मुंबई के सबसे शानदार, महंगे एरिया में, कंपनी के ऑफिस का होना गर्व के साथ थोड़ी कठिनाई की बात भी थी माला के लिए। पहले ही पढ़ाई करते समय, लोकल ट्रेनों के साथ जिंदगी की बड़ी दौड़ कर चुकी थी वो।
"एक-दो साल जाॅब कर लूँ, फिर बैंक से लोन लेकर कार खरीद ही लूँगी।" हमेशा से ही जल्दी आगे बढ़ने की उच्चाकांक्षा रखने वाली जवान लड़की को ठहराव पसंद ही नहीं था।
"अरे ..! बाप रे !! आज फिर लेट हो गई हूँ। लोकल ट्रेन, बस का चक्कर है ही बेकार। देखो किस्मत वाले लोग, शान से अपनी कार में आते हैं।" अपने बाजू से कार में जाती लड़की को देख, मन ही मन चिढ़कर माला ने बस स्टॉप से जल्दी कदम बढ़ा लिए।
परिवार की आर्थिक स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। पिताजी कपड़े की मिल में काम करते थे। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी माला, पढ़ने में बचपन से अच्छी थी। मिल के कामगारों के बच्चों के साथ खेलना, उनके साथ घुलना-मिलना पसंद नहीं था उसे।
चाॅल में रहने के कारण, सबके साथ गाना-नाचना, बातचीत करने और पूजा-पाठ का सबसे बड़ा उत्सव, गणेशोत्सव होता था। मिल में और चाॅल में गणपति उत्सव के समय दस दिन, अलग अलग कार्यक्रम होते थे। विसर्जन के दिन पूरा परिवार पंडाल में ही रहता।
"माँ, मेरे लिए घर में खाना बना दे, मैं वहां नहीं जाऊंगी खाना खाने।" हर साल माला की एक ही जिद रहती।
"क्यों नहीं जाएगी तू? सब परिवार आते हैं दर्शन और खाने को, तू कोई स्पेशल है क्या? जरा जमीन पर पैर रखना सीख। अपने बाप की कमाई पर शर्म आती है ना तेरे को, जरा खुद कमाना तब दिखाना इतने नखरे।" माला की माँ, अपनी छोटी बेटी के व्यवहार, स्वभाव से परेशान हो जाती थी।
भगवान ने बुद्धि के साथ सुंदरता भी खूब दी थी माला को। रंग गेहुंआ, बढ़िया कद-काठी के साथ तीखे नैन-नक्श। बाल तो इतने लंबे, काले, मुलायम की किसी शैंपू का विज्ञापन हो। अब इससे ज्यादा क्या चाहिए किसी को, अपने आपको श्रेष्ठ समझने के लिए।
समय के साथ, माला की दीदी का विवाह हो गया, भाई भी काम करने लगा। माला ने अपनी पढ़ाई पूरी की, उस स्थिति में भी उसने मुंबई के कॉलेज से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।
माला की ऊँची महात्वाकांक्षा का साथ किस्मत ने भी दिया। मुंबई के कॉलेज की ही एक रईस लड़की रुबी से, माला का दोस्ताना इतना बढ़ा कि रुबी के पापा की कंपनी में इंटरव्यू के लिए माला को बुलाया गया।
"पापा को बोल दिया है मैंने, तुम्हारी घर की स्थिति भी बता दी है। अच्छा इंटरव्यू देना, तुमको जाॅब मिल जाएगी।" रुबी ने समझा दिया।
माला को इस बात का बुरा लगा कि रुबी ने उस कंपनी में इंटरव्यू के पहले ही उसके घर की स्थिति बता दी। कहीं ना कहीं बात दिल में और चुभती परंतु दो दिन बाद ही नौकरी का आदेश मिल गया और अब माला सब कुछ भूलकर इस नई दुनिया में, अपनी जगह बनाने के लिए तैयार हो रही थी।
अपनी सुंदरता, काम सीखने की ललक और बड़े पदों के लोगों से जल्दी मधुर संबंध बनाने के स्वभाव ने, चार-छह महीनों में माला को कंपनी का जाना पहचाना चेहरा बना दिया।
"तुम कहां रहती हो माला?" लंच टाइम में कंपनी की एक सहकर्मी ने माला से पूछा।
"बस यहीं आसपास ही।" अपने चॉल का पता बताने की बिल्कुल इच्छा नहीं थी माला की।
अब तो दिमाग में एक ही बात घूमती कि किस तरह एक सिंगल बेड रूम वाला फ्लैट किराए पर लिया जाय। अभी तो पैसे इतने नहीं मिलते थे कि इतना किराया दे सकती।
"बाबा, आपके पास कुछ पैसे हैं तो हम मुंबई में एक फ्लैट लेंगे ना।" एक रात खाना खाते समय माला ने अपने पिताजी से कहा।
"मेरे पास इतने पैसे कहां से आएंगे बेटा! तेरी दीदी की शादी, तेरी पढ़ाई कितनी मुश्किल से हुई है। भूल गई क्या तू, कितने बार हमने एक समय ही खाना खाया।" अपनी इस बेटी की अक्ल पर बाप हतप्रभ रह गया।
"तेरा भाई काम कर रहा है तो अब दो समय खाना मिल रहा है। यह घर, यह चॉल हमारी पहचान है, इसे ना हम छोड़ सकते हैं ना इससे ज्यादा हमारी औकात है।" इस बुढ़ापे में, बेटी की बेतुकी बातें, माँ को परेशान कर रहीं थीं।
"अब तेरी भी शादी कर देने का टाइम है। बिरादरी से अच्छे रिश्ते आ रहें हैं।" माँ की बात पर नाक मुंह सिकोड़ कर माला ने उत्तर दिया।
"नहीं, मैं अभी शादी नहीं करुंगी। अपना फ्लैट लूंगी, कार लूंगी और फिर सोचूंगी।" खाने की थाली सरका कर उठ गई थी माला।
पिछले कुछ दिनों से कंपनी का काम संभालने की जिम्मेदारी रुबी के भाई धवल ने संभाल ली थी। रुबी के पापा की तबियत ठीक नहीं थी और इतनी बड़ी कंपनी की जिम्मेदारी धवल ने संभाल ली।
ऑफिस के स्टाफ से धवल को परिचित कराने के लिए एक छोटी सी वेलकम पार्टी रखी गई थी। पहली बार माला ने धवल को देखा तो देखती रह गई। रुबी से विपरीत, गोरा चिट्टा, हैंडसम लड़का धवल। पार्टी के बाद उसी दिन से अपने केबिन को अपने अनुसार बनवाने का काम धवल ने आर्किटेक्ट को दे दिया।
दो पीढ़ियों के बीच काम करने का अंदाज अलग सा था। धवल एकदम आधुनिक ढंग से काम करना पसंद करता था। सभी कामवालों के मनोरंजन के लिए एक रिक्रिएशन रुम भी बनाने का काम दिया। उसे खुद के लिए "सर" का संबोधन बिल्कुल पसंद नहीं था वह खुद सभी सीनियर लोगों को नाम से बुलाता था।
माला ने उसे सिर्फ दो-तीन, बार देखा था।
"माला, इस काम को और भी कम स्पेस में, कम खर्च में किया जा सकता है। मुंबई में जगह बेशकीमती है। थोड़ा समय लो, परंतु काम परफेक्ट करके लाना।" केबिन में चार लोगों के सामने कहा था धवल ने।
"सर, आपको मेरा नाम याद है।" आश्चर्य से पूछ लिया था माला ने।
"माला, पहले तो मेरा नाम सर नहीं धवल है। दूसरी बात, मुझे नाम कभी भूलते नहीं।" इस अंदाज से कहा धवल ने की, माला सारी रात सो नहीं सकी।
"क्या लड़का है, अब तो कंपनी का मालिक भी है।" उसका मन ऊँचे ख्वाब देखने लगा। कमा कमाकर कितना भी कर लेगी वो परंतु इन अमीरों की बात निराली होती है। रुबी की तरह धवल की भी अलग अलग कारें, एक से एक ब्रांडेड कंपनी के कपड़े देखकर, माला को उनकी और उनके जैसे अमीरों की ज़िंदगी से ईर्ष्या होने लगी थी।
घर में माँ-बाबा और भाई से आने-जाने की तकलीफ़ो का बखान करके, आखिरकार माला ने ऐसे एरिया में वन रुम किचन किराए पर ले लिया जो उसके घर और आफिस के बीच था। किराया इतना था कि अपनी तनख्वाह में खींचतान कर दे सके। घर में पैसे देने का उसने सोचा ही नहीं, भाई है ना मांँ-बाबा का ध्यान रखेगा। कटी शाख की तरह उसने, अपने पेड़ से अलग होने में संकोच नहीं किया।
"आजकल तुम टिफिन नहीं लाती?" उसको आफिस में एक दोस्त ने पूछा।
"हाँ, आजकल मैंने दोपहर का खाना बंद किया है। मोटी होती जा रही हूँ और दिनभर बैठकर काम करना होता है।" कह तो दिया माला ने परंतु भूख तो लगती थी। खुद सुबह खाना बनाकर टिफिन लाने की फुर्ती नहीं थी। रोज बाहर से कुछ लेकर खाने की पर्स अनुमति नहीं देता था। अक्सर चाय-ब्रेड या चाय के साथ पराठा खा आती थी। रात को घर जाकर कुकर में दाल चावल बनाकर खाती। रोज खाते समय मांँ की याद बहुत आती थी परंतु अपने बड़े सुनहरे भविष्य की चाहत में, वह सब भूल जाती थी।
आफिस का रंग-रूप बदल गया था, धवल ने एकदम आधुनिक ढंग से बनवाया था। सभी की सुविधाओं का ध्यान रखा गया था। कई बार माला ने महसूस किया कि उसके लंबे बाल, उसकी आधुनिकता पर धब्बा थे। आफिस में आने जाने वाली, काम करने वाली सभी लड़कियों के बाल एकदम खूबसूरत ढ़ंग से कटे रहते थे।
"ये पैसा भी कमाल करता है, पैसे खर्च करके लोग अपने चेहरे को कितना बदल लेते हैं।" अक्सर कुछ लड़कियों को देखकर सोचती थी माला। उसका बड़ा मन होता था कि किसी अच्छे बड़े ब्यूटी पार्लर में जाकर, अपने शरीर के रखरखाव पर खर्च करे, परंतु जितना कमाती थी उतना तो घर किराया, आना-जाना और खाने में खत्म हो जाता था।
खैर, धवल के उन्मुक्त और सहयोगी स्वभाव का जादू माला पर इस कदर छा गया कि अब वो सिर्फ धवल की पसंद नापसंद के अनुसार कपड़े पहनती, तैयार होती। बालों की चोटी बनाना बंद करके, ऊपर कसकर बाँध आती।
आज तो माला बहुत खुश हो रही थी क्योंकि कल एक ऑफर कूपन में उसे एक बड़े ब्यूटी पार्लर में हेयर स्टाइलिस्ट से बाल कटवाने का मौका मिला। एक समय अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारे लगने वाले बालों को, अपनी उन्नति के रास्ते में रोड़ा समझ कर माला ने मोह त्याग दिया। आज उसे ऑफिस पहुँचने में थोड़ी देर भी हो गई। खूब सज-संवर कर वो आज धवल को एकदम आधुनिक ढंग की दिखना चाहती थी। पैंट और हलके रंग की शर्ट, खुले सुंदर, स्टाइल से कटे खुले बाल, हल्का सा मेकअप। अपनी खूबसूरती पर खुद रीझे जा रही थी माला।
ऑफिस के मेनगेट के अंदर कदम रखा तो आश्चर्यचकित रह गई। बहुत सुंदर सजावट, सारे खुले मैदान में शामियाना लगा हुआ था।
"शनिवार रविवार की छुट्टी थी और इतनी सजावट हो गई!!ऐसा क्या हो गया?" मन ही मन सोचती ऑफिस के अंदर आ गई।
आज रुबी को देखकर दूसरी बार आश्चर्य हुआ माला को। रुबी को पापा और भाई की कंपनी, बिजनेस में बिल्कुल रुचि नहीं है।
"हैलो रुबी! आज तुम ऑफिस में कैसे?" माला ने रुबी को देखकर पूछ बैठी। पारंपरिक परिधान में रुबी बड़ी प्यारी लग रही थी।
"डियर माला, ऑफिस तो मेरा ही है इसलिए मेरा आना कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे तुमने कब इतने छोटे बाल कटवा लिए, मेरे लिए तो यही आश्चर्य की बात है!" रुबी ने अपनी पुरानी दोस्त को तल्ख़ स्वर में उत्तर दिया।
अब माला को अहसास हुआ कि सचमुच रुबी इस कंपनी के मालिक की बेटी है। नौकरी में लगने के दो माह बाद से ही माला ने उसे फोन करना बंद कर दिया था, शायद रुबी की नाराज़गी की यही वजह थी। माला अपने भविष्य को संवारने की प्लानिंग में इतनी डूब गई थी कि पढ़ाई के बाद तुरंत जॉब दिलाने वाली रुबी को भी याद करने का समय नहीं निकाला।
"अरे! तुम तो गुस्सा हो गई। मैंने तो यूँ ही पूछ लिया।" आदतन मीठी आवाज बनाकर माला बोली।
"मैं और नाराज़, कभी नहीं! वो भी आज के दिन.?" रुबी ने हँसकर कहा।
"आज क्या विशेष है? तेरा जन्मदिन भी नहीं.! आज क्या है बता तो सही।" माला ने मनुहार की।
"आज मेरे भाई धवल की सगाई हो रही है। मेरे लिए बहुत खुशी का दिन है। भाई ने ऐसी लड़की को पसंद किया जिसका कोई नहीं है, अनाथ आश्रम में पली बढ़ी परंतु स्वभाव, व्यवहार में बहुत प्यारी, दिल से प्रेम करने वाली।" आगे माला के कानों ने सुनने से इंकार कर दिया।
सामने से धवल और उसकी होने वाली जीवनसाथी आ रहे थे। दोनों हाथों में हाथ लिए, जीवन की नयी राह पर चलने के पूर्व सबसे आशीर्वाद ले रहे थे। उस लड़की के लंबे बालों की गूंथी चोटी, उसके कमर से नीचे लटक रही थी। माला के कदम थम गए, वह अनजाने में ही अपने कटे बालों को सहलाने लगी।
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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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