकर आया।
"अबे! बोलना, गूँगा तो है नहीं। क्या लिया है?" चौकीदार ने अपने पद की गरिमा निभाई।
"साहब, कचरे से बेटी की खुशी लिया है।" गनपत के हाथों में, नीली आँखों वाली, लंबे बालों वाली गुड़िया मुस्कुरा रही थी।
शर्मिला चौहान
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