गुरुवार, 10 जून 2021

बीजेंद्र जैमिनी के blog 2020 लघुकथा

पेट भर                                 


                                                 - शर्मिला चौहान

                                                    ठाणे - महाराष्ट्र


          आज खुशी से फूली ना समा रही थी नीमा। मैडम जी ने खाने -पीने का ढे़र सारा सामान दिया है।
कल पार्टी हुई थी बंगले पर और खाना बच गया था। रात तक तो नीमा थी सरजू और गीता की मदद करने। वो दोनों खाना बनाते और नीमा साफ -सफाई करती। 
आज तो बच्चों को और पति को स्वादिष्ट खाना पेटभर मिलेगा। एक सप्ताह से, संतोष घर पर ही है , सर्दी - ताप से कमजोर हो गया है। काम करने की कौन कहे, बिस्तर से उठने पर भी सिर चकराने लगता है उसका।
सरकारी अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टर ने गोली - दवाई थमाते हुए कहा , "शरीर को ताकत की जरूरत है, अच्छा खाना, फल- फूल, सब्जियांँ खिलाना।" 
उसी समय से नीमा सोच में पड़ गई कि पेट भर रोटी-भात तो जुट नहीं रहा, काम बंद और ऊपर से तीन जवान होते बच्चे।
कल का बचा खाना जब बांधकर रख रही थी तभी सरजू और गीता ने खुद को मिले सेब और केक भी उसे ही पकड़ा दिया ,"घर ले जा बच्चे खाएंगे, हम दोनों को तो दो जून खाना यहां मिलता ही है।" कृतज्ञता से नीमा ने उनको देखा और बड़ी सी पोटली बांध लहकती चली।
छोटू तो केक देखकर पगला ही जाएगा,  सेब छुपाकर रखेगी बच्चों से, सिर्फ संतोष को देगी, हिस्से-बाटे का ताना-बाना बुनते चल ही रही थी कि पीछे से जोर-जोर की आवाजों से पलटी।

मोटरसाइकिल पर सवार कई लोगों का हुजूम चला आ रहा था। वो रास्ते पर आने वाली सभी चीजों को तोड़ते- फोड़ते, चिल्लाते तेजी से आगे बढ़ रहे थे।
अगले कुछ पलों में जमीन पर गिरी नीमा ने, दबी कुचली पोटली को समेटते हुए, आँखें मूंद लीं।

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