तेरी याद भी अब सताती नहीं है
तेरी बात भी अब रुलाती नहीं है।
न चाहत न कोई शिकायत है तुझसे
तेरी सादगी अब जलाती नहीं है।
तेरी बेबसी का पता है मुझे भी
नई राह दुनिया बनाती नहीं है।
सुनेगा न कोई भी दुनिया में मेरी
यही बात जीना सिखाती नहीं है।
दबे पाँव आकर चले भी गए जो
मेरी आह तुमको बुलाती नहीं हैं।
इसी चाह में हूँ कभी तो मिलोगे
मेरी चाह आँखें छुपाती नहीं हैं।
कहूँगा मैं तेरी ही महफ़िल में सबसे
कि तू राज़ अपने बताती नहीं है।
बहर-१२२
काफिया-आती
रदीफ़- नहीं है
शर्मिला चौहान
३/३/२०२१
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१२/३/२०२१
बहर १२२
काफिया- आ, छा, भा
रदीफ- रही है
न जाने कहाँ से हवा आ रही है।
उड़ा कर घरौंदा चली जा रही है।
बड़ी तेज़ बहती हवा है यहाँ पर।
कि चूनर सरकती मेरी जा रही है।
न किस्मत मेरी में लिखी थी मुहब्बत।
तेरी चाहतें किस कदर छा रही है।
न शिकवा ना कोई शिकायत करुँगी।
कि दिल से मेरे यह सदा आ रही है।
रखूंगी छिपाकर मैं दिल में हमेशा।
तेरी आशिकी अब मुझे भा रही है।
खुलें हैं कहीं चंद झिलमिल झरोखे
लिये साथ खुश्बू हवा आ रही है।
मेरा नाम आया तुम्हारी जबां पर।
खुली चोट पर अब दवा भा रही है।
शर्मिला चौहान
ठाणे
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