सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

221 1222 221 1222


221 1222  221 1222


ओ मीत मेरे मन के, कैसा ये सताना है
हर रोज नया देखो, मिलने का बहाना है।।1।।

ये बात नहीं अच्छी, छुप छुप के मिला करते
सब ओर बिछीं आँखें, घूरे ये ज़माना है।।2।।

आते जो गली मेरी करते हो इशारे तुम
बेकार की रुसवाई, हर रोज उठाना है।।3।।

मैं जान गई मितवा, दिल प्यार भरा तेरा
ख़्वाबों को हक़ीक़त में, तब्दील कराना है।।4।।

बंधन जो लगाते हैं वो खूब करें पहरे
धर धीर हमें फिर भी मन दीप जलाना है।।5।।


जग देख रहा सारा है घोर परीक्षा  ये
जब सोच लिया हमने अब साथ निभाना है।।6।।

नित प्रेम की वो लहरें  उठतीं जो रहीं दिल में
लहरों को किनारों के अब साथ मिलाना है।।7।।

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