"होरी खेलत हैं कन्हाई"
कैसे जाऊँ मैं सखी री,
होरी खेलत हैं कन्हाई।
होरी खेलत हैं कन्हाई,
होरी खेलत हैं कन्हाई,
कैसे जाऊँ मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई ।।
गुँज की माला, मोरपंखा सिर ,
कटि करधनी सजायो।
पीताम्बर, पग पैंजन नीकी,
रुप मेरो मन भायो।
बरसाने की छोड़ के होरी...होऽऽ
बरसाने की छोड़ के होरी,
मैं ब्रज खेलन आई।
कैसे जाऊँ मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई।।
ललिता, विशाखा संग सहेली,
राधे ढूंढे कन्हाई।
जमुना जल को निरखत राधे,
मन ही मन सकुचाई।
श्यामल जमुना केसर भई री ..होऽऽ
श्यामल जमुना केसर भई री,
राधे लाज लजाई ।
कैसे जाऊँ मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई।।
अबीर-गुलाल उड़े ब्रज में,
मन मुक्तक फाग सुनाये।
पूर्ण पुरूषोत्तम मोहन प्यारा,
होरी रास रचावे।
रूप बना गोपी का सुंदर ..होऽऽ
रूप बना गोपी का सुंदर, गौरा भी ब्रज आई।
कैसे जाऊँ मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई ।।
कठिन डगर है जोग-ज्ञान की,
राधा चल ना पाए।
प्रेम रंग है सबसे चोखा,
माधव के मन भाए।
राधेश्याम की सुंदर जोड़ी...होऽऽ
राधेश्याम की सुंदर जोड़ी, लोगन के मन भाई।
कैसे जाऊं मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई।।
कैसे जाऊं मैं सखी री, होरी खेलत हैं कन्हाई।।
यह मेरी मौलिक एवं स्वरचित रचना है।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)४००६१०
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