" गंगा दर्शन "
तेजस्विता भाव, शुचिता परिपूर्ण , भव निर्मल करती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे,अंतर मम बसती हो ।।
भगीरथ अथक प्रयास सफल ,
हुआ धरा पर अवतरण ।
शिव जटा बीच सिमटी ,
था प्रबल वेग मात्र कारण ।
शुभ्र उफनती गौमुख उद्गम,
चपला सी वेग गति ।
संतृप्त हृदय, आत्म अनहद ,
स्थिर करती चंचल मति ।
आवेग, उत्साह , हर्ष , परिपूर्णता , जन-जन में भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।।
वेद, पुराण , इतिहास , वंदित ,
जप-तप ध्यान योग स्थान ।
निर्मल नीर प्रवाह निरंतर ,
आदिकाल से धरा की शान ।
हरिद्वार की पुण्य भूमि को ,
करती जब स्पर्श ।
तपोभूमि ऋषियों-मुनियों की ,
रम्य मनोहर तीर्थ ।
श्रृद्धा भाव , मन शुचिता , आस्था विश्वास भरती हो ।
माँ गंगे , कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।।
सुरसरि , देवनदी, माँ गंगा ,
जाह्नवी, अलकनंदा , मंदाकिनी ।
पुण्यदायिनी ,मोक्षप्रदायिनी,
पापनाशिनी , कर्म प्रकाशिनी ।
सिंचन करती निज नीर से ,
समस्त धरा का पोषण करे ।
आलिंगन कर वसुधा का फिर,
जन -जन का कल्याण करे ।
बूंद बूंद निर्मल गंगाजल ,
आध्यात्म भाव भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे, अंतर मम बहती हो ।
घंटा, ढोल, नगाड़े बाजें,
शंखनाद की गूंज रहें ।
बहते दीपक जलधारा में
जीवन सातत्य की सीख धरें ।
आकाश दीप सा जीवन हो
ध्येय उच्चतम सदा रहे ।
आत्मज्ञान की ज्योति से
हृदय आलोकित रहे ।
जीवन दर्शन की सुंदरता , लहर लहर भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे, अंतर मम बहती हो ।।
राम, कृष्ण ने वंदन किया,
तुलसीदास गुणगान करे ।
तट पर स्थित पवित्र भूमि पर ,
शिव साक्षात निवास करे ।
आदि शंकराचार्य , विवेकानंद के
दर्शन का आधार हो तुम ।
सनातन वैदिक संस्कृति का
एक प्रबल विश्वास हो तुम ।
आदिकाल से अनंत तक , जनमानस में भाव भरती हो ।
माँ गंगे, कल-कल स्वर गूंजे , अंतर मम बहती हो ।
अंतर मम बहती हो ।।
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