बुधवार, 11 दिसंबर 2024

212 212 212 2 पर ग़ज़ल

फ़िलबदीह 31
दूसरा चरण 


212 212 212 2

दिल के सागर में तुमको बसाया 
प्यार का मोती गहरे छुपाया।।1।।


डायरी दिल की कोरी पड़ी थी 
गीत ग़ज़लों से मैंने सजाया।।2।।

दिल की बंजर ज़मीं पर तुम्हारी 
फूल चाहत का मैंने खिलाया।।3।।

थे भटकते कभी दर-बदर तुम 
प्रेम का मैंने तब घर बनाया।।4।।

अपनी पलकों में तुमको छिपाकर 
ख़्वाब जीवन का सुंदर दिखाया।।5।।

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शर्मिला चौहान

शनिवार, 7 दिसंबर 2024

2122. 1212 22 पर ग़ज़ल

2122 1212 22

दौर आया फ़िज़ूल गानों का
वक्त थम सा गया घरानों का।।1।।

देख दुश्मन को सामने अपने
जोश बढ़ जाता है जवानों का।।2।।

देर हो जाती है पहुँचने में 
अब ठिकाना नहीं उड़ानों का।।3।।


चंद बातों से टूटते रिश्ते 
घर तो बस नाम है मकानों का।।4।।

सालभर काम करते खेतों में 
देवता नाम उन किसानों का।।5।।

आप ही अपने से लड़ा करते
 बस यही काम है दिवानों का।।6।।

गीत कविता ग़ज़ल हो चाहे वो 
काम तो हर जगह तरानों का।।7।।
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शर्मिला चौहान 
ठाणे (महाराष्ट्र )

शुक्रवार, 22 नवंबर 2024

2122 2122 2122 212 पर ग़ज़ल

फ़िलबदीह क्रमांक- 30
रदीफ़ - के लिए 
क़ाफ़िया - आने

मिसरा-ए-तरह
 मैं झुकूँगा गोद में बच्चा उठाने के लिए

वज़्न -
2122  2122 2122 212

यादों की गहराइयों में डूब जाने के लिए 
भूले बिसरे गीत बजते गुनगुनाने के लिए।।1।।

ले के धरती से विदा किरणें गईं जो शाम को 
भोर होते आ गईं रिश्ते निभाने के लिए।।2।।

टकटकी बाँधे था चंदा रात हरसिंगार को
वो तो आतुर थे ज़मीं पर लोट जाने के लिए।।3।।

देख‌ कमरे में तिमिर को झाँकती ठिठकी किरण 
छन्न से बिखरी उजाला घर में लाने के लिए।।4।।

वेदना सहता है प्रस्तर कटता छंटता रात दिन 
मुस्कुराती तब है मूरत दिल लुभाने के लिए।।5।।

जो मिले तैयार घर पंछी नहीं रुकते वहाँ
खुद करें दिन रात मेहनत घर बनाने के लिए।।6।।

डूबकर भक्ति में भव तो पार करते हैं सभी
तैरते पत्थर कभी प्रभु काम आने के लिए।।7।।

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शर्मिला चौहान

तरही मिसरा-

शान शौकत और दौलत मैं कहीं झुकता नहीं 
मैं झुकूंँगा गोद में बच्चा उठाने के लिए।।


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शर्मिला चौहान


आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 (संशोधित रूप)

फ़िलबदीह 30
दूसरा चरण 
रदीफ़ - है
क़ाफ़िया - आर


2122  2122  2122  212


चल रहा दुनिया में अब हर चीज़ का व्यापार है
रोज़ गढ़ता आदमी अपना नया किरदार है।।1।।

तेज़ भागी ज़िंदगी, भौचक सी मैं देखा करी
जीतने की चाह में मिलती   रही बस हार है।।2।।

गठरी खोले आ गया सूरज सबेरे आज भी, 
धूप के सिक्कों से चमके पूरा ये संसार है।।3।।

शुष्क होती ये धरा पानी कृषक की आँखों में 
ताकता दम थामकर बादल का कब आसार है।।4।।


कौन सच्चा कौन झूठा जाँच भी कैसे करें 
इश्तिहारों से भरा देखो हरिक अखबार है।।5।।

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 19 नवंबर 2024

कहानी -"दायरे"

कहानी_ "दायरे" 



नाम तो उसका रूपा रखा गया था परंतु बाबूजी उसे 'सुरसतिया' ही पुकारते थे। खुद ही बताया करते थे कि, "तुम्हारे जनम पर हम सब बहुत खुस थे बिटिया। तुम्हारी अम्माँ तो तुम्हारे गाल और माथे पर काला टीका लगाए रखती, गाँव भर को हलुआ पूड़ी खिलाया था तुम्हारे नामकरण पर।" छोटी बच्ची का कौतूहल और बढ़ जाता।
"क्या नाम रखा था बाबूजी हमारा?" उसकी हिरणी सी मासूम, भोली आँखें बाबूजी के चेहरे पर टिक जातीं।
"तुम्हारी अम्माँ ने तो तुम्हारे सुंदर रंग-रूप को देखकर, पंडित जी से इचार-बिचार करके "रूपा" नाम रख दिया था।" बाबूजी अपनी स्मृतियों के झरोखों में से, उन पलों को झाँकने लगे थे।

"फिर आप हमें 'सुरसतिया' क्यों कहते हो?" भौंहें सिकोड़ती रूपा बोल पड़ी।
"तुम्हारी अम्माँ चली गई बिटिया, अब उनके साथ उनकी सब चीज़ों को भी छोड़ना चाहता हूँ। उनकी बनाई चाय पसंद थी तो अब हमने चाय पीना ही बंद कर दिया।" शून्य में गुम हो गए थे बाबूजी।
"हमें तो आप 'सुरसतिया'  ही पुकारा करो, पर ठीक तो बोलो 'सरस्वती'।" ठठाकर हंँस पड़ी थी रूपा।
बाबूजी के प्रेमभरे चेहरे में ही कहीं अपनी अम्माँ को ढूँढती, एक छोटी बच्ची बोझिल होते पलों को खुशनुमा बनाना बख़ूबी जानने लगी थी।

आसपास के लोगों, अपनी दादी और बाबूजी से अम्माँ की सुंदरता और अच्छे स्वभाव की बहुत बातें  सुना करती थी रूपा। बहुत मन होता था उसका, अपनी अम्माँ को देखने, छूने और बातें करने का। बाबूजी की आलमारी में उनकी एक-दो फोटो रखी थीं। 

रूपा की बालबुद्धि समझ नहीं पाती थी कि बाबूजी कभी-कभी देर रात घर आते और बिना कोई बात किए चुपचाप सो जाते। कभी-कभी आसमान की ओर देखकर बड़बड़ करते थे। उनसे एक अजीब सी बू आती थी।
सुबह उठकर उन्हें अपनी सुरसतिया याद आ जाती।‌
"सुरसतिया, बेटा रात खाना खाया था तूने?" सुबह बाबूजी  रात से एकदम अलग हो जाते थे।
"हाँ हाँ बाबूजी, हमने तो शाम को ही भरपेट भात सब्जी खा लिया था।" सुनकर उनके चेहरे पर पश्चात्ताप की जगह, सुकून की उठती लहर को, सहज ही अनुभूत कर लेती छोटी बच्ची।

बाबूजी का काम सबसे अलग सा था। दादी ने बताया था उसे कि उसके बाबूजी कम उम्र से ही, गाँव की भजन मंडली में चले जाते थे। पाँचवी कक्षा के बाद तो उन्होंने आगे शाला ना जाने का ऐलान कर दिया।
"तोहरे बाबूजी, सकूल से भाग-भाग भजन मंडली मा जाइथ रहै री बिटिया। कितना समुझावा करत रहै हम पंचन, मुला सुनिबै नाइ किए। अब तोहरे टैम कहत है, "पढ़ लिख सुरसतिया, तोहरा नाम बिद्या की देबी रखे हैं।"  चार-पांँच साल की बच्ची यह समझ जाती कि उसके बाबूजी कम पढ़े हैं परंतु उसे पढ़ाना चाहते हैं।

दादी से अपने बालों में तेल लगवाती, चोटी गुथवाती रूपा अक्सर उनसे अपनी अम्माँ -बाबूजी की बातें पूछा करती।‌ बालमन को और किसी कथा कहानी, बातों में वो स्नेह आनंद नहीं मिलता था जो अपने माता-पिता की बातों में मिलता। 

"दादी, फिर बाबूजी बड़े होकर क्या काम करते थे?" आँगन में बिछी चारपाई पर बैठ, भाजी साफ़ करती दादी से, चकर बिल्लस पर पैरों से उछलती रूपा ने पूछा।
अपना मोटा ऐनक आँखों से उतारकर, पल्लू से साफ़ करती दादी कुछ बोलती, उससे पहले ही बाबूजी ने अपनी वकालत शुरू कर दी।

"बड़े होकर क्या, हम तो बचपन से ही कमाने लगे गए थे। भजन मंडली साथ जागरण, अखंड रामायण पाठ, महाशिवरात्रि रतजगा सब में हम जाते थे। सुर भी लगा लेते थे और मंजीरा भी बजाते थे।‌ सही कह रहे ना अम्माँ हम, बारह-चौदह की उमर में तो अनाज, पैसा घर लाने लगे थे।" अपने बचपन को मखमल के डिब्बे से खोल, सुरसतिया के आगे रख दिए बाबूजी।

"अब सीखे पढ़े नहीं तो शिवजी ही बेड़ा पार करेंगे ना माधो।" दादी जब चिड़ती तो बाबूजी 'माधव' से 'माधो'  हो जाते थे।
"हमें तो अभी भी आपका काम बहुत अच्छा लगता है बाबूजी। अलग-अलग रूप धरकर, स्वांग रचाते हो तो बड़ा मज़ा आता है।" ताली बजाकर रूपा अपने बाबूजी का मन जीत लेती।

"अच्छा, कौन सा रूप स्वांग पसंद है हमारी सुरसतिया को?" प्रेम से बाबूजी ने पूछा।
"कान्हा की गोपी, नटनी बहुत अच्छा लगता है हमें।"  फिर बड़ी बड़ी आँखें मटका कर पूछने लगी, "नटनी बन कर नाचते हुए करतब कैसे कर लेते हो आप, हमें तो देखकर डर लगता है।" 
"आप हमेशा सखी, गोपी क्यों बनते हो? कान्हा, लखनलाल क्यों नहीं बनते?"  बिटिया के इस सरल, शुद्ध और सीधे प्रश्न के उत्तर में माधव मौन हो गया। पाँच मिनट इधर उधर करके, बाहर अपने मित्रों से मिलने चला गया।

गाँव में दस दिनों रामलीला का आयोजन हुआ और माधव के घर लक्ष्मी आगमन का शुभ समय प्रारंभ हुआ। उसकी दुबली काया, चेहरे पर कोमलता, लंबी गर्दन और तोते की सी नाक ने, उसे दस दिनों विविध स्त्री किरदार निभाने के लिए उसकी रोजी पक्की कर दी।

रूपा दादी और आस पड़ोसियों के साथ प्रतिदिन रामलीला देखने जाया करती। बैठने के लिए दरी या बोरी का टुकड़ा और कागज़ के पूड़े में बंधा चना चबैना लेकर सब रामलीला का आनंद लेते।

"दादी, बाबूजी कितना गोल गोल घूमकर नाचते हैं। सब लोग ताली बजा रहें हैं आप नहीं बजाती। ना बजाओ, हम तो खूब बजाएंगे।" माधव पर बरसते सिक्के, रुपयों को देखकर रूपा दुगुने उत्साह से तालियांँ बजाने लगती।
कभी-कभी रात ज़्यादा हो जाने पर दादी उसे आधे में ही घर ले आती जिससे सुबह शाला समय पर जा सके।
दादी ने अम्माँ की जगह संभालने की पुरजोर कोशिश की लेकिन रूपा के मासूम सवालों के आगे उनकी हिम्मत टूट जाया करती।
"दादी, हम  बहुत छोटे थे ना जब अम्माँ मर गई थी।" तुलसी के आगे दीया जलाती दादी से प्रश्न किया रूपा ने।
दीया तुलसी चौरे पर रख, हाथ जोड़े, कुछ बुदबुदाती दादी आगे-आगे और रूपा पीछे पीछे, तुलसी माता की परिक्रमा करने लगे।

साँझ के पसरते आँचल में एक दीपक की रोशनी जगमगाने लगी। अँधेरे से लड़ने का हौंसला लिए, उस रोशनी ने अपना दायरा फैलाना शुरू किया। अब एक बड़े से वृत्त को रौशन कर, तिल तिल कर जलती बाती आनंदित होने लगी।  हवा का एक झोंका आया और दादी ने अपनी अंगुलियों की दीवारें, बाती के चारों ओर खड़ी कर लीं। अपने शरीर को कण-कण जलाकर, चारों ओर उजियारा देने वाली बाती पुनः मुस्कुराने लगी थी।

"बताओ ना दादी, हमारे छुटपन में हमारी अम्माँ मर गई थीं ना।" दादी का पल्ला खींचती रूपा ने फिर पूछा।
"ऐसा नहीं बोलते बिटिया, तुम्हारी अम्माँ तो पुण्यात्मा थी सुहागन गई भगवान के घर। हमारी तरह जिनगी भर सफेद साड़ी का बोझ नहीं ढोना पड़ा उसे।" आँगन में बिछी चारपाई पर बैठकर वो रूपा को आसमान के तारे दिखाने लगी।

"तुम्हारी अम्माँ, वो देखो तारा बनी चमचमा रही है। बड़ी अच्छी थी सो भगवान ले गए उसे अपने पास, उनको भी अच्छे लोग पसंद आया करे हैं बिटिया।" गहरी साँस भरकर दादी शाम के रोटी पानी के लिए रसोई में चली गई।

दिन, महीने अपनी चाल से चलते, बदलते रहे और एक साल बाद दादी ने भी अपनी बहू के साथ, आसमान के तारों बीच जगह बना ली।

छह-सात साल की बच्ची को, घर में बिना किसी स्त्री के पालना माधव को भारी लगने लगा।‌ अब गाँव के भजन कीर्तन, भागवत, रामायण में जाता था वह, बाहर गाँव का काम बंद सा हो गया था।
कई बार रात नशा कर आता माधव और फिर भगवान से अपना कसूर पूछता। अम्माँ की फोटो आलमारी से निकाल कर, देख देखकर आँसू बहाते कि इस फूल सी बच्ची को क्यों छोड़ गई वो।

बाबूजी और रूपा अनजाने ही काल की चाल से कदम मिलाते हुए, अज्ञात भविष्य की ओर बढ़ रहे थे। 
"सुरसतिया बेटा, बाहर गांँव में दो दिनों का काम आया है। पैसे जियादा भी मिलेंगे, बड़ी मंडली है।" बहुत दिनों से थोड़े पैसों पर काम करने वाले कलाकार ने अपनी बेटी से सलाह ली।
"हम रात को अकेले कैसे रहेंगे बाबूजी, डर लगता है।" रूपा ने बाबूजी की आँखों में आँखें डालकर कहा।
"तुम्हारी सखी है ना पुष्पा, उसकी अम्माँ को कह जाऊंँगा कि उसे रात तुम्हारे साथ सोने भेज दे।  अंदर से दरवाजा बंद कर लेना पक्का और अपनी अम्माँ की शॉल ओढ़कर सो जाना, फिर डर‌ ना लगेगा।" बाबूजी की बातों से सुरसतिया सहमत हो गई। 
दस साल की दो हमउम्र बच्चियांँ, पहली बार साथ-साथ रात बिता रही थीं। एक टिमटिमाते पीले बल्ब के सहारे, दुनिया जहान की बातें करतीं  दो किशोर होती लड़कियों की आँखें पहेट ही लगी थींं।
बाबूजी को ज़्यादा पैसे मिले और रूपा को हमउम्र के साथ बातें करने वाली रात, बस फिर तो बाबूजी जब भी बाहर गाँव का काम लेते रूपा खुशी से तैयार हो जाती।

इस साल बस अड्डे के चौक पर बड़ा पंडाल लगा था। आसपास के गाँवों से भी लोक कलाकार, कारीगर आने वाले थे। समिति ने प्रतियोगिता रखी थी। बाबूजी की मंडली ने सीता स्वयंवर तैयार किया था।

उस दिन पंडाल खचाखच भरा था, आसपास के गाँवों के भी लोग दर्शक थे। दरियाँ बिछी थीं तिल रखने की जगह नहीं बची थी। 
माता सीता सखियों संग मंदिर जा रही थीं। राम लखन बाग में घूम रहे थे। सीता की सखी बने बाबूजी आगे आगे नाचते चल रहे थे। दो सखियों का मोहक नृत्य, सीता जी के पूजन तक भाव भंगिमाओं संग चल रहा था। समय सीमा हो गई परंतु रूपा के बाबूजी नृत्य में तल्लीन रहे। 

अपने नृत्य में कलाकार अनहद पार करने चला, जहाँ बस वह स्वयं को स्पर्श कर रहा था। घेरदार लहंगा घूम रहा था, नाक की नथ गिर गई थी और चुनरी सरक कर कमर पर लटक गई थी। कलाकार को आनंद के उस क्षितिज से वापस लाने के लिए, श्याम चाचा ने उसका हाथ पकड़ लिया। खूब तालियांँ बजीं और बाबूजी को विशेष पुरस्कार भी दिया गया परन्तु आज रूपा के हाथ नहीं जुड़े। अनमनी सी वह पड़ोसियों के साथ घर वापस आ गई।

"बाबूजी, आप कोई दूसरा काम क्यों नहीं करते?" अप्रत्याशित प्रश्न माधव को झिंझोड़ गया।
"बचपन से यही कर रहा हूँ बिटिया, अब कौन‌ नया काम कर सकूँगा?" प्रश्न के उत्तर में एक प्रश्न ही था उनके पास।

किशोर होता शरीर और स्वछंदता के पीछे भागते बावले मन ने रूपा में कई बदलाव ला दिए। घंटों दर्पण में खुद को निहारना, भाभी से चुहल बाजी, बनाव श्रृंगार में कई घंटे बीता देना, सीख लिया था उसने।
स्कूल की पोशाक कसने लगी थी उसको। बालों की चोटी अब खुलने लगी थी, गालों पर लटकते बाल मनभाने लगे थे रूपा को। अब अपने अलग प्रकार के कपड़ों की जरूरतों को पूरी करने के लिए उसने बाबूजी से पैसे माँगे।

"सब सामान लिख दो बिटिया, हम हाट से लेते आएंगे।" किशोर मन की बात समझ ना पाया पिता।

"क्या लिख दें बाबूजी, लड़कियों का सामान है आप कैसे लाएंगे? हम खुद ले आएंगे पुष्पा साथ जाकर।" ज्वालामुखी सा धधकता तेवर देख, माधव सहम गया था।
"ठीक है, तुम्हीं ले आना जाकर।" कहते हुए रूपा के हाथों में रुपए पकड़ा दिए थे बाबूजी। 
रूपये पकड़ाते समय, माधव की अँगुलियाँ रूपा की हथेलियों को स्पर्श कर गईं और झटके से उसने हाथ पीछे खींच लिया।

दो दिनों बाद अपने लिए सारा सामान ले आई रूपा ने, देहरी पर खड़े होकर आलमारी में अपना घेरदार लहंगा, चोली, नकली बाल और गहने जमाते बाबूजी को घूर रही थी।
छोटी समीज़, सलवार कुर्ता, बालियांँ, बिंदिया और एक लाल लिपस्टिक ले आई थी रूपा। अपनी रूप-राशि, अंग सौंदर्य, लंबे बालों और चिकने होते शरीर पर रीझ जाती थी वह। कल्पनाओं के पँख लगाकर, हल्की हो उन्मुक्त आकाश में उड़ने लगी थी वह। चारपाई पर पड़ी, आसमान के तारों में अब कल्पना के चित्र साकार करती। इस किशोरी को बाबूजी का रोकना-टोकना, श्रृंगार करके नृत्य करना नापसंद होने लगा था। 

बदलाव की हवा शहरों से गाँवों तक आने लगी थी। बैलगाड़ियों की जगह ट्रैक्टर और साइकिलों की जगह मोटरसाइकिलों ने ले ली थी।‌ चंद बड़े किसानों, आढ़तियों के घरों में टेलीविजन लग गए और परदे पर नाचते-गाते हीरो-हीरोइनों ने, नृत्य मंडलियों और कलाकारों के कामों पर असर डालना शुरू कर दिया।

अब रात भर के जागरण में वी.सी.आर. पर तीन चार पिक्चरें चला देते थे।  चुनाव, नवरात्रि, गणेश पूजा, महाशिवरात्रि सभी में लोक कलाकारों की जगह, इन आधुनिक साधनों ने ले ली थी।
"अब तो भजन एक-दो घंटों में खत्म कर, बाकी समय पिक्चरें चलाते हैं श्याम भैया। कैसे चलेगा आगे जीवन?" अपने मित्रों के सामने माधव बोल रहा था।
"सही कह रहे हो माधव, परिवार चलाना कठिन हो गया है।" मंडली का एक और मित्र बोल पड़ा।
"गाँव में दसवीं कक्षा तक पढ़ाई है फिर बाहर इक्का-दुक्का बच्चे ही जाया करे हैं पढ़ने। हमारी सुरसतिया को कैसे पढ़ा सकेंगे?" अपनी होशियार बेटी के भविष्य के प्रति पिता चैतन्य था।

"कैसे पढ़ाओगे माधव भैया, रहने खाने का खरचा सुना बहुतई जादा है।" श्याम लाल ने चिंता जताई।
"अब ईश्वर के हाथों सब है भाई।" भविष्य के धुँधलके में अपनी सुरसतिया का स्पष्ट चित्र देखने की कोशिश कर रहा था माधव।
"सुरसतिया, बेटी खूब मन लगा कर पढ़ना लिखना। अच्छे से पास कर जाओगी तो सोनपुर के बड़े सकूल में भर्ती मिल जाएगी।" दर्पण के सामने इठलाती, बाल संवारती किशोरी से पिता ने कहा।
"लहंगा पहनकर, नाच- गाकर आप हमारी फीस दे सकेंगे क्या?" आज 'बाबूजी' का संबोधन में भी रूपा ने कटौती कर दी।

दो मिनट तक मौन छाया रहा। स्वर अपनी जगहों पर जम गए थे। माधव सिर झुकाए बाहर चला गया। देर रात जब वह घर वापस नहीं आया तो रूपा ने भुने बैंगन में नमक-मिर्च मिलाकर, सुबह की रोटी के साथ गले से उतार लिया। किताब खोलकर पढ़ते हुए बाबूजी का इंतज़ार कर  रही थी।
नाम अनुरूप काम, सुरसतिया पर माँ सरस्वती की कृपा बरसती थी, कोई भी विषय, पाठ सबसे जल्दी समझ लेती थी वह। आज किताब के अक्षरों में सखियों की बातचीत, नृत्य करते बाबूजी के लहंगे का घेर, टेलीविजन के गानों पर इतराते लड़का-लड़की और बाबूजी का बुझा चेहरा सब गड्ड-मड्ड होने लगा और पुस्तक बंद करके वह सोने की कोशिश करने लगी।
"ऐसा क्यों बोल गए हम, बाबूजी शुरू से ही हमें पढ़ाने लिखाने के लिए काम करते रहें हैं।" अपने ही अंतर्द्वंदों में उलझती हुई कब नींद की बाँहों में समां गई, उसे पता नहीं चला।
सुबह आवाज़ों से आँखें खुलीं तो देखा बाबूजी तैयार खड़े थे।
"हाट से कुछ सामान लाए दे रहा हूँ, फल-सब्जी, बिस्कुट सब। मैं सोनपुर जा आता हूँ, आगे का कुछ समझ आएगा देखकर।"आज बाबूजी ने एक बार भी रूपा के चेहरे की ओर नहीं देखा।
"एक-दो दिन नहीं आऊँ तो घबराना नहीं, पुष्पा को बुला लेना।" कहते हुए बाबूजी बाहर निकल गए और रूपा स्कूल चली गई।

स्कूल से वापस आकर उसने देखा भात, आलू की तरकारी बना गए थे बाबूजी। भात पूरा था एक चम्मच भी नहीं निकला था।
"बाबूजी भूखे चले गए आज, कुछ खाया भी नहीं।" हर कौर में बाबूजी का चेहरा सामने आ जाता।

"ऐ रूपा, कल लखनी में बड़ा मेला भरने वाला है। सब मिलकर  जा रहें हैं, तू भी चल।" पुष्पा गाँव भर की ख़बर लिए आ गई।
"बाबूजी हैं नहीं, उनसे पूछे बिना कैसे जा सकते हैं हम?" रूपा ने कहा।
"दीदी कह रही थी कि तेरे बाबूजी परसों आने कह गए हैं। हम सब तो सुबह जाकर शाम वापस आ जाएंँगी।" पुष्पा ने समझाया।
मेले की चकाचौंध, सखियों का साथ, नए सलवार कुर्ते को पहनने की ललक से कुछ ही देर बाद रूपा ने हामी भर दी।
आने जाने का जीप खर्च पचास प्रति व्यक्ति था परंतु रूपा और पुष्पा को कम-उम्र जान, उनके लिए गाड़ी वाला पच्चीस में राजी हो गया।
रात में कितनी देर दोनों बालियांँ, चूड़ियांँ, बिंदियाँ जमाते रहे। एक कपड़ा पहन कर और एक थैली में ले जाएंगे, ऐसा तय किया।
जब पुष्पा की नींद पड़ गई तब रूपा को बाबूजी के पैसों वाले बक्से का ध्यान आया। उनकी आलमारी आज खुली रह गई थी और रूपा ने बक्सा निकाल लिया। एक, दो, पाँच, दस-बीस के कई नोट, उसके सामने मुस्कुराने लगे। 
"पच्चीस तो गाड़ी वाला लेगा, दस-बीस हमें भी तो चाहिए खर्चें के लिए।" पचास रुपए लेकर बक्सा वापस रखने गई तो अम्माँ बाबूजी की श्वेत-श्याम तस्वीर देखकर रूक गई।
पुरानी तस्वीर, किनारे खराब हो गए थे परंतु अम्माँ का मुखड़ा चाँद सा दमक रहा था।

रूपा, टकटकी बाँधें अम्माँ को देखती रही। अँगुलियों से उनके चेहरे को स्पर्श करती रही।
"क्यों छोड़ गई हमको अम्माँ, क्यों?" अँगुलियाँ बाबूजी के चेहरे पर लग गईं तो झटके से फोटो वापस रखने लगी रूपा।
एक मोटा, मुड़ा-तुड़ा‌ कागज़ ‌जमीन पर गिर पड़ा।‌
आलमारी में बाबूजी की स्त्री किरदार की विविध पोशाकें लटक रही थीं। नथ, बालियाँ, झुमके, नकली बालों के जूडे, चोटी सब पड़े थे। ये गहने कपड़े मानो रूपा के  इर्द-गिर्द लिपटते लगे और उसने हिकारत से आलमारी बंद कर दी। जमीन पर पड़ा कागज़ उठाकर, पचास रुपयों के साथ अपनी थैली में भर लिया।

सुबह मेले जाने की उत्कंठा और बाबूजी की अनुपस्थिति में, उनसे बिना बताए जाने की अपनी हिम्मत को थपकी देती हुई, वह आधी रात तक करवटें बदलती रही।

कार्तिक पूर्णिमा की अगवानी में प्रकृति निमग्न थी। दिन दिन बढ़ते चाँद की ज्योत्सना, सारी सृष्टि को शुभ्रता देने के लिए प्रतिबद्ध थी।  शीतलता से शुभ्रता का सौंदर्य द्विगुणित हो रहा था। प्रकृति का पोर पोर आल्हादित हो रहा था। झाँकते चंद्र की छवि, ताल-तलैयों, बावड़ियों में हिचकोले लेते डोल रही थी। मुस्कुराते चाँद के साथ तारों की टोलियांँ लुका छिपी खेल रही थीं।

"खट् खटाक..!" आवाज़  हुई और रूपा चौंक पड़ी।  लेटे लेटे ही टोह लिया।  शायद पीपल की लकड़ी टूट कर गिरी थी। उठकर देखने की हिम्मत नहीं हुई।  बाजू में देखा तो पुष्पा, गहरी नींद में थी। उसके थोड़े खुले मुँह से भी हल्की घुर्र की आवाज़ें आ रहीं थीं। अपनी बाल सखी को देख, रूपा का हौंसला बढ़ा। उसने उठकर जलते पीले बल्ब को बुझा दिया और रौशन दान, खिड़कियों से आती चाँदनी को  देखती देखती सो गई। 

सुबह अपने तय समय से कुछ देर ही उनकी यात्रा शुरू हुई। जीप में ठूँसे हुए, गाने गाते, तालियाँ बजाते हुए सुबह की सुंदरता का आनंद लेते वे सब चल पड़े थे। सुबह की शीतल,अल्हड़, मंद बयार मनमोह रही थी। खेतों में किसानों के गूँजते गीत, तालाब के किनारों पर अर्ध्य देते लोग, मंदिरों में आरतियों की घंटियांँ, वातावरण को शुद्ध कर रही थीं।‌

मेले के बड़े झूले, दूर से दिखाई देने लगे थे। सबकी ख़ुशी दोगुनी हो गई। एक बड़े पीपल के पेड़ के पास गाड़ी रूक गई। सबने अपने साथ लाया खाना निकाल लिया। पीपल की घनी छाँव में, पूड़ियाँ, आलू की सब्जी, अचार, सूजी का हलवा और मीठी खुरमियाँ कागज़ के टुकड़ों पर परोसी जाने लगीं। सुबह-सुबह घर से भूखे निकले सभी ने जमकर खाया। 

अब मेले में साथ रहने, कैसे और कितनी खरीदी करने पर, एक कच्ची पक्की योजना भी बनाई गई।‌
मेले में लोगों की आवक बढ़ गई थी। 

"ना ना दीदी, हमें नहीं बैठना इसमें, बहुत डर लगता है।"  ऊँचे झूले पर बैठकर रूपा वापस उतर गई।
सहेली के ना बैठने पर पुष्पा ने भी अपना धर्म निभाया। अब वो दोनों निशानेबाजी लगाने चली गईं। अपने समूह में मौज-मस्ती करते हुए दो-तीन घंटे पलक झपकते बीत गए। 

सामने हलवाई अपनी कला से, ग्राहकों को रिझाने की तैयारी में था। छन्न.. की मधुर ध्वनि और चकरी के आकार की जलेबियांँ, कड़ाही में तैरने लगीं और घी की महक, चाशनी की मिठास वातावरण में। बाहरी शोर से अप्रभावित हलवाई अपना सारा ध्यान, अपनी कला में लगाए हुए था। 

सामने लगे पंडाल के बाहरी पर्दे पर, हीरो हीरोइनों की तस्वीरें, रामायण महाभारत के दृश्य सजे थे।
उस खेल का टिकट दर पता करने सब उधर ही चले गए। अपनी धुन में मग्न रूपा ठिठक गई। आँखों को खुद पर भरोसा नहीं हुआ। पंडाल के एक छोटे तंबू का परदा हटाकर, दो पुरुष बाहर आए। दरवाजे से पर्दा हटा और आँखों के सामने पड़ गया। सामने का सब कुछ रूपा को धुँधला नज़र आने लगा। 
बाबूजी, मंडली के कुछ लोगों के साथ श्रृंगार में मग्न थे। घेरदार लहंगा, छाती से चिपकी चोली, जिसपर अभी चुनरी नहीं चढ़ी थी, नकली बालों की फूल लगी चोटी लगाए, दर्पण में देख अपनी छोटी विरली मूँछों को साफ़ करते बाबूजी।

रूपा के पैर जम गए। आँखों देखी को मस्तिष्क नकार रहा था। उसने आज तक स्वांग करते, नाचते-गाते कलाकार बाबूजी को मंच पर देखा था, स्त्री श्रृंगार करते पुरूष ने, जवान लड़की के स्त्रीत्व पर चोट की थी। लिपस्टिक लगाकर‌ वे चूनर ओढ़ते उससे पहले रूपा चैतन्य हो गई।

समूह की परवाह किए बिना वह मेले में एक ओर दौड़ती चली गई। लोगों के सैलाब में, उसके हृदय की लहरों को कौन महसूस करता। एक कोने में उकडू बैठ गई, दोनों हाथों से सिर को थाम लिया।‌ कंधे की थैली से पानी पीकर, कुछ शांत हुई। पानी की शीशी के साथ, वो मोटा कागज़ भी हाथ को स्पर्श कर गया।

दिमाग ने हड़ताल कर दिया परंतु दिल ने हाथों को कागज़ खोलकर आँखों को अक्षर पढ़ने का हुक्म दे दिया।

माधव,

आप सचमुच हमारे अच्छे साथी, सखा बनकर रहे। पहली बार हम मंडली में मिले थे, हमारी आवाज़ पर आपका नृत्य लोगों ने पसंद किया और आपने हमें।
हमने तुरंत इंकार कर दिया। आप जैसे अर्ध पुरूष, स्त्रैण से विवाह कैसे कर सकते थे हम। आपने ना जाने बुरा माना भी या नहीं परंतु हमसे कभी कभार बात करते थे।
जिस पुरुष पर हमने विश्वास किया, उसने हमें धोखा दिया।
निराश होकर हमने आपसे सहायता माँगी और पुरुष के अत्याचार से क्षुब्ध स्त्री को आपने थाम लिया। हमें मान-सम्मान, पत्नी पद दिया, अपने घर ले आए।
माँ जी अपने बेटे की सारी कमियों को भूलकर हमें घर और दिल में जगह दी। आपने हमसे कभी रूपा के पिता का नाम तक नहीं पूछा।
हमें कितनी बार क्षमा कर पाएंगे, पता नहीं। हम जीना ही नहीं चाहते अब, रूपा को आप दोनों के पास छोड़कर, ईश्वर के  पास जा रहें हैं। 
आपके जैसा सखा, मित्र मिलना हमारा सौभाग्य रहा।

क्षमा कर दीजिएगा।

माया।
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रूपा, जैसे किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो। अम्माँ का लिखा पत्र, उसकी अपनी अम्माँ का, जिसने जीवन के दुःख पर उसे न्यौछावर कर दिया।‌ आँखों में से हृदय की लहरों ने रास्ता बनाना शुरू कर दिया।

आगे भी कुछ दो-चार पंक्तियांँ हैं, रूपा ने आँखें पोंछ कर पढ़ना शुरू किया।

माया,
ना जाने क्यों तुम हमारे परिवार में रम नहीं पाईं और अपनी फूल सी बच्ची को छोड़कर चली गईं। मैंने तुम्हारी हर बात मानी सिर्फ़ बच्ची को 'रूपा' नहीं पुकारा, उसे सरस्वती का नाम दिया। अपनी सुरसतिया का विद्या, ज्ञान की रोशनी से श्रृंगार करना है।

माधव
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रूपा की दुनिया में भूचाल आ गया था। आगे की पंक्तियों को पढ़ने की शक्ति नहीं थी उसमें। चंद पंक्तियों ने उसे उसका स्थान  दिखा दिया था।
आगे की पंक्तियों में स्याही का रंग बदल गया था।

माया,
'सुरसतिया' बड़ी हो गई है।  उसे मेरा नाचना-गाना बिल्कुल पसंद नहीं है। मैं सोनपुर जाकर पता लगा आया हूँ, फीस माफ़ भी हो गई तो रहने खाने-पीने का बड़ा खरचा है। अब मैं दूसरे गांँवों में जाकर नाचता गाता, स्वांग करता हूँ ताकि सुरसतिया को बुरा ना लगे, बहुत पैसे जमा करना है उसके लिए।

माधव
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अब सब कुछ शांत था, ना मेले की आवाज़ें ना चकाचौंध। हृदय की उठती तरंगों ने, दिमाग के ज्वालामुखी को शांत कर दिया था। बचा पानी पी गई रूपा। कागज़ को मोड़कर वापस थैली में रख, वह शांत कदमों से मेले की भीड़ में गुम हो गई।
"कहाँ चली गई थी रूपा, हम सब कितना ढूँढ रहे थे।" सामने उसके समूह के लोगों में से पुष्पा ने आवाज़ दी।

"बता कर तो भटकती लल्ली, का जवाब देते तुम्हारे बाबूजी को।" आँखें तरेरती भाभी बोली।
अब सब पंडाल के अंदर ‌बिछी दरियों में बैठ गए। सामने सरस्वती पूजा हुई और कलाकारों ने अपने गायन, नृत्य का प्रदर्शन शुरू कर दिया। 
पिक्चरों के खूब चलने वाले गाने, गाए जा रहे थे और कलाकार अपनी कला दिखा रहे थे। दर्शक भी गानों से स्वर मिलाने, थाप मारने में पीछे नहीं थे।‌ रूपा का दिमाग कुछ और सोच रहा था, दादी की बातें, आसमान पर चमकते तारे, नाचते हुए बाबूजी का खुशी से भरा चेहरा, पिछले कुछ दिनों से उनका मुर्झाया उदास चेहरा। अम्माँ-बाबूजी की साथ फोटो, बाबूजी का घेरदार लहंगा, नथ, बिंदिया... और फिर सब एक दूसरे में गड्ड-मड्ड होने लगे। 
लोगों की जोरदार आवाज़ों, सिक्कों की खनक से रूपा चौंक पड़ी। मंच पर बाबूजी अपने नृत्य में तल्लीन थे।
 
"चलत मुसाफिर मोह लियो रे, पिंजरे वाली मुनिया।" 

गानों की स्वर लहरियों, ढोलक पेटी की थाप पर बिजली की गति से कदम थिरकाते बाबूजी। उनको दीन दुनिया का होश नहीं था, कलाकार अपने जीवन के लक्ष्य पूर्ति के लिए, अपनी कला को जीवंत बना रहा था।
अचानक कदम थम गए, कल्पनाओं की दुनिया ढह गई, कलाकार जड़ हो गया, चैतन्य हुए बाबूजी।
"सुरसतिया, बिटिया तुम यहाँ, कैसे आई..?" आवाज़ खरखराने लगी, मानो गले में घुट जाना चाहती हो।

"बाबूजी, सिर्फ़ हमारे बाबूजी। हम खूब पढ़ेंगे, और हाँ हमारा नाम 'सुरसतिया' है केवल सुरसतिया।" मंच के गायक, वाद्य सब मौन थे बोल रहे थे तो पिता-पुत्री के हृदय। 
दुनिया के इस मेले में, अपना विशाल कद लिए, सबकी सोच से परे थे सुरसतिया के बाबूजी।


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मंगलवार, 5 नवंबर 2024

221 2122 221 2122 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 (संशोधित रूप)


फ़िलबदीह क्रमांक -29
दिनांक - 01.11.24
क़ाफ़िया: ईर
रदीफ़: धीरे धीरे 
मिसरा-ए-तरह- आई मेरे सुखन में तासीर धीरे धीरे 
शाइर/शाइरा का नाम - राजेश रेड्डी 


221 2122 221 2122

 मेहनत से बन रही है तक़दीर धीरे धीरे
 हांडी की खीर सोंधी,  पकती है धीरे धीरे।।1।।

ऊष्मा से प्रेम की अब, पिघले न बर्फ़ मन की
इंसान की बदलती तासीर धीरे धीरे।।2।।

कब तक रखें छुपाकर, कुछ घाव हैं जो गहरे
नैनों से फिर रिसे दुख बन नीर धीरे धीरे।।3।।

 कोहरा अगर घना हो हिम्मत से पग बढ़ाना 
निकलेगा सूर्य फिर से तम चीर धीरे धीरे।।4।।

हो मौन सिर झुकाती पत्थर की नींव जब भी 
इठलाता है वहीं तब प्राचीर धीरे धीरे।।5।।

तरही मिसरा-

दोहे हों गीत ग़ज़लें, गागर में भरते सागर
आई मेरे सुखन में, तासीर धीरे धीरे।।

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शर्मिला चौहान

सोमवार, 28 अक्टूबर 2024

गीत: मनुज को जोड़ती बस प्रेम की इक डोर तब है

"गीत" 


जगत में गूँजता नित, द्वेष का ही शोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम इक डोर तब है।

रही बढ़ती दनुजता विश्व में
                   हर बार जब जब।
विजय पाती मनुजता मात दे,
                    हर बार तब तब।
हृदय को बींधकर भीगी मिले,
               ‌     इक कोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम की
                इक डोर तब है।।१।।


पनपती शाख पर कोंपल,
         सहमती खूब हर पल।
किलकती मौन हों कलियाँ
           बुरा है सोच के कल।
बिखरती आस जीवन की,
             निराशा जोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस,
          प्रेम की इक डोर तब है।।२।। 


महाभारत कथा से सीख 
         ‌ ‌‌       भी  लेते नहीं जो
भटकते मोह में फिर ठौर
                  पाते ना कहीं वो।
हृदय की वेदना का रूप
                  होता घोर जब है
मनुज को जोड़ती बस,
 प्रेम की इक डोर तब है।।३।।

तमस अवसाद का जितना 
         सघन छाया हुआ हो।
भरम का जाल नैनों से
          हृदय आया हुआ हो।
निशा को मात देती रश्मियों
                   का भोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस, 
प्रेम की इक डोर तब है।।४।।


शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2024

1222 1222 122 पर ग़ज़लें

फ़िलबदीह क्रमांक -28
अर- क़ाफ़िया 
रदीफ़- बोलते हैं।

1222  1222  122


बिना सोचे वो अक्सर बोलते हैं 
पता कुछ हो नहीं पर बोलते हैं ।।1।।

समा लेता ज़माने की कही सब
हृदय को ही समंदर बोलते हैं।।2।।

किसी से गर गिला हो मुँह पे कहना 
सुना पीछे तो कायर बोलते हैं।।3।।

खुशी से झेल लेते हैं ग़रीबी 
अदा उनकी को तेवर बोलते हैं।।4।

लगाते व्यंग्य से पैने निशाने
उन्हीं को तो धुरंधर बोलते हैं।।5।।

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तरही मिसरा- 

कभी थे बाग कोयल कूकती थी
अब इस बस्ती में खंजर बोलते हैं।।


शर्मिला चौहान
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आदरणीय अनिल सर एवं सभी साथियों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास  (सात शेर पहली बार पटल पर 🙏क्षमा प्रार्थी)

फ़िलबदीह क्रमांक 28
दूसरा चरण 

क़ाफ़िया - ई की मात्रा 
रदीफ़ - है 

1222  1222  122

पराली जब से खेतों में जली है 
हवा मेरे शहर की विष भरी है।।1।।

हुआ दिन स्याह सूरज लापता सा
धुआँ उड़ता फिरे अब हर गली है।।2।।

जले हैं खेत, जंगल और घर भी
बुझाए कौन किसको क्या पड़ी है।।3।।

कहीं गोदाम तो जलती कहीं बस
जहाँ देखो वहाँ प्राणी दुखी हैं।।4।।

धुआँ तो फट रहा बारूद बनकर 
धमाकों से सकल धरती हिली है।।5।।

बचा क्या शेष जलती सृष्टि सारी 
ये दुनिया आज अंगारों भरी है।।6।।

हुआ सब राख बस अवशेष बाकी 
धरा आँचल भिगोती रो रही है।।7।।

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शर्मिला चौहान

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

शिकागो

शिकागो: झील नदी का संगम स्थल (यात्रा संस्मरण) 


अपने बच्चों के साथ  रहकर उनकी कार्यशैली, क्षमताओं को देखने का सौभाग्य, सभी माता-पिता चाहते है। 
कुछ इसी कारण के मन में हिलोर लेते ही, हम पति-पत्नी ने मुंबई से शिकागो की फ्लाइट की थी।‌ विभिन्न कंपनियों के वायुयानों की कतारों ने यह तो जतला ही दिया की, आकाश में भी जल्दी ही ट्रेफिक पुलिस की ज़रूरत पड़ने वाली है।

हर एक देश के नियमों के अनुसार, यात्रा के पूर्व ही यात्रियों को एयरलाइंस की ओर से ले जा सकने वाली और प्रतिबंधित चीज़ों की सूची ज़ारी कर दी जाती है।‌
इसी सूची के अनुसार हमने भी अपने बैग तैयार किए।
बहुत सूक्ष्मता, गहराई से जब सोचते हैं तो भविष्य में आने वाले संकटों का भी आभास हो जाता है। ये प्रतिबंधित वस्तुएं कहीं ना कहीं इसी विचार से प्रभावित हैं।
अनाज, फल, बीज और पौधे ले जाना प्रतिबंधित है, तात्पर्य यह है कि अपनी भूमि को दूषित होने से बचाना ही बुद्धिमानी है। धरती के उपजाऊपन को बनाए रखने के लिए, सोच समझकर कदम उठाना जरूरी है।

सामान्य जानकारी लेकर, बोर्डिंग पास दे दिया गया। तीन-चार घंटे बाद, आबूधाबी में दो घंटे का विश्राम हुआ। सउदी अरब अमीरात का आर्थिक मूल्यांकन आबूधाबी के एयरपोर्ट से किया जा सकता है। अगली फ्लाइट शिकागो की, चौदह घंटे की लंबी यात्रा वाली रही। 
अलग-अलग देश, भाषा, संस्कृति को मानने समझने वाले लोगों के साथ, मिलना यात्रा करना, अपनी जीवन यात्रा को और सहज बनाता है। समय समय पर नाश्ता, खाना, चाय-कॉफी देकर बहुत ध्यान रखते हुए विमान परिचारकों ने, इस लंबी यात्रा को आरामदायक बनाया। 
एक-दूसरे की भाषा को ना समझकर भी, भावों से जरूरतों को जानने का अवसर मिलता है। सचमुच यात्राएं हमें जोड़ती हैं, आशावान और मज़बूत बनाती है।

शिकागो पहुंँचकर, दो दिन भारत के समय, दिन-रात के अंतराल को शरीर के साथ संतुलित किया। 
यह हमारी शिकागो की दूसरी यात्रा थी और हमने प्रायः सभी खूबसूरत जगहें पहली बार देख लीं थीं।
शिकागो नदी की मिशिगन झील के साथ संधि होते देखना, बेहद खूबसूरत अनुभव है। 
मिशिगन झील, आकार विस्तार में दुनिया की छठवें नंबर की झील है और उत्तरी अमेरिका की पाँच महान झीलों में से है। मीठे पानी से भरी, जलीय प्राणियों को जीवन देने वाली  22,300 वर्ग मील में फैली यह झील, इलिनाइस, इंडियाना, विस्काॅन्सिन और मिशिगन स्टेट में फैली है। इसके तट पर शिकागो, मिलवॉकी, सिस्टर्स बे और ग्रीन बे जैसे शहर स्थित हैं।

शिकागो की वास्तुकला, विश्व में प्रसिद्ध है। शिकागो नदी और मिशिगन झील के मिलाप की साक्षी गगनचुंबी इमारतों की कतारें, पर्यटकों के लिए आश्चर्य और अनुभव की जगहें हैं। शिकागो नदी से आर्किटेक्चर टूर होता है, आप सुंदर जहाजों से नदी और झील का मिलन होते देखते हैं, किनारों पर स्थित इमारतों की विशेषता जानने का अवसर मिलता है। 

एक से एक बिल्डिंगें, एक दूसरे से आकार, रंग-रूप, बनावट के शिल्प में विविधता लिए अपनी गौरव-गाथा गान कर रहीं थीं। दुनिया की पहली गगनचुंबी इमारत और एक महिला वास्तुशास्त्री द्वारा बनाई दुनिया की सबसे बड़ी इमारत भी यहाँ है। लंबी सूची है शिकागो के भव्य वास्तुकला से दमकती इमारतों की। मिलेनियम पार्क, पीपुल्स  पैलेस, ओक पार्क, विलिस स्काई डेक एवं मर्चेंडाइज मार्ट जैसी जगहें देखने, जानने और वास्तुकला में रूचि रखने वालों के लिए हमेशा खुलीं हैं।‌

आर्थिक, भौतिक समृद्धि के साथ शिकागो के सामाजिक पारिवारिक जीवन को देखने का अवसर मिला। पारिवारिक व्यवस्था शहर और गांवों में उतनी ही विविध जितनी हमारे भारत में। शहरों का व्यस्ततम जीवन, गांवों का थोड़ा शांत वातावरण दिखता है।
प्रकृति का नियम भी बड़ा कठोर झेलतें हैं यहाँ के लोग। भीषण ठंड, बर्फ़ के साथ चार महीने रहने के बाद सूर्य की नन्हीं किरणों से, लोगों में नवजीवन प्रस्फुटित होता है। कम तापमान, तेज़ ठंडी-ठंडी हवाओं में भी, सूर्य की किरणों का स्वागत करते हुए पूरे परिवार को छुट्टी के दिन भर बाहर देखा जा सकता है। पारिवारिक व्यवस्था बेहतरीन लगती है। परिवार के साथ, प्रकृति के सान्निध्य में दिनभर बिताना, यहाँ हर तरफ देखने मिला। एक बात ने मुझे सुखद आश्चर्य में डाल दिया कि हर परिवार में दो-तीन बच्चे और साथ में पालतू प्राणियों को भी साथ रखने का जैसे रिवाज़ है यहाँ। भारत में आजकल मॉल संस्कृति जिस तेज़ी से फैल रही है, वह चिंता का विषय लगने लगी हमें। हमारे बचपन में हम सब भी नदी किनारे, बाग-बगीचों और तालाब के किनारे स्नान, खेलने-खाने के लिए बड़े-बड़े समूहों में जाते थे जो आजकल कम हो रहा है। क्या ये लोग हमसे कम कमाते हैं, कम व्यस्त हैं.. फिर भी प्रकृति के बीच दिन दिन भर, परिवार सहित निकलते हैं ना कि अपना दिन दिनभर टेलीविजन के सामने निकालते हैं। 
हमारी वैदिक सनातन संस्कृति के अनुसार जो नियम बने थे कि सुबह जल्दी उठना, रात का भोजन समय पर करना, रात जल्दी सोना, सब यहाँ देखा और वापस सीखने का अवसर मिला। दोपहर बारह से पहले और शाम सात-आठ तक रात का खाना खाकर लोग आराम करते हैं।  यही तो हमारी भी संस्कृति है इससे भोजन को पचने का सही समय मिलता है।‌

आसपास के कुछ गाँवों में भी चार-पांच दिन रहने का मौका मिला। साफ-सुथरे, अपने पुश्तैनी कामों में लगे लोगों को देखकर अपने देश की याद आ गई। मीठे पानी की मिशिगन झील, रोजी-रोटी, जीवन देती है। 
स्वास्थ्य के प्रति सजग लोगों को सुबह शाम, झील के वॉक साईड पर नियमित चलते, दौड़ते, साइकिलिंग करते देखना, प्रेरक था। वृद्ध लोग भी, अपने अनुसार चलते फिरते और व्यायाम करते दिखे। हमने भी सुंदर, बड़ी झील के किनारे सुबह-शाम घूमने चलने का लुत्फ़ लिया।

शिकागो नदी और मिशिगन झील के जोड़ पर नेवी पियर है। नेवी पियर में खड़े जहाजों में पर्यटन पानी के रास्ते से, शहर की खूबसूरती देखते हैं। जब शिकागो में गर्मी का मौसम आता है, लोगों का घरों से बाहर घूमने का समय होता है, पर्यटकों की भीड़ शहर में बड़ी संख्या में दिखती है तब नेवी पियर का फायरवर्क्स शो चालू होता है। प्रत्येक बुधवार रात 9 बजे और शनिवार को 10 बजे यह शो सभी लोगों के लिए मुफ्त में होता है।‌ सुंदर रंगों, आवाज़ों, नमूने को बनाती आतिशबाजियांँ, मन मुग्ध कर लेतीं हैं। पन्द्रह मिनटों के इस शो को दूर से भी देखा जा सकता है क्योंकि गगन को छूने के प्रयास में रहने वाली आतिशबाजी, नेवी पियर के आसपास रहने वाले लोग अपनी इमारतों की छतों, बालकनी से भी देखते हैं।

शिकागो, विभिन्न भाषाओं के बोलने वाले, अलग अलग देशों एवं अलग अलग संस्कृतियों के लोगों का संगम है। शिक्षा, नौकरी के लिए आए विश्व के विभिन्न भागों के नवयुवाओं को यहाँ देखा जा सकता है। भारत, चीन, कोरिया, ब्राजील, जापान, यू.ए.ई. और अन्य कई देशों के लोगों की विविधता दिखाई देती है।‌ हमें यहाँ भारतीय खाने के लिए अच्छे रेस्टोरेंट मिले। हमारे भोजन को पसंद करने वाले और भी लोग हैं, जिनसे भारतीय रेस्टोरेंटों की बहुत माँग है।

स्वामी विवेकानंद ने वर्षों पहले जिस स्थान पर अपना भाषण दिया था, उस जगह को अभी संग्रहालय के रूप में देखना सुखकर था। विश्व धर्म सम्मेलन शिकागो से स्वामी जी ने, सनातन वैदिक धर्म का सच्चा स्वरूप दुनिया के सामने रखा था।

अमेरिका का एक व्यस्ततम, औद्योगिक, श्रेष्ठ वास्तुकला वाला शैक्षणिक और आध्यात्मिक शहर है शिकागो। नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर शिकागो ने हमारा मन मोह लिया।

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शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र) 400610
मो.नं. 9967674585

शनिवार, 5 अक्टूबर 2024

"आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह" (व्यंग्य)

"आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह" (व्यंग्य)

पिछले दो दिनों से अच्छेलाल की दाहिनी आँख, स्वचलित यंत्र सी फड़फड़ा रही थी।‌ अँगुलियों से उसे रोकने का प्रयास जब असफल हुआ तब अच्छे को अपना निकट भविष्य धुँधला लगने लगा।

"सुनते हो, आज शाम ननकू आ रहा है। उसकी नई-नई नियुक्ति हुई है ना प्राथमिक शाला शिक्षक के लिए।" अपने भाई की नियुक्ति का समाचार सुनाते हुए उमा का मुखमंडल चढ़ते सूरज सा दैदीप्यमान था।
"पिछले छह महीनों से दिन में छह बार यह समाचार सुनाती हो, जैसे कल ही लगा तुम्हारा भाई नौकरी में। हाथ में माला ले लो जिससे भाई की नौकरी का जाप पूरा हो जाए।" अपनी फड़फड़ाती आँख को रोकते हुए अच्छे कुरकुराए।

"पूरी बात सुने बिना, अपनी बेतुकी बात का झंड़ा गड़ाने की आदत पुरानी है तुम्हारी।" आँखें तरेरती उमा ने आगे कहा,"पास के गाँव‌ में ननकू की जनगणना ड्यूटी लगी है।‌ हमारी माँ कह रही थीं कि जमाई बाबू साहब को ननकू के संग भेज देना, वैसे भी घर में ही तो बने रहते हैं।" अच्छे के माथे में  उभरी लकीरें इस पत्नी नामक जीव को घूर रही थीं जो एक ओर जमाई बाबू साहब और दूसरी ओर घर में बैठने वाला, मान और उपहास का इतना सुन्दर सम्मिश्रण कर सकती है।
"तुम्हारे भाई को सिफारिश और पैसे के दम से नौकरी मिली है वरना इतने दिनों वह भी घर की रोटी तोड़ रहा था।" सामने खड़ी उस औरत के होंठों पर छाई कुटिल मुस्कान से अच्छे को अहसास हुआ कि अनजाने में ही उसने अपना 'घर की रोटी तोड़ना' स्वीकार कर लिया था।
शाम को ननकू जी का अभूतपूर्व स्वागत हुआ।‌ हलुआ, पूड़ी, आलू की सूखी चटपटी सब्ज़ी और मुन्ना के‌ रेस्टोरेंट का समोसा। सोने के लिए चारपाई पर पसरे भाई को, गिलास भर दूध थमाते हुए उमा ने कहा, "बड़ा काम करना पड़ता है थोड़ा दूध घी खाया करो नहीं तो सेहत बिगड़ जाएगी।" अच्छे के चौखटे को षट्कोण में बदलता ताड़कर ननकू बोल पड़ा, "जीजा, सुबह-सुबह की बस से निकल पड़ेंगे। ज़्यादा दूर नहीं है बस से दो घंटे बता रहे थे हमारे साथी।" 
"अब इनका पूरा नाम लिया कीजिए, ननकू ननकू थोड़े ही अच्छा लगता है। अब काम करता है, कमाई लाता है हमारा ननकू।" दूध का गिलास खाली करवा कर, भाई को जुबान की मलाई खिला रही थी उमा।
सुबह भाई को बस स्टैंड  तक पहुँचाने के लिए, उमा सुंदर साड़ी पहनकर  तैयार खड़ी थी।
"अरी भागवान, गाँव में घर-घर, गली-मोहल्ला भटकने जा रहा तुम्हारा भाई, सीमा पर लड़ने नहीं जो पहुँचाने जाना है तुम्हें।" अच्छे ने तेज़ स्वर में कहा।
"देश की जनसंख्या गिनना, आकाश में तारे गिनने और पीपल के पत्ते गिनने से तो अच्छा ही है।" बातों की कटार चलाने में कुछ ज़्यादा ही माहिर थी उमा।

आज अच्छेलाल ने अपनी हाल फिलहाल खरीदी, टेलर से कमर  फिट करवाई इकलौती जीन्स, झक्क सफेद सूती कमीज़ पहन रखा था। बालों को तेल का जामा ना पहनाने से वो स्वतंत्र इठला रहे थे।

बस से उतरकर गाँव की संकरी, पक्की सड़क के बाद की पहली गली में साला-जीजा के जोड़े ने प्रवेश किया।‌ अपने बैग में से फ़ार्म निकाल कर, हाथ की कलम को तलवार बनाकर, ननकू पहले घर के लिए सज्ज हो गया। 

घर के सामने दालान में बैठे बुजुर्ग से ननकू ने कहा, "सरकारी स्कूल से जनगणना में आए हैं।" 
लुंगी के ऊपर कुर्ता लटकाए, सफेद बालों को मेंहदी की लालिमा दिए बैठे उस बुज़ुर्ग ने, दोनों अजनबियों को नज़रों से तौला।

"सकूल में पढ़ाने से जी चुराकर, आदमी गिनने निकल पड़े मास्टर।  बच्चों को तालीम दोगे तो  बड़े होकर दुआ देंगे।" पोपले मुँह से अपना दायित्व निभा दिया बुजुर्ग ने।

"चाचा, स्कूल से ही भेजा है। अपने आप नहीं आए।" ननकू बोल पड़ा, "बताइए आपके घर कितने सदस्य हैं, पानी की क्या व्यवस्था है, कितने पढ़ने वाले, नौकरी वाले लोग हैं आराम से सब बताइए।" ननकू अपना पहला फार्म भरने के लिए उत्सुक था।

बुज़ुर्ग के माथे पर साँप के चाल समान बल पड़ गए। 
"अरे चाचा, बताइए ना।" ननकू ने फिर कहा।
"बड़ी जल्दी में हो मास्टर, बता रहा हूँ गिन तो लूँ।" नवाबी अंदाज़ में  बुज़ुर्ग ने फरमाया।
"अठारह।" हिसाब पूरा हुआ था।
"अठारह लोग इस दड़बे में।" अच्छे का मुँह खुला रह गया।
"हमारे ताजमहल को दड़बा कहते ज़ुबान गिरी नहीं तुम्हारी। कैसे बेअदब आदमी को लेकर आए हो मास्टर।" बुज़ुर्ग तमतमा गया।
"शांत हो जाओ चाचा, बस इन्हें तो मसखरी करने की आदत सी है। आप बताओ सभी के नाम, उम्र सब।" ननकू ने बात संभाली।
बुज़ुर्ग ने एक, दो और फिर तीसरी बीबी का सिलसिलेवार ब्यौरा दिया। पहली की मौत तक तीन बच्चे, दूसरी से तलाक तक पाँच की पलटन और वर्तमान वाली ने चार बच्चों से खानदान को रौशन किया है।
"इस सरकारी पुर्जे में तो आपके खानदान को संभालने का हौंसला नहीं है।" कहते हुए ननकू ने अपने साथ लाया रजिस्टर निकाल लिया।
"पहली और दूसरी बीवी तो यहाँ हैं नहीं फिर अठारह कैसे हुए, चौदह हुए ना।" ननकू ने कुनबे के सरगने से पूछा।
"मास्टर, हिसाब कच्चा है तुम्हारा। दो बीवियांँ अब नहीं हैं पर पहली के दो छोकरों की बीवियांँ और एक एक बच्चा है ना।" बुज़ुर्ग अपने बड़े और रंगीन दाँत दिखा रहा था।

अच्छेलाल को दिन में तारे नज़र आने लगे, सामने बैठे इस आदमी ने अपनी सेवाओं से, अपने समाज और देश को समृद्ध कर दिया था।
रजिस्टर के तीन पन्ने इस खानदान के खाते में चले गए और जीजा-साले की जोड़ी शून्य में।

माथे का पसीना सुखाते हुए वे दोनों अगले घर की ओर चल पड़े। सामने दो औरतें खड़ी थीं। अपने घर अजनबियों को आता देख, उन्होंने सिर का पल्ला रंगमंच के पर्दे की तरह अपने मुखमंडल पर गिरा लिया।
"सुनिए, हम आपके परिवार वालों, बाल-बच्चों की जानकारी लेने आए हैं।" ननकू ने ऊँची आवाज़ में कहा।
"तनिको लाज ना आए रही बबुआ। घर के मनई ना हैं और तुम घुसे चले आए मेहरारून में।" प्रौढ़ महिला गुर्राई।
"तो बुला लो घरवालों को, हम भी सरकारी ड्यूटी कर रहें हैं।" ननकू भी गरम हो गया।
"अरी मोरी मैया, बड़ा जोर बोलत है ई तो।" प्रौढ़ा ने अपने सिर का पल्ला थोड़ा ऊपर खींच लिया।
"काकी, आप तो बड़ी हो, समझदार हो आप ही सब कुछ लिखवा दो। हर घर से जानकारी ले रहे हैं।" नाम के मुताबिक अपनी आवाज़ में बोले अच्छे।
"ठीक है, पूछो का बताएं।" अब महिला का पल्ला माथे के ऊपर चला गया और चेहरे के हाव-भाव दृष्टिगोचर होने लगे।
"इस घर में कितने लोग रहते हैं?" ननकू ने फिर पहला फार्म निकाला।
"एक, दुई, तीन, चार..पाँच.और छह.. कुल छह प्रानी रहते हैं इहाँ।" पाँच और छह अँगुलियों के बीच वह ताल बिठा रही थी।

"घर के मुखिया का नाम बताइए?" ननकू की कलम स्याही उगलने के लिए बेताब हो रही थी।
"बहुतई बेसरम मनई हो, कभी मेहरारू अपने मरद का नाम लिया करे है भला।" वह दोबारा बिफर पड़ी।
"अब नाम नहीं बताओगी तो क्या लिखूंँ?" परेशान ननकू  ओसारे के नीचे की छोटी दीवार पर बैठ गया और अच्छे उसकी बगल में।

दूसरी औरत, जो दुबली-पतली शायद कम उम्र की थी उसने प्रौढ़ा को कुछ समझाया। 
"ई हमार बहुरिया, इसारे से अपने ससुर का नाम बताएगी, समझो और लिखो।" प्राथमिक शाला के शिक्षक पर छात्र बनने की मजबूरी थी।
बहू, घूँघट खींच कर गेंदें का फूल तोड़ लाई।
"गेंदालाल।" ननकू की आँखें चमक गईं।
उसने ना में सिर हिलाया।
"गेंदाराम।" अच्छे ने पूछा।
उसका सिर घड़ी के पेंडुलम की तरह दाएं बाएं हिल रहा था।
अब उसने एक गुलाब का फूल भी तोड़ लिया।
"गुलाबचंद" ननकू और  अच्छे एक साथ बोल पड़े।
वह ना में अटल रही।
अब उसने सफ़ेद फूल, कनेर के पीले फूल, हथेली में भर लिए।

"फूलचंद।" अच्छे और ननकू ने आखिरकार परीक्षा पास की और परिणाम में प्रौढ़ा ने लजाकर अपना मुखमंडल पुनः ढांँक लिया।

छह सदस्यों के नाम, उम्र और कामकाज लिखने में दोनों को चक्कर आने लगे।
एक गिलास पानी मांँगने पर, प्रौढ़ा ने पिछले साल लगे हैंडपंप की कुंडली निकाल ली। अब एक गिलास पानी के लिए इतना और कौन सुनता, सो दोनों हाथ जोड़कर बाहर निकल गए।

नीम के चबूतरे के दूसरी ओर वह कुख्यात हैंडपंप था। अच्छे के कंधे पर कुछ गिरा और उसने  अँगुलियों से झटक दिया। 
हाथ में चिपचिपा सा कुछ चिपक गया। सफेद सूती कमीज़ भी कंधे पर चिपचिपा गई‌ थी।
"ये क्या किए जीजा, यहाँ पीने का पानी नहीं और आपने गंदा कर लिया।" ननकू के कहते ही अच्छे भभक पड़े, "ये हमने किया है? एक तो तुम्हारा साथ देने आए पागलों की बस्ती में तिस पर तुम्हारे ये तेवर।" कहते हुए अच्छेलाल पेड़ पर बैठे पंछियों में से अपने दुश्मन को ढूँढने लगे।
साले साहब के पंद्रह मिनट की परिश्रम के बाद, हैंडपंप से निकले चुल्लू दो चुल्लू पानी से नहा निचोड़कर आगे निकल पड़े।

आगे किराने की दुकान और पिछले हिस्से में रहवासी घर था‌। दुकान पर आवाज़ देते हुए पाँच मिनट हो चुके थे और वो आगे बढ़ते कि दस-बारह साल का लड़का आया।
"क्या चाहिए?" टेलीविजन के बंद करके आने की झुंझलाहट उसके चेहरे और आवाज़ में थी।
"कुछ जानकारी।" ननकू ने बताया।
"नहीं रखते हम दुकान में।" कहते हुए वह पलट कर अंदर घुस गया।
"अरे..ओ! किसी बड़े को बाहर भेजो।" दोनों की आवाज़ें टेलीविजन की तेज़ आवाज़ में दब गईं।
"अजीब गाँव है भाई।" अच्छे के अच्छे दिलो-दिमाग में ऐसी दुनिया की हवा भी नहीं थी।
दो प्लॉट छोड़कर खपरैल का बड़ा मकान था।
सामने चारपाई पर हुक्का गुड़गुड़ाते, घुटनों तक धोती, ऊपर बंडी और सिर पर गमछा लपेटे बुजुर्ग बैठे थे।
"राम राम बाबा।" ननकू ने शुभ शुरुआत की। 
"जय राम जी की, हम पहचाने नहीं बचुआ कौन हो?" अपना चश्मा ठीक करते हुए उन्होंने पूछा।
"बाबा, हम  शिक्षक हैं। गाँव की जनसंख्या, शिक्षा, कामकाज, सुविधा सबकी जानकारी लेने भेजा है सरकार ने।" अब अच्छे अपने अंदाज़ में बोले।

"का करोगे लिखकर, अरे हमारे घर का खपरैल पार साल इतना चुअत रहा कि जानो बाढ़ आ गई। तुम्हार सरकार हमरा खपरैल बदलेगी का।" बुज़ुर्ग घूरने लगा।
"बाबा, आपके घर कितने लोग हैं, उनकी उम्र, काम-धाम, पीने के पानी की व्यवस्था सब आराम से लिखवा दो।" ननकू ने फार्म, कलम फिर हाथ में ले लिया।
"हमारा नाम सुखलाल है मूला जिनगी में कौंनो सुख नहीं देखे। पीने का पानी हमारे बुढ़िया कुआँ से भरती हैं।" ननकू जानकारी लिखने लगे।
"बाबा, आपकी उम्र बताओ या आधार कार्ड दिखा दो।" आधार कार्ड ही सरल उपाय लगा सबकी उम्र पता करने का।
"काहे बाबू, काहे देंगे अपना आधार कार्ड तुमको? हमार बेटवा मना किए हैं केहुका आधार कार्ड ना देंगे।" बुज़ुर्ग ऐसे घूरने लगा जैसे उसकी तिजोरी लूटने आए हैं।
"ठीक है बाबा, अपनी उम्र, जन्म तारीख ही बता दो।" परेशान ननकू बोला।
"सावन-भादो की झड़ी लगी थी, हमारी अम्माँ बताया करतीं कि हम नवमी को तड़के पैदा हुए थे।" बुढउ के चेहरे पर ऐसी चमक आ गई जानो उस दिन दुनिया का उद्धार हो गया।
"दिन, तारीख, साल हमारे लंगोटिया यार मनसुख बता देगा। हम उससे आठ दिन बड़े हैं।" कहते हुए वो चारपाई से उठ कर पच्चीस साल के जवान की चाल से सड़क पर निकल पड़े।
वो आगे-आगे, साला जीजा का जोड़ा पीछे और सबसे पीछे उनकी पत्नी।

सामने से आते एक ऊँचे कद-काठी, बड़ी घनी मूँछों वाले रोबदार बुजुर्ग को देखकर साथ वाले बुजुर्ग चिल्लाए, "अरे ओ मनसुखवा! इनको तोहार जनम साल, जनमदिन बता‌‌ दे तनिक, तोहरे से आठ दिन पहले हमार रहा ना।" सुखलाल ने मनसुख का हाथ पकड़ लिया।
"दद्दा, तुमको मालूम है ना हमारा सरीर बड़ा, दिमाग छोटा है। हमें कहाँ कुछ याद रहता है।" लंगोटिया यार की अपनी विपदा थी।
"हमारी अम्माँ ने बताया था कि हम नागपंचमी को जनम लिए थे, तब हमारे बाउजी अखाड़े में कुश्ती लड़ रहे थे।" इस उम्र में भी अपनी भुजाओं को अभिमान से देख रहे थे मनसुख जी।

सुखलाल और मनसुख को कुंभ में बिछड़े भाइयों की तरह गले मिलते देख, ननकू ने पूछा, "पानी जहाँ से भरकर लाना पड़ता है वह कुआंँ कहाँ है?"
"कुआँ तो हमारे घर के पिछवाड़े है, अब का ई हमार मेहरारू बाहर के कुआँ में जाके पानी लावै के उमर की है।" सुखलाल ने तपाक से उत्तर दिया।
"हे भगवान! बताया क्यों नहीं कि पानी की व्यवस्था घर पर है।" अब अच्छे उकता गए थे।
"का का बताया जाए बोलो कि हम पंचे का खात हैं, कहाँ आत-जात हैं, धंधा, पैसा कौड़ी सब बतावैं का। आ जाते हैं सरकारी टट्टू।‌ लिखो जो लिखना हो, चला चली हो घर।" पहली बार बुज़ुर्ग महिला ने मुँह खोलना और ऐसा कि दोनों अजनबियों का मुँह खुला रह गया।
"आ गए हैं मनई गिने खातिर।" जाते-जाते सुखलाल ने इतना कहकर सुख का अनुभव कर लिया।
थके मांदे जीजा-साले ने कोने पर दिख रही चाय टपरी की ओर कदम बढ़ा लिए।
"कौन‌ गाँव के हो भाई?" टपरी वाले ने समझ लिया की दोनों अजनबी हैं।
"गाँव तो तुम्हारा कमाल का है भाई।‌ सरकारी सुविधाएं, मुवायजा सबको चाहिए परन्तु जानकारी किसी को नहीं देना है।" अच्छेलाल को टपरी वाला, अपने मुन्ना जैसे ही लग रहा था।
"अरे भाई, कोई छुट्टी वुट्टी के दिन आना चाहिए था।  लड़के बच्चे रहें, तो बताएं सब।" टपरी वाले ने सलाह दी।
"अब हम छुट्टी के दिन काम करें।" ननकू का मुँह कडुवा गया।

पास ही दो आदमी चाय पी रहे थे। थोड़ा पास खिसक आए और बोले, "अरे, हमारे गाँव में हमारे रहते आपको तकलीफ़ हुई, बुरा हुआ। हम आपके साथ चलतें हैं घर-घर, सब जानकारी मिलेगी आपको।" धीमे और शांत स्वर में एक ने कहा।
"आप चलोगे हमारे साथ!" खुशी से अच्छे ने पूछा।
"हाँ हाँ, क्यों नहीं। सुबह से अभी चाय पिएं हैं हम दोनों। भूखे तो‌ नहीं चलेगी शरीर की मशीन।"  दोनों ने एक साथ कहा।
"हमारे जीजा बड़े दिलवाले हैं भाईयों, खाने खिलाने के शौकीन, है‌‌ ना जीजा।" साले की इस अदा पर अच्छे ने हामी में सिर हिलाया।
चारों ने छक कर समोसा, कचौड़ी उड़ाया और तीनों के जीजा बने अच्छे ने कड़क नोट देकर रिश्ता निभाया।
अब चारों गाँव की गलियों में घूमने लगे। चौपाल, गलियों में आते जाते लोग उन्हें सिर से पैर तक घूर रहे थे।

"आप पहली गली में घूम आएं ना, अब दूसरी छोड़ तीसरी गली से निकलते हैं।" कहते हुए वो दोनों आदमी आगे आगे चलने लगे। कुछ कदमों के बाद एक बोला, "अरे..! मैंने अपना पर्स टपरी के मेज़ पर छोड़ दिया।" 
"पैसे तो मैंने दिए भाई और पर्स तुम छोड़ आए।" अच्छे ने टोका।
"आप दोनों के आने से पहले चाय पिए थे ना, उसी समय निकाले थे।" एक आगे  बोला, "इस गली का अंतिम घर श्यामलाल जी का है, आप चलो हम पर्स लेकर आते हैं।" कहते हुए दोनों टपरी की ओर वापस चले गए। 

तीसरी गली का अंत आता ही नहीं था। श्यामलाल का घर तो नहीं मिला, पर कोने में खड़ी पगुराती श्यामल भैंस मिली। पेटभर खाया खाना, प्रेम से जुगाली कर पचा रही थी। इस पूरे गाँव में इन्हीं कजरारी आंँखों से स्नेह झरता देख, साला-जीजा की आत्मा तृप्त हो गई।

उसकी जुगाली का अंदाज़ देखते जब आधा घंटा बीत गया तब जीजा और साला को अपनी स्थिति का भान‌ हुआ।
अब उस टपरी पर जाकर अपनी और गति करवाना मंजूर नहीं था उनको।
भारी दिल और थके कदमों से बस स्टैंड की ओर लौटती जोड़ी में से, जीजा अचानक चिल्ला पड़े, "ननकू, अभी-अभी हमारी दाहिनी आँख ने फड़फड़ाना बंद कर दिया है।" 
 बस पर सवार ननकू सोच रहा था कि अब जनगणना ड्यूटी में तभी आएंगे जब जीजा की बाईं आंँख फड़केगी।


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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 19 सितंबर 2024

1212 1212 1212 1212 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 


फ़िलबदीह क्रमांक 26
प्रथम चरण 
क़ाफ़िया - आर
रदीफ़ - कर
मिसरा-ए-तरह
यहीं हूँ आपके करीब देखिए पुकार कर 

1212 1212 1212 1212


चला गया बसंत कुछ समय यहाँ गुज़ार कर
बनी है फूल हर कली उसी से आँखें चार कर।।1।।

जला जो सूर्य तो लगी है आग सी गली गली 
हुआ पलाश लाल अब हरित वसन उतार कर।।2।।

हो दग्ध अपनी ही अगन से सूर्य बावरा फिरे
मिला घटा से तब कहा कि मुझसे अब करार कर।।3।।

फुहार बरसे मेघ की तने से लिपटी बेल है
है झांकता इधर-उधर   कभी तो बातें  चार कर ।।4।।

धवल शरद का चाँद है बयार मंद शीत की
मैं श्वेत कांस से हुई  कहे धरा पुकार कर।।5।।


तरही मिसरा-

चले हो क्यों इधर-उधर लगे किसी तलाश में 
यहीं हूँ आपके करीब देखिए पुकार कर।

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आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा दूसरे चरण का प्रयास 🙏


फ़िलबदीह क्रमांक 26
दूसरा चरण 

1212 1212 1212 1212

जो अपनी धुन में मग्न है, मलंग जिसकी चाल है 
युगों को पाले अंक में, समय बड़ा विशाल है।।1।।

कदम थमे जो पल घड़ी, तो वक्त आगे बढ़ गया 
जो सोचा था मिला नहीं, तो मन में क्यूँ मलाल है।।2।।

दुखों में जो संभाल ले, खुशी में गीत बन बजे
दिलों का हौंसला बने, समय तो बेमिसाल है।।3।।


गवाह है ये सृष्टि का, विनाश हो सृजन हो या
जो न्याय इसके हाथ हो, वो न्याय का मिसाल है।।4।।

कभी कठोर हो बड़ा, कभी दयालु सा लगे
मिज़ाज बदले हर घड़ी, इसी से सब बवाल है।।5।।



हमेशा दे ये कर्म फल, बड़ा ये न्यायधीश है
रखे नज़र सभी तरफ़, त्रिनेत्र इसके भाल है।।6।।

है आज जो वो कल नहीं, अनंत है तो बस यही
बने जो पल घड़ी प्रहर, ये काल का कमाल है।।7।।


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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 6 सितंबर 2024

221 1222 221 1222 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 ( संशोधित)


फ़िलबदीह क्रमांक 25
प्रथम चरण 
वज़्न...
221 1222  221  1222

इस उजले से चंदा में, इक दाग सलोना है 
काजल से लगाया वो, मैयाँ का डिठौना है।।1।।

पागल हुआ मन‌ देखो, तृष्णा ही घुली हरदम
वो तृष्णा निकल जाए, मन इतना बिलोना है।।2।।

आदम की बुरी फितरत, पशुओं से हुआ नीचा
जब सामने हो नारी तब भाव घिनौना है।।3।।

माता-पिता या बीबी, हर मर्द गणित करता
होता न कभी हल ये, अनसुलझा तिकोना है।।4।।

कुछ कर्म तो हों सच्चे, जिनकी हो चमक असली
मोती से उन्हें अब तो, जीवन में पिरोना है।।5।।


तरही मिसरा-

चाहत के पिटारे को, खाली न कभी करना
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है।।

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आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 

फ़िलबदीह क्रमांक 25 
दूसरा चरण 

221 1222  221  1222


जब भ्रूण का निज तन में, निर्धार करे नारी
तब सृष्टि सकल का फिर, विस्तार करे नारी।।1।।

मन चाँदनी सा उजला, तन लौह सदृश पक्का
भर भाव हृदय गागर, बौछार करे नारी।।2।।

नव पंँख से शिक्षा के, छूने लगी नभ सारा।
सपनों को प्रयासों से, साकार करे नारी।।3।।

व्रत कोई हो या उत्सव, सब रंग भरे लगते
परिवार सहित हरदम, त्यौहार करे नारी।।4।।

है शक्ति उपासक वो, अन्याय नहीं सहती
जब बढ़ते असुर जग में, संहार करे नारी।।5।।


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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 27 अगस्त 2024

जन्माष्टमी पर गीत

श्याम तेरे कितने रूप, कितने नाम?
कोई कहे तुझे मुरली मनोहर,
कोई कहे घनश्याम।
वृंदावन की कुंज गलियों में,
रहे सदा तेरा धाम।

जीवन का हर रंग है सुंदर, 
चाहे सुबह या शाम,
खेलकूद कर, रास-रंग कर,
किया कर्म योग को महान।

प्यार, दोस्ती, रिश्ते-नाते
सब होते हैं जीवन में अहम्।
कृष्ण रंग है सबसे अलौकिक,
तोड़ दे सारे माया भ्रम।

बुद्धि, भक्ति और कर्म का,
 जिसने किया है संगम।
गीता संदेश दिया जग को,
कहलाया पूर्ण पुरूषोत्तम ।

उद्धव का अलबेला श्याम,
गोपी जन वल्लभ है श्याम।
संतजनों के तारक श्याम,
दुष्टो के संहारक श्याम।

राधेश्याम राधेश्याम, गोपी जन वल्लभ हैं श्याम।

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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 23 अगस्त 2024

11212 11212 11212 11212 पर दो ग़ज़लें




फ़िलबदीह क्रमांक 24
प्रथम चरण 
रदीफ़ - करो
क़ाफिया - आ की मात्रा 

11212  11212 11212  11212


जो बिछड़ गए कभी उनसे भी तो  मिलन की आस रखा करो।
ज़रा दिल में झांक के देख लो, वहीं रोज़ उनसे मिला करो।।1।।

कभी साथ साथ चले थे जो,  वो हैं फ़ासले पे खड़े हुए 
वो जो दो कदम भी बढ़ें अगर, दो कदम तो तुम भी चला करो।।2।।

मुझे मुफ़्त में तू मिली नहीं, मेरी ज़िंदगी मेरी ज़िद है तू।
मेरे दिल में तू जो समा गई, सुनो साँस बन के जिया करो।।3।।

खिले फूल अब तो पलाश के, लगी आग ज्यों वसुधा में है।
कहे डर का मारा सूर्य भी, धरा कम ज़रा सा सजा करो।।4।।


न ग़ज़ल बनी न ही गीत ही, न भजन कोई न ही छंद ही।
भरे प्रेम से ये दो शब्द हैं, मेरी प्रीत बन के झरा करो।।5।।

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तरही मिसरा-
 
मेरे संग बैठ कभी कभी, सुनो गीत फिर वो पुराने ही।
यूँ ही बेसबब न फिरा करो किसी शाम घर भी रहा करो।


शर्मिला चौहान
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फ़िलबदीह क्रमांक 24
दूसरा चरण 

11212  11212  11212  11212


ये जो बावली सी चली हवा, कहीं दीप कोई बुझा न दे।
वो झुकी हुई सी जो शाख है, उसे पेड़ से तो गिरा न दे।।1।।

बड़े साहसी हैं जवान वो, डटे रात दिन जो हैं सीमा पे।
रखें ध्यान वो यही हर समय, कोई ‌शत्रु झंडा झुका न दे।।2।।

ज़रा सोचकर तो कहा करो, बड़ी धारदार ज़ुबान है।
चले वो जो ऐसी ही चाल से, किसी दिल पे घाव बना न दे।।3।।

छिपा बदलियों में जो सूर्य तो, विरहिन किरण उसे ढूँढती।
कहे सबसे आँखें तरेर कर, कोई इसको मेरा पता न‌ दे।।4।।

जो मकान खूब चमकते हैं, किसी त्याग का ये तो रंग है।
करो बात तुम कभी नींव से, कहीं तुमको फिर वो रुला न दे।।5।।

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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 8 अगस्त 2024

"काम बिगारे आपनों जग में होता हँसाय" (व्यंग्य)

"काम बिगारे आपनो, जग में होत हंँसाय"
(व्यंग्य)

गर्मी की लू धूल का घाघरा घुमाती, बाँध को तोड़ने  वाली नदी की तरह उन्मादी  हो चली थी।‌ पीपल बरगद की बपौती को आँखें दिखाती   जब गुज़रती तो सर-सर, सूँ-सूँ से पूरा इलाका गूँजने लगता। सिर पर गमछा लपेटे, जेब में एक प्याज़ ठूंसते हुए अच्छेलाल ने, आँगन में खड़े होकर तपते सूरज के तेवर से अपने तेवर को मिलाने की कोशिश की।

"अब भरी दोपहरी में किसको कांधा देने जा रहे हो अच्छन। कम से कम इस झांय झांय वाली लूं पर तनिक रहम खा लो।"  बरामदे पर से झांँकती अम्माँ की वाणी ने अच्छेलाल के माथे पर सिकुड़न ला दी। 

"अम्माँ, हमने एक कदम भी कभी तुम्हारी मन मर्ज़ी के बिना उठाया है कभी, तो किसी की अर्थी कैसे उठा लेंगे। आते जाते टोकने की आदत हो गई है, ना जाने कब जाएगी?"  सूरज की चढ़ती किरणों ने, अच्छे के कूल दिमाग को भी गर्म कर दिया था।
"कब जाएगी बेटा, सीधे सीधे कहो ना कि, अम्माँ अब चली जाओ। तुम सबकी छाती पर पत्थर की तरह धरी पड़ी हूँ।" अम्माँ की आवाजें अच्छे के कानों में पूरा शीशा उड़ेलती, इसके पहले ही अच्छे को सूरज का ताप ज़्यादा मध्यम और कोमल जान पड़ा।

चौपाल का हॉल, चुनाव के बाद नया नया खड़ा हुआ था। अपनी विशालता, नए रंग रोगन से अकड़ा हुआ वह, आज की इस सभा का आतिथेय (मेज़बान) बना खड़ा है।
इस भीषण गर्मी में दो बड़े कूलर हॉल की चर्चा का तापमान संतुलन करने के लिए लगे थे। 
"दोनों कूलर और पानी की टंकी में पानी भरने के लिए नगर निगम का टैंकर आया था सुबह।" बिहारी ने अच्छे को बताया।
"अरे यार! ये दो कूलर और फुट दो फुट की टंकी में पानी भरने के लिए क्या टैंकर भर पानी लगता है?" अच्छे ने आश्चर्य से पूछा।
"बाकी पानी तो विधायक जी की कोठी की टंकी और उनके बगीचे में डाल दिए, पैसे तो आज की मीटिंग के खाते में ही जाएगा ना।" अपेक्षाकृत धीमी आवाज़ में फुसफुसाया।

सामने दीवार पर बड़ा बैनर लगा था_
"पर्यावरण बचाओ-पेड़ लगाओ"
"एक एक पेड़ -जीवन के एक एक साल"
"पेड़ रहेंगे जब तक-साँस चलेगी तब तक"
सुंदर अक्षर, चित्रों से सजे मनमोहक बैनर को देखकर, अच्छेलाल और बाकी सब भी प्रभावित हो गए।

विधायक जी के इंतज़ार में कूलर बंद करके रखें गए थे,  आम जनता जनार्दन ने सामने के छतनार पीपल और बरगद के नीचे ही पसीना सुखाना बेहतर समझा। 
छोटी-बड़ी स्टील की टंकियों में बर्फ़ डालकर रखा शरबत भी, विधायक जी के इंतज़ार में गर्म हो चला था।
"ऐ भइया, गर्मी से व्याकुल लोगों को तनिक ठंडा, मीठा शरबत ही पिला दो। जीभ और गला दोनों लाल मिर्ची की तरह सूखकर सिकुड़ रहें हैं।" एक अधेड़ ने आयोजक नवमंडली से आग्रह किया।
"चाचा, अभी एक घंटे भी नहीं हुए, गला सूख गया आपका, यदि आजादी की की लड़ाई लड़ते तो क्या होता?" बीस साल के सुंदर ने बाईं आंँख दबाते हुए बत्तीसी निपोरी।
"जो समोसा की जूठन हॉल के पीछे की दीवार पर फेंक आए हो ना तुम सब, वहीं खाकर लड़ लेते।" अधेड़ की बातों ने सुंदर के श्यामल चेहरे को लोहित कर दिया।

चार अन्य कारों के बीच, फूलों से सजी विधायक जी की चमचमाती कार आ गई। सिर पर ब्रांडेड कैप, आँखों पर धूप का चश्मा, सफेद लिनेन की शर्ट और हल्की नीली हाफ जैकेट पहने विधायक जी, फिल्मी स्टाइल में उतरे।
उनकी जय जयकार, माल्यार्पण और आरती उतारने के बाद उनका भाषण था। कुछ गर्म होते शर्बत में दो बर्फ़ के बड़े बड़े टुकड़े और समा गए। पीते हुए लोगों ने नाक-मुंँह सिकोड़कर, लाल रंग का ठंडा पानी ही पिया। शक्कर तो आजकल ट्रेंड में है भी नहीं।‌

सामने खड़े विधायक जी की जुबान पर साक्षात सरस्वती ने आसन जमा लिया था। उनके पास लक्ष्मी की कृपा का रास्ता, माँ सरस्वती स्वयं तय करतीं थीं। 
पेड़-पौधों, हरियाली, पानी का संरक्षण, जलवायु के बारे में बोलते हुए विधायक जी ने पूरी श्रोता मंडली को हरे-भरे बाग, वन-उपवन की सैर करा दी। खुद अच्छे ने अपने फेफड़ों को प्रसारित करके बड़ी मात्रा में शुद्ध वायु खींचकर, पहले से ज़्यादा तरोताजा महसूस किया।

आनेवाले पर्यावरण दिवस में इस क्षेत्र का रुप बदलने के प्रत्येक नागरिक ने कमर कस ली थी। अपनी भावी पीढी के लिए टनों ऑक्सीजन का इंतज़ाम करने वाले लोगों का उत्साह, आज सूरज को दीपक दिखा रहा था।
कुछ बातों को बार-बार बताकर मानो लोगों को कंठस्थ करवाया जा रहा था। 
हर एक परिवार पाँच पेड़ लगाए।
हरे रंग का कपड़ा पहनें, यह हरियाली का प्रतीक है।
इको फ्रेंडली बैनर, पोस्टर बनाकर लाना है।
अपने पीने के लिए और लगाए पौधों को सींचने के लिए, पानी की बोतल सब खुद लाएं।

नवयुवकों ने पास के हाइवे नर्सरी से फलदार, छायादार पौधे मंगवा लिए थे। विधायक जी ने अपने बंगले तक की सड़क पर पौधे लगाने वालों के लिए चाय नाश्ता स्पांसर कर दिया था।
प्रतिदिन ग्राउंड लेवल की रिपोर्ट मुन्ना के रेस्टोरेंट से मिलने लगी। चाय समोसा के साथ पर्यावरण दिवस की गहमा-गहमी से, बगल में खड़ा बूढ़ा पीपल मंद-मंद मुस्कुरा रहा था। उसने अपनी जड़ों की ओर देखा, मिट्टी बह जाने से नागिन की तरह भूमि की सतह पर खुली रेंग रहीं थी। टपरी की छत का काम करने वाले पीपल की, इन खुली जड़ों को मिट्टी का कवच पहनाने का सोचते सोचते मुन्ना की टपरी रेस्टोरेंट में बदल गई थी। 

पीपल के कंधों पर चढ़ने वाली, उसकी शाखाओं की बांँहों में झुलने वाली, जल चढ़ाकर दीया जलाने वाली पीढ़ियाँ, अब अपने बाल बच्चों के साथ शहरों की ओर कूच कर गई थी‌ परंतु पीपल की उन उभरी खुली जड़ों को मिट्टी से ढांकने का समय किसी को नहीं मिला।
देवी देवताओं की खंडित मूर्तियांँ और फोटो की बढ़ती संख्या ने, उन जड़ों पर और बोझ बढ़ा दिया था। 

"हरा रंग हम कैसे पहन लें बच्चा, हम तो सफ़ेद सूती साड़ी ही पहनते हैं?" अम्माँ का यक्ष प्रश्न था।
"दादी, हम हरे रंग के कुछ पत्ते, आपकी साड़ी पर प्रिंट कर देंगे। हमारे स्कूल में हमें सिखाया है कपड़ों पर चित्रकारी।" दीपू और गोपी को अपनी कलाकारी दिखाने का सुनहरा मौका मिला था।
"अरे!  कहांँ रंग रोगन करेंगीं इस उम्र में अम्माँ, हाथ में पेड़ की हरी डाली पकड़ लेंगीं और क्या?" उमा की यह बात एक बार में ही अम्माँ को जँच गई।

पाँच तारीख आते तक, पूरा गली-मोहल्ला उत्साह से भर उठा। सौ पौधे खरीद लाए थे नवयुवक पार्टी के युवा।
"इतने पुण्य का काम है, हमारे घर से भी पाँच पौधे हम ले आएंगे।" अच्छे ने अपनी कॉलर खड़ी कर ली।
"अच्छे भैया, पौधे लाना ही नहीं है बल्कि उन्हें लगाकर उनकी रोज उनकी जी-हजूरी भी करना है।" मुन्ना ने दाँत निपोरते हुए कहा।
"हमें ज्ञान ना ही दो तो अच्छा है मुन्ना। ये पीपल का अधनंगा पेड़ रोज तुमको गरियाता होगा तनिक आसपास से मिट्टी लाकर ढांक दो  उसको।" अच्छे भैया के तेवर से मुन्ना सहम गया और हँसते पीपल ने झूम-झूमकर प्राणायाम शुरू कर दिया। 
अपने खेत की मेड़ों पर उग आए पीपल और बरगद के नन्हें पौधों को हाथों में थामे, हरा कुर्ता पहने अच्छेलाल को आज सृष्टि की हरीतिमा में अपने योगदान के प्रति गर्व हो रहा था। 
"खेत के किनारे पीपल, बरगद बढ़िया लगवा दिए थे सुंदरवा से कह कर। तुम काहे उखाड़ लाए अच्छन?" अम्माँ  तमतमा गईं।‌
"अरी अम्माँ! खेत पर कितने ही लोग जाते हैं जो इस बड़े पेड़ की छाया में बैठने का सुख लेते।‌ इस गली में लगा देंगे तो कुछ सालों बाद ठंडी हवा, छाँव देगा सबको। चार लोग बैठेंगे नीचे, पंछियों को आसरा मिलेगा।"
 अम्माँ के तेवरों में ढीलापन देखकर अच्छे ने उत्साह से कहा "पेड़ के तने में बाबूजी का नाम भी लिखवा देंगे अम्माँ।" अच्छे के पिचके गालों में चमक के साथ उछाल आ गई।
नए बने हॉल के बाहर, सारे लोग जमा हो गए। सामने लगे छतनार वृक्षों को समझ नहीं आ रहा था कि सब आज उनकी शाखाओं, पत्तियों को तोड़कर अपने पोस्टर और बैनरों में चिपका रहा थे।
"आज कौन सा विशेष दिन है भाई, जो सभी लोग हमारे अंगों को तोड़-मरोड़ कर दुखी कर रहें हैं।" पीपल अपनी नन्हीं शाखाओं के तोड़ लिए जाने पर व्यथित हो गया।
"कहते हैं कि आज नए पेड़ उगाकर, धरती को हरा-भरा बनाएंगे।" बूढ़ा बरगद अपनी जटाओं पर झूलते बच्चों से परेशान हो रहा था।
"ये प्लास्टिक की थैलियों में लाए हैं छोटे छोटे पौधे, अरे वाह! चलो अपना परिवार बढ़ेगा परंतु हमें तोड़ क्यों रहें हैं?" पीपल कराहने लगा।
हाथों में टहनियांँ लिए, बैनर पकड़े, हरे कपड़े पहने लोगों का झुंड फोटो खींचने-खिंचवाने में व्यस्त था। औरतों ने तो पीपल, बरगद के साथ सैकड़ों सैल्फी‌ ले डाली।

"सुनो सुनो, बड़ा बैनर इस जटाधारी बरगद पर‌ लगाकर, सब एक साथ खड़े हो जाते हैं। पर्यावरण दिवस पर इससे सुंदर फोटो इंस्टा पर किसी की ना होगी।" शहर में पढ़ने वाले सोशल मीडिया में एक्टिव मुकुंद ने सलाह दी।
आनन फानन बरगद की भुजाओं पर कीलें ठोंक कर, बैनर लटका दिया गया और की कई कोणों से फोटो लेने लगे।
जुलूस चला, आगे आगे विधायक और दाएं-बाएं ट्रेनी युवा नेता चल रहे थे।

गड्ढे खोदने का काम कुछेक लोगों को सौंपा गया था, पेड़ लगाने वालों की संख्या तो टिड्डी दल की तरह भिनभिना रही थी। फोटोग्राफर परेशान था कि किस पर फोकस करें और किसकी फोटो खींचे।‌ तीन-चार घंटों बाद, सड़क किनारे नए पौधों की फ़ौज अपना सिर उठाने के लिए तैयार थी। सूरज के तेवरों से उन नन्हों की सूरत उतर गई थी।

विधायक जी की कोठी के सामने चाय-नाश्ते का इंतज़ाम था। मुन्ना अपने अस्सिटेंट लिए, मुस्तैदी से इस मोर्चे को संभाल रहा था। 
मुन्ना को ऐसे आपाधापी में खाना पसंद नहीं था और वो भी सपरिवार, इसीलिए अपनी गली में खेतों से लाए आम बरगद और पीपल के पौधे लगा दिए। मुन्ना के हॉटल से सटे पीपल की जड़ों को दो-तीन टोकरी मिट्टी का अर्ध्य देकर, अच्छे का पर्यावरण दिवस पूर्ण हुआ।
तपती धूप से अम्माँ‌ और बाकी सब घरवालों के दिमाग गर्म हो रहे थे। हाथ में टहनी पकड़े सारे कस्बे घूमकर अम्माँ का पेट भूख से कुलबुला रहा था। उमा ने रसोई में जाकर जब बर्तनों की झनझनाहट की, तब कहीं सभी के पेट में कूदते‌ चूहे आश्वस्त हुए।

थाली में गर्म खिचड़ी और आँगन में टहनी, बैनर ‌और पत्तों के बने पोस्टर फैल रहे थे।‌
शाम ढले दिनभर की जायज़ा लेने अच्छेलाल चौपाल की ओर निकले। अपनी गली में दोपहरी को लगाए पौधों को‌ ना देखकर उनके होश‌ उड़ गए।
भैरव की श्यामा, कुछ ही दूरी पर जुगाली कर‌ रही थी और उसके बड़े-बड़े सींगों पर चिपकी पीपल की कोमल पत्ती, अपनी शहीदी की दास्तां कह रही थी।

आज सुबह तक खेत में हँसते मुस्कुराते इन पाँच पौधों की बलि चढ़ाकर, चौपाल की चर्चा में मुँह खोलना अच्छे को नहीं भाया‌।

आँगन में बैठी अम्माँ के‌ चुभते‌ प्रश्नों से टकराने की हिम्मत अच्छे में बिल्कुल नहीं थी, मुन्ना का हॉटल भी गाँववालों‌ की जिह्वा को संतुष्ट करने में लगा‌‌ था‌  अतः अच्छे‌ मुन्ना के‌ पड़ोसी पीपल से बतियाने ‌निकल‌ पड़े।
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शुक्रवार, 2 अगस्त 2024

2122 2122 2122 पर दो ग़ज़लें

फ़िलबदीह क्रमांक 23
तरही मिसरा- मत कहो आकाश में कोहरा घना है।

2122  2122  2122

मानवों में लुप्त होती भावना है 
बस यही धरती की गहरी ‌वेदना है।।1।।

भावनाएं बर्फ़ सी कुछ जम गईं अब
आदमी ही आदमी से अनमना है।।2।।

पेड़ टूटे बाग सूखे मौन कलरव
नेह से अपने इन्हें फिर सींचना है।।3।।


है विषमताओं की बढ़ती दूरियां जो
खुद प्रयासों से उन्हें अब जोड़ना है।।4।।

है समय अब जाग जाए सुप्त मानव
हे प्रभो कर जोड़ तुमसे प्रार्थना है।।5।।


पीठ पर बस्ते दिमागों में भविष्यत 
आज बच्चा भूलता बस बचपना है।।6।।

काल बीते सृष्टि की अपनी कलाएं
मौसमों में हर लगे नवयौवना है।।7।।

तरही मिसरा-

नित्य करता सामना सूरज  उन्हीं से 
मत कहो आकाश में कोहरा घना है।

******"****

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏-

फ़िलबदीह  23
दूसरा चरण 

2122  2122  2122


अपनी धरती से ज़रा सा प्यार कर लें 
स्वर्ग धरती पर चलो साकार कर लें।।1।।

फाड़कर छप्पर जो ईश्वर ने दिया सब
बैठ उसके सामने आभार कर लें।।2।।

पीठ पीछे तुम भुनाते रिश्तों को क्यूँ
खोल कर बाज़ार कुछ व्यापार कर लें ।।3।।

चंद कमियांँ हैं हरिक मानव के भीतर 
चल हृदय में झाँक कर स्वीकार कर लें।।4।

काम करते बीतता जीवन ये सारा
साल में दो-चार तो इतवार कर लें।।5।।

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शर्मिला चौहान

बुधवार, 31 जुलाई 2024

"स्वयं मुक्त है" कविता

"स्वयं मुक्त है"

प्रकृति धरा बादल फूल सब प्रेम युक्त हैं,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।

पर्वत श्रृंखलाओं से कल कल नदियों का बहना,
नाज़ुक अठखेलियों संग सागर की बाँह सिमटना।

ऋतुओं का सुंदर आना-जाना,
पत्तों का गिरना, मुरझाना।
नवपर्णों से वृक्षों का दमकना,
फूल देख भ्रमरों का बहकना।

आल्हादित धरती सारी प्रेम लिप्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।१।।

पंछी, तितली, मछली, कीड़े,
नियमों से बंधे सारे।

नित कर्मयोग में लगे रहें,
सूरज धरती चंदा तारे।

वायु का मंद प्रवाह सुगम, दे प्राण श्वास भरें चेतन।

धरती अंबर की प्रेमकथा,
बन गई बूंँद जल जीवन।

कर्म की इस नियति से सारी प्रकृति युक्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।२।।


बूँदों का सीपियों पर गिरना,
फिर गर्भ में मोती का पलना।

प्यार भरी इन बूँदों से, सृष्टि में जीवन का चलना।

हरि तृणों की नोकों पर,
जब ओस चमक इठलाती है।
मेघों को आँचल से ढंकने,
कभी बदली दौड़ी आती है।

हृदय में भावों का  नवगीत सुप्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।३।।

उसांस भरे वसुधा जिस क्षण,
गर्मी की तपन झुलसाती तन।

सूरज जब आँख दिखाता है,
गुलमोहर तब मुस्काता है।

महुआ तेंदु टेसू महके,
बन बाग रहें बहके बहके।

ऋतुओं का रुप सलोना है,
महके जग का हर कोना है।

जड़ चेतन कालचक्र सब अटल नित्य है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।४।।

समरसता की सीख धरा जब देती है,
मानव को भी वो अपना कह देती है।

प्रकृति के संकल्प में लीन हो जाना है,
चर अचर का हाथ थाम बढ़ जाना है।

तू प्रकृति का अंग भूल क्यों जाता है,
अहं लपेटे अपना तू इठलाता है।

प्रस्तर में जो दबा भाव अब बहने दे,
दूसरों के साथ ही जीवन चलने दे।

आसपास की सोच जब कदम बढ़ाता है,
मानव, तब सच्चा मानव कहलाता है।।५।।


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शर्मिला चौहान

शनिवार, 27 जुलाई 2024

212 1222 212 1222 पर ग़ज़लें

आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏( संशोधित रुप)


फ़िलबदीह क्रमांक 22
दूसरा चरण 
क़ाफ़िया -ई की मात्रा 


212 1222  212 1222

सींच दे दिलों को जो, वो नमी कहीं गुम है
गूँज जाये घर जिससे, वो हँसी कहीं गुम है।।1।।

चार दाने चुगकर जो, मीठे गीत गाती थी
दौर में नये देखो, वो चिड़ी कहीं गुम है।।2।।

लिखते थे कभी जिसमें, सब हिसाब खुशियों के
आज के ज़माने में, वो बही कहीं गुम है।।3।।

थामकर जिसे शिक्षक पाठ को पढ़ाते थे, 
आज उनके हाथों की, वो छड़ी कहीं गुम है।।4।।

तेज़ चाल से अपनी, जो मुझे डराती थी
सुस्त सी पड़ी रहकर, वो घड़ी कहीं गुम है।।5।।

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 23 जुलाई 2024

212 1222 212 1222 पर ग़ज़ल

(आदरणीय अनिल सर द्वारा संशोधित 🙏)

फ़िलबदीह 22 
प्रथम प्रयास 
ई -क़ाफिया 
रदीफ़ -नहीं होती

212 1222  212 1222

दिल्लगी की कुछ बातें, आशिक़ी नहीं होती
चार शेर कह लेना, शायरी नहीं होती।।1।।

पोर पोर महका दे, बावरा जो कर दे मन
बहती हर हवा अक्सर, फागुनी नहीं होती।।2।।

मत्त हो महक जिसकी, खुद में गुम जो कर देती 
हर हरिण में कस्तूरी, वो छुपी नहीं होती।।3।।

चुप्पी की ज़ुबां बेहतर, वार उसके पैने से
ख़ामशी हरिक की तो, बेबसी नहीं होती।।4।।

रंग केसरी गाता, दर्द गान उस माँ का
बेटे की कभी जिसके, वापसी नहीं होती।।5।।


गिरह का शेर-

 फूल कागज़ी खुश्बू को तरसते जीवन‌ भर
बाँस की हरिक टहनी बांसुरी नहीं होती।

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शर्मिला चौहान

शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

लघुकथाएं, मेरी दृष्टि से (अहमदनगर)

"लघुकथाएं: मेरी दृष्टि से"


कहानियों से जब लघुकथा के संसार में पदार्पण किया तो कुछ बंधन, वर्जनाएं सीखने का अवसर मिला।‌ सूक्ष्म निरीक्षण, शब्दों का पैनापन, समाज के प्रति अपना दृष्टिकोण और सही सोच के साथ लघुकथाएं लिखी जातीं हैं।‌ 
नाम के अनुसार,आकार में लघु परंतु अपनी बात पूर्णतया कहने में सक्षम होतीं हैं लघुकथाएं। लघुकथाकार संवेदनाओं की भूमि पर विसंगतियों के बीज बोकर, शब्दों-भावों का सिंचन करके, लघुकथा का पौधा तैयार करता है। इस प्रक्रिया में, तैयार होती लघुकथा आने वाली समस्याओं से जूझकर, अपना अस्तित्व बनाए रखना भी सिखाती है।

परिवार, समाज, देश और अब तो विश्व स्तर के विभिन्न विषयों पर, लघुकथाकार अपनी कलम चला रहें हैं। पाठकों के द्वारा पढ़ी‌ जाने वाली प्रमुख विधाओं में, लघुकथा ने अपना स्थान बनाया है।
वर्तमान की विषमताओं, परिस्थितियों पर नज़र बनाए रखने वाली, सशक्त विधा है लघुकथा।‌
आसपास की भौगोलिक स्थिति, सामाजिक व्यवस्था, औद्योगिक विकास संबंधी लघुकथाएं, जहाँ समस्याओं को जनमानस तक लातीं हैं, वहीं उनके समाधान का कुछ प्रयास भी करतीं हैं।  

लघुकथाकार की सूक्ष्म दृष्टि, उसकी सहृदयता उसे एक सशक्त लघुकथा लिखने को प्रेरित करती है। लघुकथाओं के पात्र इसी समाज से चुने और फिर बुने जाते हैं।‌ विषयों को चुनना बेहद महत्वपूर्ण चुनौती भरा काम है क्योंकि इसी पर लघुकथा का दारोमदार निर्भर करता है।

नदी के सूखकर, प्रवाह का मंद होना, एक पर्यावरण जनित समस्या है जिसके साथ समाज के बँटवारे को जोड़ने के प्रयास में लिखी मेरी एक लघुकथा "बैलेंसिंग" की कुछ पंक्तियां, जो भाषा के प्रवाह से लघुकथा को अंत तक ले जाती है।
"किनारों की ऊँचाई तक लहरों के अंगड़ाइयों के निशान बना करते थे, रामदीन ने महसूस किया की अब नदी की साँसें फूल जातीं हैं। उसकी तलहटी के रंग-बिरंगे, हीरे-जवाहरात से चमकते पत्थर, अब मटमैले धूसर हो गए हैं। वह भी कृशकाय हो गई है बिल्कुल रामदीन की तरह।"

मेरी लघुकथाएं मुख्यतः स्त्री विमर्श, उनके प्रतिरोध, बाल विसंगतियों, पर्यावरण एवं संवेदनाओं से भरपूर समाज से जुड़ी, आशावादी दृष्टिकोण लिए, विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु अग्रसर रहतीं हैं।

 लघुकथा "शक्ति" जिसे पाठकों द्वारा, निर्णायकों द्वारा बहुत सराहा गया, वह झोपड़पट्टी में रहने वाली छोटी बच्ची पर लिखी है। माता-पिता रोजी-मजदूरी के लिए जाते हैं और बच्चे थोड़ा बहुत पढ़कर, उसी काम में लग जाते हैं। एक मूर्तिकार का, छोटी बच्ची को पुस्तक-स्लेट देकर, देवी की मूर्ति के श्रृंगार को पूर्ण करना, बालिकाओं की शिक्षा पर बल देता है।

इसी प्रकार "चिंगारी" "गौरैया-बाज" "न्याय" "स्वयं सिद्धा" जैसी लघुकथाएं, स्त्रियों को अपने ऊपर होने वाले अत्याचार के प्रति आवाज़ उठाने पर आधारित हैं। प्रतिरोध, रोष दिखाएं बिना ग़लत करने वालों को मुँहतोड़ जवाब संभव नहीं है।

"भूख"  "धर्म" "बदलता ज़ायका" "विनिमय" "बहती संवेदना" जैसी लघुकथाएं, समाज का आधार प्रेम, अपनापन और दया जैसी संवेदनाओं को बनातीं हैं।

"कठपुतली" "गिरगिट" "काले उजाले" "नई फ्रॉक" लघुकथाएं, बाल विसंगतियों को सामने लातीं हैं जो आज के समाज पर प्रश्न चिन्ह हैं।

नए विषय, नए विचारों से भरपूर "अटैक" "हकीकत"  "किराएदार" "संरक्षक" "कंपनी" जैसी लघुकथाएं, वर्तमान एवं भविष्य में आने वाली बड़ी समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करतीं हैं।
"कंपनी" में घर के वृद्ध को अचंभा होता है कि तीसरी पीढ़ी के बेटे बहू अपने शुक्राणु और अंडाणु अपनी कंपनी के बैंक में सुरक्षित रख दिए हैं ताकि भविष्य में जब समय मिले, अपना परिवार बढ़ाएंगे।

लघुकथाओं का अनंत विस्तार है जिनमें विचरण करते हुए, लघुकथाकार स्वयं को उसी का एक किरदार अनुभूत करने लगता है। यही अनुभूति ही लघुकथा का मूल आधार है।
अहमदनगर (महाराष्ट्र) लघुकथा शोध केंद्र से जुड़ना, मेरा सौभाग्य है। आदरणीया ऋचा शर्मा जी के‌ नेतृत्व में लघुकथाओं के विस्तार, विकास पर मार्गदर्शन मिलता है। मासिक संगोष्ठी, लघुकथाओं के वाचन और उनपर वरिष्ठ लघुकथाकारों के सुझाव जैसे नियमित आयोजनों से, बहुत कुछ सीखने मिलता है। आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र वार्षिक लघुकथा प्रतियोगिता के आयोजन संयोजन से, लघुकथाकारों की गुणवत्ता को परखने का स्वस्थ अवसर मिला है।

अखिल भारतीय लघुकथा प्रतियोगिता 2020 में मेरी लघुकथा "सौंधी महक" का प्रथम स्थान प्राप्त करना, मेरा रूझान लघुकथाओं की ओर बढ़ाने का गौरवपूर्ण कारण था। 
विभिन्न साहित्यिक मंचों, संस्थानों द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिताओं में, मेरी लघुकथाएं पुरस्कृत होतीं रहीं एवं पाठकों द्वारा सराही गईं।

साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं, संकलनों में प्रकाशन के अलावा क्षितिज लघुकथा प्रतियोगिता, सिरसा हरियाणा लघुकथा प्रतियोगिता, आचार्य जगदीश चंद्र मिश्र लघुकथा प्रतियोगिता, कृष्णा देवी सारस्वत लघुकथा प्रतियोगिताओं में पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त मेरी लघुकथाएं, मेरी संवेदनाओं की कलम  से निकलीं हैं। लघुकथाएं के इस सुंदर संसार को अपनों लेखनी से सुंदरतम बनाने का निरंतर प्रयास करतीं रहूंगी।


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नाम - शर्मिला चौहान 
शिक्षा - एम.एच.एससी., बी.एड.
प्रकाशित कहानी संग्रह - मुट्ठी भर क्षितिज 

लघुकथा संग्रह के प्रकाशन की प्रक्रिया में अग्रसर।

निवास - ठाणे (महाराष्ट्र)

9967674585
ई-मेल- sharmilachouhan.27@gmail.com 

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मंगलवार, 16 जुलाई 2024

एक नई सुबह _कहानी

"एक नई सुबह"


सुमन का आखिरी पीरियड चार बजे खत्म होता है पर आज वह पाँच बजे तक कॉलेज में ही थी। स्टाफ रूम में रखी उसकी आलमारी को, आज उसने व्यवस्थित किया था। कल ही द्वितीय वर्ष की एक छात्रा की फाइल नहीं मिल रही थी, तो आज इस शुभ कार्य करने का अवसर मिला था। सारी फाइलें, रजिस्टर, पुस्तकें सुमन ने आलमारी में करीने से लगाया फिर उसे लॉक करके महाविद्यालय के ही अपने क्वार्टर की ओर चल पड़ी।
सुमन पैंतीस वर्षीया प्रौढ़ महिला, ज़िम्मेदार वार्डन एवं बुद्धिमान प्राध्यापिका है। इसके साथ ही वह अच्छी लेखिका और कमाल की वक्ता भी है। साहित्य प्रिय विषय होने के कारण उसने हिंदी साहित्य में एम.ए. किया फिर पी.एच.डी.।‌ आज जब वह कक्षा में हिंदी साहित्य पढ़ाती है तो छात्राएं मंत्रमुग्ध हो कर सुनतीं हैं मानो सारा आत्मसात कर‌ लेंगी।‌
सुमन चौधरी मैडम, छात्राओं के बीच ऐसा नाम जो उन्हें कड़क शासन में रखता है और साथ ही स्नेह भी देता है।

प्रिंसिपल ने हॉस्टल वार्डन के लिए सुमन का नाम स्वयं लिया था क्योंकि लड़कियों के हॉस्टल की इस ज़िम्मेदारी के लिए, सुमन उन्हें अनुकूल लगती थी। 

सुमन भी इस ज़िम्मेदारी में सुकून पाती थी, उसका कॉलेज, हॉस्टल और ये लड़कियांँ, यही तो उसका परिवार, उसकी ज़िंदगी थी। हिंदी के काव्यांश, व्याकरण और साहित्य को इतने प्रेम से, उदाहरणों द्वारा पढ़ाने वाली चौधरी मैडम, छात्राओं की पसंदीदा शिक्षिका थी। हॉस्टल से लगे क्वार्टर में रहने के कारण, लड़कियों के लिए मैडम के घर के द्वार हमेशा खुले रहते थे। लड़कियों के जीवन की बहुत सी बातें मैडम सुनतीं, समाधान का सुंदर रास्ता भी निकालने की कोशिश करतीं।

जब जब लड़कियांँ अपनी इस खूबसूरत, होशियार टीचर को देखतीं, तब तब आपस में बतियातीं कि आखिरकार मैडम अकेली क्यूँ हैं? अन्य शिक्षिकाओं की तरह इनकी शादी, परिवार क्यों नहीं है? कभी कभी हवाओं के बदलते तेवर से, सुमन को उनके इस कौतूहल का अंदाजा होता भी था जिसे वो उन्हीं हवाओं के साथ दूर उड़ा दिया करती थी।

धीरे-धीरे चलती हुई सुमन अपने क्वार्टर के सामने पहुँच गई।  रोज की तरह हॉस्टल की ओर नज़र दौड़ाकर, लड़कियों की आवाजाही का जायज़ा लिया और यंत्रवत गेट का दरवाजा खोलकर बगीचे से निकलकर कब बरामदे तक आ गई, उसे पता ही नहीं चला। बरामदे में रखी  मेज पर पर्स और हाथ की पुस्तकें रखकर वह पास ही पड़ी आराम कुर्सी पर पसर गई। पैर की चप्पल तक उतारने की ताकत नहीं बची थी सुमन में।‌ दिनभर की थकावट से चूर, पलकें बंद किए अधलेटी सी पड़ी रही।‌ ईश्वरी को आवाज़ देकर, चाय बनाने के लिए भी कहने की इच्छा ‌नहीं हुई उसकी। 

सामने लगे पेड़ों पर चंद ही पत्तियांँ लटकीं थीं। आज से चार महीने पहले हरे भरे थे यही पेड़, फरवरी-मार्च से इनकी पत्तियांँ साथ छोड़ने लगतीं हैं और पतझड़ का आगमन हो जाता है। कॉलेज में भी प्रेक्टिकल परीक्षाएं, अतिरिक्त कक्षाओं के चलते एक प्रकार की शांति सी रहती है। परिक्षाओं की तैयारी में लगी छात्राओं के बीच हो-हल्ला, मौज-मस्ती कम होने लगती है और यहाँ की प्रकृति बेजान, मूक,मौन‌ लगने लगती है।

अब थोड़ी विश्रांति के बाद सुमन ने ईश्वरी को आवाज़ देने के लिए आँखें खोली तो सामने ईश्वरी खड़ी थी।

"बहन जी, ई तार आवा रहा, हम तुम का बुलाए खातिर आवत रहे, मुला तुम बिगड़ जाती तो एहि कारन  हम ‌आए नहीं।" कहती हुई टेलीग्राम सुमन के हाथों में पकड़ा दिया।
उसे चाय बनाने को कहकर सुमन टेलीग्राम खोलने लगी। 

"ईश्वरी भी अजीब है जब तब छोटी सी बात पर बुलाने आ जाती है कॉलेज, अब टेलीग्राम आने पर भी नहीं आई।" मन ही मन बड़बड़ाते हुए टेलीग्राम खोल लिया।

टेलीग्राम दिल्ली से था। कौन होगा, दिल्ली में तो कोई जान-पहचान का नहीं है सोचते हुए टेलीग्राम के शब्दों को पढ़ने लगी।
"सुमी, तुम फौरन दिल्ली चली आओ। मुझे तुम्हारी बहुत ज़रूरत है।
तुम्हारा तो नहीं कह सकता, सिर्फ़ शेखर।"

एक क्षण के लिए सुमन को लगा कि पैरों के नीचे से जमीन सरक गई है। समय रूक गया और साथ ही सामने पेड़ों से गिरती पत्तियांँ भी मानो जहाँ की वहाँ थम गईं।
आज दस साल बाद क्यों याद किया शेखर ने, सुमी कहने वाला कौन है वह? आज वह अपने कॉलेज में सुमन चौधरी है, सुमी का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

हवा से मेज़ पर रखी पुस्तक के पन्ने फड़फड़ाए और उनको देखती हुई सुमन अपने अतीत में गुम हो गई।

ग्यारह-बारह साल पहले की बात सुमन को कल की बात लग रही थी। सुमन मध्यम आय वाले परिवार की, सुंदर, बुद्धिमान और मेहनती लड़की थी।‌ अपने पैरों पर खड़ी होकर, अपने परिवार को आर्थिक संबल प्रदान करने की अभिलाषा मन में लिए उसने हिन्दी साहित्य में एम.ए. कर लिया। साथ ही साथ पी.एच.डी. की तैयारियां भी शुरू कर दी थी। शेखर उससे सीनियर था और वह भी साहित्य पर शोध कर रहा था। एक ही निकाय के होने के कारण वे एक-दूसरे से कुछ परिचित थे। किसी भी प्रकार की कठिनाई आने पर, सुमन बेहिचक शेखर से पूछ लेती थी। 
जिस प्राध्यापक के निर्देशन में शेखर शोधपत्र तैयार कर रहा था, उसी प्राध्यापक के पास सुमन भी अपनी थीसिस के लिए गई थी। एक ही निर्देशक के पास रहने के कारण, दोनों शोधकर्ताओं में अच्छी जान-पहचान हो गई। एक समान रुचि, योग्यता और समान आर्थिक स्थिति के होने से दोनों करीब आने लगे।

शेखर के परिवार में उसके अलावा, एक और भाई‌ और बहन थे। पिता लेखापाल थे और सेवानिवृत्ति के करीब भी थे। शेखर के पिता की इच्छा थी कि उनकी सेवानिवृत्ति के बाद शेखर उनकी जगह के लिए प्रार्थना करे।

सुमन ने भी शेखर को अपने परिवार का परिचय दिया ‌था। सुमन के घर में उसकी माँ के अलावा एक छोटा भाई था। पिताजी की मृत्यु के बाद माँ को नौकरी मिली थी और उन्होंने घर-परिवार, बच्चों को अकेले संभाल कर बड़ा किया था। सुमन का भाई रवि उससे पाँच साल छोटा , माँ और सुमन, दोनों का ही लाड़ला था।‌ सुमन को जल्दी से पी.एच.डी.करके, उपाधि लेकर कॉलेज में प्राध्यापिका बनना था। माँ को आराम देना और छोटे भाई को उच्च शिक्षा दिलवाना, सुमन के जीवन का उद्देश्य था।

शेखर और उसने जात-पात की दीवारों को तोड़ने का साहस कर लिया था क्योंकि शेखर का मानना था कि एक अभिरुचि के साथ नौकरी करके वे दोनों परिवारों को सुखी कर सकेंगे।
शेखर की पी.एच.डी. हो गई और उसी कॉलेज में तदर्थ व्याख्याता के रूप में उसके काम की शुरुआत हुई। अब एक ही कॉलेज में रहकर भी वे कम मिलते थे। एक प्राध्यापक की ज़िम्मेदारी और फिर हमेशा किसी छात्रा से मिलना, दोनों को उचित नहीं लगता था। एक-दूसरे को जीवनसाथी बनाने का संकल्प तो दिल से पक्का कर ही लिया था दोनों ने।

सुमन ने अपनी माँ को शेखर के बारे में सब बता दिया था। एक अच्छे परिवार का, सुंदर, सुशील, योग्य लड़का दामाद बने, इससे अच्छा और क्या होता। दोनों एक ही शहर में रहेंगे, दोनों परिवारों के बीच रहेंगे तो सबके लिए अच्छा ही होगा। माँ की सम्मति मिल‌ जाने से, सुमन ने शेखर को घर भी बुलाया। शेखर‌ ने माँ‌ और रवि का दिल जीत लिया था।‌ एक अच्छे रिश्ते के लिए सब खुश थे।

"बहन जी, चाय साथ बिस्किट रख रहें हैं, खा लो।‌ रात को का बनाए खाना, सब्जी भिंडी की बना लें, सुबह की दाल धरी है उसे छौंक लगा देंगे।" ईश्वरी की आवाज़ कुछ सुनाई आई, कुछ समझ।‌ 
"ठीक है, बना लो।" अनमनी सी सुमन‌ ने मानो उसे टाल दिया।
"सब ठीक है ना बहन जी, तार आवा तब से कुछ चुप हो आप।"  ईश्वरी पढ़ी लिखी कम थी परंतु अनुभवी बहुत थी।

सुमन ने उसकी ओर देखकर, "ठीक है सब।"  कहकर फिर अपने आप में डूब गई।

स्वप्नों का घरौंदा भरभरा कर गिर गया, सारी ख्वाहिशें कल्पनाओं के पंँख लगा कर दूर निकल गईं। 
एक दिन कॉलेज में शेखर ने उसे बुलाकर बताया कि, "सुमी, मेरे घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी है।‌ बड़ा धनी परिवार है, सोने-चाँदी के शोरूम हैं उनके।" एक क्षण भी नहीं झिझका था शेखर। 

"तुमने अपने घर में, हम दोनों के बारे में आज तक कुछ नहीं बताया था शायद। हमेशा कहते रहे कि बताने ही वाला हूँ।" सपाट स्वर था सुमन का।

"लड़की के पिता, कई  शिक्षा संस्थानों के मैनेजमेंट से संबंध रखते हैं। मेरे भाई-बहन को भी उच्च शिक्षा के लिए मदद करने वाले हैं..।" वह अपनी गौरव-गाथा का पाठ कर रहा था और सुमन शून्य होकर अपने रास्ते निकल गई थी।

घर आकर माँ से लिपट कर कितनी देर रोती रही थी वह, अंदर की टूटन उसके जीवन पर निर्लिप्तता बन कर छा गई थी। दो स्त्रियों के बीच, संवेदनाओं की  उफनती नदी थी, कौन‌ किसको कैसे संभाल रहा था, किसी को पता नहीं।

उसके बाद सुमन, शेखर से कभी नहीं मिली। कॉलेज में ही सब पता चलता रहा कि अगले ही महीने उसकी शादी है और दो महीने बाद वह अपनी पत्नी के साथ विदेश जा रहा है।

"किस्मत वाला है शेखर, ससुर पैसैवाला, रूतबे वाला मिला भाई।‌ ज़िंदगी सैट हो गई लड़के की।"  प्राध्यापक दीक्षित जी ने कहा था।
"सुना है कि विदेश में हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए, विश्वविद्यालय से उसे विदेश भेजा जा रहा है। अब रईस बाप की इकलौती बेटी का पति है हमारा शेखर, वो नहीं जाएगा तो क्या हम तुम जाएंगे।" उनकी हँसी सुमन के कानों में गर्म सीसे सी उतरती। अपनी पी.एच.डी. के लिए वह इस जगह पर आती थी, वरना अब उसे ज़िंदगी की हर बात व्यर्थ लगती। 
अगले तीन माह उसने अपने दिन रात, अपने शोध-पत्र में झोंक दिए और साथ ही साथ कई महाविद्यालयों में आवेदन भी कर दिया था। कुछ जगहों के साक्षात्कार हो गए थे और वह अपने उपाधि की प्रतीक्षा कर रही थी।

विश्वविद्यालय से उपाधि मिली और एक कार्यक्रम में सुमन को महाविद्यालय ने  उपाधि प्रदान किया। उस दिन अपने मार्गदर्शक प्राध्यापक के सामने सुमन रो पड़ी थी। अब वह डॉ सुमन हो गई थी।
एक दूसरे शहर में उसकी नियुक्ति का आदेश आया और वह जाने की तैयारियांँ करने लगी। माँ की घबराहट, छोटे भाई का चुप रहना सुमन के पैर की जंजीर नहीं बन सका। उसे पता था कि परिवार को उससे ज़्यादा अभी उसकी नौकरी की जरूरत है।‌

पहली बार माँ साथ आई थी, सुमन के कॉलेज और आसपास के वातावरण से खुश होकर वापस गई।
छुट्टियों में सुमन घर आ जाती और कभी-कभी बीच में माँ और रवि उसके पास आ जाते। धीरे-धीरे यह शहर, यहाँ के लोग, कॉलेज के सहकर्मियों में सुमन का मन लग गया। घर पर सुमन नियमित पैसे भेजती थी, अपनी जिम्मेदारी का उसे हमेशा भान रहता था।

तीन साल बाद रवि की नौकरी लग गई और माँ  ने ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ले‌ ली।‌
माँ के हर पत्र से, दबे शब्दों में सुमन को शादी कर‌ लेने की सलाह का अनुभव होता था। सुमन, उसका तो प्रेम, विवाह, अपनापन सब से जैसे विश्वास ही उठ गया था। आखिर कार रवि के पसंद की लड़की मेघा से उसकी शादी करवा कर, माँ को एक भरा परिवार देकर सुमन ऋणमुक्त हो गई। बेटी के एकाकीपन को देखते हुए, एक माँ अपने जीवन संघर्ष से हार गई थी। माँ ने दुनिया छोड़ दी और सुमन का परिवार में आना-जाना कम होने लगा। दीपावली के समय जब कॉलेज बंद रहता और लड़कियांँ अपने अपने घर जातीं तब सुमन भी रवि और मेघा के पास चली जाती। दोनों के खुशनुमा जीवन में कुछ दिन बिताकर,  दीपावली मनाकर फिर अपने कॉलेज लौट आती। राखी के समय रवि और मेघा , उसके पास आ जाते।‌ एक बच्चा होने के बाद अब रवि और मेघा ज्यादा व्यस्त रहने लगे थे। सुमन के हॉस्टल के फोन नंबर पर कभी कभी बात हो जाया करती‌ थी, सुमन‌ को उन दोनों से कोई शिकायत नहीं थी।

"हाय दैया, बहन जी। आप चाय नहीं पीं, राम जाने आज का भया है कि चाय सामने रही और आप बैठी रहीं, हाथ भी ना लगाया।" ईश्वरी की आवाज़ से सुमन हड़बड़ा गई।
"आज मन ही नहीं हुआ, थोड़ी गर्मी शुरू हो गई है ना शायद इसीलिए।" अपनी मनोदशा को छुपाती, तेज वक्ता सुमन थोड़ी घबरा सी गई।
"शरबत ला दें नींबू का।" ईश्वरी ने पूछा।
"नहीं रहने ही दो। सब्जी रोटी बन गई है तो तुम घर जाओ।" कहती हुई सुमन अपने कमरे में जाकर कपड़े बदलने लगी।

"बहन जी, हॉस्टल का चौकीदार घनश्याम आवा है, कहत है कि फोन आवा है।" कमरे के दरवाजे पर खड़ी ईश्वरी को सुमन ने उत्तर दिया, "ठीक है, अभी आती हूँ कहो।"
जल्दी जल्दी सलवार कमीज़ पर दुपट्टा डाल, पैरों में घर की ही चप्पल पहनकर, सुमन‌ हॉस्टल की ओर तेजी से चल पड़ी।
रवि का फोन करता है तो  रात नौ बजे आराम से करता है जिससे दुनिया भर की बात कर सके। क्या मालूम बच्चे की तबियत कैसी है? मन में कई प्रश्न आ-जा रहे थे और वह फोन के पास रखी कुर्सी पर बैठ कर, फोन के पुनः आने का इंतज़ार करने लगी।

फोन घनघनाया और सुमन ने लपक कर उठा लिया।
"हैलो।" सुमन‌ ने कहा।

दूसरी ओर से आने वाली आवाज़ सुनकर चौंक पड़ी सुमन। दस- सालों बाद सुनी थी यह आवाज़ उसने। दबी, बुझी, थकी सी आवाज़ से शेखर था फोन के उस ओर।
"सुमी, मैं शेखर बोल रहा हूँ। तुम्हें टेलीग्राम किया और फिर बड़ी मुश्किल से यह फोन नंबर मिला है मुझे। प्लीज़ फोन कट मत करना।" स्वर में गिड़गिड़ाहट थी। 

"मैं तुम्हारा अपराधी हूँ सुमी। इस अपराध की सजा भुगत रहा हूँ। तुम्हें धोखा देकर, मेरा भी कुछ अच्छा नहीं हुआ। विदेश से आने के बाद मेरी पत्नी, जो कि माँ बनने वाली थी, एक कार दुर्घटना में चल बसी।" सुमन ने महसूस किया, वो बोलते हुए हांफ रहा था।‌ 
"मैं अपनी ज़िंदगी को ढो रहा हूँ। सभी मुझे ज़िम्मेदार समझते हैं। पिछले पांँच-छह महीनों से बहुत बीमार हूँ, नहीं तो खुद आकर माफी माँगता तुमसे। एकदम अकेला रह गया हूँ। अपना पता बता रहा हूँ प्लीज़ नोट कर‌ लो। एक बार, सिर्फ़ एक बार आ जाओ मुझसे मिलने ताकि चैन से मर सकूंँ।"

सुमीत के हाथ, अनजाने ही टेलीफोन के पास रखें पेपर पर शेखर का पता लिखने लगे। उस कागज को साड़ी के आँचल से छुपाती हुई सुमन अपने क्वार्टर में आ गई।

रात भर अतीत के सागर में गोते लगाती रही वह। दूर दूर तक किनारा नज़र नहीं आता था। इतने सालों से थपेड़ों से जूझती उसकी कश्ती, आज अचानक झंझावात में फंस गई थी। विचारों के ताने-बानों में उलझी, उसकी सोचने की शक्ति मद्धम पड़ती जा रही थी। 
थके शरीर और मन को कब नींद ने अपने आगोश में भर लिया, पता नहीं चला।

सुबह उठी तो एक नई सुबह उसके सामने थी।‌विचारों की बदली को चीरकर निर्णय का सूर्य चमक रहा था। संकल्प ने दुविधाओं को समाप्त कर‌ दिया था।‌

आलमारी से अपने पसंद की, हल्की पीली, सूती की साड़ी निकाली और तैयार होने लगी। कॉलेज के पास पहुँचकर, शेखर के घर का पता लिखा वह कागज़ पर्स से निकाला और उसे फाड़कर डस्टबिन में फेंक दिया।

अब वह अपनी ज़िंदगी की ओर कदम बढ़ा रही थी, जहाँ कई लड़कियों का भविष्य उसकी राह निहार रहा था।


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शनिवार, 13 जुलाई 2024

औरतों पर ग़ज़ल

औरतों पर आज एक ग़ज़ल कही है।🙏


द्रौपदी को खुद अपनी  लाज अब बचानी है
कृष्ण जी के आने की बात तो पुरानी है।।1।।


मूक बैठ कर देखें चीर के हरण को जो
अब दिखे न वो मंज़र याद फिर दिलानी है।।2।।

औरतें रहीं दुश्मन औरतों की सदियों से
लोक लाज के बंधन दर्द की कहानी है।।3।।


धुंध थी दिशाओं में भेद की प्रथाओं में
गाँठ जो पड़ी अंतस अब वही छुड़ानी है।।4।।


सोच तंग दुनिया की वंशबेल बेटों से
कम नहीं ये बेटियांँ भी बात यह बतानी है।।5।।


बाग की सभी कलियांँ हृष्ट पुष्ट हों उन्नत
ज्ञान पुष्प विकसित हों वो फसल उगानी है।।6।।


मुश्किलों को झेलती  विघ्न हर को ठेलती 
छू रही गगन सारा जीत की निशानी है।।7।।


शर्मिला चौहान
ठाणे (महाराष्ट्र)

शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

22 22 22 2 पर ग़ज़ल


फ़िलबदीह क्रमांक -21
प्रथम चरण 
मिसरा-ए-तरह
थान अंगूठी से निकले
इतनी कात मुहब्बत को(हस्तीमल जी हस्ती)
वज़्न
 22 22 22 2

अपने दिल की सुनते जो कभी न फिर पछताते वो।1।

मीठे फल की आस बसी
अच्छे बीज अभी से बो।2।

चाँद रहे घटता बढ़ता 
कपड़ा फिट भी कैसे हो।3।

दाग़ दिखाता औरों के
पहले खुद का चेहरा धो।4।

 प्रभु की दुनिया है सुंदर 
सुंदरतम ही रहने दो ।5।

तरही मिसरा-

रेशम सा दिल खिल जाए 
इतनी कात मुहब्बत को।

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शर्मिला चौहान

मंगलवार, 11 जून 2024

122 122 122 122 पर 2 ग़ज़लें

आप सभी के समीक्षार्थ बहुत दिनों बाद मेरा प्रयास 🙏(संशोधित रूप)

फिलबदीह क्रमांक -19
प्रथम प्रयास 
शाकिर/शाइरा- निज़ाम फतेहपुरी 


122 122 122 122

ज़रा देखकर ही कदम तुम बढ़ाना 
कि मुश्किल है काँटों से दामन बचाना।1।

गमों की जो चादर हुई खूब भारी
झटकना उसे और हल्की बनाना।2।

गज़ब का दिखावा अजब है ये दुनिया 
बिना स्वार्थ के ना हो मिलना मिलाना।3।

मुखौटा चढ़ाये जिये जा रहे हो
कभी तो ज़रा खुद को खुद से मिलाना।4।

चुभे बात नश्तर सी जो दिल को हरदम
बहुत जल्द उसको है दिल से हटाना।5।

गिरह:

नज़र चार लोगों में आने के डर से
जुदा हो गए वो बनाकर बहाना।

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शर्मिला चौहान

आदरणीय अनिल सर एवं सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏 (आदरणीय अनिल सर एवं मित्रों के सुझाव से संशोधित)

फ़िलबदीह क्रमांक 19
दूसरा चरण 

122 122 122 122

ये नफ़रत की फैली जो चिंगारियां हैं।
कहीं गुम हुईं इनमें किलकारियां हैं।।1।।

बहन माँ बहू और पत्नी का जीवन 
हरिक भूमिका में दिखीं नारियां हैं।।2।।

बुजुर्गों से बढ़कर  कहीं उनके अनुभव 
उन्होंने तो खेलीं कई पारियां हैं।।3।।

अमीरी गरीबी में सरहद हमेशा 
निभी कब जो इनमें हुई यारियां हैं।।4।।

 खुशी का दिखावा जो करते हैं अक्सर 
दुखों की दिलों पर चलें आरियां हैं।।5।।

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शर्मिला चौहान

गुरुवार, 25 अप्रैल 2024

व्यंग्य - बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय ( रहिमन फाटे दूध को, मथे ना माखन होय)

व्यंग्य -"बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय 
(रहिमन फाटे दूध को, मथे ना माखन होय)

"घंटे भर से बाथरूम में कैद होकर लाख टाइमपास  कर लो, बात बनेगी नहीं।" कोकिला की कर्कश आवाज़ से मधुर के गाने की तन्मयता भंग हो गई।
"अब बाथरूम के समय का भी हिसाब देना पड़ेगा क्या तुम्हें?" चिढ़कर मधुर तुरंत टॉवेल लपेटता बाहर आ गया।
विजयी मुस्कान लिए कोकिला किचन में गई और मधुर तैयार होने लगा।
सामने आइने में अपना कच्चा-चिट्ठा देख, अपने अस्तित्व को एक क्षण के लिए नकार दिया उसने।‌
सिर पर चमकते चाँद की झलक, अपना पैर पसारे दूर तक पेट का फैलाव, शुभ्र बालों का जनसंख्या की तरह तेजी से विस्तार, सचमुच मधुर   अपने इस बदलाव पर हैरान खड़ा रह गया।

"आज से अपना लंच बॉक्स मत देना, हज़ार बार कहा कि दो रोटी ही दिया करो परंतु नहीं, तीन तीन पराठे और डिब्बे की सांस फूलते तक सब्जी़ ठू़ंँसती हो।" अपने शरीर के फैलाव का सारा दोष मधुर ने कोकिला के माथे पहना दिया।

ऐसे ताज पहनना तो क्या, कोकिला को अपने सिर पर एक क्षण भी ना रखना गंवारा
नहीं था।

अपनी आँखों की पुतलियों को, पलकों से बाहर ढकेलती हुई, कमर में चुन्नी लपेटे, हाथों में बेलन लिए वो किचन से बेडरूम में आ धमकी।
"फलाने चोपड़ा के टिफिन के आलू पराठों की क्या खुशबू आती है, ढिकानी मिताली मैडम के अंडे बिरयानी तो किसी फाइव स्टार से लाए लगते हैं वाह!" ज़रा सांस लेकर बोली, "घर की रोटी-सब्जी नहीं बल्कि मक्खन लगे आलू पंराठे और शुद्ध घी की अंडा बिरयानी लटक रही है शर्ट से बाहर।"  अपनी सारी आहुति हवन में डाल, प्रज्ज्वलित अग्नि को बिना देखे ही वह वापस चली गई।

"शाम को सिर्फ सलाद और सूप ही पियूंँगा।" दृढ़ संकल्प मधुर की आवाज़ में झलक रहा था।
सामने खड़ी स्त्री ने, एक सौ अस्सी अंश पर सिर दांए से बाएं हिलाया और गाने लगी, "हमको मन की शक्ति देना...!" 

डाइनिंग टेबल पर रखे बिस्किट, नमकीन, वैफर्स के पैकेटों को जाते जाते मधुर ने, बाजू की आलमारी के निचले खंड‌ में फेंक दिया और सौ ग्राम वजन कम हो जाने का अहसास लिए ऑफिस निकल गया।

फोन पर सारे सोशल मीडिया, विज्ञापन छानकर पाँच जिमों में फोन घुमाया। 
"कमाल है, जिम जैसी मेहनत वाली जगहों पर कोमल मीठी वाणी से फोन उठाने वाली रिसेप्शनिस्ट रखी जातीं हैं।" मधुर के मन में जिम के प्रति उत्साह बढ़ गया।

लंच टाइम होते होते, पेट ने आसपास से अपनी शिकायत शुरू कर दी। कुलबुलाहट ही आवाज़, चोपड़ा के डिब्बे की महक से कुछ ज़्यादा ही बढ़ गई। 
परेशान होकर मधुर बाहर निकलने लगा कि दोस्तों ‌ने पूछा, "आओ यार, आज टिफिन नहीं लाए क्या? आ जाओ सबके साथ खा लो।"
डिब्बों की सब्जियांँ, मसाले, अचार, चटनी की खुशबू से मधुर की जीभ लार के तालाब में तैर रही थी।

अपने दिल दिमाग के घोड़ों पर लगाम कसकर मधुर ने अति मधुर स्वर में अपनी डाइटिंग, फिटनेस का संकल्प बताया। सिर हिलाते हुए दोस्तों की आँखों में झलकता अविश्वास, मधुर को घायल कर गया।

बाहर भी लंच टाइम का माहौल था। रेस्टोरेंट और आसपास के ठेलों पर लोगों की भीड़ लगी हुई थी। नारियल पानी खरीदकर पीने ही वाला था कि गड़गड़ाते पेट ने फिर गुहार लगाई। 
ठेले से एक वड़ा पाव लेकर, इधर-उधर देखते हुए मुँह में ठूँस लिया उसने। अब तो उदराग्नि भड़क गई थी, पेट और आहुति मांँग रहा था। दूसरा वड़ा पाव अंदर समर्पित कर, आराम से कुर्सी पर बैठकर सिप सिप नारियल पानी पीने लगा।

आत्मिक  संतुष्टि की चरम सीमा थी। कैसी दुनिया है ऊपरी दिखावा जानती है, अंदर सभी का मन एक ही है। इस शरीर से बड़ी आत्मा है हर एक प्राणी में समान है। 
अपने आपको आध्यात्मिक लहरों के बीच पाया मधुर ने। 

ऑफिस के सैकंड हॉफ में, सारे जरूरी काम दिल लगाकर खत्म किए मधुर ने।

जिम क्या था, काँच का बना सुंदर शो-केस जिसमें बड़े बड़े यंत्र-तंत्र सजे थे। कोई अभिमन्यु सा वजन उठाए ललकार रहा था तो कोई मशीन पर दौड़ते दौड़ते अपना पसीना बहा रहा था, कोई गोल बड़ी सी गेंद पर लोट लोट कर घूम रहा था।

"आपको आपकी बॉडी के एकार्डिंग फिटनेस प्लान दिए जाएंगे। पर्सनल ट्रेनर रहेगा, डाइटीशियन के साथ आपकी हर सप्ताह बात होगी। सप्ताह भर का खान-पान गाइडेंस किया जाएगा।" मधुर की कल्पना सेभी ज़्यादा खूबसूरत रिसेप्शनिस्ट सामने खड़ी थी। मधुर ने अनुमान लगाना शुरू किया कि इसकी आवाज़ ज़्यादा अच्छी है या ये खुद।


"इधर आओ, आपका मैज़रमेंट लेना है।" कानों में गरम शीशे की तरह उतरने वाली आवाज़ थी।
कंधों पर रखा उसके हाथ के वजन को मन ही मन आंकता मधुर पीछे मुड़ा। करीब सवा छह फीट ऊँचा, काला, टकला,गठीले बदन का पहलवान नुमा आदमी सामने खड़ा था।
"मुझे कोई कपड़ा-वपड़ा नहीं सिलाना भाई।" मधुर ने उसका हाथ कंधे से हटाने की असफल कोशिश की।
अंगद के पैरों का तो सुना था, उसके हाथों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी उसे। 
"आपके फिटनेस फीस के लिए ही माप रहा हूँ।" कहते हुए उसने मधुर के कंधों पर बैताल की तरह चिपके बैग को निकाल कर, बाजू की मशीन पर लटका दिया।
छाती, पेट, भुजाओं, हिप्स सभी को बारी बारी मापकर उसने अपनी कॉपी में लिख लिया। बड़े ही रहस्यमय अंदाज़ से मुस्कुराते हुए उसने रेट कार्ड समीर को पकड़ा दिया। 

लाल रंग का, बहुत खूबसूरत कार्ड देख समीर पढ़ने लगा।

चैस्ट बढ़ाना:
प्रति इंच मूल्य

पेट कम करना :
प्रति इंच मूल्य

मसल्स मजबूत करना:
बाइसेप्स मूल्य

(जी.एस.टी., डाइटीशियन फीस, स्पेशल ट्रेनर फीस अलग) 

"जब ज्वाइन करोगे तो डाइटीशियन के प्लान के हिसाब से खाना पीना। हर सप्ताह का मील प्लान करतें हैं यहाँ।" कड़क, टका सा जवाब देकर टकला चला गया।‌
मधुर अपने एक्स्ट्रा इंचेस को मन ही मन गिनना चाह रहा था परंतु ये ऑफिस का हिसाब किताब थोड़े ही था जो राव सर के सिर मढ़ कर हाथ झाड़ लिया जाए।

"आइए सर, आपको अपना ऑफिस दिखातीं हूँ।" उस खूबसूरत लड़की की आवाज़ ने कानों में पुनः मिसरी घोल दी। 
मंत्रमुग्ध उसके पीछे-पीछे समीर कब काँच के बने, एयरकंडीशंड ऑफिस में आकर, कुर्सी पर बैठ गया, पता ही नहीं चला।
"आप बिल्कुल फ़िक्र ना करें सर, एक बार हमको ज्वाइन कर लिया तो इस ऑफिस में आपकी भी ऐसी ही डेशिंग फोटो लगेगी।" एक दिलकश अदा से वह उसे चारों तरफ लगी तस्वीरों का परिचय बताने लगी।
उसके अंदाज़ से मधुर को विश्वास हो गया कि दीवारों पर लटकते इन सुंदर, सजीले, आकर्षक नवजवानों का वज़न उससे उन्नीस बीस ही रहा होगा और वह उनके बीच में अपनी फिट फोटो को फिट करने की कोशिश करने लगा।

"मुझ जैसी चार पर्सनल ट्रेनर हैं, आपकी चॉइस से आपको प्रोवाइड की जाएंगी। स्पेशल ट्रीटमेंट से बहुत जल्दी आप एकदम परफेक्ट मॉडल बन जाएंगे।‌बस, इसके लिए थोड़ा एक्स्ट्रा चार्ज रहेगा जो आप दे ही देंगे।" इतना अधिकार और विश्वास तो किसी ने उस पर नहीं किया था, उसने खुद ने भी नहीं।
खुशी से हलका हो, कल्पना के पंख लगाए वह आसमान में अपने आपको ढूंँढने चला।
रोज़ इस खूबसूरत साथी के साथ रिलेक्सिंग समय, हल्की-फुल्की एक्सरसाइज, नपा तुला  बढ़िया सा खाना और फिर दुनिया के इस मंच पर एक चमकते सितारे "मधुर"  का जन्म होगा। अभी मन के घोड़ों को बेलगाम छोड़ दिया था उसने।

"आइए सर, कुछ फार्म पढ़कर आप साइन कर दीजिए। तब तक मैं आपके लिए चाय भिजवाती हूँ।" ऑफिस में कुछ कागज़ों के साथ उसे छोड़कर, वह बाहर चली गई। 

उस फॉर्म को पढ़ता हुआ, नियमों को समझता हुआ जब मधुर, मासिक फीस के कॉलम में आया तो एयरकंडीशन कमरे में भी चेहरे पर कुछ बूँदों के सरकने का अहसास हो गया ‌ 

उसके शरीर के बढ़े हुए इंचेस ने इस कागज़ की गर्मी बढ़ा दी थी। बारह हज़ार महीने का जिम, स्पेशल ट्रेनर। बाद में प्रोटीन, खाने-पीने का अलग। 

आज उसे अपने बढ़े हुए शरीर पर गुस्सा आ रहा था। अरे, अब आदमी हवा पीकर तो नहीं जी सकता ना, दो टाइम खाने पर सुरसा के मुँह की तरह फैल गया।

बड़ी ब्रांड के कप प्लेट में दी हुई हैल्दी ग्रीन टी, मधुर को कसैली और बेस्वाद लगने लगी। सारे कागज़ बैग में भर, उस लड़की से कल‌ आने का वादा कर मधुर तेज़ी से बाहर निकल गया।

बाइक को चार-पांँच बार आदेश दिया पर वो टस से मस नहीं हुई। अपनी सर्विसिंग के लिए उसका भी मुँह फूला था। 
मधुर ने अनुनय विनय किया और सर्विसिंग के आश्वासन का पेट्रोल पाते ही वह स्टार्ट हो गई। आश्वासन के पेट्रोल से तो देश की गाड़ी भी चलती रहती है फिर इस बाइक की क्या बात।

अपने घर से आती सौंधी खुशबू से मधुर विचलित हो गया। 
"हाथ मुँह धोकर आ जाओ, आज तुम्हारी पसंद का खाना बनाया है।" सुबह की आवाज़ और अभी की मिठास से किसी अप्रत्याशित की कल्पना कर ली थी मधुर ने।

"तुमको कहा था ना कि शाम को सिर्फ सलाद और सूप लूँगा। मुझे अपने संकल्प से कोई नहीं हटा सकता।" मधुर ने आवाज़ तेज़ की।

"आज तो हमारे पापा का बर्थडे है इसलिए सब बनाए हैं। मम्मी पापा, भैया भाभी मंदिर दर्शन के लिए गए थे तो आज रात यहाँ रुकते हुए जाएंगे।" कहते हुए कोकिला ने मधुर के हाथ का बैग लेकर अंदर रख दिया।
"पूरी की पूरी दाल ही काली है आज तो।" हाथ पैर धोते हुए मधुर अपनी सास की तीक्ष्ण दृष्टि को शरीर में घुसता महसूस कर रहा था। 

"जो खाए सो खाए, मेरे लिए तो सलाद काट दो बस।" आज मधुर भी अपने संकल्प से हटने को राज़ी नहीं था।

गिलास भर पानी से आई डकारों ने लंच का राज खोलने की पुरजोर कोशिश की।‌
कोकिला की छठी इंद्रिय ने उसे क्या बताया कि वो एक कटोरी खीर सामने पटक गई।

"हमारे मायके वालों के जाने के बाद अपने चोंचले करते रहना, वैसे भी छोटे की शादी तय हो रही है तो मैं तो दो महीने पहले ही चली जाऊंगी मायके, तब शांति से अपनी फिटनेस, डायटिंग करते रहना। सुबह सारी दुनिया वाकिंग करती है, तब तो मुँह ढांके सोते रहते हो और फिटनेस लाएंगे।" 

डाइनिंग टेबल पर विविध व्यंजन सजाती उस अन्नपूर्णा को देख मधुर ने गहरी सांस रोककर, अपने पेट को सपाट दिखाने की प्रेक्टिस शुरू कर दी।

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शर्मिला चौहान