इस बहर पर पहला प्रयास सादर है। 🙏(मार्गदर्शन के बाद संशोधित)
11212 11212 11212 11212
कहीं दूर से जो दिखी मुझे, वो करीब इतने यूँ आ गई
न नज़र मिली न पलक झुकी, मेरे मन में फिर भी समा गई।।1।।
जो लिपट रही हवा सर्द सी, लगी आग यूँ जला तन बदन
वो तपिश तेरी थी निगाहों की, मुझे इस कदर जो जला गई।।2।।
खुली लट किसी की जो दूर जब, मेरे दिल को अब तो भाने लगी
चली फिर बयार जो झूमती, पता उनका मुझको बता गई।।3।।
न मलाल था न कोई खुशी, जो मिली न तू तो कटी यूं ही
मेरे हाथ में तेरा हाथ अब, यही जिंदगी मुझे भा गई।।4।।
सुने खूब किस्से कहानियांँ, पढ़े नगमे गीत रुबाइयाँ
तेरे थरथराते लबों की धुन, मुझे प्रेम राग सिखा गई।।5।।
शर्मिला चौहान
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें