खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।
प्रेमरंग की भर पिचकारी, तोसे खेलन आई।
इत-उत ढुँढू तोहे कन्हाई, ढूँढ नहीं मैं पाई।।
कैसै जाऊंगी लौट कर आज, कोरी की कोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।
अबीर गुलाल से भरी हथेली, भाव नेह भर लाई।
मनमंदिर में बसने वारे, ढूंढे मिला ना कन्हाई।
रंगभरी मेरी सुन ले पुकार, नाजुक मैं गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।
श्यामवर्ण पीतांबर सोहे, गले बैजयंती माला।
मुरली मधुर बजावर वारे, रूप तेरा निराला।
धुन ऐसी बजाना आज, मन कर ले चोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।
खोजत खोजत थक गई मोहन, मिला ना तू हरजाई।
नैन बंद कर नाम पुकारुँ, हृदय में मूरत पाई।।
खुल गए अब बंद कपाट, श्यामा भई गोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।
आँखें खोलूं अब मैं माधव, तू ही तू मुस्काए।
जमुना किनारे, गली चौबारे, ठौर ठौर दिख जाए।।
अँसुवन की बहती धार, अद्भुत ये होरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।
अपने रंग रंगाना कान्हा, बहुत दूर से आई।
जन्मों की प्यासी, तेरी दासी, आस तुम्हीं ने जगाई।
मेरी नैया लगाना पार, अस्तुति कर जोरी।
खेलो खेलो रे कन्हाई आज, जी भर कर होरी।।
मन बसे मेरो फागुन रास, मैं ब्रज की छोरी।।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें