"गीत"
जगत में गूँजता नित, द्वेष का ही शोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम इक डोर तब है।
रही बढ़ती दनुजता विश्व में
हर बार जब जब।
विजय पाती मनुजता मात दे,
हर बार तब तब।
हृदय को बींधकर भीगी मिले,
इक कोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस प्रेम की
इक डोर तब है।।१।।
पनपती शाख पर कोंपल,
सहमती खूब हर पल।
किलकती मौन हों कलियाँ
बुरा है सोच के कल।
बिखरती आस जीवन की,
निराशा जोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस,
प्रेम की इक डोर तब है।।२।।
महाभारत कथा से सीख
भी लेते नहीं जो
भटकते मोह में फिर ठौर
पाते ना कहीं वो।
हृदय की वेदना का रूप
होता घोर जब है
मनुज को जोड़ती बस,
प्रेम की इक डोर तब है।।३।।
तमस अवसाद का जितना
सघन छाया हुआ हो।
भरम का जाल नैनों से
हृदय आया हुआ हो।
निशा को मात देती रश्मियों
का भोर जब है।
मनुज को जोड़ती बस,
प्रेम की इक डोर तब है।।४।।
शर्मिला चौहान
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