प्रकाशित गृहशोभा जनवरी प्रथम अंक २०२२ में
कहानी_"नीलोफर"
खिड़की के सामने अशोक की झाँकती टहनी पर, छोटा सा आशियाना बना रखा था उसने। जितनी छोटी वो खुद थी, उसके अनुपात से बित्ते भर का उसका घर। मालती जब जब शुद्ध हवा के लिए खिड़की पर आती, उसको देखे बिना वापस ना जाती। वो थी ही बला की खूबसूरत! चिकनी चमकती सुडौल काया, पीठ जहांँ खत्म होती वहीं से पूँछ शुरू हो जाती। भूरे छोटे परों पर दो चार नीले परों का आवरण चढ़ा था, यही नीला आवरण उसे दूसरी चिड़ियों से अलग करता था। उस छोटी सी मादा को भी, अपनी सबसे खूबसूरत चीज पर अभिमान तो जरूर ही था।
खाली समय में, चोंच से नीले परों को साफ करती, अपनी हलकी पीलापन लिए भूरी आँखों से चारों ओर का जायज़ा लेती कि उसके सुंदर रुप को कोई निहार भी रहा है या नहीं।
उस नन्हीं चिड़िया के खूबसूरत पँखों के कारण ही, मालती ने उसका नाम "नीलोफर" रख दिया था।
"मम्मी, नीलोफर ने शायद अंडे दिए हैं। वो उस घोंसले से हट ही नहीं रही।" मालती की चौबीस साल की बेटी नीलू ने उसी खिड़की के पास से मालती को आवाज दी।
"मुझे भी ऐसा ही लगता है, इसलिए इतनी मेहनत करके घर बनाया उसने।" कहती हुई मालती भी खिड़की के बाहर झाँकने लगी।
नीलू को बाहर टकटकी बाँधें देखकर, मालती नीलू के बालों पर अंगुलियों से कंघी करने लगी।
"आपने इस चिड़िया का नाम नीलोफर क्यों रखा मम्मी?" नीलू अभी भी उस छोटी चिड़िया में गुम थी।
"उसके नीले पँख कितने प्यारे हैं, बस इसलिए वो नीलोफर हो गई।" मुस्कुराते हुए मालती ने कहा।
"मेरा नाम नीलू क्यों रखा?" अगला सवाल नीलू ने।
"इसलिए कि तुम्हारी नीली आँखें झील सी पारदर्शी हैं। तुम्हारे हृदय की बात, आंँखें कह देती हैं तो तुम नीलू हो।" मालती ने कहा और फिर नीलू की व्हील चेयर को धकेल कर बैठक की ओर ले गई।
नीलू ने रिमोट से टेलीविजन चालू किया और कुछ पंजाबी डांस वाले गानों का आनंद लेने लगी। किसी त्यौहार का दृश्य था और रंग-बिरंगी पोशाकें पहने लड़कियाँ, ढ़ोल की थाप पर झूम-झूम के नाच रहीं थीं। मालती ने कनखियों से नीलू को देखा, वह तन्मय होकर गाना गा रही थी और कमर के ऊपर के शरीर को नाचने की मुद्रा में ढालने में लगी थी।
उसे गाने के बोल और नृत्य की मुद्राओं में तल्लीन देखकर, मालती उसके बचपन में खो गई।
"मम्मी, मुझे क्लासिकल डांस नहीं सीखना है, मुझे तो डांस वाले फिल्मी गाने पसंद हैं. सात साल की नीलू ने जिद करके बालीवुड गानों पर नाचना शुरू किया था।
"क्या है मम्मी, ये दिन भर बंदरिया की तरह उछल-कूद मचाती रहती है। आइने के सामने मटकती रहती है और कोई काम नहीं है क्या इसको?" नीलू से चार साल बड़ा, शुभम झल्लाता रहता।
"आप भी नाचो ना, आपको तो आता ही नहीं।" कहती नीलू उसको और चिढ़ाती।
समय पंँख लगा कर उड़ता गया और नीलू नौ साल की हो गई।
"कल सुबह बस से शुभम की स्कूल पिकनिक जा रही है। हम उसको स्कूल बस तक छोड़ आएंगे।" मालती ने अपने पति से कहा।
"मैं भी जाऊंगी भैया को छोड़ने।" नीलू ने रात को ही कह दिया था।
सुबह सब कार से शुभम को स्कूल बस तक छोड़ कर वापस आ रहे थे।
"पापा, रुको ना! हम वहां रुककर कुछ खाते हैं। मेरी फ्रेंड्स कहतीं हैं कि सुबह यहांँ वड़ा पाव, इडली डोसा और सैंडविच बहुत अच्छे मिलते हैं।" स्कूल के रास्ते पर, एक छोटे से रेस्टोरेंट के आगे नीलू ने कहा।
सब उतर ही रहे थे और नीलू दौड़कर सड़क पार करने लगी।
"नीलू, बेटा रुको!" मालती की आवाज़ बाजू से गुजरती कार के ब्रेक मारने में दब गई।
मिनटों में पासा पलट गया था, लहुलुहान नीलू अस्पताल में बेहोश पड़ी थी। तब से आज तक वह कभी खड़ी अपने पैरों नहीं हो पाई है। खेलता-कूदता, दौड़ता-नाचता बचपन कमर के नीचे से शांत हो गया। व्हील चेयर में उसकी दुनिया समा गई थी।
"मम्मी, भैया को आज वीडियो कॉल करेंगे तो मुझे उनसे एक बैग मंगवाना है।" नीलू की आवाज़ से चौंककर मालती वर्तमान में आ गई।
"हाँ, आज करते हैं शुभम को काॅल।" अमेरिका में जाॅब कर रहे बेटे शुभम के बारे में बात हो रही थी।
दूसरे दिन सुबह-सुबह भाई से बात करके, अपने लिए एक मल्टीपर्पज बैग लाने को कहकर नीलू व्हील चेयर लेकर खिड़की पर आ गई।
पापा और भाई की सलाह से, नीलू ने अपनी पढ़ाई तो चालू रखी ही, साथ ही हस्तकला की सुंदर चीजें भी बनाती रही। ईश्वर ने उसके पैरों की सारी शक्ति मानो हाथों को दे दी। बारीक धागों, सीपियों, मोती, जूट से खूबसूरत बैग और वाॅल हैंगिंग बनाती थी। उसके काम में मदद करने के लिए मालती तो थी ही, साथ एक और लड़की को रखा था जो सामान उठाने, रखने में मदद करती थी। बड़ी बुटीक से आर्डर आते थे और सब मिलकर उसे समय पर पूरा करते। धीरे-धीरे जिंदगी अपनी गति फिर पकड़ने लगी थी।
"मम्मी, आपको मेरी बहुत चिंता होती रहती है ना?" एक चिर-परिचित से अंदाज में नीलू कहा करती थी।
"नहीं तो, मैं क्यों करुँ तेरी चिंता। तू तो खुद समझदार है, अपने काम कर लेती है। बुटीक के आर्डर भी संभालती है और पढ़ाई भी कर रही है।" मालती हमेशा उसे प्रोत्साहित करती।
"आपके चेहरे पर इतनी झुर्रियाँ आ गईं आँखों के नीचे काले निशान हो गए अब भी कहोगी कि कोई चिंता नहीं।" नीलू की गहरी नीली आँखें मालती को अंदर तक भेद जातीं।
नीलू की कमर से निचले अंगों की स्वच्छता, कपड़े पहनाने का काम मालती खुद करती थी, एक जवान लड़की को, किसी दूसरे के हाथों से ये सब काम करवाने की स्थिति का सामना रोज ही दोनों करते थे।
अचानक, चीं-चीं, चीं-चीं की आवाज के साथ, काँव काँव का शोर होने लगा।
"मम्मी, देखो! नीलोफर के घोंसले में एक साथ तीन चार कौए आ गए। उसको परेशान कर रहें हैं। बचाओ मम्मी, नीलोफर को उसके अंडों को।" नीलू की आवाज़ दर्दनाक थी जैसे कोई उसपर घात कर रहा हो।
एक बेबस, व्हील चेयर पर जीवन बिताने वाली लड़की ने, पेड़ पर रहने वाली अकेली चिड़िया के साथ अपने को शायद दिल की गहराइयों से जोड़ लिया था।
मालती रसोई से भागकर कमरे की खिड़की पर आ गई। नीलू की ओर देखा, वो पसीने से तर-बतर हो रही थी।
"मम्मी, प्लीज नीलोफर को बचा लो। ये कौए उसे मार डालेंगे। आपने जैसे मुझे बचा लिया, इसको भी बचा लो मम्मा..!" नीलू की आवाज़ कुएं से बाहर आने का प्रयास कर रही थी। एक अंधकार जिसमें वो खुद जी रही थी, एक सन्नाटा जिसको वो झेल रही थी जहाँ मीलों उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था। मुट्ठी में आशाओं का क्षितिज था, जो हमेशा मुट्ठी से फिसलने को लालायित रहता।
"बेटा, हर एक को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। कोई दूसरा कुछ मदद तो कर सकता है पर जीवन भर साथ नहीं दे सकता।" मालती ने नीलू का हाथ थाम लिया, "नीलोफर की लड़ाई, उसकी अपनी है। हम सिर्फ ईश्वर से प्रार्थना कर सकतें हैं कि उसको शक्ति दे।"
"आप तो उन कौओं को भगा सकती हो ना, मैं तो उठकर उन्हें नहीं मार सकती।" नीलू की आवाज कंपकंपा रही थी।
"अपने अंडों की चिंता हमसे ज्यादा नीलोफर को खुद है। तुम देखो, वो कैसे अपनी लड़ाई लड़ेगी।" मालती ने बेटी को दिलासा तो दे दिया परंतु एक नन्ही सी चिड़िया की शक्ति पर उसको विश्वास नहीं था अतः अंदर से एक बड़ी लकड़ी ले आई।
सामने देखकर हतप्रभ रह गई कि चार कौओं से अकेली नीलोफर पूरे विश्वास से जूझ रही थी। अपनी छोटी परंतु नुकीली चोंच से, कौए की आँखों पर वार कर करके, दो कौओं को भगा दिया उसने। एक नज़र अपने अंडों पर डाली, पंख फड़फड़ा कर शक्ति का संचार किया, परंतु यह क्या..? उसके नीले चमकीले पंखों में से दो गिर गए थे। एक भरपूर निगाह गिरे पंखों पर डालकर वो तेजी से चीं-चीं, चीं-चीं करती हुई, बचे दोनों कौओं पर वार करने लगी।
साँस थामकर खिड़की से मालती और नीलू, उस नन्हीं सी चिड़िया का हौसला बढ़ा रहे थे। पक्षी हृदय की बात बहुत जल्दी समझ लेते हैं जो ज़ुबान के रहते मनुष्य नहीं समझ पाता।
संबल देती चार आँखों ने नीलोफर को बिजली सी गति दे दी। उड़-उड़कर वह अपनी चोंच से लगातार वार करती रही। कौओं की बड़ी, मोटी चोंच से खुद को बचाना छोड़ दिया उसने और आक्रामक हो गई।
आखिर एक माँ के आगे वो दोनों हार गए और भाग खड़े हुए। लंबी श्वास भरकर नीलोफर ने अपने घोंसले में सुरक्षित अंडों को प्रेम से जी भर देखा। उसकी नज़र खिड़की पर रुक गई, जहाँ दो मादाएं ताली बजाकर उसका अभिनंदन कर रहीं थीं।
नीलोफर, अपने क्षतिग्रस्त शरीर का मुआयना करने लगी। जगह जगह, कौओं की चोंच से घाव हो गए थे। उसके चमकीले, नीले पंँख अब शरीर छोड़कर नीचे गिर गए थे। उसकी आँखों में एक बूँद सी चमकने लगी।
"नीलोफर, तुम दुनिया की सबसे खूबसूरत चिड़िया हो, तुम्हें नीले पंखों की जरूरत ही नहीं है। आज तुम्हारी खूबसूरती को मैंने महसूस किया है।" नीलू की बात, उस छोटे से पंछी को कितनी समझ आई पता नहीं परंतु वह खुशी से चिचियाने लगी।
नीलू ने घूमकर मालती की ओर देखा, मम्मी के दमकते चेहरे में आज कोई झुर्रियाँ, आँखों के नीचे कोई कालापन नहीं दिखाई दिया।
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यह मौलिक, स्वरचित एवं अप्रकाशित रचना है।
लिखने की तिथि- 26/8/2021
नाम- शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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Sharmila chouhan
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Opposite Lokpuram Temple
Thane (west) 400610
Maharashtra
M.no.9967674585
email- sharmilachouhan.27@gmail.com
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