फ़िलबदीह क्रमांक 23
तरही मिसरा- मत कहो आकाश में कोहरा घना है।
2122 2122 2122
मानवों में लुप्त होती भावना है
बस यही धरती की गहरी वेदना है।।1।।
भावनाएं बर्फ़ सी कुछ जम गईं अब
आदमी ही आदमी से अनमना है।।2।।
पेड़ टूटे बाग सूखे मौन कलरव
नेह से अपने इन्हें फिर सींचना है।।3।।
है विषमताओं की बढ़ती दूरियां जो
खुद प्रयासों से उन्हें अब जोड़ना है।।4।।
है समय अब जाग जाए सुप्त मानव
हे प्रभो कर जोड़ तुमसे प्रार्थना है।।5।।
पीठ पर बस्ते दिमागों में भविष्यत
आज बच्चा भूलता बस बचपना है।।6।।
काल बीते सृष्टि की अपनी कलाएं
मौसमों में हर लगे नवयौवना है।।7।।
तरही मिसरा-
नित्य करता सामना सूरज उन्हीं से
मत कहो आकाश में कोहरा घना है।
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आदरणीय अनिल सर एवं आप सभी मित्रों के समीक्षार्थ प्रस्तुत है मेरा प्रयास 🙏-
फ़िलबदीह 23
दूसरा चरण
2122 2122 2122
अपनी धरती से ज़रा सा प्यार कर लें
स्वर्ग धरती पर चलो साकार कर लें।।1।।
फाड़कर छप्पर जो ईश्वर ने दिया सब
बैठ उसके सामने आभार कर लें।।2।।
पीठ पीछे तुम भुनाते रिश्तों को क्यूँ
खोल कर बाज़ार कुछ व्यापार कर लें ।।3।।
चंद कमियांँ हैं हरिक मानव के भीतर
चल हृदय में झाँक कर स्वीकार कर लें।।4।
काम करते बीतता जीवन ये सारा
साल में दो-चार तो इतवार कर लें।।5।।
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शर्मिला चौहान
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