होरी की धूम मची है, अवध में होरी खेलें रघुराई।।
श्याम वर्ण रघुबीर सुहाए, गौरवर्ण सब भाई।
रंग-रंगीली भई रे अयोध्या, कौतुक करें सब माई।
सरयू में केसर घुल गई ऐसे, ह्रदय में साँसें समाई।
कंगन-नग से निरखे जानकी,नवधा भक्ति जग पाई ।
अवध में होरी खेलें रघुराई।।
पिचकारी बड़ी कारीगरी की,पंचधातु से बनाई।
हीरा, पन्ना, मोती माणिक, नवरत्नों से सजाई।
काया जो रघुबीर ने गढ़ दई, पाँच तत्व है समाई।
लोभ,मोह,सत,रज गुण डाला, प्रेम-सुधा बरसाई।
अवध में होरी खेलें रघुराई ।।
जिसके रंग सारा जग रंगता, रंग खेलें हैं रघुराई।
मुक्ति, ज्ञान,भक्ति के सागर, कर रहे ठकुरसुहाई।
खेल रे मनवा जी भर होरी, ऐसी होरी ना आई।
राम साथ जो खेलें होरी, धन्य वो लोग-लुगाई।
अवध में होरी खेलें रघुराई।।
होरी की धूम मची है, अवध में होरी खेलें रघुराई।
राम-सिया के फाग गा रहे, चरण कमल चित लाई।।
अवध में होरी खेलें रघुराई।।
मौलिक एवं स्वरचित रचना।
शर्मिला चौहान
सी-१४०१, निहारिका कनकिया स्पेसेस।
लोकपुरम मंदिर के सामने
ठाणे (पश्चिम)४००६१०
महाराष्ट्र
मो.नं.- 9967674585
ई-मेल- sharmilachouhan.27@gmail.com
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