मंगलवार, 9 मार्च 2021

लघुकथा-चिंगारी( महिला दिवस,एक अभिव्यक्ति पुस्तक) प्रकाशित, लघुकथा- स्वयंसिद्धा अप्रकाशित(कथादेश में भेजी)





-"चिंगारी"


दुलारी ने आँगन में बीड़ी फूंँकते लखना को देखा तो बस बिगड़ गई।
"अरे! भिनसारे कोई बीड़ी फूँकता है क्या? निकल पड़ो तो कोई काम भी मिले।" एक सप्ताह से बिना काम के, घर में बैठे पति से त्रस्त हो गई थी दुलारी। 
"काम मिलता ही नहीं तो क्या चोरी करूँ?"तल्ख स्वर में लखना ने जवाब दिया।
"उमर हो रही है तुम्हारे साथ, सब जानती हूँ। एक-दो घर पूछा और फिर चार दोस्तों में दिन बिता के खाने के टैम हाजिर।" आज दुलारी के तेवर भी तेज थे।
"चार घर पोंछा बर्तन क्या कर लेती है, अपने आप को मालकिन समझ रही है।" गुर्राते हुए लखना ने अधजली बीड़ी को पैर से मसल दिया।
लखना के पैरों तले रौंदी बीड़ी ने दुलारी को अपने पुराने दिनों की याद दिला दी। 
गाँव की सबसे सुंदर लड़की थी दुलारी। पाँच कक्षा पढ़ी भी थी। सोलह में ब्याह दी गई लखना से और बीस तक तो दो बच्चों की माँ बन गई थी। 
लखना, लकड़ी का काम करता था। फर्नीचर, दरवाजे सब बनाता था परंतु स्वभाव का तेज और शरीर से आलसी। किसी ठेकेदार के नीचे टिककर काम ना करता। घर की जरुरतों को पूरा करने के लिए दुलारी आसपास की बिल्डींग में काम करने लगी।
लखना के खाँसने से दुलारी की तंद्रा टूटी। हाथ में पानी का गिलास भरकर लखना के पास गई।
"कहती हूँ बीड़ी मत फूँको। फेफड़ा खराब हो रहा है। सब जगह लिखा रहता है कि बीड़ी पीना बुरी बात है।" कहते हुए पानी का गिलास उसके हाथ में पकड़ा दिया।
बेकार बैठकर, दोनों जून  खाना खाने का आनंद लेने वाला मर्द जाग गया। 
गिलास की झनझनाहट हुई और दुलारी का माथा छिल गया। माथे से छलकती रक्त बूँदों ने दुलारी को, उसका अस्तित्व बता दिया। उसने ऐसी मर्दानगी अपने बापू और अपने ससुर में भी देखी थी।  किसी भी कीमत पर वह इस परंपरा को आगे  बढ़ने नहीं  देना चाहती थी।
कुछ सड़ी-गली परंपराओं को तोड़ना ही भला होगा, इसी सोच के साथ दुलारी ने कमर कस लिया।
अगले कुछ क्षणों में, अपनी मर्दानगी भूलकर, हाथ पैर बचाता लखना सचमुच काम की खोज में निकल गया था। कुचली बीड़ी में से एक चिंगारी चमक रही थी।

स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
9967674585
sharmilachouhan.27@gmail.com



"स्वयंसिद्धा"

शादी की गहमा-गहमी खत्म हुई तो आज पूरा परिवार घर के बगीचे में आराम कर रहा है। वैसे व्यवसाय करने वाले परिवारों में ऐसा दृश्य कम ही होता है कि सब एक साथ घर पर बैठें। कुछ एक्का - दुक्का करीबी रिश्तेदार ही घर पर हैं।

"नितिन की शादी बड़ी यादगार रहेगी, कम मेहमान और जो थे वो सब भी मास्क में।" हँसते हुए नितिन के बड़े भाई राजीव ने कहा।
"सही बात कही भैया ने, फोटोग्राफर के सामने ही सब चेहरा दिखा रहे थे।" नितिन से छोटे पुनीत ने कहा।
इन सबकी बातों को सुनते हुए, नई बहू दिव्या और कहीं खो रही थी।
इस घर में सब कुछ अच्छा है, पर उसको ना जाने क्यों कुछ अजीब सा लगता है। अपने कमरे में भी लगता है कि कोई और भी है। कल बाथरूम से बाहर‌ निकली तो लगा कोई दरवाजे से तुरंत हट गया।
"क्यों, तुम मेरे नहाने के समय बाथरूम के बाहर पहरा दे रहे थे!" दिव्या ने नितिन से मुस्कुरा कर पूछा था।
"मैं तो बाहर समाचार पत्र पढ़ रहा था, तुम भी ना! क्यों करुँगा पहरेदारी?" नितिन ने बताया।
कल से दिव्या और परेशान हो गई। 
शाम को सास और जिज्जी ने चाय बनाकर कमरे में लाने को कहा। जिज्जी ने रसोई का सारा समझा दिया था कि चीजें कहाँ कहाँ हैं।
चाय उबल रही थी और गुनगुनाते हुए दिव्या दूध का पतीला लेने पलटी, अनायास ही डर गई। उसने रसोई के दरवाजे से किसी को तेजी से हटते देखा।
"कौन है ये? कोई क्यों छिपकर देखता है?" एक मर्दाने परफ्यूम की खुशबू ने उसका दिमाग खराब कर दिया।
सास- जेठानी के साथ चाय पीने में बिल्कुल मन नहीं लगा उसका।
"हमारी नई बहू आती जाती है तो पता चलता है। बहू की पायल बजती है।" बाबूजी ने कुर्सी पर बैठी दिव्या को देखकर कहा।
बाजू में बैठे, जिज्जी के भाई की परफ्यूम की महक से विचलित दिव्या ने, सबकी ओर एक दृष्टि डाली और अपने पैर से पायल निकाल लिया।
"मुझसे ज्यादा जरुरत इस पायल की इनको है।" जिज्जी के भाई के हाथों, अपनी पायल पकड़ाते हुए दिव्या के दिल का बोझ हल्का हो गया।

स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।

शर्मिला चौहान
सी-१४०१, निहारिका कनकिया स्पेसेस
ठाणे (पश्चिम) ४००६१०
महाराष्ट्र
फो.नं._ 9967674585
ई-मेल- sharmilachouhan.27@gmail.com


महिला दिवस, खुदेजा खान जी को नागपुर।

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