बुधवार, 31 जुलाई 2024

"स्वयं मुक्त है" कविता

"स्वयं मुक्त है"

प्रकृति धरा बादल फूल सब प्रेम युक्त हैं,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।

पर्वत श्रृंखलाओं से कल कल नदियों का बहना,
नाज़ुक अठखेलियों संग सागर की बाँह सिमटना।

ऋतुओं का सुंदर आना-जाना,
पत्तों का गिरना, मुरझाना।
नवपर्णों से वृक्षों का दमकना,
फूल देख भ्रमरों का बहकना।

आल्हादित धरती सारी प्रेम लिप्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।१।।

पंछी, तितली, मछली, कीड़े,
नियमों से बंधे सारे।

नित कर्मयोग में लगे रहें,
सूरज धरती चंदा तारे।

वायु का मंद प्रवाह सुगम, दे प्राण श्वास भरें चेतन।

धरती अंबर की प्रेमकथा,
बन गई बूंँद जल जीवन।

कर्म की इस नियति से सारी प्रकृति युक्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।२।।


बूँदों का सीपियों पर गिरना,
फिर गर्भ में मोती का पलना।

प्यार भरी इन बूँदों से, सृष्टि में जीवन का चलना।

हरि तृणों की नोकों पर,
जब ओस चमक इठलाती है।
मेघों को आँचल से ढंकने,
कभी बदली दौड़ी आती है।

हृदय में भावों का  नवगीत सुप्त है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।३।।

उसांस भरे वसुधा जिस क्षण,
गर्मी की तपन झुलसाती तन।

सूरज जब आँख दिखाता है,
गुलमोहर तब मुस्काता है।

महुआ तेंदु टेसू महके,
बन बाग रहें बहके बहके।

ऋतुओं का रुप सलोना है,
महके जग का हर कोना है।

जड़ चेतन कालचक्र सब अटल नित्य है,
मानव क्यों इस श्रेणी से स्वयं मुक्त है।।४।।

समरसता की सीख धरा जब देती है,
मानव को भी वो अपना कह देती है।

प्रकृति के संकल्प में लीन हो जाना है,
चर अचर का हाथ थाम बढ़ जाना है।

तू प्रकृति का अंग भूल क्यों जाता है,
अहं लपेटे अपना तू इठलाता है।

प्रस्तर में जो दबा भाव अब बहने दे,
दूसरों के साथ ही जीवन चलने दे।

आसपास की सोच जब कदम बढ़ाता है,
मानव, तब सच्चा मानव कहलाता है।।५।।


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शर्मिला चौहान

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