मंगलवार, 23 जुलाई 2024

212 1222 212 1222 पर ग़ज़ल

(आदरणीय अनिल सर द्वारा संशोधित 🙏)

फ़िलबदीह 22 
प्रथम प्रयास 
ई -क़ाफिया 
रदीफ़ -नहीं होती

212 1222  212 1222

दिल्लगी की कुछ बातें, आशिक़ी नहीं होती
चार शेर कह लेना, शायरी नहीं होती।।1।।

पोर पोर महका दे, बावरा जो कर दे मन
बहती हर हवा अक्सर, फागुनी नहीं होती।।2।।

मत्त हो महक जिसकी, खुद में गुम जो कर देती 
हर हरिण में कस्तूरी, वो छुपी नहीं होती।।3।।

चुप्पी की ज़ुबां बेहतर, वार उसके पैने से
ख़ामशी हरिक की तो, बेबसी नहीं होती।।4।।

रंग केसरी गाता, दर्द गान उस माँ का
बेटे की कभी जिसके, वापसी नहीं होती।।5।।


गिरह का शेर-

 फूल कागज़ी खुश्बू को तरसते जीवन‌ भर
बाँस की हरिक टहनी बांसुरी नहीं होती।

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शर्मिला चौहान

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