मंगलवार, 16 मार्च 2021

अप्रकाशित लघुकथा

"संरक्षक"

आज मंडल बाबू के घर के सामने, पंडाल तना, कुर्सियां बिछी थीं। मंडल बाबू का बेटा रंजन, अमेरिका से आया है। 
"सुना है कोई बड़ा काम किया रंजन ने।" मंडल बाबू के मित्र सुदेश जी ने पूछा।
" हाँ हाँ, पक्षियों की विलुप्त होती प्रजातियों पर शोध कर रहा था।" उसके शोध पर आधारित पुस्तक हाथ में पकड़े मंडल बाबू बोले।
"ये भी कोई काम है।" चेहरे पर बुरे से भाव थे।
"नहीं यार! उसके शोध को बहुत सराहा गया, पुस्तक का रूप दिया गया है।" अपने बेटे की मेहनत का, इतना उदासीन स्वागत मंडल बाबू को पसंद नहीं आया।
"किसी को सुनने, जानने की इच्छा ही नहीं है, सिर्फ मिलकर जलपान करके गए।" अपनी हिंदी में अनूदित पुस्तकों की ओर देखकर रंजन दुखी हो गया।
मंडल बाबू ने, रंजन को साथ चलने कहा।
बाजार में रद्दी वाले की दुकान के बाजू में चादर बिछाए, कुर्ता पायजामा पहने, पुस्तक पढ़ने में तल्लीन, अधेड़ व्यक्ति को पहचानने में रंजन को अधिक समय नहीं लगा।
"अरे! लेखक काका आप, यहां! " आश्चर्य से रंजन ने पूछा।
"अरे! रंजन बेटा! बधाई हो, बहुत बढ़िया काम किया तूने। तेरे शोध की पुस्तक मुझे भी देना पढ़ने।" खुशी से रंजन को गले लगा लिया।
"आप तो लिखते थे काका। कोई  पुस्तक आई आपकी?" रंजन ने बचपन से समाचार पत्रों में प्रकाशित उनकी कविताएं, कहानियां पढ़ीं थीं।
"नहीं रे! अब मैंने लिखना बंद कर दिया है।" लंबी सांस भरकर उन्होंने कहा, "पढ़ने वालों की विलुप्त होती प्रजाति को बचाने के लिए, मैं पाठक बन गया हूँ।" मुस्कुराते हुए बोले, "नहीं तो आगे दस बीस साल बाद, तेरे को पाठकों की खोज पर पुस्तक लिखना पड़ेगा।" 
रंजन ने अपनी पुस्तक, एक प्रबुद्ध पाठक के हाथों सौंप दी।

मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।

शर्मिला चौहान

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