कहानी- "नया नामकरण"
(पलाश, उमाकांत भारती जी को भेजी, जुलाई दिसम्बर २०२३ अंक में प्रकाशित)
दस खरे सिक्कों के बीच एक खोटा तो चल जाता है, बस इसी बात को मानकर कुसुम, जी रही है। तीन बच्चियों की माँ है पर ताने उलहाने इतने झेलती कि दस बच्चे जनी हो। जिसके कारण गाँव भर से झगड़ा मोल लेना पड़ता है वो उसकी तीसरे नंबर की संतान, "कचरा"!
अब बताओ, कचरा भी कोई नाम हुआ ..पर क्या करे कुसुम दो बेटियों के बाद भी जब तीसरी बेटी पैदा हुई तो दाई ने फुसफुसा कर कहा, "मुई.. कित्ती छोरी पैदा करेगी। अरी! दूसरी छोरी के बखत कही थी मैंने, पर तू ना मानी। अब ले, पोस एक और बेटी।" बच्ची के रोने की आवाज भी ना सुन सकी कुसुम ठीक से।
"क्या करूँ मौसी, मेरी किस्मत में बेटियाँ ही लिखीं हैं तो बेटा कैसे होगा?" नवप्रसूता की थकी, कमज़ोर आवाज थी।
"तुझे टोटका तो बताया था पर तूने सुनी ही नहीं। अब भी वक्त है, इस छोरी का नाम ऐसा रख दे कि कोई अपने बच्चे का ना रखे। जब जब इसको पुकारेगी तब तब तेरी किस्मत में फेर होगा।" दाई की बात कुसुम के दिमाग में घूमने लगी।
सवा महीने तक तो सभी उस बच्ची को गुड़िया, मुनिया कहकर पुकारते पर सवा महीने के बाद, जब आसपास के दो-चार लोगों के बीच पंडित जी के सामने, बच्ची का नाम रखवाया तो औरतें फुसफुसाने लगीं।
"ये क्या कोई नाम हुआ, "कचरा"! कैसी माँ है ! अपनी सुंदर सी बेटी का नाम कचरा रख दी।" ढोलक पर दो-तीन सोहर गाकर, महिला मंडल नामकरण पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगा।
"क्या करे कुसुम भी, भगवान ने दो के बाद तीसरी भी छोरी भेज दी। अब कचरा ही तो बोलेंगे ना उसे ..हुँह.!" दो बेटों की माँ सगुना ने आँखें मटकाकर कहा।
खैर, कुछ महीनों के बाद सब कुछ सामान्य हो गया और कचरा अपनी बड़ी बहनों के साथ खूब मस्ती करते बढ़ने लगी। दो साल की होते कचरा, खूबसूरत, प्यारी बच्ची लगने लगी। गोल मटोल, गोरी चिट्टी, बड़ी आँखों वाली कचरा, दुकान में सजी गुड़िया लगती थी। सबसे बड़ी खासियत थी कचरा की जु़बान! सीधे, साफ शब्दों का उच्चारण, कहीं कोई तुतलाहट नहीं थी। पूरे वाक्य, कभी संयुक्त वाक्य भी, स्पष्ट तेज बोलती थी। समय के साथ बच्ची, स्वस्थ, तेज और मनमौजी हो गई।
"छोरी की ज़ुबान बड़ी तेज है, चार साल की है पर बोलने में तूफान। कल मेरे को बोली की तेज ना चल, गिर जाएगी बुआ। बस.. आगे थोड़ी दूर जाकर सचमुच मैं गिर पड़ी। छोरी का नाम वैसी जुबान है।" कमला बुआ, जिसे सारा गाँव "बुआ" ही पुकारता था, ने अपनी दुखती कमर पर हाथ लगाकर कहा।
"बैठो बुआ, चाय पीकर जाना।" कुसुम ने उन्हें मनाने के लिए रोक लिया। बुआ तो फिर बुआ ठहरीं, चाय भी पी लीं और साथ पकौड़े भी बनवा लिए।
"इस लड़की ने खूब परेशानी में डाल रखा है। क्यों बोलती है ऊटपटांग बातें? लोगों ने तुझे 'काली जुबान वाली' का नाम दे रखा है। करम मेरे ही फूटे थे जो छाती पर मूंँग दलने ऐसी छोरी भेज दी भगवान ने।" कुसुम ने गुस्से से दो-चार हाथ जमा दिए कचरा पर।
"अरी.! ज्यादा गुस्सा मत किया कर, इससे पूछ जरा कि अबकी बार बेटा होगा या बेटी?" चौथी बार गर्भवती कुसुम से उसके पति मनोहर ने कहा
"क्या पूछूँ? कभी कोई जवाब अच्छा देती है। बित्ते भर की छोकरी गज भर ज़ुबान, वो भी काली।" गुस्सा कम ना हुआ था कुसुम का।
"अम्माँ, मेरे को भाई चाहिए, छोटा सा भाई।" कचरा ने दोनों हथेलियों से छोटा आकार बना दिया
"आज तो तेरी ज़ुबान सच हो जाए, तो तेरे मुंँह में घी-शक्कर पड़े।" कहते हुए कुसुम कचरा को बेतहाशा चूमने लगी।
तीन-तीन बेटियों को जन्म देते-देते, बेटे की धूमिल होती आशा को जैसे नव रुप मिल गया। पति की इच्छा, समाज का दबाव झेलते हुए कुसुम का शरीर और मन, थक गए थे। छोटी बच्ची की बोली ने, उम्मीदों के दीपक में विश्वास का तेल भर दिया।
दिन, महीने जैसे-जैसे आगे बढ़ते, कुसुम का शरीर भारी होता जान पड़ता। अब आए दिन कचरा की बड़-बड़ उसको उतनी बुरी नहीं लगती। इस बार तो दाई ने भी चार-पांँच चक्कर लगा लिए थे।
"कहती थी ना मैं कि छोरी का बेकार सा नाम रख दे। मेरा टोटका काम कर गया।" दाई जब जब आती, चाय नाश्ता करके ही जाती।
"अभी बच्चा हुआ तो नहीं ना मौसी, लड़का ही होगा कैसे पक्का बोल सकते हैं?" दाई को कुसुम ने समझाया।
तीन-तीन बेटियों को संभालना, घर का काम करना और शरीर की कमजोरी ने कुसुम को परेशान कर रखा था। अठारह में ब्याह कर आई थी कुसुम और अब अट्ठाइस में चौथी बार गर्भवती हुई थी। खेती किसानी ठीक थी इसलिए खाने पीने की कमी तो नहीं थी परंतु बार बार मातृत्व का अनुभव करके, कुसुम का नाज़ुक शरीर इस बार बहुत कमजोर हो गया था।
"तू दूध घी खाया कर, छोरा अच्छा पैदा होगा। हमारे वंश को आगे बढ़ाने वाला वही तो है।" कुसुम को मनोहर समझाया करता।
कैसे कहती कुसुम कि तीन तीन बच्चियाँ हैं, उन्हें पहले खाने-पीने को देगी या खुद खा लेगी। पति की आशाओं से मानसिक दबाव महसूस करने लगी थी कुसुम।
"मेरी माँ को बुला लेती हूँ इस बार, रहेगी तो कम से कम चूल्हा-चौका संभाल लेगी।" कुसुम ने धीमे स्वर में पति से पूछा।
"रहेगी तुम्हारी माँ हमारे घर? उनको तो बेटी का घर रास नहीं आता" मनोहर ने चोट की।
"मना लूँगी मैं, तुम हाँ कहो तो।" कुसुम ने थोड़ी ज़िद की और मनोहर मान गया।
मनोहर की माँ बचपन में ही गुजर गई थी और कुसुम ने ससुर को तो देखा परंतु सास का साथ नहीं मिला। कुसुम की शादी के बाद, ससुर भी धर्म स्थानों की यात्रा पर चले गए तो फिर कभी लौटकर नहीं आए। मनोहर और रिश्तेदारों ने बहुत पता लगाया पर निराशा ही हाथ लगी।
कुसुम की मांँ आ गई और कुसुम ने चैन की सांँस ली। माँ, बच्चियों का ख्याल भी रखती, रोटी पानी भी कर लेती थी। सचमुच, इस उम्र में भी माँ का उत्साह देखकर कुसुम को लगता कि भगवान "माँ" को गढ़ने में कौन सी माटी लगाता होगा जो हर पीढ़ी, हर उम्र की माँ में समान वात्सल्य मिलता है। नानी, कचरा को नहीं भाती थी क्योंकि वो दिन भर हिदायतें देती रहती। समय पर उठो, नहाओ खाओ.! कचरा ऐसे बंधन से ऊब रही थी।
"अम्माँ, नानी अपने घर क्यों नहीं जाती?" कचरा ने एक रात कुसुम से पूछा।
"हमारे घर ही रहेगी नानी, नानी खाना बनाती है बड़ी अच्छी है ना!" कुसुम ने बिटिया से पूछा।
"मुझे अच्छी नहीं लगती, ज्यादा दिन ना रहेगी नानी, देख लेना।" कहकर चार साल की बच्ची तो सो गई पर कुसुम की नींद उड़ गई।
अब होनी को कौन टाल सकता है, कुसुम का भाई छज्जे में खपरैल डलवा रहा था। पैर फिसलने से जो गिरा की पैरों में प्लास्टर चढ़ा कर पलंग पर आ गया।
कुसुम की माँ , बेटे का समाचार सुनकर व्याकुल हो गई और कुसुम से अपने वापसी का अनुरोध करने लगी।
"पता नहीं, लल्लन को कितनी चोट लगी है। बहू भी अकेली, घर संभालेगी, बच्चे और अब लल्लन की देखभाल भी।"
गाँव के एक आदमी के साथ, माँ को विदा करके अब कुसुम बहुत अकेलापन महसूस कर रही थी। माँ के साथ थोड़ा बहुत हाथ बँटाकर, अपने और भाई के बचपन के किस्से, आस-पड़ोस की बातें करते हुए समय बीत जाता था और आराम भी था।
वापस वही काम, बच्चों की चिक-चिक और चिड़चिड़ाहट का दौर शुरू हो गया। भाई को भी डाॅक्टर ने बेड रेस्ट और कुछ एक्सरसाइज बताई थी तो अब माँ के आने की कोई गुंजाइश बची नहीं थी।
सातवें महीने के आते-आते, कुसुम का शरीर पीला पड़ गया। कमजोरी से हाथ-पैरों की नसें दिखने लगीं। साँस फूल जाती थी तब मनोहर उसे डॉक्टर के पास ले गया। सरकारी अस्पताल की इकलौती महिला डॉक्टर ने जाँच करके बताया कि खून की कमी है। अच्छा पौष्टिक भोजन और साथ में कैल्शियम आयरन की गोलियां लिख दीं। इस बार प्रसव इसी अस्पताल में कराने का सोच रखी थी कुसुम ने।
शाम को दाई भी आ पहुँची जो कुसुम के अस्पताल में जचकी कराने की बात से नाराज़ थी। कुसुम ने उसे बताया कि अस्पताल से घर आने पर जच्चा-बच्चा का नहलाना, मालिश और सिंकाई सब दाई को ही करना है। उसे नई साड़ी देने का वादा किया कुसुम ने।
अपने अंदाज में दाई ने कहना चालू किया, "क्या हालत बना ली तूने? भगवान ने सबकुछ दिया है तू तंदुरुस्त रहकर ही बेटा पैदा करेगी तो आगे सब ठीक रहेगा। ऐसा रहा तो तू मर ही जाएगी।" कुसुम तो सिर झुकाए सुन रही थी परंतु कचरा नहीं सुन पाई।
"क्यों, क्यों मरेगी मेरी अम्माँ? कभी नहीं मरेगी। तुम बहुत बुरी हो। जाओ..भाग जाओ। तुम ही मर जाओ! नहीं मरेगी मेरी अम्माँ, कभी नहीं मरेगी!" कचरा जोर से चिल्ला रही थी, "तुमने ही मेरा नाम कचरा रखवाया था ना, बहुत गंदी हो तुम! भाग जाओ!"
दाई तो सिर पर पैर रखकर घर की ओर निकल गई। रास्ते भर रोते चिल्लाते जा रही थी कि," हे भगवान! 'काली जुबान वाली' छोरी ने मरने का श्राप दिया है। हे प्रभु! बचा ले!"
इधर कुसुम से लिपटकर कचरा सुबकने लगी। दोनों बड़ी बेटियांँ भी आकर चिपक गईं।
कुसुम ने उनको सीने से लगा लिया.।अब वो इन बच्चियों के लिए और आने वाले नए शिशु के लिए जीवन जीना चाहती थी।
सुबह उठकर देखा तो नौ साल की बड़ी बेटी, उसके लिए चाय और डबलरोटी लिए खड़ी थी। स्कूल से आकर दोनों बड़ी बहनों ने कचरा को नहलाया, खिलाया और खुद भी खाना खा लिए। मनोहर ने शाम को जल्दी आकर दूध दुहकर गरम किया।
पूरे समय सब मिलकर काम करने की कोशिश करते और कचरा तो एक मिनट के लिए भी अपनी अम्माँ को छोड़ती नहीं थी। कभी कुसुम के बालों में तेल लगाकर अपने छोटे हाथों से मालिश करती तो कभी पैर दबाती। अब बोलती बहुत कम थी और जब बोलती सिर्फ अम्माँ के जल्दी अच्छी होने की बात करती।
दो-तीन दिनों तक सब ठीक चलने के बावजूद कुसुम परेशान थी कि सचमुच दाई को कुछ हो तो नहीं जाएगा। तीन दिन बाद, पास के घर से दाई की जोर से बोलने की चिर-परिचित आवाज सुनाई दी और कुसुम ने बाहर निकलकर देखा।
"कैसी हो मौसी?" डरते डरते कुसुम ने पूछा।
"अरी कुसुम बिटिया, बिल्कुल अच्छी हूँ। दो दिनों से मैं बहुत डर रही थी परंतु कल मुझे रास्ते में दस हजार रुपए, पर्स में पड़े मिले। उसे पुलिस थाने में दे आई तो मुझे इनाम भी मिला और मेरी फोटू भी पेपर में छपी है, देख तू भी देख!" सचमुच दाई मौसी की फोटो छपी थी।
"बच्ची के बोलने से क्या अच्छा और क्या बुरा हो सकता है। हमने क्यों ऐसा सोच लिया कि वह जो बुरा बोलती है वही होता है। उस दिन तो दाई ने मुझे मरने का श्राप दिया तो क्या उसकी जुबान काली नहीं हुई।" कुसुम ने बाजू में खड़ी कचरा को प्यार से चूम लिया।
"तू जब अस्पताल से आ जाएगी, तो जच्चा-बच्चा की देखभाल मैं ही करुँगी, तेरी मुँहबोली मौसी जो हूँ।" कहते हुए कुसुम को हाथ से टाटा करते दाई चली गई।
"तीसरी बेटी होने के कारण, कभी इसे प्यार-दुलार नहीं किया। छोटी बच्ची मन में कितनी दुखी होती होगी तभी कुछ भी बोल देती है।" अम्माँ के स्पर्श से बालमन की कली खिल गई। अम्माँ से लिपटकर बोली, "अम्माँ, मैं कचरा नहीं हूँ ना।"
कुसुम ने उसे छाती से चिपकाकर कहा, "नहीं बिटिया, तू तो खरा सोना है। बिल्कुल खरा। मेरे घर तो तीन-तीन रत्न हैं , अब मैं जीवन में कभी हार नहीं मानूँगी।" कुसुम ने आगे बात पूरी की, "अब एक साथ दो बच्चों का नामकरण होगा, नए बच्चे का और सोना का।"
बाहर खड़े मनोहर ने शांति की साँस ली, अब चौथा बच्चा जो भी हो इस परिवार का अंतिम सदस्य रहेगा। वंश बढ़ाने के लिए अब तक कुसुम ने अपने शरीर पर कितने ज्यादती सही है, उसका अंदाजा लगाते हुए मनोहर की आँखें नम हो गईं।
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स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित रचना।
शर्मिला चौहान
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