घनाक्षरी छंद
भवन रास्ते बनाता, रेल जाल हूँ बिछाता।
कंँगूरों को भी सजाता, एक मजदूर मैं।
तेज धूप हो या पानी, मन में लगन ठानी।
मौसमों को देता मात, जीवन से चूर मैं।
मिल हो या कारखाने, मेरे काम के दीवाने।
स्वेद से मशीनें चलें, सुखों से हूँ दूर मैं।।
रोटी भात सब्जी खाता, घी दूध कभी ना पाता।
मेवा मिठाई ना सोचूँ, ऐसा मजबूर मैं।।
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देख श्रमिक का हाल, दया नहीं आए काल?
काल की कठोर चाल, बीते दिन माह साल।।
धूप में तपाता खाल,थक कर है निढ़ाल।
हाथों में पड़े हैं छाल, धरती का सच्चा लाल।।
अस्त्र फावड़ा कुदाल, नित रोटी का सवाल।
काम से रहे निहाल, स्वेद कण जड़े भाल।।
बने मजदूर बाल, फंसा मजबूरी जाल।
किस्मत की ये कुचाल, मेहनत बनी ढा़ल।।
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चंद रुपए कमाने, छोड़ चला घर द्वार।
पराए नगर रहे, ढोता परिवार भार।।
यान कार वो बनाता, गढ़ता साज सामान।
उसके घर है नहीं, दीवाली के दीए चार।।
करे मेहनत सदा, शक्ति का है अवतार।
धैर्य धरे झेल जाता, जिंदगी के सारे वार।।
मान का है अधिकारी, दुनिया चलाता सारी।
करके दिखाता सदा, कभी नहीं माने हार।।
शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)
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