फ़िलबदीह क्रमांक 24
प्रथम चरण
रदीफ़ - करो
क़ाफिया - आ की मात्रा
11212 11212 11212 11212
जो बिछड़ गए कभी उनसे भी तो मिलन की आस रखा करो।
ज़रा दिल में झांक के देख लो, वहीं रोज़ उनसे मिला करो।।1।।
कभी साथ साथ चले थे जो, वो हैं फ़ासले पे खड़े हुए
वो जो दो कदम भी बढ़ें अगर, दो कदम तो तुम भी चला करो।।2।।
मुझे मुफ़्त में तू मिली नहीं, मेरी ज़िंदगी मेरी ज़िद है तू।
मेरे दिल में तू जो समा गई, सुनो साँस बन के जिया करो।।3।।
खिले फूल अब तो पलाश के, लगी आग ज्यों वसुधा में है।
कहे डर का मारा सूर्य भी, धरा कम ज़रा सा सजा करो।।4।।
न ग़ज़ल बनी न ही गीत ही, न भजन कोई न ही छंद ही।
भरे प्रेम से ये दो शब्द हैं, मेरी प्रीत बन के झरा करो।।5।।
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तरही मिसरा-
मेरे संग बैठ कभी कभी, सुनो गीत फिर वो पुराने ही।
यूँ ही बेसबब न फिरा करो किसी शाम घर भी रहा करो।
शर्मिला चौहान
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फ़िलबदीह क्रमांक 24
दूसरा चरण
11212 11212 11212 11212
ये जो बावली सी चली हवा, कहीं दीप कोई बुझा न दे।
वो झुकी हुई सी जो शाख है, उसे पेड़ से तो गिरा न दे।।1।।
बड़े साहसी हैं जवान वो, डटे रात दिन जो हैं सीमा पे।
रखें ध्यान वो यही हर समय, कोई शत्रु झंडा झुका न दे।।2।।
ज़रा सोचकर तो कहा करो, बड़ी धारदार ज़ुबान है।
चले वो जो ऐसी ही चाल से, किसी दिल पे घाव बना न दे।।3।।
छिपा बदलियों में जो सूर्य तो, विरहिन किरण उसे ढूँढती।
कहे सबसे आँखें तरेर कर, कोई इसको मेरा पता न दे।।4।।
जो मकान खूब चमकते हैं, किसी त्याग का ये तो रंग है।
करो बात तुम कभी नींव से, कहीं तुमको फिर वो रुला न दे।।5।।
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शर्मिला चौहान
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